अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८१)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (८१)
पंचदश सर्ग
हनुमान्जीका रामचन्द्रकी स्तुति करना
ध्यात्वा हृदिस्थं प्रणिपत्य मूर्ध्ना बद्धांजलिर्वायुसुतो महात्मा ॥
ओंकारमुच्चार्य विलोक्य देवमंतः शरीरे निहितं गुहायाम् ॥ १ ॥
रामं महात्मानम कुंठशक्तिं सनंदमुख्यैः स्तुतमप्रमेयम् ॥ पुष्टाव च
ब्रह्ममयैर्वचोभिरानंदपूर्णायितमानसः सन् ॥ २ ॥
वह महात्मा महावीरजी हृदयमें ध्यान कर शिरसे प्रणामकर हाथजोडकर ओंकारका उच्चारण देवको देखकर जो प्राणियोंके हृदय की गुहामें स्थित हैं ॥ १ ॥ राम महात्मा अकुंठशक्ति सनन्दादि मुख्योंसे स्तुतिको प्राप्त होते हुए, अप्रमेय भगवान्को आनन्दसे पूर्णमन होकर ब्रह्ममय वचनोंसे प्रसन्न स्तुति करने लगे ॥ २ ॥
त्वामेकमीशं पुराणं प्राणेश्वरं राममनन्तयोगम् ॥ नमामि सर्वान्तर-
सन्निविष्टं प्रचेतसं ब्रह्ममयं पवित्रम् ॥ ३ ॥ पश्यंति त्वां मुनयो
ब्रह्मयोनिं दांताः शांता विमलं रुक्मवर्णम् ॥ ध्यात्वात्मस्थमचलं स्वे
शरीरे कविं परेभ्यः परमं परं च ॥ ४ ॥
तुमही एक ईश पुरुष पुराण प्राणेश्वर अनन्तयोग सबके अन्तरमें स्थित हो, प्रचेतस पवित्र ब्रह्ममय पवित्रको नमस्कार करता हूँ ॥ ३ ॥ ब्रह्मयोनि आपको मुनिजन देखते हैं आप दान्त शान्त विगल रुक्मवर्ण हो, आत्मामें स्थित, परेसे परे तुमको महात्मा देखते हैं ॥ ४ ॥
त्वत्तःप्रसूता जगतःप्रसूतिः सर्वात्मसृष्टेः परमाणुभूतः ॥ अणो-
रणीयान्महतोमहीयांस्त्वामेव सर्वे प्रवदंति संतः ॥ ५ ॥ हिरण्यगर्भो
जगदंतरात्मा त्वत्तोऽधिजातः पुरुषः पुराणः ॥ स जायमानो भवता
विसृष्टो यथाविधानं सकलं ससर्ज ॥ ६ ॥
आपसे सारा जगत् उत्पन्न होता है, आप सर्वात्मा, सृष्टिके परमात्मा भूत हो, सूक्ष्म, बडेसे बड़े, आपको सन्त महात्मा कहते हैं ॥ ५ ॥ हिरण्यगर्भ जगत्के अन्तरात्मा आप पुराणपुरुषसे सब जगत् उत्पन्न होता है, विराटने -
६
(८२) अद्भुतरामायण [पञ्चदश-
आपसेही उत्पन्न होकर सब जगत्को उत्पन्न करके सब विधानको उत्पन्न किया है ॥ ६ ॥
त्वत्तो वेदाः सकलाः संप्रवृत्तास्त्वय्येवान्ते संस्थितिं ते लभंते ।
पश्यामि त्वां जगतो हेतुभूतं नृत्यं तं स्वे हृदये संनिविष्टम् ॥ ७ ॥
त्वयैवेदं भ्राम्यते ब्रह्म चक्रं मायावी त्वं जगतामेकनाथः ॥ नमामि
त्वां शरणं संप्रपद्ये योगात्मानं चित्पतिं दिव्यनृत्यम् ॥ ८ ॥
तुमसे ही सब वेद उत्पन्न हुए हैं, आपमें ही अन्तमें स्थितिको प्राप्त होते हैं, आपको जगत्का हेतुभूत में देखता हूँ, मेरे हृदयमें आप सदैव स्थित हों ॥ ७ ॥ आपहीसे सब ब्रह्माण्डचक्र घुमाया जाता है, आपही जगत्के एक नाथ हो, मैं आपके शरणमें प्राप्त हूँ, आप योगात्मा चित्पति दिव्य नृत्य रूप हो ॥ ८ ॥
पश्यामि त्वां परमाकाशमध्ये नृत्यंतं ते महिमानं स्मरामि ॥
सर्वात्मानं बहुधा संनिविष्टं ब्रह्मानंदमनुभूयानुभूय ॥ ९ ॥ ओंकारस्ते
वाचको मुक्तिबीजं त्वामक्षरं प्रकृतौ गूढरूपम् ॥ त्वं त्वां सत्यंप्रवदंतीह
संतः स्वयंप्रभं भवतो यत्प्रकाशम् ॥ १० ॥
परमाकाशके मध्यमें विराजमान आपको देखता हूं, आप सर्वात्मा अनेक प्रकारसे संनिविष्ट ब्रह्मानन्दको अनुभव करके आपको स्मरण करता हूँ ॥ ९ ॥ ओंकार आपका वाचक मुक्तिबीज है, आप अक्षर प्रकृतिमें गूढरूप हैं, उसे आप सत्यरूपका सन्त वर्णन करते हैं, आप स्वयं रूप प्रकाशमान हो ॥ १० ॥
स्तुवंति त्वां सततं सर्वदेवा नमंति त्वामृषयः क्षीणदोषाः ॥
शांतात्मानः सत्यसंधं वरिष्ठं विशंति त्वां यतयो ब्रह्मनिष्ठाः ॥ ११ ॥
एको वेदो बहुशाखो ह्यनंतस्त्वामेवैकं बोधयत्येकरूपम् ॥ संवेद्यं त्वां
शरणं ये प्रपन्नास्तेषां शांतिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥ १२ ॥
आपकी निरन्तर सब देवता स्तुति करते हैं, क्षीणदोष ऋषि आपको नमस्कार करते हैं, शान्ताराम सत्यसन्ध वरिष्ठ आपमें ब्रह्मनिष्ठ यति प्रवेश करते हैं ॥ ११ ॥ एकही वेद बहु शाखावाला अनन्त है, आपको ही एक रूप बोधित करते हैं, जानने योग्य आपकी शरणमें जो हुए हैं उन्हींको सदा शान्ति है अन्योंको नहीं ॥ १२ ॥
भवानीशोऽणिमादिमां स्तेजोराशिर्ब्रह्महृद्विश्वं परमेष्ठी वरिष्ठः ॥
आत्मानंदं चानुसूयानुशेते स्वयंज्योतिवचनो नित्यमुक्तः ॥ १३ ॥