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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (५१)

तथेत्युक्त्वा जगामाशु ब्रह्मा लोकपितामहः ॥ नरांश्चाजीगणद्रक्षो मत्वा तांस्तृणवद्द्विज ॥ १३ ॥ ब्रह्मदत्तवरो राजा रावणोवरदर्पितः ॥ त्रैलोक्यजयसर्वस्वं प्राप्तवान्बाहुवीर्यतः ॥ १४ ॥

बहुत अच्छा यह कहकर ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये मनुष्योंको तृणके समान मानकर ब्रह्माजीसे मनुष्योंका अवैध्यत्व नहीं मांगा ॥ १३ ॥ ब्रह्माजीके वरदानसे मत्त हुआ रावण बडे पराक्रमसे त्रिलोकीके जय सर्वस्वको प्राप्त हुआ ॥ १४ ॥

एकदा रावणो राजा दंडकारण्यमागतः ॥ तदर्षीन्नग्निकल्पांश्च दृष्ट्वा मनस्यचिंतयत् ॥ १५ ॥ एतान जित्वा हि कथं त्रिलोकीजयभागहम् ॥ एषां वधेन च श्रेयो न पश्यामि महात्मनाम् ॥ १६ ॥

एक समय राजा रावण दण्डकारण्यमें प्राप्त हुआ वहांके अग्निके समान कान्तिमान् ऋषियोंको देखकर विचार करने लगा ॥ १५ ॥ बिना इनके जीते कैसे मैं त्रिलोकीका जीतनेवाला हो सकता हूं और इन महात्माओंके मारनेसे भी मैं मंगल नहीं देखता हूं ॥ १६ ॥

दुरात्मा स विचिंत्यैतत्प्राह तान्मुनिपुंगवान् ॥ अहं सर्वस्य जगतः शास्ताः च जयभागहम् ॥ १७ ॥ भवतां जयमाकांक्षे जयं दत्त द्विजर्षभाः ॥ इत्युक्त्वा स शराग्रेण क्षताच्छोणितमंगतः ॥ १८ ॥

यह विचार कर वह दुरात्मा उन मुनियोंसे कहने लगा में सब जगत्का शास्ता और जयभागी हूं ॥ १७ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आपके जय करनेकी इच्छा करता हूं; हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो ! मुझे जय दो यह कह बाणके अग्रभागको चुभाय उनके शरीरसे रुधिर ॥ १८ ॥

बलादाकृष्य तेषां वै कलशेऽस्थापयत्प्रभुः ॥ तत्र गृत्समदो नाम शतपुत्रपिता द्विजः ॥ १९ ॥ दुहित्रर्थे भार्यया स प्रार्थितो भगवान् मुनिः । लक्ष्मीर्मे दुहिता भूयादित्यसौ कलशे विभुः ॥ २० ॥

बलपूर्वक निकालकर एक कलशमें स्थापन करता हुआ, उनमें एक गृत्समद ब्राह्मण सौ पुत्रका पिता था ॥ १९ ॥ उसने भार्यासहित भगवानसे एक कन्याकी प्रार्थना की थी कि, लक्ष्मी मेरी कन्या होजाय इस प्रकार वह कलशेमें ॥ २० ॥

(५२) अद्भुतरामायण अष्टम-

दुग्धं चाहरहस्तत्र कुशाग्रेण समंत्रतः ॥ स्थापयत्येष नियत-
स्तदहर्निर्ययौ वनम् ॥ २१ ॥ तद्दिने दैवयोगेन कलशे तत्र रावणः ॥
मुनीनां शोणितं स्थाप्य गृहीत्वा स्वगृहं ययौ ॥ २२ ॥
कुशाग्रभागसे दुग्धकी स्थिति करता हुआ और कलशमें दूध रखकर वह
बनको चला गया ॥ २१ ॥ दैवयोगसे रावणने उस दिन उसी कलशमें ब्राह्मणों-
का रुधिर भरा और घरको लेगया ॥ २२ ॥

भार्या मंदोदरीं प्राह कलशं रक्ष सुंदरि ॥ विषादप्यधिकं विद्धि
शोणितं कलशे स्थितम् ॥ २३ ॥ न देयं नापि वा भक्ष्यं मुनीनां
शोणितं त्विदम् ॥ त्रैलोक्यजयलाभेन रावणो लोकरावणः ॥ २४ ॥
और अपनी भार्या मंदोदरीसे कहा हे सुन्दरी ! इस कलशको अच्छी
प्रकारसे रक्षा कर; जो रुधिर इस कलशमें स्थित है उसको विषसे भी तीक्ष्ण
जान ॥ २३ ॥ यह मुनियोंका रुधिर न किसीको देना चाहिये न भक्षण करना
चाहिये, लोकोंका रुवानेवाला रावण त्रिलोकीके जयलाभसे ॥ २४ ॥

देवदानवयक्षाणां गंधर्वाणां च कन्यकाः ॥ आहृत्य रमयामास
मंदरे सह्यपर्वते ॥ २५ ॥ हिमवन्मेरुविंध्याद्रौ रमणीयवने तथा ॥
मंदोदरी तथा दृष्ट्वा पतिं सा हि मनस्विनी ॥ २६ ॥
देव दानव यक्ष और गन्धर्वोंकी कन्या लाकर मन्दर पर्वतपर और सह्यपर्वत-
पर रमता था ॥ २५ ॥ हिमालयमें रमणीय विंध्याचलमें विहार करने
लगा, तब इस प्रकार मंदोदरी अपने पतिको देखकर ॥ २६ ॥

आत्मानं गर्हयामास भर्तुः स्नेहमपश्यती । धिग्जीवितं हि नारीणां
यौवनं कुलमेव च ॥ २७ ॥ वंचिताः पतिना याः स्युस्तस्मान्मे
मरणं वरम् ॥ पुरा रावणसंदिष्टं शोणितं श्वेडतोऽधिकम् ॥ २८ ॥
भर्ताका स्नेह औरोंमें देखकर अपनी निन्दा करने लगी कि, स्त्रियोंके
जीवन और कुलको धिक्कार है ॥ २७ ॥ पतिसे वंचित होकर मेरा मरनाही
अच्छा है पहले जो रावने कहा कि, यह रुधिर तीक्ष्ण है ॥ २८ ॥

पपौ मरणमाकांक्ष्य पतिना वंचिता सती । लक्ष्मीशरणदुग्धेन
मिश्रिताच्छोणितादभूत् ॥ २९ ॥ सद्यो रावणकांताया गर्भो ज्वलन-
सन्निभः । ततो विस्मयमापन्ना सा हि मंदोदरी शुभाः ॥ ३० ॥