अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४३)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (४३)
स्वांगं निरीक्षमाणेण परमप्रेक्षता तथा ।। न गायेदूर्ध्वबाहुश्च
नोर्ध्वदृष्टिः कथंचन ।। ९ ।। हासो भयं क्षुधा कंपः शोकोऽन्यस्य
स्मृतिस्तृषा ।। नैतानि सप्तरूपाणि गानयोगे महामते ।। १० ।।
केवल अपने अंगको देखते ऊपरको भुजा उठाकर वा केवल ऊपरको दृष्टि
देकर ।। ९-।। हँसते हुए डरमें भूखमें कँपा शोक दूसरेकी यादमें प्यासेमें इन
प्रसंगोंमें गान करना उचित नहीं है ।। १० ।।
नैकहस्तेन शस्येत तालसंघट्टनं मुने ।। क्षुधार्तेन भयार्तेन तृषार्तेन
तथैव च ।। ११ ।। गानयोगो न कर्तव्यो नांधकारे कथंचन ।। एव-
मादीनि योग्यानि कर्तव्यानि महामुने ।। १२ ।।
एक हाथसे ताल देकर गान करना उचित नहीं है, भूखे प्यासे घवराये
हुएको ।। ११ ।। किसी प्रकारसे गान योग्य कर्त्तव्य नहीं है; इसी प्रकार अंध-
कारमें भी न गावे, हे महामुने ! इस प्रकारसे योग्य अयोग्य कर्त्तव्य विचारे १२।।
एवमुक्तः स भगवात्रारदो विधिरक्षणे ।। अशिक्षत तथा गीतं
दिव्यवर्षसहस्रकम् ।। १३ ।। ततः समस्तसंपन्नो गीतप्रस्तावका-
दिषु ।। विपंच्यादिषु संपन्नः सर्वस्वरवि भागवित् ।। १४ ।।
जब इस प्रकारसे कहा तब दिव्य सहस्त्र वर्षतक नारदजी गीत सीखते
रहे ।। १३ ।। तब गीतकी प्रस्तावना आदिके पारगामी हुए वीणाके सब
स्वरोंके ज्ञान हुए ।। १४ ।।
अयुतानि च षट्त्रिंशत्सहस्राणि शतानि च ।। स्वराणां भेदयोगेन
ज्ञातवान्मुनिसत्तमः ।। १५ ।। ततो गंधर्वसंघाश्च किन्नराणां तथा
गणाः ।। मुनिना सह संयुक्ताः प्रीतियुक्तास्तु तेऽभवन् ।। १६ ।।
छियालीस सहस्त्र ४६००० स्वरभेदोंको नारदजीने भली प्रकारसे जान
लिया ।। १५ ।। तथा गंधर्व और किन्नरोंके समूह मुनिके संगमें परम प्रीतिका
प्राप्त हुए ।। १६ ।।
गानबंधुं मुनिः प्राह प्राप्य गानमनुत्तमम् ।। त्वां समासाद्य
संपन्नं त्वं हि गीतविशारदः ।। १७ ।। ध्वांकशत्रो महाप्राज्ञ किमवाप्यं
करोमि ते ।। गानबंधुस्ततः प्राह नारदं मुनि पुंगवम् ।। १८ ।।
तब गानबंधुसे नारदजीने कहा, अब मैं तुमको प्राप्त हो उत्तम गानयोगको
प्राप्त हुआ तुम सम्पन्न और गीतविशारद हो ।। १७ ।। हे उलूकराज ! अब मैं
तुम्हारा क्या प्रिय करूं ? तब गानबन्धुने नारदजीसे कहा ।। १८ ।।
(४४) · अद्भुतरामायण [सप्तम-
ब्रह्मणो दिवसे ब्रह्मन्मनवः स्युश्चतुर्दश ॥ ततस्त्रैलोक्यसंप्लाबो
भविष्यति महामुने ॥ १९ ॥ तावन्मे स्याद्यशोभागस्तावन्मे परमं
शुभम् ॥ मनसाध्यापितं मे स्याद्दाक्षिण्यान्मुनिसत्तमः ॥ २० ॥
हे भगवन् ! ब्रह्माके एक दिनमें चौदह मनु बीत जाते हैं उस समय त्रिलोकी नष्ट हो जायगी ॥ १९ ॥ तवतकं मेरा उत्तम यश बना रहे, हे मुनिश्रेष्ठ ! मनसे ही मुझको चतुरताकी प्राप्ति हो जाय ॥ २० ॥
उलूकं प्राह देवर्षिः सर्वं तेऽस्तु मनोगतम् ॥ अतीते कल्पसंयोगे
गरुडस्त्वं भविष्यसि ॥ २१ ॥ गुणगानादच्युतस्य सायुज्यं तस्य
लप्स्यसे ॥ स्वस्ति तेऽस्तु महाप्राज्ञ गमिष्यामि प्रसीद मे ॥ २२ ॥
देवर्षिने उलूकसे कहा, जो तुम्हारी इच्छा है, वह सब होजायगा, एक कल्प बीत जानेपर तू गरुड होगा ॥ २१ ॥ और नारायणके गुण गान करनेके कारण उनकी सायुज्यताको प्राप्त होगा हे महाप्राज्ञ ! आपका मंगल हो मैं जाता हूं तुम प्रसन्न रहो ॥ २२ ॥
एवमुक्त्वा ययौ विप्रो जेतुं तुंबुरुमुत्तमम् ॥ तुंबुरोश्च गृहाभ्याशे
ददर्श विकृताकृतीन् ॥ २३ ॥ कृत्तबाहूरुपादांश्च कृतनासा-
क्षिवक्षसः ॥ कृतोत्तमांगांगुलींश्च छिन्नभिन्नकलेवरान् ॥ २४ ॥
यह कह नारदजी तुम्बुरुके जीतनेको गये, तब तुम्बेरुके घरके निकट विकृत आकारवाले ॥ २३ ॥ हाथ जंघा पैर कटे नासिका वक्षस्थल कटे, छिन्न शिर, कोई अंगुलीसे छिन्न कोई भिन्न कलेवर ॥ २४ ॥
पुंसः स्त्रियश्च विकृतानददर्शायुतशो बहून् ॥ नारदेन च ते
प्रोक्ताः के यूयं कृतविग्रहाः ॥ २५ ॥ नारदं प्रोचुरपि ते त्वया
कृतांगा वयम् ॥ वयं रागाश्च रागिण्योगानेन भिन्नसंधिना ॥ २६ ॥
ऐसी सहस्रों स्त्रियोंको नारदजीने देखकर उनसे पूछा तुम्हारे अंग किसने नष्ट करदिये ॥ २५ ॥ यह सुन उन्होंने नारदजीसे कहा, आपनेही हमारी यह दशा की है, हम राग रागिनी हैं जिस समय आप भिन्न सन्धानसे ॥ २६ ॥
भवता गीयते यर्हि तर्ह्यवस्थेदृशी हि नः ॥ पुनस्तुंबुरुगानेन
च्छिन्नभिन्नप्ररोहणम् ॥ २७ ॥ तुंबुरुर्जीवयत्येष त्वं मारयसि नारद ॥
तदाश्चर्यं महद्दृष्ट्वा श्रुत्वा च विस्मयान्वितः ॥ २८ ॥