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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५७)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५७)

प्रकृतिकी अवस्थावाला, त्रिगुणात्मबीज ऐश्वर्य विज्ञान विराग धर्मोंसे युक्त, चौदह लोकात्मक, जलमें स्थित, आपके रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३१ ॥ विचित्रभेद पुरुष एकनाथ अनन्त भूतोंसे निवासित जगतके अंडसंज्ञक अशेष वेद आद्य तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३२ ॥ अपने तेजसे लोकको भेद पूर्ण रविमंडलमें स्थित तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं सहस्रमूर्धावाले अनन्तशक्ति सहस्रबाहु पुराणपुरुष जलके भीतर शयन करनेवाले नारायणाय आपके रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३३ ॥ कराल डाढोंवाले देवताओंसे नमस्कृत युगान्तकालानलके समान प्रकाशित सम्पूर्ण भूतअण्डके विनाशकारण कालसंज्ञके तुम्हारे रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३४ ॥

फणासहस्रेण विराजमानं भुवस्तलेऽधिष्ठितमप्रमेयम् ॥ अशेष-
भारोद्वहने समर्थं नमामि ते रूपनंतसंज्ञम् ॥ ३५ ॥ अव्याहतैश्वर्यम
युग्मनेत्रं ब्रह्मात्मतानं दरसंज्ञमेकम् ॥ युगांतशेषं दिवि नृत्यमानं
न तोऽस्मि रूपं तव रुद्रसंज्ञम् ॥ ३६ ॥

सहस्रफणोंसे विराजमान पृथ्वीतलमें स्थित अप्रमेय सम्पूर्ण भारके उद्वहन करनेमें समर्थ अनन्तसंज्ञक अव्यौतहतैश्वर्य नेत्रद्वयवाले ब्रह्मानंदमें स्थित स्वर्गमें नाचनेवाले ऐसे तुम्हारे रुद्र रूपको नमस्कार करता हूं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥

प्रहीणशोकं विमलं पवित्रं सुरा सुरैरर्चितपादयुग्मम् ॥ सुकोमलं
देवि विशालशुभ्रं नमामि ते रूपमिदं नमामि ॥ ३७ ॥ एतावदुक्त्वा
वचनं रघुराजकुलोद्वहः ॥ संप्रेक्षमाणो वैदेहीं प्रांजलिः पार्श्वतोऽ
भवत् ॥ ३८ ॥

शोकरहित विमल पवित्र सुर असुरोंसे अर्चित चरणकमल कोमल विशाल शुभ्र इस तुम्हारे रूपको मैं प्रणाम करता हूं ॥ ३७ ॥ राजा रघुकुलनंदन राम हाथ जोडे यह वचन कहते देवीके पार्श्वभागमें स्थित हुए ॥ ३८ ॥

अथ सा तस्य वचनं निशम्य जगतीपतेः ॥ सस्मितं प्राह
भर्त्तारं शृणुष्वैकं वचो मम ॥ ३९ ॥ गृहीतं यन्मया रूपं रावणस्य
वधाय हि ॥ तेन रूपेण राजेंद्र वसामि मानसोत्तरे ॥ ४० ॥

तब जानकी जगत्पतिके वचन श्रवण करके हँसती हुई स्वामीसे बोली हमारा आप एक वचन सुनिये ॥ ३९ ॥ जो मैंने रावणके वधके निमित्त यह रूप धारण किया है इस रूपसे मैं मानसेके उत्तरभागमें निवास करूंगी ॥ ४० ॥

(१५८) अद्भुतरामायण [ षड्विंशति-

प्रकृत्या नीलरूपस्त्वं लोहितो रावणार्र्दितः ।। नीललोहितरूपेण
त्वया सहवसाम्यहम् ।। ४१ ।। गृहाण च वरं राम सखो यदभिकां-
क्षितम् ।। तच्छ्रुत्वा राघवो वीरः प्रतिश्रुत्य गिरौ स्थितिम् ।। ४२ ।।

हे राम तुम प्रकृतिसे नीलरूप हो रावणसे अर्दित होनेसे लोहितवर्ण हुए सो
नीललोहित रूपसे तुम्हारे साथ में निवास करूँगी ॥ ४१ ॥ हे राम ! जिस
वरकी इच्छा हो सो आप मुझसे मांगिये, यह वचन सुन रामचन्द्र उस पर्वतकी
स्थितिको अङ्गीकार कर ॥ ४२ ॥

भारद्वाजांशभागेन ययाचे परमेश्वरीम् ।। देवि सीते महाभागे
दर्शितं रूपमैश्वरम् ।। ४३ ।। हृदयान्नापगच्छेतदिति मे दीयतां वरः ।।
भ्रातरो मम कल्याणि वानरोः सविभिषणाः ।। ४४ ।।

हे भारद्वाज ! अंश भागद्वारा परमेश्वरीसे मांगने लगे, हे महाभागे
देवि सीते ! यह जो तुमने ईश्वर सम्बन्धी रूप दिखाया है ॥ ४३ ॥ यह कभी
मेरे हृदयसे न जाय यही वर मुझे दीजिये । हे कल्याणी ! मेरे भ्राता वानर
और विभीषणादि सुहृद् ॥ ४४ ॥

सेनान्यो मम वैदेहि अयोध्यायोधमुख्यकाः ।। सुपुनस्ते संगताः
संतु मया रावणतर्जिताः ।। ४५ ।। एतस्मिन्नंतरे चाभूदाकाशे दुंदुभि-
स्वनः ।। पपात पुष्पवृष्टिश्च रामसीतोपरि द्विज ।। ४६ ।।

हमारे सब सेनाके लोग अयोध्याके मुख्य जो रावणसे तर्जित हो गये हैं वे
सब मुझसे फिर मिल जायँ ॥ ४५ ॥ उसी समय आकासे दुन्दुभीका शब्द
होने लगा, राम सीताके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी ॥ ४६ ॥

प्रहस्य सीता पुनराह रामं तथेति रामोऽपि विरिंचिमुख्यान् ।।
स तान्विसृज्य प्रतिगृह्य सीतां गंतुं स्वकं देशमसावियेष ।। ४७ ।।

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे श्रीराम-
विजयो नामषड्विंशतितमः सर्गः ।। २६ ।।

तब हँसकर जानकी रघुनाथजीसे कहने लगीं कि, ऐसाही होगा तब
रघुनाथजी ब्रह्मादिक देवताओंको बिदा कर सीता ले अपने देश जानेकी इच्छा
करने लगे ॥ ४७ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रा. अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां श्रीरामविजयो नाम षड्विंशतितम
सर्गः ।। २६ ।।