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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ], हिन्दीटीकासहित (१५५)

सर्ग ], हिन्दीटीकासहित (१५५)

सब देवताओंके इद्र, ब्रह्मज्ञानियोंके ब्रह्मा हो, सांख्योंमें कपिलदेव, रुद्रोंमें शंकर हो ।। १७ ।। आदित्योंमें उपेन्द्र और वसुओंमें पावक हो, वेदोंमें सामवेद और छंदोंमें गायत्री हो ।। १८ ।।

अध्यात्मविद्या विद्यानां गीतानां परमा गतिः ।। माया त्वं
सर्वशक्तीनां कालः कलयतामपि ।। १९ ।। ॐकार सर्वगुह्यानां
वर्णानां च द्विजोत्तमः ।। आश्रमाणां गृहस्थस्त्वमीश्वराणां महेश्वरः ।। २० ।।

विद्यामें अध्यात्मविद्या गतियोंमें परमगति सर्वशक्तियोंकी माया और कलित करनेवालोंमें काल तुम हो ।। १९ ।। सम्पूर्ण गुह्योंमें ॐकार तुम हो, वर्णोंमें ब्राह्मण, आश्रमोंमें, गृहस्थ, और ईश्वरोंमें महेश्वर तुम हो ।। २० ।।

पुंसां त्वमेव पुरुषः सर्वभूत हृदि स्थितः ।। सर्वोपनिषदां देवि
गुह्योपनिषदुच्यसे ।। २१ ।। ईशानं चासि भूपानां युगानां कृतमेव
च ।। आदित्यः सर्वमार्गाणां वाचां देवि सरस्वती ।। २२ ।।

पुरुषोंमें पुरुष सब भूतोंके हृदयमें तुम स्थित हो हे देवि ! सम्पूर्ण उपनिषदोंमें गुप्त उपनिषद् तुम हो ।। २१ ।। राजोंमें ईशता, और युगमें सतयुग तुम हो, अर्चिरादि सब मार्गोंमें आदित्य, वाणियोंमें सरस्वती देवी तुम हो ।। २२ ।।

त्वं लक्ष्मीश्चारुरूपाणां विष्णुर्मायाविनामपि ।। अरुंधती सतीनां
त्वं सुपर्णः पततामसि ।। २३ ।। सूक्तानां पौरुषं सूक्तं ज्येष्ठं साम च
सामसु ।। सावित्री ह्यसि जप्यनां यजुषां शतरुद्रियम् ।। २४ ।।

सुन्दर रूपवालोंमें लक्ष्मी मायावियोंमें विष्णु, सतियोंमें अरुन्धती, पक्षियोंमें गरुड तुम हो ।। २३ ।। वेदके सूक्तोंमें पुरुषसूक्त साममें ज्येष्ठ साम, जपोंमें सावित्री, और यजुओंमें शतरुद्रिय तुम हो ।। २४ ।।

पर्वतानां महामेरुरनन्तो भागिनामसि ।। सर्वेषां त्वं परंब्रह्म
त्वन्मयं सर्वमेवहि ।। २५ ।। रूपं तवाशेषकलाविहीनमगोचरं निर्मलमेकरूपम् ।। अनादिमध्यान्तमनन्तमाद्यं नमामि सत्यं तमसः
परस्तात् ।। २६ ।।


१ अर्चिरादिमार्गाणाम् ।
१ कलाः कलनानि परिच्छेदा इति यावत् । कल संख्याने । यावत्परिच्छेदशून्यमपरिच्छिन्नमिति यावत् ।

(१५६) अद्भुतरामायण [षड्विंशति

पर्वतोंमें मेरु भोगियों (सर्पों) में अनन्त, सबके परब्रह्म तुम हो यह सब तुममें हैं ॥ २५ ॥ तुम्हारा रूप सब कालसे विहीन अगोचर निर्मल एक है, आदि अन्त मध्यरहित अनन्त तुमसे परे, सबकी आदि तुमको मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २६ ॥

यदेव पश्यंति जगत्प्रसूतिं वेदांतविज्ञानविनिश्चतार्थाः ॥ आनन्द-
मात्रं परमाविधान तदेव रूपं प्रणतोऽस्मि नित्यम् ॥ २७ ॥ अशेष-
सूत्रांतरसन्निविष्टं प्रधानसंयोगवियोगहेतुः ॥ तेजोमयं जन्मविना-
शहीनं प्राणाभिधानं प्रणतोऽस्मि रूपम् ॥ २८ ॥

जो वेदान्तके विज्ञानसे निश्चित अर्थवाले होकर इस जगत्की प्रसूति तुमको जब देखते हैं, आनन्द मय परम तुम्हारे रूपको मैं नित्य प्रणाम करता हूँ ॥ २७ ॥ सम्पूर्णके सूत्रांतरमें सन्निविष्ट प्रधानसंयोगवियोगके हेतु तेजोमय जन्मविनाशसे हीन प्राणरूप तुमको मैं नित्य नमस्कार करता हूं ॥ २८ ॥

आद्यंतहीनं जगदात्मरूपं विभिन्नसंस्थं प्रकृतेः परस्तात् ॥ कूट-
स्थमव्यक्तवपुस्तवैव नमामि रूपं पुरुषाभिधानम् ॥ २९ ॥ सर्वाश्रयं
सर्वजगन्निधानं सर्वत्रगं जन्मविनाशहीनम् ॥ नतोऽस्मि ते रूपमणु-
प्रभेदमाद्यं महत्त्वे पुरुषानुरूपम् ॥ ३० ॥

आदि अन्तमें हीन. जगत्के आत्मरूप विभिन्नसंस्थावान्, प्रकृतिसे परे, कूटस्थ अव्यक्त शरीर पुरुषरूप तुमको नित्य नमस्कार करता हूं ॥ २९ ॥ सबके आश्रय, सर्व जगत्के निधान, सब स्थानमें जानेवाले जन्मविनाशसे रहित, अणुप्रभेद आद्य महत्त्व पुरुष अनुरूप तुम्हारे रूपको मैं प्रणाम करता हूं ॥ ३० ॥

प्रकृत्यवस्थं त्रिगुणात्मबीजमैश्वर्यविज्ञानविरागधर्मैः ॥ समन्वितं
देवि नतोऽस्मि रूपं द्विसप्तलोकात्मकमंबुसंस्थम् ॥ ३१ ॥ विचित्र-
भेदं पुरुषैकनाथमनंत भूतैर्विनिवासितं ते ॥ नतोऽस्मि रूपं जगदंड-
संज्ञमशेषवेदात्मकमेकमाद्यम् ॥ ३२ ॥ स्वतेजसा पूरितलोकभेदं
नमामि रूपं रविमंडलस्थम् ॥ सहस्रमूर्द्धानमनंतशक्तिं सहस्रबाहुं
पुरुषं पुराणम् ॥ शयानमंतः सलिले तवैव नारायणाख्यं प्रणतोऽस्मि
रूपम् ॥ ३३ ॥ दंष्ट्राकरालं त्रिदशाभिवंद्यं युगांतकालानलकल्प-
रूपम् ॥ अशेषभूतांडविनाश हेतुं नमामि रूपं नव कालसंज्ञम् ॥ ३४ ॥