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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५३)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५३)

षड्विंशति सर्ग

श्रीरामविजयवर्णन

एवं नामसहस्रेण स्तुत्वाऽसौ रघुनंदनः ॥ भूयः प्रणम्य प्रीतात्मा प्रोवाचेदं कृतांजलिः ॥ १ ॥ यदेतदैश्वरं रूपं घोरं ते परमेश्वरि ॥ भीतोऽस्मि सांप्रतं दृष्ट्वा रूपमन्यत्प्रदर्शय ॥ २ ॥

इस प्रकार रघुनन्दन सहस्रनामसे स्तुति करे फिर हाथ जोड प्रणाम कर जानकीसे कहने लगे ॥ १ ॥ हे परमेश्वरी ! जो यह तेरा घोर परमेश्वर सम्बन्धी रूप है इससे मैं भीत हो रहा हूं इस कारण इसे शान्त करे सौम्यरूप दिखाओ ॥ २ ॥

एवमुक्ताथ सा देवी तेन रामेण मैथिली ॥ संहृत्य दर्शयामास स्वं रूपं परमं पुनः ॥ ३ ॥ कांचनांबुरुहप्रख्यं पद्मोत्पलसुगंधिकम् ॥ सुनेत्रं द्विभुजं सौम्यं नीलालकविभूषितम् ॥ ४ ॥

जब रामने मैथिली जानकीसे ऐसा कहा तब जानकीने अपना रूप शान्त कर सौम्यरूप दिखलाया ॥ ३ ॥ जो कञ्चनके कमलके समान पद्मदलके समान, सुगंधिवाला सुन्दर नेत्र दो भुजा, नीली अलकोंसे विभूषित ॥ ४ ॥

रक्तपादांबुजतलं सुरक्तकर पल्लवम् ॥ श्रीमद्विशालसदवृत्तललाटतिलकोज्ज्वलम् ॥५॥ भूषितं चारुसर्वांगं भूषणैरभिशोभितम्॥ दधानं सुरसां मालां विशालां हेमनिर्मिताम् ॥ ६ ॥ ईषस्मितं सुबिम्बोष्ठं नूपुरांबरसंयुक्तम् ॥ प्रसन्नवदनं दिव्यमनन्तमहिमास्पदम् ॥ ७ ॥ तदीदृशं समालोक्य रूपं रघुकुलोत्तमः ॥ भीतिं संत्यज्य हृष्टात्मा बभाषे परमेश्वरीम् ॥ ८ ॥

लाल चरण लाल करपल्लव श्रीमान् विशाल सद्वृत्त ललाटके ऊपर उज्ज्वल तिलक लगाये ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण सुन्दर अंग भूषणोंसे शोभित विशाल सुवर्णनिर्मित सुरमाला धारण किये ॥ ६ ॥ कुछेक हास्ययुक्त बिम्बाफलके समान ओष्ठ, नूपुर और अम्बरसे संयुक्त प्रसन्नमुख दिव्य और अनन्तमहिमाका स्थान ॥ ७ ॥ रघुनाथजी जानकीका इस प्रकारका रूप देखकर भयको त्याग प्रसन्न हो परमेश्वरीसे कहने लगे ॥ ८ ॥

(१५४) अद्भुतरामायण [ षड्विंशति-

अद्य मे सफलं जन्म अद्य मे सफलं तपः ॥ यन्मे साक्षात्त्वमक्ता प्रसन्ना दृष्टिगोचरा ॥ ९ ॥ त्वया सृष्टं जगत्सर्वं प्रधानाद्यं त्वयि स्थितम् ॥ त्वय्येव लीयते देवि त्वमेव च परागतिः ॥ १० ॥

आज मेरा जन्म और तप सफल है जो तुम अव्यक्ता साक्षात् मेरी दृष्टिके सन्मुख हुई हो और प्रसन्न हुई हो ॥ ९ ॥ तुमनेही सब जगत् निर्माण किया है और यह प्रधानादि दुतुममें स्थित है. हे देवि ! यह अन्तमें तुममेंही लय हो जाता है, तुमही परागति हो ॥ १० ॥

वदंति केचित्त्वामेव प्रकृतिं विकृतेः परम् ॥ अपरे परमात्मज्ञाः शिवेति शिवसंश्रये ॥ ११ ॥ त्वयि प्रधानं पुरुषो महान्ब्रह्मा तथेश्वरः ॥ अविद्या नियमिर्माया कालाद्याः शतशोऽभवन् ॥ १२ ॥

कोई तुमहीको प्रकृतिसे विकृतिसे परे कहते हैं. परमात्माके जाननेवाले शिवके आश्रयमें शिवा कहते हैं ॥ ११ ॥ तुममें प्रधान पुरुष महान् ब्रह्मा ईश्वर अविद्या नियति माया कालादि सैकड़ों होते हैं ॥ १२ ॥

त्वं हि सा परमा शक्तिरनंता परमेष्ठिनी ॥ सर्वभेदविनिर्मुक्ता सर्वभेदाश्रया निजा ॥ १३ ॥ त्वामधिष्ठाय योगेशि पुरुषः परमेश्वरीम् ॥ प्रधानाद्यं जगत्कृत्स्नं करोति विकरोति च ॥ १४ ॥

तुम अनन्त परमेष्ठिनी परमशक्ति हो सब भेदोंसे निर्मुक्त सब भेदोंके आश्रयवाली निजस्वरूप ॥ १३ ॥ हो हे योगेशि ! तुम परमेश्वरको प्राप्त होकर पुरुष प्रधानादि सब जगत्को निर्माण कर फिर संहार करती है ॥ १४ ॥

त्वयैव संगतो देवः स्वमानंदं समश्नुते ॥ त्वमेव परमानन्दस्त्वमेवानन्ददायिनी ॥ १५ ॥ त्वमेव परमं व्योम महाज्योतिर्निरंजनम् ॥ शिवं सर्वगतं सूक्ष्मं परं ब्रह्म सनातनम् ॥ १६ ॥ त्वं शक्रः सर्व-देवानां ब्रह्मा ब्रह्मविदामपि ॥ सांख्यानां कपिलो देवो रुद्राणामसि शंकरः ॥ १७ ॥ आदित्यानामुपेंद्रस्त्व वसूनां चैव पावकः ॥ वेदानां सामवेदस्त्वं गायत्री छन्दसामपि ॥ १८ ॥

तुम्हारी संगतिसे अपने देव अपने आनन्दको प्राप्त होता है, तुमही परमानंद और आनंदकी देनेवाली हो ॥ १५ ॥ तूही । परमाकाश महाज्योति निरञ्जन है, शिव सर्वगत सूक्ष्म परब्रह्म सनातन है ॥ १६ ॥ तुम


१ स्वके नित्ये निजं त्रिष्वित्यमराञ्चित्या ।