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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५१)

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१५१)

प्रत्यक्ष देवता ९५० दिव्या, दिव्यगंधवाली, दिवापरा, इन्द्रके आसनपर प्राप्त होनेवाली, शक्रकी शक्ति, साध्वी, नारी, शवकी भक्षण करनेवाली ॥ १४५ ॥ इष्टा, विशिष्टा, ९६० शिष्टोंको इष्टरूप, शिष्ट अशिष्टोंसे पूजित, शतरूपा, शतावर्त्ता, विनीता, मनोहरा, सुगन्धियुक्ता, सुरा, ॥ १४६ ॥

सुरेंद्रमाता सुद्युम्ना ९७० सुषुम्ना सूर्यसंस्थिता ॥ समीक्षा सप्रतिष्ठा च निर्वृत्तिर्ज्ञानपारगा ॥ १४७ ॥ धर्मशास्त्रार्थकुशला धर्मज्ञा धर्मवाहना ॥ धर्माधर्माविनिर्मात्री ९८० धार्मिकाणां शिवप्रदा ॥ १४८ ॥

सुरेन्द्रकी माता, सुद्युम्ना ९७० सुषुम्नानाडीरूप, सूर्यमें स्थित, समीक्षा; सत्में प्रतिष्ठित, निर्वृत्तिस्वरूप, ज्ञानकी पारगामिनी ॥ १४७ ॥ धर्मशास्त्रके अर्थमें कुशल, धर्मकी जानने वाली, धर्मवाहना, धर्म अधर्मकी निर्माण करनेवाली, ९८० धर्मात्माओंको मंगल देनेवाली ॥ १४८ ॥

धर्मशक्तिर्धर्ममयी विधर्मा विश्वधर्मिणी ॥ धर्मांतरा धर्ममध्या धर्मपूर्वा धनप्रिया ॥ १४९ ॥ धर्मोपदेशा ९९० धर्मात्मा धर्मलभ्या धराधरा ॥ कपाली शाकलामूर्तिः कलाकलितविग्रहा ॥ १५० ॥

धर्मशक्ति, धर्ममयी, विधर्मा, संसारके धर्मवाली, धर्ममें अन्तरवाली, धर्ममध्यवाली, धर्मसे पूर्वस्थित, धनप्रिया ॥ १४९ ॥ धर्मके उपदेशवाली, ९९० धर्मात्मा, धर्मसे प्राप्त होनेवाली, पृथिवीकी धारण करनेवाली, कपाली, शाकलामूर्ति, कलाकलितशरीरवाली, ॥ १५० ॥

सर्वशक्तिविनिर्मुक्ता सर्वशक्त्याश्रया ॥ सर्वा सर्वेश्वरी १००० सूक्ष्मा सुसूक्ष्मज्ञान रूपिणी ॥ १५१ ॥ प्रधानपुरुषेशाना महापुरुषसाक्षिणी ॥ सदा शिवा वियन्मूर्तिदेवमूर्तिरमूर्तिका ॥ १००८ ॥ १५२ ॥

सब शक्तियोंसे पृथक् सब शक्तियोंके आश्रयवाली सर्वरूप सर्वेश्वरी १००० सूक्ष्मा, अत्यन्त सूक्ष्म ज्ञानके रूपवाली ॥ १५१ ॥ प्रधान पुरुष, ईशाना, महापुरुषकी साक्षिणी सदाकल्याणरूपा, आकाश मूर्ति, देवमूर्ति, मूर्तिरहित १००८ तुम हो तुम्हारे निमित्त नमस्कार है ॥ १५२ ॥

एवं नाम्नां सहस्रेण तुष्टाव रघुनंदनः ॥ कृतांजलिपुटो भूत्वा सीतां हृष्टतनूरुहाम् ॥ १५३ ॥ भारद्वाज महाभाग यश्चैतस्तोत्रमद्भुतम् ॥ पठेद्वा पाठयेद्वापि स याति परमं परम् ॥ १५४ ॥

(१५२) अद्भुतरामायण [ पंचविंशति

इस प्रकार हाथ जोडे प्रसन्नमन रोमांचशरीर हो रघुनन्दनने जानकीको प्रसन्न किया ॥ १५३ ॥ हे भारद्वाज महाभाग ! जो कोई इस अद्भुत स्तोत्रको सुनता है पढता है वा पढाता है वह परमपदको जाता है ॥ १५४ ॥

ब्रह्मक्षत्रियविड्योनिर्ब्रह्म प्राप्नोति शाश्वतम् ॥ शूद्रः सद्गतिमा-
प्नोति धनधान्यविभूतयः ॥ १५५ ॥ भवंति स्तोत्रमाहात्म्यादेत-
त्स्वस्त्ययनं महत् ॥ मारीभये राजभये तथा चोराग्निजे भये ॥ १५६ ॥

ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शाश्वत ब्रह्मको प्राप्त होते हैं और शूद्रको सद्गति तथा धन धान्यकी प्राप्ति होती है ॥ १५५ ॥ इस स्तोत्रके माहात्म्यसे परम मंगल होता है महामारीभय राजभय चोर अग्निका भय ॥ १५६ ॥

व्याधीनां प्रभवे घोरे शत्रूत्थाने च संकटे ॥ अनावृष्टिभये विप्र
सर्वशांतिकरं परम् ॥ १५७ ॥ यद्य दिष्टतमंयस्य तत्सर्वंस्तोत्रतो
भवेत् ॥ यत्रैतत्पठ्यते सम्यक् सीतानामसहस्रकम् ॥ १५८ ॥

महाघोर व्याधि शत्रुओंके संकटमें अनावृष्टिके भयमें सब प्रकारकी शान्ति होती है ॥ १५७ ॥ जो जो इसको इष्ट हो वह सब इस स्तोत्रके पाठसे हो जाता है यह सीतासहस्रनाम पढा जाता है ॥ १५८ ॥

रामेण सहिता देवी तत्र तिष्ठत्यसंशयम् ॥ महापापातिपापानि-
विलयं यांति सुव्रत ॥ १५९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे सीतासहस्रनाम-
स्तोत्रकथनं नाम पंचविंशतितमः सर्गः ॥ २५ ॥

वहां रामके सहित देवी स्थित होती है इसमें संदेह नहीं । हे द्विज ! महापाप औय घोरपाप भी इससे छूट जाते हैं ॥ १५९ ॥

इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये अद्भुतोत्तरकाण्डे पंडितज्वालाप्रसादमिश्रकृत भाषाटीकायां सीतासहस्रनामस्तोत्रकथनं नाम पंच विंशतितमः सर्गः ॥ २५ ॥