अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित (१३७)
प्राणेश्वरी, प्राणरूपा, प्रधानपुरुषेश्वरी, सर्वशक्ति, कला काष्ठा, चन्द्रमाकी ज्योत्स्ना ७०, महिमाके स्थानवाली ॥ २५ ॥ सब कार्यकी नियंत्री, सर्वभूतेश्वरोंकी ईश्वरी, अनादि, अव्यक्तगुण, महानंदा, सनातनी ॥ २६ ॥
आकाशयोनियोंनस्था सर्वयोगेगेश्वरेश्वरी ॥ ८० ॥ शवासना चितांतःस्था महेशी वृषवाहना ॥ २७ ॥ बालिकातरुणी वृद्धा वृद्धमाता जरातूरा ॥ महामाया ९० सुदुष्पूरा मूलप्रकृतिरीश्वरी । २८ ।
आकाशसे उत्पन्न होनेवाली, योगमें स्थित सर्वयोगेश्वरोंकी ईश्वरी ८०, शवासना, चिताके अंतमें स्थित, महेशी, वृषवाहनवाली ॥ २७ ॥ बालिका, तरुणी, वृद्धा, वृद्धमाता, जरासे आतुर महामाया ९०, सुदुष्पूर, मूलप्रकृति, ईश्वरी ॥ २८ ॥
संसारयोनिःसकला सर्वशक्तिसमुद्भवा ॥ संसारसारा दुर्बारा दुर्निरीक्ष्यादुरासदा १०० । २९ ॥ प्राणशक्तिः प्राणविद्यायोगिनीपरमा कला ॥ महाविभूतिर्दुर्घर्षा मूलप्रकृतिसम्भवा ॥ ३० ॥
संसारयोनि, सर्वस्वरूपा, सब शक्तिसे उत्पन्न होनेवाली, संसारसारा, दुर्बारा, कठिनतासे नेत्रगोचर होनेवाली, दुरासद १०० ॥ २९ ॥ प्राणशक्ति, प्राणविद्या, योगिनी, परमा, कला, महाविभूति, दुर्धर्षा मूलप्रकृतिसे उत्पन्न होनेवाली ॥ ३० ॥
अनाद्येनन्तविभवा परात्मा पुरुषो बली ॥ ११० ॥ सर्गस्थित्यंतकरणी सुदुर्वाच्या दुरत्यया ॥ ३१ ॥ शब्दयोनिश्र्शब्दमयी नादाख्या नादविग्रहा ॥ प्रधानपुरुषातीता प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥
अनादि अनंत ऐश्वर्यंवाली, परमात्मा, पुरुष, बली ११० सृष्टिकी स्थिति और अंत करनेवाली, कहनेमें न आनेवाली, दुरत्यय ॥ ३१ ॥ शब्दसे उत्पन्न होनेवाली, शब्दमयी, नाद नामवाली, तथानादविग्रहवाली, प्रधानपुरुषसे परे, प्रधानपुरुषात्मिका ॥ ३२ ॥
पुराणी १२० चिन्मयी पुंसामादिः पुरुषरूपिणी ॥ भूतांतरात्मा कूटस्था महापुरुषसंज्ञिता ॥ ३३ ॥ जन्ममृत्युजरातीता सर्वशक्तिसमन्विता ॥ व्यापिनी चानवच्छिन्ना १३० प्रधाना सुप्रवेशिनी ॥ ३४ ॥
पुराणी १२० चिन्मयी, पुरुषोंमें आदि पुरुषके रूपवाली, भूतांतरात्मा, महापुरुष नामवाली ॥ ३३ ॥ जन्म मृत्यु जरासे परे, सब शक्तिसे संयुक्त, व्यापिनी, अनवच्छिन्ना १३०, प्रधानमें प्रवेश करनेवाली ॥ ३४ ॥
( १३८ ) अद्भुतरामायण [ पञ्चविंशति-
क्षेत्रज्ञा शक्तिरव्यक्तलक्षणा मलवर्जिता ॥ अनादिमायासंभिन्ना
त्रितत्त्वा प्रकृतिर्गुणः १४० ॥ ३५ ॥ महामाया समुत्पन्ना तामसी
पौरुषं ध्रुवा ॥ व्यक्ताव्यक्तात्मिका कृष्णा रक्तशुक्लाप्रसूतिका ३६
क्षेत्रकी जाननेवाली, शक्ति अव्यक्तलक्षणा, मलसे वर्जित्, अनादिमायासे
संभिन्न, त्रितत्त्वा प्रकृति गुणस्वरूप १४० ॥ ३५ ॥ महामायासे समुत्पन्न
तामसी ध्रुव पुरुषार्थवाली, व्यक्त अव्यक्तात्मिका, कृष्णाशुक्लप्रसूतिका ३६
स्वकार्या १५० कार्यजननी ब्रह्मास्या ब्रह्मसंश्रया ॥ व्यक्ता प्रथ-
मजा ब्राह्मी महती ज्ञानरूपिणी ॥ ३७ ॥ वैराग्यैश्वर्यधर्मात्मा ब्रह्म
मूर्ति १६० हृदिस्थिता ॥ जयदा जित्वरी जैत्री जयश्रीर्जयशालिनी ३८
स्वकार्या १५० कार्यकी जननी, ब्रह्मके आश्रयभूत (ब्रह्मसंश्रयवाली)
प्रगट, प्रथम उत्पन्न होनेवाली, ब्राह्मी, महती, ज्ञानरूपिणी ॥ ३७ ॥ वैराग्य,
ऐश्वर्य धर्मात्मा, ब्रह्ममूर्ति १६०, हृदयमें स्थित, जयदाता, शीघ्र जीतनेवाली,
जैत्री, जयलक्ष्मी, जययुक्त ॥ ३८ ॥
सुखदा शुभदा सत्या शुभा १७० संक्षोभकारिणी ॥ अपां योनिः
स्वयंभूतिर्मानसी तत्त्वसंभवा ॥ ३९ ॥ ईश्वराणी च शर्वाणी शंकरा-
र्द्धशरीरिणी ॥ भवानी चैव रुद्राणी १८० महालक्ष्मीरथांबिका ४०
सुखदायक, शुभदायक, शुभा १७०, संक्षोभ करनेवाली, जलोंकी योनि,
स्वयंभूति, मानसी, तत्त्वसंभवा ॥ ३९ ॥ ईश्वराणी, शर्वाणी, शंकरके
अर्द्धशरीरवाली भवानी, रुद्राणी १८० महालक्ष्मी, अम्बिका ॥ ४० ॥
माहेश्वरी समुत्पन्ना भुक्तिमुक्तिफलप्रदा ॥ सर्वेश्वरी सर्ववर्णा
नित्या मुदितमानसा ॥ ४१ ॥ ब्रह्मेंद्रोपेंद्रनमिता शंकरेच्छानुवर्तिनी
१९० ॥ ईश्वराद्धासिनगता रघूत्तमपतिव्रता ॥ ४२ ॥
माहेश्वरी, प्रगट होनेवाली, भुक्ति मुक्तिका फल देनेवाली, सर्वेश्वरी,
सुवर्णयुक्ता, नित्या, मुदित मनवाली ॥ ४१ ॥ ब्रह्मा इन्द्र उपेन्द्रसे निमत,
शंकरकी इच्छासे वर्तनेवाली १९० ईश्वरके अर्धआसनमें प्राप्त, रघुश्रेष्ठकी
पतिव्रता ॥ ४२ ॥
सकृद्विभाविता सर्वा समुद्रपरिशोषिणी ॥ पार्वती हिमवत्पुत्री
परमानन्ददायिनी ॥ ४३ ॥ गुणाढ्या योगदा २०० योग्या ज्ञान-
मूर्तिर्विकाशिनी ॥ सावित्री कमला लक्ष्मीश्रीननंतोरसि स्थिता ४४ ।