अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)
Adbhut Ramayana Hindi
महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा
स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)
सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( १२७)
निर्मांसगात्र्यः श्वेताश्च तथा कांचनसंनिभाः ॥ कृष्णमेघ-
निभाश्चान्या धूम्राश्च द्विजपुङ्गव ॥ ५७ ॥ अरुणाभा महाभागा
दीर्घकेश्यः सिताम्बराः ॥ ऊर्ध्ववेणीधराश्चैव पिंगाक्ष्यो लंब-
मेखलाः ॥ ५८ ॥
निर्मांस गात्रेवाली, श्वेता, कांचनके समान, कृष्णमेघके समान कोई धूम्रवर्ण वाली ॥ ५७ ॥ अरुणाभा, महाभागा, दीर्घवालोंवाली, श्वेतवस्त्र पहरे, ऊर्ध्ववेणी धारे, पिंगाक्षी, लम्बायमान मेखला ॥ ५८ ॥
लंबोदर्यो लम्बकर्ण्यस्तथा लम्बपयोधराः ॥ ताम्राक्ष्यस्ताम्र-
वर्णाश्च हर्यक्ष्यश्च तथापराः ॥ ५९ ॥ शत्रूणां विग्रहे नित्यं भय-
दास्ता भवन्त्यपि ॥ कामरूपधराश्चैव जवे वायुसमास्तथा ॥ ६० ॥
लम्बे पेट, लम्बे कानवाली लम्बे पयोधरवाली, ताम्रवर्णके नेत्रवाली हर्यक्षी ॥ ५९ ॥ शत्रुओंके विग्रहमें नित्य भय देनेवाली होती हैं वे कामरूप धारिणी वेगमें वायुके समान हैं ॥ ६० ॥
शिरांसि रक्षसां गृह्य गंडशैलोपमान्यपि ॥ चिक्रीडुः सीतया सार्द्धं
तस्मिन् रणधरातले ॥ ६१ ॥ मुंडमालाधराश्चैव काश्चिन्मुण्ड विभू-
षणाः । रणांगणे महाघोरे गृध्रकंकशिवान्विते ॥ ६२ ॥
पर्वतशिखरके समान राक्षसोंके शिरको ग्रहण कर धरातलमें जानकीके साथ क्रीडा करने लगीं ॥ ६१ ॥ कोई मुण्डमाला धारण किये कोई मुण्डोंके भूषण पहरे महाघोर रणस्थल जो कि गृध्र कंक और गीदडोंसे युक्त था। ६२।
मांसासृक्पंकिले घोरे तत्र तत्र पुरोपमे ॥ ननर्त जानकी देवी घोर
काली महाबला ॥ ६३ ॥ तदा चकंपे पृथिवी नौरिवानिलचालिता ॥
चेलुश्च भूधराः सर्वे समुद्राश्च चकंपिरे ॥ ६४ ॥
तथा मांस रुधिरके कीचसे युक्त उस पुरके समान उस रणस्थलमें महाकाली महाबला महाघोर जानकी देवी नृत्य करने लगी ॥ ६३ ॥ तब नौकाके समान चलायमान हो पृथिवी कंपित होने लगी, सब पर्वत चलायमान और सागर कंपित होगये ॥ ६४ ॥
स्वर्गिणां च विमानानि खात्पेतुर्भयतो द्विज ॥ सूर्यस्य दुद्रुवुर्भीता
वाजिनो मुक्तरश्मयः ॥ ६५ ॥ यदा न सेहे जानक्याः भारं सोढुं
वसुंधरा ॥ गंतुमैच्छत पातालं सीतापादाग्रपीडिता ॥ ६६ ॥
(१२८) अद्भुतरामायण [ त्रयोविंशति
डरसे देवताओंके विमान आकाशसे गिरने लगे, सूर्यके घोडे मार्ग त्यागने लगे ॥ ६५ ॥ जब पृथ्वी जानकीका भार सहनेको समर्थ न हुई और सीताके चरणग्रसे पीडित हो पातालमें जाने लगी ॥ ६६ ॥
अट्टहासेन सीताया मातृणां हुंकृतेन च ।। प्रलयं मेनिरे लोकाः किमेतदिति विह्वलाः ॥६७॥ धरापातालगमनं वितर्क्य सुरसत्तमैः ।। संप्रार्थितो महादेवः स्वयमायाद्रणाजिरम् ॥ ६८ ॥
सीताके अट्टहास और मातृकाओंके हुंकारसे यह क्या हुआ इस प्रकार कहते लोक प्रलय मानने लगे ॥ ६७ ॥ देवता धराको पातालमें जाता देख महादेवसे प्रार्थना करने लगे, तब वे संग्रामस्थलमें आये ॥ ६८ ॥
जानक्याः पादविन्यासे शवरूपधरो हरः ।। आत्मानं स्तंभयामास धरणीधृतिहेतवे ॥ ६९ ॥ सर्वभारसहो देवः सीतापादतले स्थितः शवरूपो विरूपाक्षः स्थिताभूद्धरातदा ॥ ७० ॥
तब शवके समान रूप धारण कर शिव पृथ्वी थामनेको जानकीके नीचे स्थित हुए, और अपनेको स्थित किया ॥ ६९ ॥ सीताके पगतलमें स्थित हो देव सम्पूर्ण भार सहन करने लगे तब शवरूपधारी पृथ्वी स्तंभित हुई ॥ ७० ॥
तथाप्युपरिगा लोका न स्थातुं सेहिरे क्षणम् ।। सीतायाः पादशब्देन शिरसा हुंकृतेन च ।। निःश्वासवातसंघातैर्दुःस्थिता भूर्भुवादयः। ७१। धरणीतनयया यद्धीमनृत्यं धरण्यां कृतमिह मनसा तंर्त्तिचतयंतो द्विजेन्द्राः ।। जयति जयति सीतेत्याहुरिंद्रादिदेवाः सपदि भुवन भंगं मन्यमाना विषेदु ॥ ७२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदि. अद्भु. भाषाटीकायां सहस्रवदन-रावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ।। २३ ।।
परन्तु ऊपरके लोक उस समय भी स्थित न हो सके, सीताके चरणशब्द और शिरके हुंकारसे तथा निश्वासकी पवनसे भूर्भवः स्व आदि लोक अस्वस्थ हो गये ॥ ७१ ॥ धरणीतनयाने जो भयंकर नृत्य पृथ्वीपर किया, उसके मनमें विचार करते द्विजेन्द्र इन्द्रादिक देवता जय जय करने लगे और संसार भंग होगा ऐसा मानने लगे ॥ ७२ ॥
इत्यार्षे श्रीमद्रा. वाल्मीकीये आदिकाव्ये अद्भुतोत्तरकाण्डे भाषाटीकायां सहस्रवदनरावणवधो नाम त्रयोविंशतितमः सर्गः ॥ २३ ॥