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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ११५ )

सर्ग ] हिन्दीटीकासहित ( ११५ )

द्वाविंशति सर्ग

रामचन्द्रका मूर्च्छित होना

विनर्दन्तं रिपुं दृष्ट्वा रामः शत्रुनिबर्हणः। जज्वलंच स कोपेन रक्षसां सहजो रिपुः ॥ १ ॥ विचकर्ष धनुः श्रेष्ठ प्रलयानलसंनिभम् ॥ वेगेन बाणांश्चिक्षेप रक्षसां मर्मसु प्रभुः ॥ २ ॥

शत्रुनाशी श्रीरामचन्द्रजी शत्रुको गर्जन करता हुआ देखकर वह राक्षसोंके स्वाभाविक शत्रु कोपसे जल उठे ॥ १ ॥ प्रलयके समान उस धनुषश्रेष्ठको खेंचकर वेगसे राक्षसोंके मर्मस्थानमें प्रभु बाण प्रहार करने लगे ॥ २ ॥

तिलशः खण्डयन्ति स्म बाणा राक्षसपुङ्गवान् ॥ कदा धनुषि संधत्ते कदा विसृजति प्रभुः ॥ ३ ॥ नान्तरं ददृशे कैश्चिच्छिन्नाः स्युररयः परम् ॥ जघान राक्षसान्रामो रुद्रः पशुगणानिव ॥ ४ ॥

और बाणोंसे राक्षसश्रेष्ठोंको खंड खंड करने लगे कब धनुषके ऊपर बाण चढाते और कब छोडते हैं ॥ ३ ॥ इसमें कुछभी अन्तर नहीं दीखता था और शत्रु क्षीण होते चले जाते थे, रामने राक्षसोंको ऐसा मारा जैसे रुद्र पशुओंका संहार करता है ॥ ४ ॥

तद्दृष्ट्वा दुष्करं कर्म कृतं रामेण रावणः॥ अनीकाग्रं समासाद्य युयुधे राघवेण हि ॥ ५ ॥ रे रे राक्षससेनान्यः प्रेक्षका इव तिष्ठत ॥ अहमेको हनिष्यामि नरमाकस्मिकं रिपुम् ॥ ६ ॥

रामचंद्रका यह दुष्कर कर्म देखकर रावण रामचन्द्रके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५ ॥ अरे राक्षसी सेनाके लोगो ! क्या तुम देखते हुए स्थित हो, मैं इस अकस्मात् आये शत्रुको इकला वध करूंगा ॥ ६ ॥

अद्य निर्मानवां पृथ्वीं निर्देवं त्रिदिवं तथा ॥ करिष्याम्यहमेवैकः शोषयिष्यामि वारिधीन् ॥ ७ ॥ पर्वतांश्चूर्णयिष्यामि पातयिष्यामि वै ग्रहान् ॥ इत्युक्त्वा राक्षसश्रेष्ठो रामं योद्धुमथाह्वयत् ॥ ८ ॥

आज पृथ्वीको निर्मनुष्य कर डालूंगा, तथा त्रिदिवको देवतारहित करदूंगा और सागरको सोख डालूंगा ॥ ७ ॥ पर्वतोंको चूर्ण कर ग्रहोंको गिरा दूंगा, हे राम ! यह लंकापुरी नहीं है यह कहकर राक्षसश्रेष्ठ रामचन्द्रको युद्ध के निमित बुलाने लगा ॥ ८ ॥

(११६) अद्भुतरामायण [द्वाविंशो-

त्वामद्य खड्गेनाच्छिद्य तर्पयिष्यामि चानुगान् ।। नेयं लंकापुरी राम नाहञ्च दशकन्धरः ।। ९ ।। शिरस्ते पोथयिष्यामि गदया रघुनन्दन ।। कपित्थमिव काकुत्स्थ करी मदकलः किल ।। १० ।।
कि, आज तुमको खड्गसे छेदन कर अपने अनुचरोंको तृप्त कर दूंगा, हे राम ! न तो यह लंकापूरी है और न मैं दशमुख रावण हूं ।। ९ ।। मैं गदास तुम्हारा शिर चूर्ण कर दूंगा यह कैथकी तरहसे वा मदवाले हाथीके समान गिरेगा ।। १० ।।

इत्युक्त्वा रावणो युद्धं रामेण सह चारभत् ।। तदभूद्वैरथं युद्धं बलिवासवयोरिव ।। ११ ।। रावणं प्राप्य रामोऽपि परं हर्षमुपागमत् ।। तदभूदद्भुतं युद्धं द्वयोर्वै रोमहर्षणम् ।। १२ ।।
यह कह रावण रामचन्द्रके साथ युद्ध करने लगा वह वलि वासवके समान वीरथ युद्ध होने लगा ।। ११ ।। रावणको प्राप्त हो राम भी परम प्रसन्न हुए, वह उन दोनोंका रोमहर्षण युद्ध हुआ ।। १२ ।।

रामस्य च महाबाहोर्बलिनौ रावणस्य च ।। गांधर्वेण च गांधर्वं दैवं दैवेन राघवः ।। १३ ।। अस्त्रं राक्षसराजस्य जघान परमास्त्रवित् ।। अस्त्रयुद्धे च परमो रावणो राक्षसाधिपः ।। १४ ।।
महाबाहु राम और वली रावणका गन्धर्व तथा दैव आदि अस्त्रोंसे युद्ध होने लगा ।। १३ ।। परमास्त्रज्ञाता रामने राक्षसराजके अस्त्रोंको ताडन कर दिया, परम अस्त्रयोधी रोक्षसपति रावण ।। १४ ।।

ससर्ज परदक्रुद्धः पन्नगास्त्र स राघवे ।। ते रावणधनुर्मुक्ताः शराः कांचनभूषिताः ।। १५ ।। अभ्यवर्त्तन्त काकुत्स्थं सर्पा भूत्वा महाविषाः ।। ते सर्पवदना घोरा वमन्तो ज्वलनं मुखैः ।। १६ ।।
रामचन्द्रके ऊपर पन्नगास्त्रका प्रहार करता हुआ उससे रावणके धनुषसे मुक्त हुए सुवर्णभूषित बाण ।। १५ ।। रामके ऊपर सर्प होकर गिरने लगे और वे घोर सर्प मुखसे अग्निको वमन करते थे ।। १६ ।।

राममेवाभ्यवर्त्तंत व्यादितास्या भयावहाः ।। तैर्वासुकिसमस्पर्शै-र्दीप्तभोगैर्महाविषैः ।। १७ ।। दिशश्च विदिशश्चैव समंतादावृता भृशम् ।। रामः संपततो दृष्ट्वा पन्नगांस्तान्सहस्रशः ।। १८ ।।