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अद्भुत रामायण (पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र हिन्दी टीका सहित)

Adbhut Ramayana Hindi

महर्षि वाल्मीकि (टीकाकार: पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र) द्वारा

स्रोत: Maharshi Valmiki Krit Srimad Adbhut Ramayanam with Hindi Tika by Pt. Jwala Prasad Mishra (उद्गम)

DevanagariHindipublished173 पृष्ठ

प्रारंभिक पृष्ठ व विषय-सूची

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P-7

पं. ज्वालाप्रसाद मिश्र अद्भुत रामायण

कपिल
(K) परिणय (B)
भावना


प्रेषक :
गीता नन्द पोरवाल
806, अल्कापुरी, पंजाबी कालोनी
अलीगढ़ कोल्ड स्टोर के सामने, इटावा (उ.प्र.) 206 001
मो० : 9411435371, 9045625554
9650333934 (देवानन्द), 9873884386 (कपिल)

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श्रीः

अद्भुत रामायणम्

(हिन्दीटीका सहितम्)

★

टीकाकारः-
विद्यावारिधि श्री पं० ज्वालाप्रसाद मिश्र

★

मुद्रक व प्रकाशक—
खेमराज श्रीकृष्णदास,
अध्यक्ष:- “श्रीवेङ्कटेश्वर” स्टीम्-प्रेस, बम्बई.


**संवत् २०१९, सन् १९६२**

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**पुनर्मुद्रणादि सर्वाधिकार यन्त्रालयाध्यक्षाधीन है।**

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(पृष्ठ पर केवल पृष्ठ-पार की अस्पष्ट छाया/छाप विद्यमान है, कोई प्रत्यक्ष पाठ्य सामग्री मुद्रित नहीं है)

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भूमिका

★

**दोहा—**राम अनन्त अनन्तगुण, अमित कथा विस्तार ।
सुनि आश्चर्य न मानि हैं, जिनके विमल विचार ॥

रघुनाथगाथारसरसिक पाठकवृन्द ! रामकथाका संसारमें शतकरोड़ विस्तार है उसमें बहुत कथा देवलोकमें विद्यमान हैं और बहुतसी कथा मर्त्यलोकमें स्थित हैं, जिस प्रकार वाल्मीकिजीने अपनी २४००० चौबीस सहस्र रामायणमें पुरुषकी प्रधानता कही है, उसी प्रकार इसमें प्रकृति (शक्ति) का प्रभाव वर्णन किया है, जिस प्रकार प्रकृति-पुरुषसे जगत् होता है उसी प्रकार राम-सीतासे पृथ्वीका भार उतारना इस ग्रन्थमें वर्णन किया है. राम सीता एक ही हैं इनमें कुछ भेद नहीं है. इस कारण जानकीका माहात्म्य भी रामहीका माहात्म्य है । यह सम्पूर्ण कथा अध्यात्मपर है इसमें रामकी ब्रह्म और जानकीकी शक्ति प्रगटरूपसे वर्णन किया है । इस ग्रन्थके संस्कृतमें होनेसे सर्व साधारणको इसका आशय विदित नहीं होता था, केवल कहीं कहीं बहुत संक्षेपसे इसकी चर्चा होती थी, इस कारण हरिभक्त महात्माओंके विनोदार्थ इसकी भाषाटीका कर सब प्रकारके स्वत्वसहित यह ग्रन्थ वैश्यवंशावतंस सेठ शिरोमणि “ श्रीवेंकटेश्वर ” स्टीम् यंत्रालयाधिपति खेमराज श्रीकृष्णदास महाशयको कर दिया है ।

**टीकाकार—**पं ज्वालाप्रसादमिश्र,
मुरादाबाद

अद्भुतरामायणकी विषयानुक्रमणिका

★

वर्गविषयपृष्ठ
१रामजानकीका परब्रह्मरूपप्रतिपादन१
२अम्बरीषराजाको नारायणका वर देना५
३नारदपर्वतका राजसभामें आना१०
४रामचन्द्रके जन्म लेनेका कारण१५
५जानकीके जन्म लेनेका कारण कथन२४
६हरिमित्रोपाख्यान तथा कौशिकादिका वैकुण्ठगमन वर्णन३१
७नारदजीको गानविद्याका प्राप्त होना४२
८सीताजीका जन्मवर्णन४९
९परशुरामको रामका विश्वरूप दिखाना५४
१०रामचन्द्रका महावीरको चतुर्भुजरूप दिखाना५८
११रामका सांख्ययोग वर्णन करना६१
१२उपनिषत्कथन करना६८
१३रामका भक्तियोग कहना७१
१४रामचन्द्र और महावीरजीका संवाद७५
१५हनुमान्‌जीका रामचन्द्रकी स्तुति करना८१
१६रामचन्द्रका रावणको मार राज्य पाना८५
१७जानकीवचन सहस्रमुख रावणका वृत्तान्त८७
१८रावणकी सेनाका निकलना९५
१९सहस्रमुखी रावणके पुत्रोंका युद्धको चलना१०३
२०संकुलयुद्धवर्णन१०८
२१रावणका रामकी सेनाको विक्षेप करना११२
२२रामचन्द्रका मूर्च्छित होना११५
२३जानकीद्वारा सहस्रमुखी रावणका वध१२१
२४देवतोंका रामको आश्वासन करना१२९
२५रामचन्द्रका सहस्रनामसे जानकीकी स्तुति करना१३४
२६श्रीरामविजयवर्णन१५३
२७श्रीरामका अयोध्याजीमें आना१५९

इत्यनुक्रमणिका समाप्त ।

श्रीगणेशाय नमः

अद्भुत रामायणम्

भाषाटीकासमेतम्

★

**दोहा—**सीताराम लक्ष्मण सहित, बंदौं पवनकुमार ।
कृपाकटाक्ष विलोकि मोहिं, पूरण करहु विचार ॥


प्रथम सर्ग

रामजानकीका परब्रह्मरूपप्रतिपादन

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ १ ॥ नमस्तस्मै मुनींद्राय श्रीयुताय यशस्विने । शांताय वीतरागाय वाल्मीकाय नमोनमः ॥ २ ॥

नररूप नरोत्तम नारायण तथा देवी सरस्वती और व्यासजीको प्रणामकर जय शब्दका उच्चारण करना चाहिये ॥ १ ॥ मुनींद्र लक्ष्मीयुक्त यशस्वी शांत वीतराग वाल्मीकिजीके निमित्त नमस्कार है ॥ २ ॥

रामाय रामभद्राय रामचन्द्राय वेधसे । रघुनाथाय नाथाय सीतायाःपतये नमः ॥ ३ ॥ जयति रघुवंशतिलकः कौशल्यानंदवर्द्धनो रामः । दशवदननिधनकारी दाशरथिः पुंडरीकाक्षः ॥ ४ ॥

राम रामभद्र रामचन्द्र विधाता रघुनाथ नाथ सीतापतिके निमित्त नमस्कार है ॥ ३ ॥ रघुवंशके तिलक कौशल्याके हृदयके आनन्ददाता रावणहन्ता दशरथपुत्र कमललोचन रामकी जय हो ॥ ४ ॥

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(२) अद्भुतरामायण [प्रथम-

तमसातीरनिलयं निलयं तपसां गुरुम् । वचसां प्रथमस्थानं
वाल्मीकिं मुनिपुंगवम् ॥ १ ॥ विनयावनतो भूत्वा भरद्वाजो महा-
मुनिः । अपृच्छत्सम्मतः शिष्यः कृतांजलिपुटो वशी ॥ २ ॥

तमसातीरनिवासी तपस्वियोंके गुरु वाणीके प्रथम स्थान वाल्मीकी मुनिश्रेष्ठसे ॥ १ ॥ विनयसे नम्र हो भरद्वाज महामुनिसम्मत शिष्य जितेंद्रिय हाथ जोडकर कहने लगे ॥ २ ॥

रामायणमिति ख्यातं शतकोटिप्रविस्तरम् । प्रणीतं भवता यच्च
ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम् ॥ ३ ॥ श्रूयते ब्राह्मणैर्नित्यमृषिभिः पितृभिः
सुरैः । पंचविंशतिसाहस्रं रामायणमिदं भुविः ॥ ४ ॥

जो कि, सौ करोड श्लोकोंमें रामायणका विस्तार कहा है और जो आपकी बनाई ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित है ॥ ३ ॥ जिसको ब्राह्मण पितर देवता नित्य श्रवण करते हैं, जिसमेंसे पृथ्वीमें २५००० सहस्त्र रामायण हैं ॥ ४ ॥

तदाकर्णितमस्माभिः सविशेषं महामुने । शतकोटिप्रविस्तारे
रामायणमहार्णवे ॥ ५ ॥ किं गीतमिह मुष्णाति तन्मे कथय सुव्रत ।
आकर्ण्यादरिणः पृष्टं भरद्वाजस्य वै मुनिः ॥ ६ ॥

हे महामुनिराज ! वह हमने सुनी है, परन्तु रामायणके सौ करोड विस्तार में ॥ ५ ॥ वह क्या कथा गुप्त है, हे सुव्रत ! हमसे आप वर्णन कीजिये, इस प्रकार भरद्वाजका प्रश्न सुनकर मुनिराजने ॥ ६ ॥

हस्तामलकवत्सर्वं सस्मार शतकोटिकम् । ओमित्युक्त्वा मुनिः
शिष्यं प्रोवाच वदतां वरम् ॥ ७ ॥ भरद्वाज चिरं जीव साधु स्मारित-
मद्य नः । शतकोटिप्रविस्तारे रामायणमहार्णवे ॥ ८ ॥

हस्तामलकके समान सम्पूर्ण रामचरित्रका स्मरण किया, बहुत अच्छा यह वचन मुनिराजने अपने शिष्यसे कहा ॥ ७ ॥ हे भरद्वाज ! तुम बहुत दिनोंतक जीओ, हमको अच्छा चरित्र स्मरण कराया, सौ करोडके विस्तार-वाले रामायण महासागरमें ॥ ८ ॥

रामस्य चरितं सर्वमाश्चर्यं सम्यगीरितम् । पंचविंशतिसाहस्रं
नृलोके यत्प्रतिष्ठितम् ॥ ९ ॥ नृणां हि सदृशं रामचरितं वर्णितं ततः ।
सीतामाहात्म्यसारं यद्विशेषादत्र नोक्तवान् ॥ १० ॥

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सर्ग] हिन्दीटीकासहित १(३)

रामका सब चरित्र आश्चर्य रूप है, जो पचीस सहस्र रामायणमनुष्यलोकमें प्रतिष्ठित है ॥ ९ ॥ वह रामचरित्र मनुष्योंके समान वर्णन किया है उनमें सीतामाहात्म्य विशेष करके नहीं कहा है ॥ १० ॥

शृणुष्वावहितो ब्रह्मन्काकुत्स्थचरितं महत् । सीताया मूलभूतयाः प्रकृतेश्चरितं महत् ॥ ११ ॥ आश्चर्यमाश्चर्यमिदं गोपितं ब्रह्मणो गृहे । हिताय प्रियशिष्याय तुभ्यमावेदयामि तत् ॥ १२ ॥

हे ब्रह्मन् ! उस बड़े रामचरितको सावधान होकर सुनिये, जो मूलप्रकृति जानकीका चरित्र है ॥ ११ ॥ यह परम आश्चर्यरूप ब्रह्माजीके स्थानमें गुप्तरूप हैं, सो तुम हितकारी प्रिय शिष्यके निमित्त मैं वर्णन करता हूँ ॥ १२ ॥

जानकी प्रकृतिः सृष्टेरादिभूता महागुणा । तपःसिद्धिः स्वर्गसिद्धिर्भूतिर्मूर्तिमती सती ॥ १३ ॥ विद्याविद्या च महती गीयते ब्रह्मवादिभिः । ऋद्धिः सिद्धिर्गुणमयी गुणातीता गुणात्मिका ॥ १४ ॥

जानकी सृष्टिकी प्रकृति रूप आदिभूत महागुणसंपन्न है, तपकी सिद्धि स्वर्गकी सिद्धि ऐश्वर्यरूप मूर्तिमान् सती है ॥ १३ ॥ ब्रह्मवादी इसहीको विद्या अविद्यारूपसे गाते हैं, यही ऋद्धि सिद्धि गुणमयी गुणातीत गुणात्मिका है ॥ १४ ॥

ब्रह्मब्रह्मांडसंभूता सर्वकारणकारणम् । प्रकृतिर्विकृतिर्देवी चिन्मयी चिद्विलासिनी ॥ १५ ॥ महाकुण्डलिनी सर्वानुस्यूता ब्रह्मसंज्ञिता । यस्या विलसितं सर्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ १६ ॥

ब्रह्म ब्रह्माण्डका इसहीसे सम्भव है, यही सर्व कारणकी कारण है, यही देवी प्रकृतिविकृतिस्वरूपा चिन्मयी चिद्विलासिनी है ॥ १५ ॥ यही सबही प्रगट करनेवाली महाकुण्डलिनी है, ब्रह्मसंज्ञा इसीकी है, यह चराचर जगत् इसीसे विलसित है ॥ १६ ॥

यामाधाय हृदि ब्रह्मन्योगिनस्तत्त्वदर्शिनः । विघट्टयंति हृद्ग्रंथिं भवंति सुख मूर्तिकाः ॥ १७ ॥ यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति सुव्रत । अभ्युत्थानमधर्मस्य तदा प्रकृति संभवः ॥ १८ ॥

हे ब्रह्मन् ? तत्त्वदर्शी योगी जिसको हृदयमें धारणकर हृदयकी अज्ञानग्रंथि नष्ट कर सुखी होते हैं ॥ १७ ॥ हे सुव्रत ! जब जब धर्मकी ग्लानि होती है, तब तब अधर्मके नष्ट करनेको प्रकृतिका सम्भव होता है ॥ १८ ॥