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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

१३. सू० ] छलप्रकरणम् ७१

Page 89Permalink

१३. सू० ] छलप्रकरणम् ७१
'अहो खल्वसौ ब्राह्मणो विद्याऽऽचरणसम्पन्नः' इत्युक्ते कश्चिदाह—'सम्भ-
वति ब्राह्मणे विद्याऽऽचरणसम्पत्' इति । अस्य वचनस्य विघातोऽर्थविकल्पो-
पपत्त्याऽसम्भूतार्थकल्पनया क्रियते—यदि ब्राह्मणे विद्याचरणसम्पत्सम्भवति
व्रात्येऽपि सम्भवेत्, व्रात्योऽपि ब्राह्मणः, सोऽप्यस्तु विद्याचरणसम्पन्नः । यद्वि-
वक्षितमर्थमाप्नोति चात्येति च तदतिसामान्यम् । यथा—ब्राह्मणत्वं विद्याचरण-
सम्पदं क्वचिदाप्नोति, क्वचिदत्येति । सामान्यनिमित्तं छलं सामान्यच्छलमिति ।
अस्य च प्रत्यवस्थानम्—अविवक्षितहेतुकस्य विषयानुवादः, प्रशंसार्थत्वाद्
वाक्यस्य । तदत्रासंभूतार्थकल्पनानुपपत्तिः । यथा—सम्भवन्त्यस्मिन् क्षेत्रे शालय
इति । अनिराकृतमविवक्षितं च बीजजन्म, प्रवृत्तिविषयस्तु क्षेत्रं प्रशस्यते । सोऽयं
क्षेत्रानुवादः, नास्मिन् शालयो विधीयन्त इति । बीजात्तु शालिनिर्वृत्तिः सती न
विवक्षिता । एवं सम्भवति ब्राह्मणे विद्याचरणसम्पदिति सम्पद्विषयो ब्राह्मणत्वम्,
न सम्पद्धेतुः, न चात्र हेतुर्विवक्षितः । विषयानुवादस्त्वयं प्रशंसार्थत्वाद् वाक्यस्य,
सति ब्राह्मणत्वे सम्पद्धेतुः समर्थ इति । विषयं च प्रशंसता वाक्येन यथा हेतुतः
किसी के 'अहो, यह ब्राह्मण विद्याशीलसम्पन्न हैं'—ऐसा कहने पर, कोई कहे—
'ब्राह्मण में विद्याशीलसम्पन्नता सम्भव हैं' । इस वचन का विघात अर्थ-विकल्पोपपत्ति
द्वारा असम्भूत अर्थकल्पना से करता है—यदि ब्राह्मण में विद्याचरणशीलता सम्भव है तो
व्रात्य ( संस्काररहित ) में भी वह सम्भव क्यों नहीं ! क्योंकि व्रात्य भी जाति से तो
ब्राह्मण ही है, वह भी विद्याचरणसम्पन्न हो सकता है ।
जो धर्म विवक्षित अर्थविशेष को ग्रहण भी कर ले तथा अतिरिक्त में भी रहे वह
'अतिसामान्य' है । जैसे—'ब्राह्मणत्व' विद्याचरणरूप सम्पत्ति को कहीं ग्रहण भी कर
सकता है, कहीं छोड़ कर अतिरिक्त में भी रह सकता है । ऐसा सामान्याश्रित छल
'सामान्यच्छल' कहलाता है ।
इसका प्रतीकार यह है—यहाँ अविवक्षितहेतुत्व रहने से पुरुष का विषया-( संपद्वि-
षया-)नुवाद हुआ है; क्योंकि वाक्य स्तुतिपरक है । अतः यहाँ असंभूतार्थकल्पना नहीं
बनेगी । जैसे—'इस खेत में धान पैदा होता हैं' इस वाक्य में बीजजन्म न तो निराकृत
ही है, न विवक्षित है; अपितु खेत ही प्रवृत्तिविषय है, उसी की प्रशंसा की गयी है ।
इस वाक्यप्रयोग में उस प्रशस्त क्षेत्र का अनुवादमात्र है; यहाँ धान का विधान नहीं है,
न तो बीज से चावल की उत्पत्ति करना है । इसी प्रकार ब्राह्मण में विद्याचरण-संपद्वि-
षय का अनुवादमात्र किया जाता है, कोई नयी विद्या या शालीनता उसमें अब प्रतिष्ठित
नहीं की जाती कि उसे उस संपद् का हेतु मानें । वाक्य के प्रशंसार्थक होने से यह विष-
यानुवादमात्र है—ब्राह्मणत्व के रहते उक्त संपद्धेतु होता हुआ वह समर्थ है । (विषय की
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

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७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ०
फलनिर्वृत्तिर्न प्रत्याख्यायते । तदेवं सति वचनविघातोऽसम्भूतार्थकल्पनया
नोपपद्यत इति ॥ १३ ॥
उपचारच्छललक्षणम्
धर्मविकल्पनिर्देशेऽर्थसद्भावप्रतिषेध उपचारच्छलम् ॥ १४ ॥
अभिधानस्य धर्मो यथार्थप्रयोगः । धर्मविकल्पः = अन्यत्र दृष्टस्यान्यत्र
प्रयोगः । तस्य निर्देशे धर्मविकल्पनिर्देशे¹ । यथा—मञ्चाः क्रोशन्तीति अर्थ-
सद्भावेन प्रतिषेधः—'मञ्चस्थाः पुरुषा क्रोशन्ति, न तु मञ्चाः क्रोशन्ति' ।
का पुनरत्रार्थविकल्पोपपत्तिः ? अन्यथा प्रयुक्तस्यान्यार्थकल्पनम्, भक्त्या
प्रयोगे प्राधान्येन कल्पनमुपचारविषयं छलमुपचारच्छलम् । उपचारो नीतार्थः
सहचरणादिनिमित्तेन, अतद्भावे तद्वदभिधानम् = उपचार इति ।
अत्र समाधिः—प्रसिद्धे प्रयोगे वक्तुर्यथाभिप्रायं शब्दार्थयोरभ्यनुज्ञा प्रतिषेधो
वा, न च्छन्दतः । प्रधानभूतस्य शब्दस्य भाक्तस्य च गुणभूतस्य प्रयोग उभयोर्लोक-
सिद्धः । सिद्धे प्रयोगे यथा वक्तुरभिप्रायः, तथा शब्दार्थावनुज्ञेयौ प्रतिषेध्यौ वा, न
प्रशंसा करता हुआ उक्त वाक्य हेतु से फलसंपन्नता का प्रत्याख्यान नहीं करता । इस
रीति से असंभूतार्थकल्पना द्वारा वचनविघात वाद में उचित नहीं है ॥ १३ ॥
स्वभावविकल्पनिर्देशक वाक्य में अर्थ की सत्ता का निषेध करना 'उपचारच्छल'
कहलाता है ॥ १४ ॥
यथार्थप्रयोग ही शब्द का स्वभाव है, स्वभाव ( धर्म ) विकल्प से तात्पर्य है—अन्यत्र
दृष्ट का अन्यत्र प्रयोग । उस स्वभावविकल्प के निर्देशक पदप्रयोग ( वाक्य ) में ( अर्थ
की सत्ता का निषेध 'उपचारछल' कहलाता है ) । जैसे—'मञ्चाः क्रोशन्ति' इस वाक्य
में अभिप्रेतार्थ की सत्ता का निषेध करके 'मञ्चस्थ पुरुष चिल्ला रहे हैं,' 'न कि मञ्च
चिल्ला रहे हैं'—ऐसा कहना ।
यहाँ अर्थविकल्पोपपादन क्या है ? अन्य अर्थ में प्रयुक्त की अन्य अर्थकल्पना ।
गौणार्थ से प्रयुक्त वाक्य में मुख्य अर्थ की कल्पना ही उपचारविषयक छल है, अतः यह
'उपचारच्छल' है । 'उपचार' से तात्पर्य है सहचारादि निमित्त द्वारा अर्थ को अन्यत्र ले
जाया जाये । संक्षेप में, 'अतत्त्व में तत्त्वकथन' उपचार कहलाता है ।
इस ( उपचारछल ) का प्रतीकार यह है—शक्य या भाक्त अर्थ में प्रसिद्ध प्रयोग
का शब्दार्थ की अभ्यनुज्ञा या उनका निषेध वक्ता के अभिप्रायाधीन होता हैं, न कि
स्वेच्छया । प्रधानभूत ( मुख्य ) शब्द का गौण या भाक्त उभयविध अर्थ में प्रयोग लोक
में देखा जाता है । सिद्ध प्रयोग में जैसा वक्ता का अभिप्राय हो वैसे ही शब्द, अर्थ की
स्वीकृति या अस्वीकृति देना चाहिये, स्वेच्छा नहीं । जब वक्ता का प्रधानभूत अर्थ में
१. वार्त्तिककृत्तु 'धर्मविकल्पेन निर्देशे वाक्ये' इत्येवं व्याचष्टे ।
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