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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

६८. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१९

६८. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१९
दृष्टं च तैजसेन स्पर्शेन वायव्यस्य स्पर्शस्याभिभवादग्रहणमिति, न च तेनैव
तस्याभिभव इति ॥ ६७ ॥
तदेवं न्यायविरुद्धं प्रवादं प्रतिषिध्य ‘न सर्वगुणानुपलब्धेः’ (३.१.६४) इति
चोदितं समाधीयते—
पूर्वपूर्वगुणोत्कर्षात् तत्तत्प्रधानम् ॥ ६८ ॥
तस्मान्न सर्वगुणोपलब्धिः । घ्राणादीनां पूर्वं पूर्वं गन्धादेर्गुणस्योत्कर्षात्तत्तत्
प्रधानम् । का प्रधानता ? विषयग्राहकत्वम् । को गुणोत्कर्षः ? अभिव्यक्तौ
समर्थत्वम् । यथा बाह्यानां पार्थिवाप्यतैजसानां द्रव्याणां चतुर्गुणत्रिगुणद्विगु-
णानां न सर्वगुणव्यञ्जकत्वम्, गन्धरसरूपोत्कर्षात्तु यथाक्रमं गन्धरसरूपव्यञ्ज-
कत्वम् । एवं घ्राणरसनचक्षुषां चतुर्गुणत्रिगुणद्विगुणानां न सर्वगुणग्राहकत्वम्,
गन्धरसरूपोत्कर्षात्तु यथाक्रमं गन्धरसरूपग्राहकत्वम् । तस्माद् घ्राणादिभिर्न
सर्वेषां गुणानामुपलब्धिरिति ।
यस्तु प्रतिजानीते—‘गन्धगुणत्वाद् घ्राणं गन्धस्य ग्राहकमेवं रसनादिष्वपि’
इति ? तस्य यथागुणयोगं घ्राणादिभिर्गुणग्रहणं प्रसज्यत इति ॥ ६८ ॥
वायव्य ( अनुष्णाशीत ) स्पर्श अभिभूत हो जाता है, परन्तु वायव्य स्पर्श से ही वायव्य
स्पर्श का अभिभव हमें नहीं मिला ॥ ६७ ॥
इस रीति से, न्यायविरुद्ध संवाद का खण्डन कर, पूर्वपक्षी ‘सब गुणों की उपलब्धि
न होने से नहीं’ ( ३. १. ६४ ) उक्ति का समाधान कर रहे हैं—
पूर्वं पूर्व ( गुण ) के उत्कर्ष से वह वह प्रधान होता है ॥ ६८ ॥
इस लिये सब गुणों की उपलब्धि नहीं हो पाती । घ्राणादि इन्द्रियों में पूर्व पूर्व
गन्धादि गुण का उत्कर्ष होने से उस उस गुण से वह इन्द्रिय प्रधान है । यह प्रधानता
है—‘विषयग्राहकत्व’ । तथा गुणोत्कर्ष है—‘अभिव्यक्ति में सामर्थ्य’ । जैसे क्रमशः चार
गुणवाले, तीन गुणवाले, तथा दो गुणवाले बाह्य पार्थिव, आप्य, तैजस का सर्वगुण-
व्यञ्जकत्व नहीं होता; अपितु क्रमशः गन्ध, रस, रूप के उत्कर्ष से गन्ध, रस और रूप
व्यञ्जक होता है। उसी प्रकार चार गुण, तीन गुण तथा दो गुण वाली घ्राण, रसन,
तथा चक्षु इन्द्रियाँ भी सब विषयों की ग्राहक नहीं हैं, अपितु गन्ध, रस तथा रूप के
उत्कर्ष से क्रमशः गन्ध, रस, तथा रूप की ही ग्राहक हैं । अतः घ्राणादि एक एक इन्द्रिय
से सब विषयों की उपलब्धि नहीं होती ।
जो यह प्रतिज्ञा करता है कि—‘गन्ध गुण होने से घ्राणेन्द्रिय गन्ध को ग्रहण
करती है’, इसी तरह रसनेन्द्रिय के विषय में प्रतिज्ञा करता है, उसको यथागुणसम्बन्ध
से तत्तद्विषय का ग्रहण प्रसक्त होता है; हमारे मत में नहीं ॥ ६८ ॥

२२० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [३. अ० १. आ०
किंकृतं पुनर्व्यवस्थानम्-किञ्चित् पार्थिवमिन्द्रियं न सर्वाणि, कानिचिदाप्य-
तैजसवायव्यानि इन्द्रियाणि न सर्वाणीति ?
तद्व्यवस्थानं तु भूयस्त्वात् ॥ ६९ ॥
अर्थनिर्वृत्तिसमर्थस्य प्रविभक्तस्य द्रव्यस्य संसर्गः पुरुषसंस्कारकारितः
'भूयस्त्वम्' । दृष्टो हि प्रकर्षे भूयस्त्वशब्दः, प्रकृष्टो यथा विषयो भूयानित्युच्यते ।
यथा पृथगर्थक्रियासमर्थानि पुरुषसंस्कारवशाद्विषौषधिमणिप्रभृतीनि द्रव्याणि
निर्वर्त्यन्ते, न सर्वं सर्वार्थम्; एवं पृथग्विषयग्रहणसमर्थानि घ्राणादीनि निर्वर्त्यन्ते,
न सर्वविषयग्रहणसमर्थानीति ॥ ६९ ॥
स्वगुणान्नोपलभन्ते इन्द्रियाणि । कस्मादिति चेत् ?
सगुणानामिन्द्रियभावात् ॥ ७० ॥
स्वान् गन्धादीन्नोपलभन्ते घ्राणादीनि । केन कारणेनेति चेत् ? स्वगुणैः
सह घ्राणादीनामिन्द्रियभावात् । घ्राणं स्वेन गन्धेन समानार्थकारिणा सह
बाह्यं गन्धं गृह्णाति, तस्य स्वगन्धग्रहणं सहकारिवैकल्यान्न भवति । एवं
शेषाणामपि ॥ ७० ॥
यह व्यवस्था कैसे बन गयी कि कोई इन्द्रिय ही पार्थिव है सब इन्द्रियाँ नहीं, या
कोई इन्द्रिय ही आप्य है, कोई इन्द्रिय ही तैजस है, कोई इन्द्रिय ही वायव्य है,
सब नहीं ?
उस द्रव्य का भूयस्त्व ( प्रकृष्टत्व ) होने से ऐसी व्यवस्था बन जाती है ॥ ६९ ॥
पुरुष के कर्मविशेष से किया गया, कार्योत्पत्ति में समर्थ, प्रविभक्त द्रव्य के संसर्ग
को 'भूयस्त्व' कहते हैं । प्रकर्ष अर्थ में 'भूयस्त्व' का प्रयोग देखा जाता है, जैसे-
प्रकृष्ट विषय को 'भूयान्' कह देते हैं । यथा-पुरुषसंस्कारवश से विषौषधि, मणि-आदि
द्रव्य पृथक्-पृथक् क्रिया करने में समर्थ उत्पन्न होते हैं । अतएव सब द्रव्य सभी क्रिया
नहीं कर सकते । इसी प्रकार, अलग-अलग विषय को ग्रहण करने में समर्थ इन्द्रियाँ
उत्पन्न होती हैं, न कि सब विषयों को ग्रहण करने में समर्थ ॥ ६९ ॥
शङ्का-इन्द्रियाँ स्वगुणों को उपलब्ध नहीं करतीं; क्योंकि
उनका इन्द्रियत्व स्वविषयसहित होता है ॥ ७० ॥
घ्राणादि इन्द्रियाँ स्वविषय गन्धादि को ग्रहण नहीं करतीं; क्योंकि स्वविषयों के
साथ मिलकर घ्राणादिकों में 'इन्द्रियत्व' आता है । घ्राण अपने समानार्थकारी गन्ध के
साथ होकर बाह्य गन्ध को ग्रहण करता है । उसका स्वगन्धग्रहण सहकारिकारण के
असम्बन्ध से नहीं बनता । इसी तरह अन्य इन्द्रियों के विषय में भी समझना चाहिए ॥७०॥
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