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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३३. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०५

३३. सू० ] प्रत्यक्षपरीक्षाप्रकरणम् १०५
कृत्स्ना गृह्यन्ते, अवयवैरेवावयवान्तरव्यवधानाद्; नावयवी कृत्स्नो गृह्यते इति,
नायं गृह्यमाणेष्ववयवेषु परिसमाप्त इति सेयमेकदेशोपलब्धिरनिवृत्तैवेति ? कृत्स्न-
मिति वै खल्वशेषतायां सत्यां भवति, अकृत्स्नमिति शेषे सति । तच्चैतत्तदवयवेषु
बहुष्वस्ति, अव्यवधाने ग्रहणाद् व्यवधाने चाग्रहणादिति ।
अङ्ग तु भवान् पृष्टो व्याचष्टाम्-गृह्यमाणस्यावयविनः किमगृहीतं मन्यते,
येनैकदेशोपलब्धिः स्यादिति; न ह्यस्य कारणेभ्योऽन्ये एकदेशा भवन्तीति तत्राव-
यववृत्तं नोपपद्यत इति ! इदं तस्य वृत्तम्-येषामिन्द्रियसन्निकर्षाद् ग्रहणम्,
अवयवानां तैः सह गृह्यते, येषामवयवानां व्यवधानाद् ग्रहणं तैः सह न गृह्यते ।
न चैतत्कृतोऽस्ति भेद इति ।
समुदाय्यशेषता वा समुदायो वृक्षः स्यात्, तत्प्राप्तिर्वा; उभयथा ग्रहणा-
भावः । मूलस्कन्धशाखापलाशादीनामशेषता वा समुदायो वृक्ष इति स्यात्,
प्राप्तिर्वा समुदायिनामिति, उभयथा समुदायभूतस्य वृक्षस्य ग्रहणं नोपपद्यते
सम्पूर्ण अवयवों का उस समय ग्रहण नहीं होता; क्योंकि पृष्ठभाग के अवयव अग्रभाग के
अवयवों से व्यवहित हैं-इसलिये समग्र अवयवी भी गृहीत नहीं होता, तथा गृह्यमाण
अवयवों में अवयवी पर्याप्त नहीं है, अतः एकदेशोपलब्धि में अवयव्युपलब्धि कैसे होगी ?
उत्तर है-'कृत्स्न'-ऐसा कथन तभी बन सकता है, जब कोई शेष न बचे; 'अकृत्स्न'-
ऐसा भी तब कहते हैं, जब कोई शेष बच जाये। यह 'कृत्स्न' या अकृत्स्न' व्यवहार
अनेक अवयवों के होने पर ही हो सकता है। तब जिन अवयवों में व्यवधान होता है,
उनका ग्रहण नहीं हो पाता, अव्यवहितों का प्रत्यक्ष हो जाता है।
अवयवी को कृत्स्न या अकृत्स्न कैसे कहा जा सकता है ?-पूछने पर, पूर्वपक्षी
सम्भवतः यह भी कहने लगे कि ज्ञायमान वृक्षावयवी का क्या नहीं जाना गया मानते
हो, जिससे मदुक्त एकदेशोपलब्धि बन सके; वृक्षावयवी का समवायिकारण शाखा, पत्र,
मूल से अतिरिक्त कोई एकदेश नहीं होता, जिससे उसमें अवयवस्वभाव उपपन्न नहीं
होता ! परन्तु पूर्वपक्षी का यह कथन अयुक्त है; क्योंकि उस अवयवी का यह स्वभाव
है कि जिन अवयवों के साथ इन्द्रिय का सन्निकर्ष व्यवधान होने से न हो उनके साथ
वह गृहीत नहीं होता, तथा अव्यवहितों के साथ इन्द्रियसन्निकर्ष से वह गृहीत हो जाता
है। इतनी बात को लेकर वस्तुतः कोई भेद नहीं बनता।
[ अब भाष्यकार 'परमाणुरूप अवयवसमूह ही अवयवी (वृक्ष) होता है' इस बौद्धमत
का खण्डन कर रहे हैं-] समुदायवाले परमाणुओं की अशेषता (सम्पूर्णता) ही अवयव-
समुदाय वृक्ष हो, या उन अवयवों का संयोग-उभयथा ही वृक्षबुद्धि का ग्रहण नहीं
होगा। तात्पर्य यह है कि मूल, स्कन्ध शाखा पत्र-आदि अवयवों की समग्रता को ही

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१०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
इति । अवयवैस्तावदवयवान्तरस्य व्यवधानादशेषग्रहणं नोपपद्यते । प्राप्तिग्रहण-
मपि नोपपद्यते; प्राप्तिमतामग्रहणात् । सेयमेकदेशग्रहणसहचरिता वृक्षबुद्धि-
र्द्रव्यान्तरोत्पत्तौ कल्पते, न समुदायमात्रे इति ॥ ३३ ॥
प्रसङ्गोपात्ता अवयविपरीक्षा
साध्यत्वादवयविनि सन्देहः ? ॥ ३४ ॥
यदुक्तम्—'अवयविसद्भावात्' इति, अयमहेतुः, साध्यत्वात् । साध्यं तावत्-
एतत्कारणेभ्यो द्रव्यान्तरमुत्पद्यते इति, अनुपपादितमेतत् । एवं च सति विप्रति-
पत्तिमात्रं भवति, विप्रतिपत्तेश्चावयविनि संशय इति ? ॥ ३४ ॥
सर्वग्रहणमवयव्यसिद्धेः ॥ ३५ ॥
यद्यवयवी नास्ति सर्वस्य ग्रहणं१ नोपपद्यते । किं तत् सर्वम् ? द्रव्यगुणकर्म-
सामान्यविशेषसमवायाः । कथं कृत्वा ? परमाणुसमवस्थानं तावद् दर्शनविषयो
न भवति, अतीन्द्रियत्वादणूनाम् । द्रव्यान्तरं चावयविभूतं दर्शनविषयो नास्ति,
दर्शनविषयस्थाश्चेमे द्रव्यादयो गृह्यन्ते, ते निरधिष्ठाना न गृह्येरन् ! गृह्यन्ते तु-
समुदाय रूप से वृक्ष मानें या उन समुदायियों की परस्पर प्राप्ति (संयोग) मानें, दोनों ही
नयों में समुदायभूत (अवयवी) वृक्ष का ग्रहण नहीं हो पायेगा; क्योंकि अवयवों से अव-
यवान्तर का व्यवधान होने के कारण ग्रहण नहीं बन सकेगा । अवयवों के परस्पर संयोग
से भी ग्रहण नहीं हो सकेगा । क्योंकि संयोगवाले अवयवों में यह ग्रहण नहीं होता, अतः
यह एकदेशग्रहण के साथ होनेवाली 'यह वृक्ष है' ऐसी बुद्धि द्रव्यान्तरोत्पत्ति मानने पर
तो बन सकती है, अवयवों का समुदायमात्र मानने पर नहीं बनेगी ॥ ३३ ॥
साध्य होने से अवयवों से भिन्न अवयवी में संशय है ॥ ३४ ॥
पूर्वोक्त ३३ वें सूत्र में एकदेशोपलब्धि न होने में 'अवयवसिद्भाव' हेतु दिया गया
था, यह हेतु साध्य है। अर्थात् प्रमाणों से यह सिद्ध करना चाहिये कि 'इन कारणों से
द्रव्यान्तर उत्पन्न होता है'। क्योंकि यह सिद्ध नहीं किया गया, अतः अयुक्त है। इस तरह
उक्त हेतु में विप्रतिपत्ति होने लगेगी, तथा विप्रतिपत्ति से अवयवी में संशय होगा ॥ ३४ ॥
और अवयवी की सिद्धि न होने से सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा ॥ ३५ ॥
यदि अवयवी सिद्ध न होगा तो सम्पूर्ण का ग्रहण न होगा । वह सम्पूर्ण क्या है ?
द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय । क्यों ऐसा होगा ? परमाणु का परस्परसंयोग
प्रत्यक्ष का विषय नहीं हुआ करता; क्योंकि परमाणु अतीन्द्रिय हैं। यदि उन्हें अवयवी
मानें तो तुम्हारे मत से द्रव्यान्तर कह कर कोई अवयवी नहीं है। द्रव्यादि तो दर्शनविषय
(अवयवी) में ही रहते हैं, अवयवी के न रहने पर वे निरधिष्ठान होते हुए प्रत्यक्ष
कैसे होंगे ! लोक में अवयवी वृत्ति के लिये यह व्यवहार देखा जाता है—यह घट
१. अवयव्यसिद्धेः प्रत्यक्षाभावः, प्रत्यक्षाभावेऽनुमाद्यभावः इति सर्वप्रमाणाग्रहणमिति
वार्त्तिकेऽर्थान्तरमपि व्याख्यातम् ।