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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१७

१. सू० ] तत्त्वज्ञानोत्पत्तिप्रकरणम् ३१७
यत्र विषये प्रवर्त्तमानं संसारबीजं भवति स विषयस्तत्त्वतो ज्ञेय इति। किं
पुनस्तन्मिथ्याज्ञानम् ? अनात्मन्यात्मग्रहः, ‘अहमस्मि’ इति मोहोऽहङ्कार इति।
अनात्मानं खलु ‘अहमस्मि’ इति पश्यतो दृष्टिरहङ्कार इति।
किं पुनस्तदर्थजातं यद्विषयोऽहङ्कारः ? शरीरेन्द्रियमनोवेदनाबुद्धयः। कथं
तद्विषयोऽहङ्कारः संसारबीजं भवति ? अयं खलु शरीराद्यर्थजातमहमस्मीति
व्यवसितः तदुच्छेदेनात्मोच्छेदं मन्यमानोऽनुच्छेदतृष्णापरिल्लुतः पुनः पुनस्त-
दुपादत्ते, तदुपाददानो जन्ममरणाय यतते, तेनावियोगान्नात्यन्तं दुःखद्विमुच्यते,
इति। यस्तु दुःखं दुखायतनं दुखानुषक्तं सुखं च सर्वमिदं दुःखमिति पश्यति स
दुःखं परिजानाति, परिज्ञातं च दुःखं प्रहीण भवत्यनुपादानात्, सविषान्नवत्। एवं
दोषान् कर्म च दुःखहेतुरिति पश्यति। न चाप्रहीणेषु दोषेषु दुःखप्रबन्धोच्छेदेन
शक्यं भवितुमिति दोषान् जहाति। प्रहीणेषु च दोषेषु न प्रवृत्तः प्रतिसन्धाना-
येत्युक्तम्।
प्रेत्यभावफलदुःखानि च ज्ञेयानि व्यवस्थापयति, कर्म च दोषांश्च प्रहेयान्।
अपवर्गोऽधिगन्तव्यः, स्तस्याधिगमोपायस्तत्त्वज्ञानम्। एवं चतसृभिर्विधाभिः प्रमेय॑
विषय में प्रवृत्त होता हुआ संसारोत्पत्ति का कारण बनता है तत्त्व से वही विषय जानना
चाहिये। वह मिथ्याज्ञान क्या है ? अनात्मपदार्थों में आत्माभिमान अर्थात् शरीर की
दृष्टि से 'मैं हूँ' यह अहङ्कार मोह है। अनात्मपदार्थों को 'मैं हूँ'—ऐसा समझने वाले
की मिथ्यादृष्टि ही अहङ्कार है। वह विषयसमूह कौन-सा है जिसको लेकर अहङ्कार
होता है ? शरीर, इन्द्रिय, मन, वेदना, बुद्धि। तद्विषयक अहङ्कार संसारोत्पत्ति का
कारण कैसे हो जाता है ? यह मिथ्याभिनिवेशी अरीरादिसमूह में 'मैं हूँ' यह अभिनिवेश
करके उनके नाश में अपना नाश मानता हुआ उन को टिकाये रखने की चाह से भरा
हुआ पुनः पुनः उनको ग्रहण करता है, उनको ग्रहण करता हुआ जन्म-मरण के लिए
प्रयत्न करता है, यों उनसे सम्बन्ध विच्छिन्न न होने से आत्यन्तिक दुःख से छुटकारा
नहीं पाता। परन्तु तत्त्वजिज्ञासु दुःख, दुःखाधिष्ठान दुःख से लिपटे सुख को भी 'यह
सब दुःख है' ऐसा मानता हुआ दुःख को ठीक से समझ लेता है, पहचान लेता है, पहचाने
दुःख को विष-सम्पृक्त अन्न की तरह ग्रहण न करने से उसका दुःख क्षीण हो जाता है।
इसतरह वह कर्म तथा दोषों को दुःखहेतु समझता है। दोषों को छोड़े बिना दुःखप्रवाह का
उच्छेद हो नहीं सकता, अतः उन दोषों को वह छोड़ देता है। दोषों के प्रहीण होने पर
उस तत्त्वज्ञ की प्रवृत्ति प्रतिसन्धानयोग्य नहीं रह जाती—यह हम पहले कह चुके।
१. प्रेत्यभाव, फल तथा दुःख ज्ञेय हैं। २. कर्म तथा दोष प्रहेय हैं। ३. अपवर्ग
अधिगन्तव्य (प्राप्तव्य) हैं। ४. उसके पाने का एकमात्र उपाय है तत्वज्ञान।
इस तरह चार प्रकारों में विभक्त इन सम्पूर्ण प्रमेयों पर विचार करने वाले को

३१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ०
विभक्तमासेवमानस्याभ्यस्यतो भावयतः सम्यग्दर्शनं यथाभूतावबोधस्तत्त्वज्ञान-
मुत्पद्यते । एवं च—
दोषनिमित्तानां तत्त्वज्ञानादहङ्कारनिवृत्तिः ॥ १ ॥
शरीरादि दुःखान्तं प्रमेयं दोषनिमित्तम्; तद्विषयत्वान्मिथ्याज्ञानस्य । तदिदं
तत्त्वज्ञानं तद्विषयमुत्पन्नमहङ्कारं निवर्त्तयति; समानविषये तयोर्विरोधात् । एवं
तत्त्वज्ञानाद् 'दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायाद-
पवर्गः' (१.१.२) इति । स चायं शास्त्रार्थसङ्ग्रहोऽनूद्यते, नापूर्वो विधीयते इति ॥१॥
प्रसंख्यानानुपूर्वी तु खलु—
दोषनिमित्तं रूपादयो विषयाः १सङ्कल्पकृताः ॥ २ ॥
कामविषया इन्द्रियार्था इति रूपादय उच्यन्ते, ते मिथ्यासङ्कल्प्यमाना
रागद्वेषमोहान् प्रवर्त्तयन्ति, तान् पूर्वं प्रसञ्चक्षीत । तांश्च प्रसञ्चक्षाणस्य रूपादि-
विषयो मिथ्यासङ्कल्पो निवर्त्तते । तन्निवृत्तावध्यात्मं शरीरादि प्रसञ्चक्षीत ।
तत्प्रसंख्यानादध्यात्मविषयोऽहङ्कारो निवर्त्तते । सोऽयमध्यात्मं वहिश्च विविक्त-
चित्तो विहरन्मुक्त इत्युच्यते ॥ २ ॥
बार-बार मनन भावना करने वाले को सम्यग्दर्शन, याथातथ्य ज्ञान अर्थात् तत्त्वज्ञान हो
जाता है । और इस तरह—
दोषनिमित्त शरीरादि के तत्त्वज्ञान से अहङ्कार निवृत्त हो जाता है ॥ १ ॥
शरीर से लेकर दुःख तक प्रमेय दोष का हेतु है, क्योंकि मिथ्याज्ञान तद्विषयक होता
है । तद्विषयक तत्त्वज्ञान उत्पन्न होता हुआ अहङ्कार को निवृत्त करता है; क्योंकि समान-
विषय में उन दोनों तत्त्व एवं मिथ्या ज्ञानों का विरोध है। इस प्रकार तत्त्वज्ञान से 'दुःख,
जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या ज्ञानों के उत्तरोत्तर अपाय से उससे पूर्व-पूर्व के न होने से अप-
वर्ग हो जाता हैं' (१. १. २) । यहाँ यह शास्त्रार्थसंग्रह तत्रोक्त तत्त्वज्ञान का उत्पत्ति
प्रकार दिखाने के लिए उक्त सूत्र का अनुवाद ही है कोई अपूर्व विषय नहीं उठाया
गया है ॥ १ ॥
( इस समाधिज ) तत्त्वज्ञान् का क्रम यह है—
सङ्कल्पकृत रूपादि विषय दोषों के कारण होते हैं ॥ २ ॥
इन्द्रियों के अर्थ रूपादि कामविषय हैं । वे मिथ्या संकल्पित किये जाते हुए राग
द्वेष मोह को प्रवृत्तित करते हैं । जिज्ञासु पहले उनका तत्त्वज्ञान करें । उनका तत्त्वज्ञान
होने पर तत्त्ववेत्ता का रूपादिविषयक मिथ्यासंकल्प निवृत्त हो जाता है । उनके निवृत्त
होने पर वह अध्यात्म शरीरेन्द्रियादि का तत्त्व जानने का प्रयास करे । उसके तत्त्वज्ञान
से अध्यात्मविषयक अहङ्कार निवृत्त हो जाता है । इस प्रकार रूपादि विषय तथा
शरीरादि को तत्त्वतः जानकर यह ज्ञानी रागद्वेषादि से विमुक्तचित्त होकर लोकयात्रा
करता हुआ भी 'मुक्त' कहलाता है ॥ २ ॥
१. 'सङ्कल्पः = समीचीनोऽयमिति मानसं' इति वार्त्तिककृतः ।