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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

३१. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३९

३१. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३९
न; तदाशुगतित्वान्मनसः ? ॥ २९ ॥
आशुगति मनः, तस्य बहिः शरीरात्मप्रदेशेन ज्ञानसंस्कृतेन सन्निकर्षः,
प्रत्यागतस्य च प्रयत्नोत्पादनमुभयं युज्यते इति । उत्पाद्य वा धारकं प्रयत्नं
शरीरान्निःसरणं मनसः; अतस्तत्रोपपन्नं धारणमिति ? ॥ २९ ॥
न; स्मरणकालानियमात् ॥ ३० ॥
किञ्चित्क्षिप्रं स्मर्यते, किञ्चिच्चिरेण । यदा चिरेण, तदा सुस्मूर्षया मनसि
धार्यमाणे चिन्ताप्रवन्धे सति कस्यचिदर्थस्य लिङ्गभूतस्य चिन्तनमाराधितं
स्मृतिहेतुर्भवति । तत्रैतच्चिरनिश्चरिते मनसि नोपपद्यत इति । शरीरसंयोगान-
पेक्षश्चात्ममनःसंयोगो न स्मृतिहेतुः; शरीरस्य भोगायतनत्वात् । उपभोगायतनं
पुरुषस्य ज्ञातुः शरीरम्, न ततो निश्चरितस्य मनस आत्मसंयोगमात्रं ज्ञान-
सुखादीनामुत्पत्तौ कल्पते, कॢप्तौ वा शरीरवैयर्थ्यमिति ॥ ३० ॥
आत्मप्रेरण-यदृच्छाज्ञ-ताभिश्च न संयोगविशेषः ? ॥ ३१ ॥
आत्मप्रेरणेन वा मनसो बहिः शरीरात् संयोगविशेषः स्याद् यदृच्छया
मन के आशुगति होने से पतन नहीं होगा ? ॥ २९ ॥
मन शीघ्रगतिवाला है, उसका शरीर से बाहर ज्ञानसंस्कृत आत्मप्रदेश से सन्निकर्ष
होता है, तथा वह वापस लौटकर शरीरधारक प्रयत्न उत्पन्न करता है—यों दोनों
क्रियाएँ उसमें सम्पन्न होती हैं । या धारक प्रयत्न को उत्पन्न करके वह शरीर से बाहर
निकलता है । इस रीति से, धारण उपपन्न होने से पतन नहीं बनेगा ? ॥ २९ ॥
स्मरणकाल का नियम न होने से ( पतनप्रतिषेध) नहीं (हो सकता ) ॥ ३० ॥
कोई बात जल्दी याद आ जाती है, कोई देर में । जब कोई बात देर में स्मरण
आती है, उस स्मरण करने की इच्छा से धार्यमाण मन में चिन्तनप्रबन्ध के होने से
हेतुभूत किसी अर्थ के विषय में किया गया चिन्तन स्मृतिहेतु होता है । इस स्थिति में
यह दीर्घकालिक चिन्तन बाहर निकलनेवाले मन में नहीं बनेगा । ऐसा आत्ममनः-
सन्निकर्ष जो शरीरसंयोग की अपेक्षा न रखता हो, स्मृतिहेतु नहीं बन सकता; क्योंकि
शरीर ही भोगायतन है । ज्ञाता पुरुष का उपभोगायतन शरीरमात्र है, इस में से मन के
बाहर निकल जाने पर, आत्मसंयोगमात्र ज्ञान सुखादि की उत्पत्ति में हेतु नहीं कल्पित
किया जा सकता है । यदि कल्पना कर भी लें तो उस शरीर का वैयर्थ्य ही
होगा ॥ ३० ॥
'ज्ञानसमवेत' ( ३. २. २५ ) इत्यादि सूत्रोक्त एकदेशिमत को दूसरा एकदेशी
खण्डित कर रहा है—
शरीर से बाहर संयोग आत्मप्रेरणा, यदृच्छा या ज्ञातुता से नहीं हो
पाता ? ॥ ३१ ॥
मन का शरीर से बाहर के प्रदेश में संयोग या तो आत्मप्रेरणा से हो, या फिर

२४० ' वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
वाऽऽकस्मिकतया, ज्ञातया व मनसः ? सर्वथा चानुपपत्तिः। कथम् ? स्मर्त्तव्यत्वादि-
च्छात्तः स्मरणज्ञानासम्भवाच्च । यदि तावदात्मा-अमुष्यार्थस्य स्मृतिहेतुः संस्कारः
अमुस्मिन्नात्मदेशे समवेतस्तेन मनः संयुज्यतामिति मनः प्रेरयति, तदा स्मृत एवा-
सावर्थो भवति, न स्मर्त्तव्यः । न चात्मप्रत्यक्ष आत्मप्रदेशः संस्कारो वा, तत्रानुप-
पन्नाऽऽत्मप्रत्यक्षेण संवित्तिरिति । सुस्मूर्षया चायं मनः प्रणिदधानश्चिरादपि
कञ्चिदर्थं स्मरति, नाकस्मात् । ज्ञातृत्वं च मनसो नास्ति, ज्ञानप्रतिषेधादिति ॥३१॥
एतच्च—
व्यासक्तमनसः पादव्यथनेन संयोगविशेषेण समानम् ॥ ३२ ॥
यदा खल्वयं व्यासक्तमनाः क्वचिद् देशे शर्करया कण्टकेन वा पादव्यथन-
माप्नोति, तदाऽऽत्ममनःसंयोगविशेष एषितव्यः । दृष्टं हि दुःखं दुःखवेदनं चेति
तत्रायं समानः प्रतिषेधः । यदृच्छया तु न विशेषः, नाकस्मिकी क्रिया, नाक-
स्मिकः संयोग इति ।
कर्मादृष्टमुपभोगार्थं क्रियाहेतुरिति चेत् ? समानम् ।
कर्मादृष्टं पुरुषस्थं पुरुषोपभोगार्थं मनसि क्रियाहेतुः, एवं दुःखं दुःखसंवेदनं च
यदृच्छा से ( अकस्मात् ) हो, या मन की ज्ञातृता से हो—तीनों ही विकल्पों में उपपा-
दन नहीं बनेगा । कैसे ? स्मर्त्तव्य होने से, या इच्छा द्वारा स्मरणज्ञान सम्भव न होने से ।
यदि आत्मा 'अमुक अर्थ का स्मृतिहेतु संस्कार अमुक आत्मप्रदेश में समवेत हुआ है, अतः
उससे साथ जाकर मन संयुक्त हो'—ऐसी प्रेरणा मन को करता है तो वह अर्थ आत्मा
द्वारा स्मृत ही है, स्मर्त्तव्य उसमें क्या रह गया ! और उक्त प्रेरणा भी अनुपपन्न है,
क्योंकि आत्मप्रदेश तथा संस्कार आत्मप्रत्यक्ष हैं नहीं, अतः वहाँ आत्मप्रत्यक्ष से संवित्ति
अनुपपन्न है । स्मरण करने की इच्छा से मन प्रणिधान करता हुआ बहुत देर में भी किसी
अर्थ को स्मरण करता है, अकस्मात् नहीं । अतः दूसरा पक्ष भी अनुपपन्न है; क्योंकि मन
में ज्ञानप्रतिषेध पहले प्रतिपादित किया जा चुका, अतः उसमें ज्ञातृत्व अनुपपन्न है ॥३१॥
दूसरे एकदेशिमत का खण्डन—
और यह कथन—
व्यासक्तमना पुरुष के पादव्यथन द्वारा हुए संयोगविशेष के समान है ॥ ३२ ॥
जब यह अन्यासक्तचित्त पुरुष किसी जगह कंकड़ या काँटे से पैर में बिंध जाता हैं,
तब एक विशिष्ट आत्ममनःसंयोग मानना ही पड़ेगा; क्योंकि लोक में वैसा दुःख तथा
दुःखानुभूति भी देखी जाती है । इसमें भी प्रतिषेध पहले जैसा ही है; क्योंकि यदृच्छा
से यह संयोगविशेष नहीं होता, न यहाँ आकस्मिकी क्रिया ही होती है, न तथाभूत
संयोग ही ।
यदि वैसे संयोगविशेष में अदृष्ट कर्म ही उपभोग के लिये क्रिया का हेतु हो जायेगा ?
तो यह बात स्मृतिहेतु मनःसंयोग में भी समान है । पुरुषस्थ अदृष्ट कर्म पुरुष के उप-