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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ?

Page 86Permalink

६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ०
अवयवविपर्यासवचनं न सूत्रार्थः१। कस्मात् ?
"यस्य येनार्थसम्बन्धो दूरस्थस्यापि तस्य सः।
अर्थतो ह्यसमर्थानामानन्तर्यमकारणम्” ॥
इत्येतद्वचनाद्विपर्यसिनोक्तो हेतुरुदाहरणसाधर्म्यात्तथा वैधर्म्यात् साध्यसाधनं
हेतुलक्षणं न जहाति। अजहद्धेतुलक्षणं न हेत्वाभासो भवतीति ।
'अवयवविपर्यासवचनमप्राप्तकालम्' ( ५. २. ११) इति निग्रहस्थानमुक्तम्,
तदेवेदं पुनरुच्यत इति, अतस्तन्न सूत्रार्थः ॥ ९ ॥
छलप्रकरणम् [ १०-१७ ]
छललक्षणम्
अथ छलम्।
वचनविघातोऽर्थविकल्पोपपत्त्या छलम् ॥ १० ॥
न सामान्यलक्षणे छलं शक्यमुदाहर्तुम्, विभागे तूदाहरणानि ॥ १० ॥
[बौद्ध नैयायिक इस सूत्र का अन्यथा व्याख्यान करते हैं-'प्रतिज्ञा' के बाद उदाहर-
णादि का पूर्वकाल हेतुवचन के उस काल को अतिक्रान्त कर जाता है, अतः यह हेतुवचन
'कालात्ययापदिष्ट' है। इसका खण्डन करते हुए भाष्यकार कहते हैं-] प्रतिज्ञादि अवयवों
में विपर्यास बताना सूत्र का अर्थ नहीं है; क्योंकि-
'जिसका जिसके साथ अर्थसम्बन्ध होता है, वह अर्थसम्बन्ध उसके दूरस्थ होने पर
भी हो ही जाएगा, असमर्थ का अर्थ से आनन्तर्य विरोधी नहीं हुआ करता' ।
इस वचनप्रमाण द्वारा विपर्यास से कहा हुआ हेतु भी उदाहरण के सादृश्य या
वैसादृश्य से अपने हेतुत्व को नहीं छोड़ेगा । यतः उसने अपना हेतुलक्षण नहीं छोड़ा, तब
वह हेतु हेत्वाभास क्यों कर हो सकेगा !
दूसरी बात यह भी है-आगे निग्रहस्थानवर्णनप्रसङ्ग (५. २. ११) में भी 'अवयव-
विपर्यासबोधक अप्राप्तकाल' नामक निग्रहस्थान बताया जायेगा, इस सूत्र का उपर्युक्त
अर्थ करने पर वहाँ पुनरुक्ति दोष होगा, अतः यह सूत्रार्थ नहीं है ॥९ ॥
प्रतिवादी के अभिमत अर्थ से विरुद्ध कल्पनोपपादन वचनविघात 'छल'
कहलाता है ॥ १० ॥
[वादी, प्रमादी या प्रतिवादी द्वारा समीचीन उत्तर न देने की हालत में विजय-
कामना से तदाभास उत्तर भी दे डालता है, सूत्रकार उसी का अब विवेचन कर रहे हैं।
इनमें 'जात्युत्तर' स्वपक्ष में भी हानि पहुँचा डालता है, अतः उससे पहले छल का बोध
कराना ही उचित है ।] इस छल के सामान्य लक्षण का उदाहरण मिलना असम्भव हैं ।
हाँ, इसका विभाग करने पर उन विभागों के उदाहरण दिये जा सकते हैं ॥ १० ॥
१. बौद्धाभिमतसूत्रार्थखण्डने प्रक्रमते भाष्यकारः ।
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri