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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

११. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८५

११. सू० ] प्रमाणसामान्यपरीक्षाप्रकरणम् ८५
समाख्याहेतोस्त्रैकाल्ययोगात् तथाभूता समाख्या १ । यत्पुनरिदम्—'पश्चात्
सिद्धावसति प्रमाणे प्रमेयं न सिध्यति, प्रमाणेन प्रमीयमाणोऽर्थः प्रमेयमिति
विज्ञायते' इति ? प्रमाणमित्येतस्याः समाख्याया उपलब्धेर्हेतुत्वं निमित्तम्,
तस्य त्रैकाल्ययोगः । उपलब्धिमकार्षीत्, उपलब्धिं करोति, उपलब्धिं करिष्य-
तीति समाख्याहेतोस्त्रैकाल्ययोगात् समाख्या तथाभूता । प्रमितोऽनेनार्थः,
प्रमीयते, प्रमास्यते, इति प्रमाणम् । प्रमितम्, प्रमीयते, प्रमास्यते इति च प्रमेयम् ।
एवं सति—'भविष्यत्यस्मिन् हेतुत उपलब्धिः', 'प्रमास्यतेऽयमर्थः', 'प्रमेयमिदम्'—
इत्येतत् सर्वं भवतीति ।
त्रैकाल्यानभ्यनुज्ञाने च व्यवहारानुपपत्तिः । यश्चैवं नाभ्यनुजानीयात्
तस्य 'पाचकमानय पक्ष्यति', 'लावकमानय लविष्यति' इति व्यवहारो नोप-
पद्यत इति ।
'प्रत्यक्षादीनामप्रामाण्यं त्रैकाल्यासिद्धेः' ( २. १. ८) इत्येवमादिवाक्यं
प्रमाणप्रतिषेधः । तत्रायं प्रष्टव्यः—अथानेन प्रतिषेधेन भवता किं क्रियत
समाख्या (संज्ञा-शब्दों) के प्रवृत्तिरूप हेतु से जाति, गुण तथा द्रव्य में त्रैकाल्य-सम्बन्ध
रहना चाहिए, तब समाख्या भी त्रैकाल्यसम्बन्ध रखती है। यह जो कहा था—'पश्चात्-
काल में सिद्धि मानने पर उस समय प्रमाण के न रहने से प्रमेय सिद्ध नहीं होगा, जब
कि प्रमाण से प्रमीयमाण अर्थ ही प्रमेय कहलाता है' ? इसका उत्तर है—'प्रमाण' इस
संज्ञा का निमित्त है—'ज्ञान का कारण होना', यह 'ज्ञान का कारण होना' त्रिकाल-
सम्बन्धी है । 'इसने उपलब्धि की', 'यह उपलब्धि कर रहा है', 'यह उपलब्धि करेगा'
इस प्रकार से 'प्रमाण' संज्ञा त्रैकाल्यसम्बन्धवाली है। अर्थात् 'इससे प्रमेय जाना गया',
'जाना जाता है', 'जानेगा'—इसलिए यह प्रमाण कहलाता है। प्रमेय भी त्रैकाल्य-
सम्बन्ध वाला है—'यह जाना गया', 'जाना जाता है' या 'जाना जायेगा।' ऐसा
त्रैकाल्य-सम्बन्ध होने पर—'इसमें हेतु से उपलब्धि हो जायेगी', 'यह अर्थ को जानेगा'
तथा 'यह जानने योग्य है' यह सब व्यवहार उपपन्न हो जायेंगे ।
त्रैकाल्य-सम्बन्ध न मानने पर समग्र लोकव्यवहार उच्छिन्न होने लगेगा। जो इस
त्रैकाल्यसम्बन्ध को स्वीकार नहीं करता, उसके लिये 'पाचक लाओ, भोजन पकायेगा',
'घास काटनेवाले को लाओ, घास काटेगा'—यह व्यवहार कैसे बनेगा !
पूर्वपक्षी ने यह भी कहा था कि 'त्रिकाल-सम्बन्ध की असिद्धि के कारण प्रत्यक्षादि
में प्रामाण्य नहीं बनेगा' ? उसके उत्तर में पूर्वपक्षी से यह पूछना चाहिये कि यह प्रतिषेध
१. केषुचित्पुस्तकेषु वाक्यमिदं सूत्रत्वेनोपन्यस्तम्, परन्तु निकाये तथाऽप्रसिद्धत्वादस्मा-
भिर्न स्वीकृतम् ।—स० ०

८६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० १. आ०
इति ? किं सम्भवो निवर्त्यते, अथासम्भवो ज्ञाप्यत इति ? तद्यदि सम्भवो
निवर्त्यते, सति सम्भवे प्रत्यक्षादीनां प्रतिषेधानुपपत्तिः । अथासम्भवो ज्ञाप्यते,
प्रमाणलक्षणं प्राप्तस्तर्हि प्रतिषेधः, प्रमाणासम्भवस्योपलब्धिहेतुत्वादिति ॥ ११ ॥
किं चातः ?
त्रैकाल्यासिद्धेः प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १२ ॥
अस्य तु विभागः । पूर्वं हि प्रतिषेधसिद्धावसति प्रतिषेध्ये किं तेन प्रतिषिध्यते !
पश्चात्सिद्धौ प्रतिषेधाभावादिति । युगपत्सिद्धौ प्रतिषेध्यसिद्धयभ्यनुज्ञानादनर्थकः
प्रतिषेध इति । प्रतिषेधलक्षणे च वाक्येऽनुपपद्यमाने सिद्धं प्रत्यक्षादीनां
प्रमाणत्वमिति ॥ १२ ॥
कथम् १ ?
सर्वप्रमाणप्रतिषेधाच्च प्रतिषेधानुपपत्तिः ॥ १३ ॥
'त्रैकाल्यासिद्धेः' इत्यस्य हेतोर्यद्युदाहरणमुपादीयते, हेत्वर्थस्य साधकत्वं
कर के आप क्या करना चाहते हैं ? क्या सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं या असम्भव को
बतला रहे हैं ? यदि सम्भव की निवृत्ति कर रहे हैं तो सम्भव होने पर प्रत्यक्षादि की
निवृत्ति कैसी ! यदि असम्भव बतला रहे हैं तो असम्भव का ज्ञापन कैसा ? क्योंकि आपका
उक्त प्रकारका ज्ञापन भी उक्त प्रमाणों के लक्षण की परिधि में ही आ गया ! आपने ही
तो कहा था कि प्रत्यक्षादि में प्रमाण का असम्भव उपलब्धि का कारण है ! ॥ ११ ॥
इससे क्या हुआ ?
त्रैकाल्य की सिद्धि न बनने से पूर्वपक्षयुक्त प्रतिषेध नहीं बन सकता ॥ १२ ॥
( पूर्वपक्षी को उत्तर देने के लिये ) इस सूत्र का वक्ष्यमाण विभागार्थ कर लेना
चाहिये । प्रस्तुत प्रमाण की सिद्धि होने पर प्रतिषेध्य के न रहने से वह किसका प्रतिषेध
करेगा ? पश्चात् काल में प्रतिषेध्य मानने पर उस समय प्रतिषेध न कर पाने से प्रतिषेध्य
की असिद्धि ही रहेगी । युगपत् (एक काल में) सिद्धि मानने पर पूर्वपक्षी द्वारा प्रतिषेध्य
की स्वीकृति दे देने से उसका प्रतिषेध निरर्थक हो जायेगा । प्रतिषेध-लक्षणार्थक वाक्य
के अनुपपन्न होने से प्रत्यक्षादि में प्रमाणत्व रह ही जायेगा ॥ १२ ॥
कैसे ?
क्योंकि सम्पूर्ण प्रमाणों का निषेध करने से भी प्रतिषेध नहीं बन सकेगा ॥ १३ ॥
यदि 'त्रैकाल्यासिद्धि' हेतु का उदाहरण देने का प्रयत्न करे तो उसमें हेत्वर्थसाधकत्व
१. पदमिदं क्वचित् सूत्रस्यावतरणरूपेण गृहीतम्, क्वचिच्च व्याख्यानरूपेणेत्युभयथापि
समञ्जसमेव प्रतिभाति ।