न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
५. सू० ] शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७९
५. सू० ] शरीरव्यतिरिक्तात्मपरीक्षाप्रकरणम् १७९
शरीरं दहतः प्राणिहिंसाकृतपापं पातकमित्युच्यते, तस्याभावः, तत्फलेन
कर्तुरसम्बन्धात्, अकर्तुश्च सम्बन्धात् । शरीरेन्द्रियबुद्धिवेदनाप्रबन्धेन खल्वन्यः
सङ्घात उत्पद्यते, अन्यो निरुध्यते । उत्पादनिरोधसन्ततिभूतः प्रबन्धो नान्यत्वं
बाधते; देहादिसङ्घातस्यान्यत्वाधिष्ठानत्वात् । अन्यत्वाधिष्ठानो ह्यसौ प्रख्या-
यत इति । एवं च सति यो देहादिसङ्घातः प्राणिभूतो हिंसां करोति, नासौ
हिंसाफलेन सम्बध्यते; यश्च सम्बध्यते न तेन हिंसा कृता । तदेवं सत्त्वभेदे कृत-
हानमकृताभ्यागमः प्रसज्यते । सति च सत्त्वोत्पादे, सत्त्वनिरोधे चाकर्मनिमित्तः
सत्त्वसर्गः प्राप्नोति, तत्र मुक्त्यर्थो ब्रह्मचर्यवासो न स्यात् । तद्यदि देहादिसङ्घात-
मात्रं सत्त्वं स्यात्, शरीरदाहे पातकं न भवेत् ! अनिष्टं चैतत् । तस्माद् 'देहादि-
सङ्घातव्यतिरिक्त आत्मा नित्यः' इति ॥ ४ ॥
तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि; तन्नित्यत्वात् ? ॥ ५ ॥
यस्यापि नित्येनात्मना सात्मकं शरीरं दह्यते, तस्यापि शरीरदाहे पातकं न
भवेद्दग्धुः । कस्मात् ? नित्यत्वादात्मनः । न जातु कश्चिन्नित्यं हिंसितुमर्हति,
अथ हिंस्यते ? नित्यत्वमस्य न भवति । सेयमेकस्मिन् पक्षे हिंसा निष्फला, अन्य-
स्मिंस्त्वनुपन्नेति ? ॥ ५ ॥
को जलाने से पातक नहीं लगता ) उसका अभाव होगा; क्योंकि उस फल से कर्ता का
सम्बन्ध नहीं अकर्ता का सम्बन्ध रहता है । शरीर-इन्द्रिय-बुद्धि-वेदना-प्रवाह से अन्य
सङ्घातात्मक शरीर दूसरा उत्पन्न होता है, वह फलभोक्ता है । अन्य सङ्घात निरुद्ध
( मृत ) होता है, उत्पादनिरोधरूप प्रवाह देह के अन्यत्व का बाध, देहादिसङ्घात में
ही अन्यत्व का अधिष्ठान ( भेदाधारत्व ) होने से, नहीं कर सकता । यह देहेन्द्रियादि-
सङ्घात अन्यत्व का अधिष्ठान प्रसिद्ध है'—इस मत में जो प्राणिभूत देहादिसंघात हिंसा
करता है, वह हिंसा के पातक से सम्बद्ध नहीं होगा, तथा जिसने हिंसा नहीं की उसे
वह पातक लगेगा—इस तरह आपके पक्ष में कृतहान ( कर्ता के नाश से कृत फल का
असम्बन्ध) तथा अकृताभ्यागम दोष (अकर्ता को शरीरान्तर में अकृत फल की प्राप्ति)
होने लगेगी । और अकर्मनिमित्तक ही सत्त्वोत्पत्ति होने लगेगी, तब मोक्ष के लिये ब्रह्म-
चर्यादि की क्या जरूरत रह जायेगी ! अतः यह सिद्ध हुआ यदि देहादिसंघातमात्र को
प्राणी मानोगे तो शरीरदाह में पातक न होगा, जब कि यह शास्त्रविरुद्ध है । तस्मात्
'देहादिसंघातव्यतिरिक्त आत्मा है, तथा वह नित्य है'—यही मत उचित है ॥ ४ ॥
शंका—
सात्मक शरीर के प्रदाह में पातक नहीं होगा; क्योंकि आत्मा नित्य है ? ॥ ५ ॥
जिसने नित्य आत्मा से संयुक्त शरीर जलाया है, उसके जलने पर भी जलाने वाले
को पाप नहीं लगना चाहिये; क्योंकि आत्मा तो नित्य है, नित्य को कभी कोई जला
सकता है ! यदि यह जल जाता है तो इसमें नित्यत्व कैसा ? इस प्रकार यह हिंसा (दोनों
पक्षों में से ) एक पक्ष में निष्फल है और दूसरे में तो बनेगी ही नहीं ? ॥ ५ ॥
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१८० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
न, कार्याश्रयकर्तृवधात् ॥ ६ ॥
न ब्रूम :—‘नित्यस्य सत्त्वस्य वधो हिंसा’, अपि त्वनुच्छित्तिधर्मकस्य
सत्त्वस्य कार्याश्रयस्य शरीरस्य स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणामुपघातः
पीडा, वैकल्यलक्षणः प्रबन्धोच्छेदो वा, प्रमापणलक्षणो वधो वा हिंसेति । कार्यं तु
सुखदुःखवेदनम्, तस्यायतनमधिष्ठानमाश्रयः शरीरम्; कार्याश्रयस्य शरीरस्य
स्वविषयोपलब्धेश्च कर्तॄणामिन्द्रियाणां वधो हिंसा, न नित्यस्यात्मनः । तत्र
यदुक्तम्—'तदभावः सात्मकप्रदाहेऽपि तन्नित्यत्वात्' इत्येतदयुक्तम् । यस्य
सत्त्वोच्छेदो हिंसा, तस्य कृतहानमकृताभ्यागमश्चेति दोषः ।
एतावच्चैतत् स्यात्—सत्त्वोच्छेदो वा हिंसा, अनुच्छित्तिधर्मकस्य सत्त्वस्य
कार्याश्रयकर्तृवधो वा; न कल्पान्तरमस्ति । सत्त्वोच्छेदश्च प्रतिषिद्धः, तत्र किम-
न्यच्छेषं यथाभूतमिति ।
अथ वा¹—कार्याश्रयकर्तृवधादिति, कार्याश्रयो देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घातः,
नित्यस्यात्मानस्तत्र सुखदुःखप्रतिसंवेदनं तस्याधिष्ठानमाश्रयः तदायतनं तद्
भवति न ततोऽन्यदिति स एव कर्ता । तन्निमित्ता हि सुखदुःखवेदनस्य निर्वृत्तिः
उक्त प्रतिषेध उचित नहीं; क्योंकि हम शरीर तथा तदाश्रयभूत इन्द्रियों के उच्छेद
को 'हिंसा' कहते हैं ॥ ६ ॥
हम ( आस्तिक दर्शनकार ) यह नहीं कहते कि नित्य द्रव्य का वध 'हिंसा' है,
अपितु अनुच्छिन्न हो कर रहने वाले धर्म के सम्बन्धी आत्मा के कार्याश्रय शरीर का,
तथा स्वविषयोपलब्धि की कर्ता इन्द्रियों का उपघात = पीड़ा, उनमें विकलता लाने
वाला प्रवाहविच्छेद या विनाशलक्षण वध हमारे मत में हिंसा है। यहाँ सुखदुःखसंवेदन
कार्य है, उसका अधिष्ठान = आश्रय शरीर है। ऐसे कार्याश्रय शरीर का, तथा स्वविषय
ज्ञान को ग्रहण करने वाली इन्द्रियों का वध 'हिंसा' है, न कि नित्य आत्मा का। अतः
पूर्वपक्षी ने 'सात्मक शरीरप्रदाह में भी पातक नहीं होता; क्योंकि आत्मा नित्य है'—
यह जो कहा था वह अयुक्तियुक्त है।
एक बात और है—सत्त्वोच्छेद को ही हिंसा माना जाय तो अकृताभ्यागम आदि
दोष हो सकता है। वह हम मानते नहीं, क्योंकि पूर्वपक्षी ने ही उसका खण्डन किया
है। अतः हिंसापदार्थ कोई दूसरा ही मानना चाहिये। हिंसा दो तरह से ही बन सकती
है—१. या तो सत्त्वोच्छेद को हिंसा माने; २. या फिर अनुच्छिन्नधर्मक के कार्याश्रयभूत
शरीर या इन्द्रियों के उच्छेद को हिंसा मानें। तीसरा कोई विकल्प नहीं। यहाँ सत्त्वो-
च्छेद का तो तुमने भी उसे नित्य मान कर प्रतिषेध ही कर दिया, अब दूसरे विकल्प
वाली हिंसा मानने के अतिरिक्त कौन मार्ग है ?
अथवा—'कार्याश्रयकर्तृवधात्' पद का व्याख्यान यों समझना चाहिये—कार्याश्रय
हुआ देहेन्द्रियबुद्धिसङ्घात । शरीर में रहने वाले नित्य आत्मा के सुखदुःखप्रतिसंवेदन
कार्य हैं, अतः उनका सङ्घात अधिष्ठान है, वही संघात तदायतन है अन्यायतन नहीं,
१. वार्त्तिककर्तुरप्यत्रैव व्याख्यानपक्षे सम्मतिरिति ध्येयम् ।