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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

२८. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३१

२८. सू० ] वाह्यार्थभङ्गनिराकरणप्रकरणम् ३३१
यदि हि तत्त्वबुद्धयः स्युः, बुद्ध्या विवेचने क्रियमाणे याथात्म्यं बुद्धिविषयाणा-
मुपलभ्येत—
बुद्ध्या विवेचनात्तु भावानां याथात्म्यानुपलब्धिस्तन्तवपकर्षेण
पटसद्भावानुपलब्धिवत् तदनुपलब्धिः ? ॥ २६ ॥
यथाऽयं तन्तुरयं तन्तुरिति प्रत्येकं तन्तुषु विविच्यमानेषु नार्थान्तरं किञ्चि-
दुपलभ्यते यत्पटबुद्धेर्विषयः स्यात्, याथात्म्यानुपलब्धेरसति विषये पटबुद्धिर्भ-
वन्ती मिथ्याबुद्धिर्भवति । एवं सर्वत्रेति ? ॥ २६ ॥
व्याहतत्वादहेतुः ॥ २७ ॥
यदि बुद्ध्या विवेचनं भावानाम् न सर्वभावानां याथात्म्यानुपलब्धिः । अथ
सर्वभावानां याथात्म्यानुपलब्धिः, न बुद्ध्या विवेचनं भावानाम् । बुद्ध्या विवेचनं
याथात्म्यानुपलब्धिश्चेति व्याहन्यते । तदुक्तम्—'अवयवावयविप्रसङ्गश्चैवमा-
प्रलयात्' (४.२.१५) इति १ ॥ २७ ॥
तदाश्रयत्वादपृथग्ग्रहणम् ॥ २८ ॥
मिथ्या हैं; क्योंकि यदि ये यथार्थ-बुद्धि होते तो बुद्धि से विवेचन किये जाने पर इन
बुद्धिविषयों का याथात्म्य गृहीत होता ।
बुद्धि द्वारा विवेचन करने से भावों का याथात्म्य ( स्वभाव ) उपलब्ध नहीं होता,
तन्तुओं के अपकर्षण से पटसत्ता के अनुपलम्भ की तरह उसकी अनुपलब्धि हो ? ॥२६॥
जैसे पट के प्रत्येक तन्तु का यह तन्तु, यह तन्तु—यों विवेचन किये जाने पर
तन्तुओं के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता जो पटबुद्धि का विषय बन सके । यों स्वभाव
( पटत्व ) की अनुपलब्धि से विषय ( पट ) के न होने पर भी वहाँ पटबुद्धि होती हुई
मिथ्याबुद्धि ही कहलायेगी ! इसी तरह सर्वत्र समझें ? ॥ २६ ॥
वचनविरोध होने से यह बुद्धिविवेचन हेतु अयुक्त है ॥ २७ ॥
यदि बुद्धि से विवेचन किया जाये तो भावों की याथात्म्यानुपलब्धि क्यों नहीं होगी !
यदि सभी भावों की याथात्म्यानुपलब्धि न हो पायी तो वह बुद्धि से विवेचन नहीं हुआ ।
भावों का बुद्धि से विवेचन हो और उनकी याथात्म्यानुपलब्धि न हो पाये—यह तो
परस्पर विरुद्ध बात है । वस्तुस्वभाव के विना उसका विवेचन नहीं हो सकता, तथा जिस
विविच्यमान की स्वभावानुपलब्धि को हेतुरूप से उपस्थित कर रहे हो वह बुद्धि से
विवेचन नहीं माना जाता । इसीलिये हम पीछे (४. २. १५ में) कह आये हैं कि 'प्रलय-
पर्यन्त अवयवावयविप्रसङ्ग होता चलेगा' ॥ २७ ॥
उस ( पटकार्य ) के आश्रित होने से वह पृथक् गृहीत नहीं होता ॥ २८ ॥
१. अत्र वार्त्तिककारः 'प्रमाणं पर्य्यनुयोज्यः' इत्यादिना दूषणान्तरमप्याह ।

३३२ . वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० २. आ०
कार्यद्रव्यं कारणद्रव्याश्रितं तत्कारणेभ्यः पृथङ् नोपलभ्यते, विपर्यये पृथ-
ग्ग्रहणात्, यत्राश्रयाश्रितभावो नास्ति तत्र पृथग्ग्रहणमिति । बुद्ध्या विवेचनात्तु
भावानां पृथग्ग्रहणम्, अतीन्द्रियेष्वणुषु यदिन्द्रियेण गृह्यते तदेतया बुद्ध्या
विविच्यमानमन्यदिति ॥ २८ ॥
प्रमाणतश्चार्थप्रतिपत्तेः ॥ २९ ॥
बुद्ध्या विवेचनाद्भावानां याथात्म्योपलब्धिः । यदस्ति यथा च यत्रास्ति
यथा च तत्सर्वं प्रमाणत उपलब्ध्या सिध्यति, या च प्रमाणत उपलब्धिस्तद्
बुद्ध्या विवेचनं भावानाम्, तेन सर्वशास्त्राणि सर्वकर्माणि सर्वे च शरीरिणां
व्यवहारा व्याप्ताः । परीक्षमाणो हि बुद्ध्याऽध्यवस्यति—इदमस्ति, इदं नास्तीति ।
तत्र न सर्वभावानुपपत्तिः ॥ २९ ॥
प्रमाणानुपपत्त्युपपत्तिभ्याम् ॥ ३० ॥
एवं च सति सर्वं नास्तीति नोपपद्यते, कस्मात् ? प्रमाणानुपपत्त्युपपत्ति-
भ्याम् । यदि सर्वं नास्तीति प्रमाणमुपपद्यते, सर्वं नास्तीत्येतद्व्याहन्यते ! अथ
प्रमाणं नोपपद्यते, सर्वं नास्तीत्यस्य कथं सिद्धिः ! अथ प्रमाणमन्तरेण सिद्धिः,
सर्वमस्तीत्यस्य कथं न सिद्धिः ! ॥ ३० ॥
कार्यद्रव्य कारणद्रव्याश्रित है, अतः वह उन कारणों से पृथक् गृहीत नहीं होता ।
जहाँ यह आश्रयाश्रित भाव न हो वहाँ पृथग् ग्रहण होता ही है ! बुद्धि द्वारा विवेचन-
मात्र से स्थूल भावों का इन्द्रियों द्वारा पृथक् ज्ञान गृहीत होता है, जैसे अतीन्द्रिय पर-
माणुओं का पृथक् ग्रहण बुद्धि द्वारा होता ही है, अतः बुद्धि से विवेचित हुआ अवयवी
परमाणु से पृथक् है ॥ २८ ॥
अर्थप्रतिपत्ति के प्रमाणाधीन होने से ॥ २९ ॥
बुद्धिविवेचन से भावों की याथात्म्योपलब्धि होती है । जो घटादि द्रव्य है तथा
स्वावयवसमवेतत्व जैसा है, या जो शशविषाणादि कार्यकारणभाव से जैसा नहीं है—
यह सब प्रमाण द्वारा उपलब्धि से सिद्ध होता है । प्रमाण द्वारा उपलब्धि ही 'भावों का
बुद्धि से विवेचन' है । इस बुद्धिविवेचन के अन्तर्गत ही सब शास्त्र, सब कर्म तथा
प्राणियों के सब व्यवहार आ जाते हैं । विवेचन करता हुआ जिज्ञासु—'यह है, यह
नहीं है' ऐसा अध्यवसाय ( यथार्थ निर्णय ) करता है, अतः 'सर्वभावानुपपत्ति' सिद्धान्त
युक्त नहीं ॥ २९ ॥
प्रमाणों की उपपत्ति, अनुपपत्ति से भी ॥ ३० ॥
इतना व्याख्यान होने के बाद, 'सब कुछ नहीं है' यह सिद्धान्त उपपन्न नहीं होता;
क्योंकि प्रमाणों की उपपत्ति तथा अनुपपत्ति उसका आधार है । जैसे—यदि 'सब कुछ
नहीं है' इसमें कोई प्रमाण देते हैं तो उस प्रमाण के होने से तुम्हारी 'सब कुछ नहीं है'
यह प्रतिज्ञा कैसे बनेगी ! यदि प्रमाण न देते हो तो 'सब कुछ नहीं है' इसे कैसे सिद्ध
करोगे ! यदि प्रमाण के बिना ही सिद्धि मानें तो 'सब कुछ है' यह क्यों न सिद्ध मान
लिया जाये ! ॥ ३० ॥