न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
४०. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४९
४०. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४९
अथवा—उपपत्तेश्चेति हेत्वन्तरमेवेदम्। नित्यः खल्वयमात्मा, यस्मादेकस्मिन्
शरीरे धर्मं चरित्वा कायभेदात् स्वर्गे देवेषूपपद्यते, अधर्मं चरित्वा देहभेदाद्
नरकेषूपपद्यते इति। उपपत्तिः शरीरान्तरप्राप्तिलक्षणा, सा सति सत्त्वे नित्ये
चाश्रयवती, बुद्धिप्रबन्धमात्रे तु निरात्मके निराश्रया नोपपद्यत इति। एक-
सत्त्वाधिष्ठानश्चानेकशरीरयोगः संसार उपपद्यते, शरीरप्रबन्धोच्छेदश्चापवर्गो
मुक्तिरित्युपपद्यते। बुद्धिसन्ततिमात्रे त्वेकसत्त्वानुपपत्तेर्न कश्चिद्दीर्घमध्वानं संधा-
वति, न कश्चिच्छरीरप्रबन्धाद्विमुच्यत इति संसारापवर्गानुपपत्तिरिति। बुद्धि-
सन्ततिमात्रे च सत्त्वभेदात् सर्वमिदं प्राणिव्यवहारजातमप्रतिसंहितमव्यावृत्तम-
परिनिष्ठितं च स्यात्। ततः स्मरणाभावः, नान्यदृष्टमन्यः स्मरतीति। स्मरणं
च खलु पूर्वज्ञातस्य समानेन ज्ञात्रा ग्रहणम्—'अज्ञासिषममुमर्थं ज्ञेयम्'। इति सोऽय-
मेको ज्ञाता पूर्वज्ञातमर्थं गृह्णाति, तच्चास्य ग्रहणं स्मरणमिति, तद् बुद्धिप्रबन्ध-
मात्रे निरात्मके नोपपद्यते ॥ ३९ ॥
स्मरणं त्वात्मनो ज्ञस्वाभाव्यात् ॥ ४० ॥
उपपद्यते इति। आत्मन एव स्मरणम्, न बुद्धिसन्ततिमात्रस्येति। तुशब्दो-
अथवा—'उपपत्ति से'—यह एक पृथक् हेतु ही है। 'यह आत्मा नित्य है, क्योंकि एक
शरीर में धर्म का आचरण करके शरीर के विनष्ट होने पर स्वर्ग में देवताओं के बीच
शरीरान्तर उपपन्न होता है, अधर्म का आचरण करके देह-नाश के बाद नरक में शरीरा-
न्तर उपपन्न होता है।' यहाँ उक्त स्वर्गीय नारकीय शरीरों की प्राप्ति ही आत्मा की
'उपपत्ति' है। वह किसी नित्य सत्त्व (द्रव्य) को ही अपना आधार बना सकती है।
बुद्धिसन्तानमात्र मानने पर निरात्मक में आश्रयहीन होकर वह कैसे उपपन्न हो सकेगी !
अनेक शरीर-सम्बन्ध वाला एकसत्त्वाश्रय ही संसार' कहलाता है, शरीरसम्बन्धोच्छेदरूप
अपवर्ग 'मोक्ष' कहलाता है। बुद्धिसन्तानमात्र मानने पर एक सत्त्व की उपपत्ति न होने
से न कोई लम्बे रास्ते (शरीर से शरीरान्तर) चलेगा, न कोई शरीरसम्बन्ध से मुक्त
होगा, यों संसार तथा मोक्ष—दोनों की ही उपपत्ति न बनेगी। तथा बुद्धिसन्तानमात्र
मानने पर सत्त्वभेद से यह सारा प्राणियों का व्यवहार असमाप्त, एक दूसरे न जुड़ा
हुआ, अव्यापृत तथा अपरिनिष्ठित (अव्यवस्थित) होने लगेगा। तब स्मरणाभाव भी
होगा; क्योंकि अन्य दृष्ट का अन्य स्मरण नहीं करता। स्मरण कहते हैं—'एक ज्ञाता को
पूर्व ज्ञात का ज्ञान होना' कि 'इस जाने हुए अर्थ को मैं जानता था।' यह एक ही ज्ञाता
जिस पूर्व ज्ञात अर्थ को ग्रहण करता है वह ग्रहण 'स्मरण' कहलाता है। वह स्मरण
निरात्मक बुद्धिसन्तानमात्र में उपपन्न नहीं होता ॥ ३९ ॥
ज्ञातृस्वभाव होने से आत्मा को स्मरण ॥ ४० ॥
उपपन्न हो सकता है। आत्मा को ही स्मरण होता है, बुद्धिसन्तानमात्र को नहीं।
२५० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आं०
ऽवधारणे। कथम् ? ज्ञस्वभावत्वात्। ज्ञ इत्यस्य स्वभावः स्वो धर्मः, अयं
खलु 'ज्ञास्यति, जानाति, अज्ञासीत्' इति त्रिकालविषयेणानेकेन ज्ञानेन सम्बध्यते,
तच्चास्य त्रिकालविषयं ज्ञानं प्रत्यात्मवेदनीयम्-'ज्ञास्यामि, जानामि, अज्ञासिषम्'
इति वर्तते, तद्यस्यायं स्वो धर्मस्तस्य स्मरणम्, न बुद्धिप्रबन्धमात्रस्य निरा-
त्मकस्येति ॥ ४० ॥
स्मृतिहेतूनामयौगपद्याद्युगपदस्मरणमित्युक्तम्। अथ केभ्यः स्मृतिरुत्पद्यत
इति ? स्मृतिः खलु—
प्रणिधाननिबन्धाभ्यासलिङ्गलक्षणसादृश्यपरिग्रहाश्रयाश्रितसम्बन्धानन्तर्य-
वियोगैककार्यविरोधातिशयप्राप्तिव्यवधानसुखदुःखेच्छाद्वेषभयार्थित्वक्रियाराग -
धर्माधर्मनिमित्तेभ्यः ॥ ४१ ॥
सुस्मूर्षया मनसो धारणं प्रणिधानं सुस्मूर्षितलिङ्गचिन्तनं चार्थस्मृति-
कारणम्। निबन्धः खल्वेकग्रन्थोपनयमोऽर्थानाम्, एकग्रन्थोपनताः खल्वर्था अन्योऽ-
न्यस्मृतिहेतव आनुपूर्व्येणेतरथा वा भवन्तीति। धारणाशास्त्रकृतो१ वा प्रज्ञा-
सूत्र में 'तु' शब्द निश्चयार्थक है। क्यों ? ज्ञस्वभाव ज्ञाता का अपना धर्म है, वह
'जानेगा', 'जानता है', 'जानता था'—इस त्रिकालविषयक अनेक ज्ञान से सम्बद्ध
होता है। यह त्रिकालविषयक ज्ञान 'जानूँगा' 'जानता हूँ' 'जानता था'—ऐसा प्रत्यात्म-
वेदनीय (प्रतिव्यक्ति को अनुभवसिद्ध) होता है। जिसका यह स्वधर्म है वही स्मरण
करता है, न कि निरात्मक बुद्धिसन्तानमात्र ॥ ४० ॥
स्मृतिहेतुओं में यौगपद्य न रहने से युगपद् स्मरण नहीं होता—यह पहले कह आये
हैं। यह स्मृति—
प्रणिधान, निबन्ध, अभ्यास, लिङ्ग, लक्षण, सादृश्य, परिग्रह, आश्रय, आश्रित,
सम्बन्ध, आनन्तर्य, वियोग, एककार्य, विरोध, अतिशय, प्राप्ति, व्यवधान, सुख-दुःख,
इच्छा-द्वेष, भय, अर्थित्व, क्रिया, राग, धर्म, अधर्म—इन २५ निमित्तों से होती है ॥४१॥
स्मरण करने की इच्छा से मन को एक में धारण करना, अर्थात् उस सुस्मूर्षा-विषय
के अतिरिक्त अन्यत्र गये मन को निवारण करना 'प्रणिधान' कहलाता है। सुस्मूर्षित के
चिह्न का चिन्तन भी अर्थ का स्मरण करता है। एक ग्रन्थ में आये हुए अर्थ (विषय),
जैसे इसी ग्रन्थ में प्रमाणादि पदार्थ, 'निबन्ध' कहलाते हैं। एक ग्रन्थ में आये हुए
पदार्थ अनुक्रम या व्युत्क्रम से अन्योन्यस्मृतिहेतु होते हैं। जैगीषव्यादि महर्षि प्रोक्त
'धारणाशास्त्र', तत्कृत प्रज्ञातवस्तुओं में स्मर्तव्य विषयों का समारोप भी 'निबन्ध' है,
१. "धारणाशास्त्रं जैगीषव्यादिप्रोक्तम्, तत्कृतो ज्ञातेष्वेव वस्तुषु नाडीचक्रहृत्पु-
ण्डरीककण्ठकूपनासाग्रतालुललाटब्रह्मरन्ध्रादिषु स्मर्त्तव्यानां बीजरूपसंस्थानास्त्राभरणभू-
तानां देवतानामुपनिक्षेपः समारोपः। तथा च तत्र देवताः समारोपितास्तत्तदवयवग्रहणात्
स्मर्यन्ते इत्यर्थः"—इति तात्पर्यटीकायां वाचस्पतिमिश्राः।