न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन
Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)
५९. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०५
५९. सू० ] अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् ३०५
कथम् ? न दुःखं जन्म स्वरूपतः, किन्तु दुःखोपचाराद् । एवं सुखमपीति एतद-
नेनैव निर्वर्त्त्यते, न तु दुःखमेव जन्मेति ॥ ५८ ॥
अपवर्गपरीक्षाप्रकरणम् [ ५९-६८ ]
दुःखोपदेशानन्तरमपवर्गः, स प्रत्याख्यायते—
ऋणक्लेशप्रवृत्त्यनुबन्धादपवर्गाभावः ? ॥ ५९ ॥
ऋणानुबन्धान्नास्त्यपवर्गः । “जायमानो ह वै ब्राह्मणस्त्रिभिर्ऋणैर्ऋणवान्
जायते ब्रह्मचर्येण ऋषिभ्यो यज्ञेन देवेभ्यः, प्रजया पितृभ्यः” इति ऋणानि,
तेषामनुबन्धः१ स्वकर्मभिः सम्बन्धः । कर्मसम्बन्धवचनात् “जरामयं वा एतत्सत्रं
यदग्निहोत्रं दर्शपूर्णमासौ चेति; जरया ह एष तस्मात् सत्राद्विमुच्यते, मृत्युना ह
”वा इति । ऋणानुबन्धादपवर्गानुष्ठानकालो नास्तीत्यपवर्गाभावः ?
क्लेशानुबन्धान्नास्त्यपवर्गः । क्लेशानुबन्ध एवायं म्रियते, क्लेशानुबद्धश्च
जायते । नास्य क्लेशानुबन्धविच्छेदो गृह्यते ?
स्वयं जन्म दुःख नहीं, किन्तु उसमें दुःख की भावना (आरोप) की जाती है अर्थात्
दुःख का जन्म में उपचार है। इसी तरह सुख के विषय में भी समझ लें। जन्म से सुख
होता है न कि दुःख ही जन्म है। यहाँ जन्मनिवृत्ति ही इस उपदेश से समझायी जा रही
है, सुख का अभाव नहीं सिद्ध किया जा रहा है ॥ ५८ ॥
उद्देशसूत्रानुसार अब क्रमप्राप्त 'अपवर्ग' पर विचार किया जाये । अपवर्ग, जिसका
कि हम पीछे (१. १. २०) लक्षण कर आये हैं, का कुछ लोग प्रत्याख्यान करते हैं। (वे
कहते हैं—)
ऋणानुबन्ध, क्लेशानुबन्ध तथा प्रवृत्त्यनुबन्ध हेतुओं से अपवर्ग नहीं है ? ॥ ५९ ॥
ऋणानुबन्ध से 'अपवर्ग नहीं है'—ऐसा मानना चाहिए। जैसा कि शतपथब्राह्मण
में कहा है—'उत्पन्न होता हुआ यह ब्राह्मण तीन ऋणों से ऋणवान् रहता है, उसमें वह
ऋषियों के ऋण (वेदाध्ययनाध्यापन) से ब्रह्मचर्य द्वारा छूटता है, देव-ऋण से यज्ञ द्वारा
तथा पितृ-ऋण से सन्तानोत्पत्ति द्वारा छूट पाता है।' यों ऋण बता दिये गये। इन ऋणों
का अनुबन्ध अर्थात् स्वकर्तव्यों से सम्बन्ध। इस प्रकार हमारा सम्बन्ध इनसे सदा बना
है। निष्कर्ष यह है कि इन ऋणों का अपाकरण कर्त्तव्य कोटि में आता है। इस कर्म-
सम्बन्धवचन से—'यह अग्निहोत्र तथा दर्श, पूर्णमास आदि यज्ञ वार्धक्य तक करने आव-
श्यक हैं, इन यज्ञों से बुढ़ापा या मृत्यु आने पर ही छुटकारा मिल सकता है' यह श्रुति-
वाक्य से प्रमाणित होता है। उक्त ऋणापाकरण में ही समग्र जीवन व्यतीत हो जायेगा
तो उसे अपवर्गानुष्ठान का समय ही न मिलेगा, अतः मान लें कि अपवर्ग नहीं है ?
क्लेशानुबन्ध से भी अपवर्ग नहीं है। यह प्राणी क्लेशानुबद्ध ही पैदा होता है, क्लेशों
से संघर्ष करता-करता मर जाता है। उसका यह क्लेशानुबन्ध कभी विच्छिन्न होता नहीं
दिखायी देता ?
१. 'अनुबन्धः = सर्वदाकरणीयता' इति वार्त्तिककृतः ।
न्या० द० : २०
३०६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ४. अ० १. आ०
प्रवृत्त्यनुबन्धान्नास्त्यपवर्गः। जन्मप्रभृत्ययं यावत्प्रायणं वाग्बुद्धिशरीरा-
रम्भेणाविमुक्तो गृह्यते, तत्र यदुक्तम्-‘दुःखजन्मप्रवृत्तिदोषमिथ्याज्ञानानामुत्तरो-
त्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः’ इति (१.१.२) तदनुपपन्नमिति ? ॥ ५९ ॥
अत्राभिधीयते—
१. यत्तावदृणानुबन्धादिति, ऋणैरिव ऋणैरिति—
प्रधानशब्दानुपपत्तेर्गुणशब्देनानुवादो निन्दाप्रशंसोपपत्तेः ॥ ६० ॥
‘ऋणैः’ इति नायं प्रधानशब्दः। यत्र खल्वेकः प्रत्यादेयं ददाति द्वितीयश्च
प्रतिदेयं गृह्णाति तत्रास्य दृष्टत्वात् प्रधानमृणशब्दः! न चैतदिहोपपद्यते;
प्रधानशब्दानुपपत्तेः। गुणशब्देनायमनुवादः—ऋणैरिव ऋणैरिति। प्रयुक्तोपमं
चैतद्, यथाऽग्निर्मांणवक इति। अन्यत्र दृष्टश्चायमृणशब्द इह प्रयुज्यते, यथाग्नि-
शब्दो मागवके। कथं गुणशब्देनानुवादः ? निन्दाप्रशंसोपपत्तेः। कर्मलोपे ऋणीव
ऋणादानान्निन्द्यते, कर्मानुष्ठाने च ऋणीव ऋणदानात्प्रशस्यते; स एवोपमार्थ इति।
प्रवृत्त्यनुबन्ध से भी अपवर्ग नहीं है। जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त यह प्राणी वाचिक,
बौद्धिक तथा शारीरिक क्रियाओं में लगा रहता है, उनसे इसे कभी छुटकारा नहीं मिल
पाता। अतः आपका यह पूर्व कथन (१. १. २) कि—'दुःख जन्म, प्रवृत्ति, दोष, मिथ्या-
ज्ञानों के उत्तरोत्तर के अपाय द्वारा उसके बाद वाले के नाश से अपवर्ग हो जाता है' ?
सर्वथा अयुक्त है ॥ ५९ ॥
यहाँ सिद्धान्ती (नैयायिक) कहता है—इस ‘ऋणानुवन्ध’ शब्द में ‘ऋणों की तरह
ऋणों से’ ऐसा औपचारिक अर्थ करना चाहिए। क्योंकि
जहाँ शब्द का मुख्यार्थ अनुपपन्न हो वहाँ गुण शब्द से, निन्दा-प्रशंसोपपादन होने से
अनुवाद कर लिया जाता है ॥ ६० ॥
‘ऋणों से’ यह प्रधान (मुख्यार्थबोधक) शब्द नहीं है। जहाँ एक उधार ली हुई
चीज को देता है तथा दूसरा लेता है—वहीं ‘ऋण’ शब्द का मुख्यार्थ रूप में प्रयोग होता
है। यहाँ ऐसी बात है नहीं, अतः इस शब्द का प्रधान अर्थ गृहीत नहीं होता। इसलिये
ऋणशब्द लाक्षणिक अर्थ में प्रयुक्त किया है कि ‘ऋणों की तरह के ऋणों से’। जैसे
तेजस्वी आदमी को लोक में कह देते हैं—‘यह माणवक तो अग्निरूप है’। इसी तरह
अन्यत्र देखा गया ऋण शब्द यहाँ प्रयुक्त हुआ है, जैसे अग्नि शब्द माणवक में। गुण-
शब्द से अनुवाद कैसे है ? उसके निन्दा-प्रशंसात्मक होने से। जैसे ऋणी ऋण न चुका
पाने के कारण निन्दापात्र होता है उसी तरह यह पुरुष भी उक्त तीनों में से कोई एक
या सब कर्मों के विलोप से निन्दापात्र बनता है। और जैसे ऋणी ऋण चुका देने से
प्रशंसित होता है उसी तरह यह पुरुष कर्मानुष्ठान से प्रशंसा प्राप्त करता है।