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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

५५. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६५

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५५. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १६५
अनित्यपक्षे समाधि :—
अनवस्थायित्वे च वर्णोपलब्धिवत् तद्विकारोपपत्तिः ? ॥ ५४ ॥
यथाऽनवस्थायिनां वर्णानां श्रवणं भवत्येवमेषां विकारो भवतीति ?
असम्बन्धादसमर्था अर्थप्रतिपादिका १ वर्णोपलब्धिर्न विकारेण सम्बन्धाद-
समर्था, या गृह्यमाणा वर्णविकारमर्थमनुमापयेदिति । तत्र यादृगिदम् यथा
गन्धगुणा पृथिव्येवं शब्दसुखादिगुणापीति, तादृगेतद्भवतीति । न च वर्णो-
पलब्धिर्वर्णानिवृत्तौ वर्णान्तरप्रयोगस्य निवर्तिका । योऽयमिर्वर्णानिवृत्तौ यकारस्य
प्रयोगः, यद्ययं वर्णोपलब्ध्या निवर्त्तते तदा तत्रोपलभ्यमान इवर्णो यत्वमापद्यते
इति गृह्येत । तस्माद् वर्णोपलब्धिरहेतुर्वर्णविकारस्येति ॥ ५४ ॥
विकारधर्मित्वे नित्यत्वाभावात् कालान्तरे विकारोपपत्तेश्चोप्रतिषेधः ॥ ५५ ॥
'तद्धर्मविकल्पात्' इति न युक्तः प्रतिषेधः । न खलु विकारधर्मकं किञ्चिन्नित्-
त्यमुपलभ्यत इति वर्णोपलब्धिवदिति न युक्तः प्रतिषेधः । अवग्रहे हि दधि
शङ्का—अनित्य मानने पर तो उनमें विकारधर्म बन जायेगा—
वर्णों में अनवस्थायित्व ( स्वल्पकालस्थायित्व ) होने पर भी उनकी उपलब्धि की
तरह उनमें विकार भी बन जायेगा ? ॥ ५४ ॥
जैसे स्वल्पकालस्थायी वर्णों का श्रवण उपपन्न होता है, उसी तरह उनकी अस्था-
यिता में उनका विकार भी सम्भव है ?
उत्तर—जब प्रकृतिशब्द ( इकार ) के साथ विकृतिशब्द ( यकार ) से असम्बद्ध
रहने पर वर्णोपलब्धि अर्थप्रतिपादन में असमर्थ है तो विकार से सम्बन्ध न होने से उसका
ज्ञान कराने में असमर्थ ही रहेगी । उसमें ऐसी शक्ति कहाँ से आ जायेगी कि वह गृहीत
होती हुई वर्णविकार का अनुमान करा सके ! वर्णोपलब्धि वर्णवृत्ति में वर्णान्तरप्रयोग
की निवर्तिका नहीं है । गंध गुणवाली पृथ्वी जैसे शब्द सुख आदि गुणवती होती है, वैसा
ही यहाँ समझना होगा । यह जो इकारनिवृत्ति होने पर यकार का प्रयोग है, यदि यह
यकार वर्णोपलब्धि से निवृत्त हो जाता तो 'वहां सुनाई देता हुआ इकार यकारत्व को
प्राप्त होता है' ऐसा परीक्षकों द्वारा समझा जाता । ऐसा नहीं होता, अतः मान लेना
चाहिये कि वर्णोपलब्धि (उपलभ्यमान इकार) वर्णविकार (यकार) का हेतु नहीं है ॥५४॥
विकारी मानने पर, उसमें नित्यत्व न रहने से तथा कालान्तर में विकारोपपत्ति
होने से प्रतिषेध नहीं बनेगा ॥ ५५ ॥
'तद्धर्मविकल्प' हेतु से प्रतिषेध उचित नहीं; क्योंकि कोई विकारी नित्य नहीं होता;
अतः 'वर्णोपलब्धि की तरह'—ऐसा कह कर प्रतिषेध करना उचित नहीं । असंहिता में
'दधि + अत्र' ऐसा प्रयोग कर, काफी देर तक ठहरने के बाद पुनः संहिता में 'दध्यत्र'
१. 'अर्थप्रतिपादने' इति पाठस्तात्पर्यसम्मतः ।

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१६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
अत्रेति प्रयुज्य चिरं स्थित्वा ततः संहितायां प्रयुङ्क्ते-दध्यत्रेति। चिरनिवृत्ते
चायमिवर्णे यकारः प्रयुज्यमानः कस्य विकार इति प्रतीयते ! कारणाभावात्
कार्याभाव इति अनुयोगः प्रसज्यत इति ॥ ५५ ॥
५. इतश्च वर्णविकारानुपपत्तिः-
प्रकृत्यनियमात् १ ॥ ५६ ॥
इकारस्थाने यकारः श्रूयते, यकारस्थाने खल्विकारो विधीयते-विध्यति
इति । तद्यदि स्यात् प्रकृतिविकारभावो वर्णानाम्, तस्य प्रकृतिनियमः स्यात् ।
दृष्टो विकारधर्मित्वे प्रकृतिनियम इति ॥ ५६ ॥
अनियमे नियमान्नानियमः ? ॥ ५७ ॥
योऽयं प्रकृतेरनियम उक्तः स नियतो यथाविषयं व्यवस्थितो नियतत्वान्नियम
इति भवति, एवं सत्यनियमो नास्ति । तत्र यदुक्तम्-‘प्रकृत्यनियमात्’ इति,
एतदयुक्तमिति ? ॥ ५७ ॥
नियमानियमविरोधादनियमे नियमाच्चाप्रतिषेधः ॥ ५८ ॥
नियम इत्यत्रार्थमभ्यनुज्ञा, अनियम इति तस्य प्रतिषेधः । अनुज्ञातनिषिद्ध-
का प्रयोग करता है। इवर्ण के चिरनिवृत्त होने पर प्रयुज्यमान यकार किसका विकार
प्रतीत होगा ! कारणाभाव से कार्याभाव है-ऐसा अनुयोग आपके हेतु हेत्वाभास
ही है ॥ ५५ ॥
५ इस कारण भी वर्णविकार का उपपादन नहीं होगा-
(वर्णविकारों का) प्रकृतिनियम न होने से ॥ ५६ ॥
इकार के स्थान में जो यकार श्रुत होता है, जैसे-‘विध्यति’, यहाँ यकार के स्थान
में इकार का विधान उपलब्ध है। यदि वर्णों का प्रकृतिविकृतिभाव होता तो प्रकृतिनियम
बन सकता था; क्योंकि लोक में विकारी पदार्थों का प्रकृतिनियम देखा जाता है ॥ ५६ ॥
छलवादी की शंका-
यह अनियम में नियम होने से अनियम नहीं, (नियम ही है) ॥ ५७ ॥
आप ने यह जो वर्णों के विषय में प्रकृति का अनियम सिद्ध किया वह अपने विषय के
लिये व्यवस्थित होने के कारण ‘नियम’ ही सिद्ध होता है। ऐसा होने पर अनियम कहाँ
रहा ! अतः आप ने अभी जो ‘प्रकृत्यनियम’ हेतु दिया था, वह अनुपपन्न है ॥ ५७ ॥
उत्तर-
नियम ‘अनियम’-दोनों का शाश्वतिक विरोध होने से, अनियम में नियम बताने
से प्रतिषेध नहीं बनता ॥ ५८ ॥
‘नियम’ इस शब्द से तदर्थ की स्वीकृति है, ‘अनियम’ इस शब्द से तदर्थ
१. 'वर्णविकाराणाम्' इत्यधिकः पाठः क्वचित् ।