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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

·३८. सू० ]· बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् :२४७

·३८. सू० ]· बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् :२४७
आत्मास्तित्वहेतुभिरात्मनित्यत्वहेतुभिश्च भूतचैतन्यप्रतिषेधः कृतो वेदि-
तव्यः । 'नेन्द्रियार्थयोस्तद्विनाशेऽपि ज्ञानावस्थानात्' ( ३.२.१८ ) इति च
समानः प्रतिषेध इति । क्रियामात्रं क्रियोपरममात्रं चारम्भनिवृत्ती इत्यभिप्रेत्यो-
क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा
त्विमे आरम्भनिवृत्ती आख्याते, न च तथाविधे पृथिव्यादिषु दृश्येते, तस्मादयु-
क्तम्-‘तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः' इति ॥ ३७ ॥
भूतेन्द्रियमनसां समानः प्रतिषेधः, मनस्तूदाहरणमात्रम् ।
यथोक्तहेतुत्वात् पारतन्त्र्यादकृताभ्यागमाच्च न मनसः ॥ ३८ ॥
‘इच्छाद्वेषप्रयत्नसुखदुःखज्ञानान्यात्मनो लिङ्गम्' (१.१.१०) इत्यतः प्रभृति
यथोक्तं संगृह्यते, तेन भूतेन्द्रियमनसां चैतन्यप्रतिषेधः ।
पारतन्त्र्यात् । परतन्त्राणि भूतेन्द्रियमनांसि धारणप्रेरणव्यूहनक्रियासु प्रय-
त्नवशात् प्रवर्तन्ते, चैतन्ये पुनः स्वतन्त्राणि स्युरिति ।
इसी प्रकार, आत्मास्तित्वसाधक तथा आत्मनित्यत्वसाधक हेतुओं से भी भूतचैतन्य
का प्रतिषेध समझना चाहिये । 'इन्द्रिय-अर्थ को बुद्धि नहीं कह सकते; क्योंकि उनके
विनाश पर भी ज्ञानस्थिति देखी जाती है' ( ३.२.१८ ) — यह प्रतिषेध भी भूतचैतन्या-
भाव का ही समर्थन करता है। क्रिया तथा क्रियोपरममात्र को आरम्भ-निवृत्ति समझ
कर पूर्वपक्षी ने कह दिया था कि 'तल्लिङ्ग होने से इच्छाद्वेष का पार्थिवादि में प्रतिषेध
नहीं बनता' ( ३.२.३५ ) । अन्यथा हमारे मत में हितप्राप्ति तथा अहितपरिहार के
लिये चेष्टा ( प्रयत्न ) विशेष आरम्भ-निवृत्ति कहलाते हैं। इस लक्षणवाले आरम्भ तथा
निवृत्ति भूतों में दिखायी नहीं देते । अतः यह कहना असमीचीन ही है कि 'तल्लिङ्ग होने
से पार्थिवादि में प्रतिषेध नहीं बनता' ॥ ३७ ॥
बुद्धि के आश्रितत्व के वारे में भूत, इन्द्रिय तथा मन का प्रतिषेध समान ही है; मन
तो एक उदाहरणमात्र है ।
यथोक्त हेतुओं से, पारतन्त्र्य से, तथा अकृताभ्यागम दोष से बुद्धि मन का ( गुण
नहीं हो सकती ) ॥ ३८ ॥
'यथोक्त' का तात्पर्य 'इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, सुख, दुःख, ज्ञान को ही आत्मा का हेतु
समझें' ( १. १. १० ) इत्यादि सूत्र से है। उक्त हेतुओं से भूत, इन्द्रिय, तथा मन का
चैतन्य प्रतिषिद्ध समझना चाहिए ।
पारतन्त्र्य हेतु से भी इनमें चैतन्य का प्रतिषेध समझें । भूत, इन्द्रिय तथा मन
परतन्त्र हैं, वे किसी अन्य के प्रयत्न से धारण, प्रेरण तथा व्यूहन ( संग्रह ) क्रियाओं में
प्रवृत्त होते हैं। इनको चैतन्य मानने पर ये स्वतन्त्र होने लगेंगे ।

२४८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
अकृताभ्यागमाच्च । 'प्रवृत्तिर्वाग्बुद्धिशरीरारम्भः' (१.१.१७) इति चैतन्ये
भूतेन्द्रियमनसां परकृतं कर्म पुरुषेणोपभुज्यत इति स्यात् । अचैतन्ये तु तत्सा-
धनस्य स्वकृतकर्मफलोपभोगः पुरुषस्येत्युपपद्यत इति ॥ ३८ ॥
अथायं सिद्धोपसङ्ग्रहः—
परिशेषाद्यथोक्तहेतूपपत्तेश्च ॥ ३९ ॥
आत्मगुणो ज्ञानमिति प्रकृतम् । परिशेषो नाम 'प्रसक्तप्रतिषेधे अन्यत्रा-
प्रसङ्गाच्छिष्यमाणे सम्प्रत्ययः' ( १.१.५ सू० भा० ) । भूतेन्द्रियमनसां प्रतिषेधे
द्रव्यान्तरं न प्रसज्यते, शिष्यते चात्मा, तस्य गुणो ज्ञानमिति ज्ञायते ।
यथोक्तहेतूपपत्तेश्चेति । 'दर्शनस्पर्शनाभ्यामेकार्थग्रहणात्' (३.१.१) इत्ये-
वमादीनामात्मप्रतिपत्तिहेतूनामप्रतिषेधादिति ।
परिशेषज्ञापनार्थं प्रकृतस्थापनादिज्ञानार्थं च यथोक्तहेतूपपत्तिवचनमिति ।
अकृताभ्यागम दोष से भी बुद्धि मन का गुण नहीं है । "वाणी, बुद्धि तथा शरीर
से किये जाने वाले कार्यों का आरम्भ 'प्रवृत्ति' कहलाता है" (१. १. १७) यह पहले
कह आये हैं, इस स्थिति में शरीरादि को चैतन्य मानने पर चेतन के स्वतन्त्र होने से
वे ही कर्ता हो जायेंगे, तब शरीरनाश के बाद परलोक का फलभोग कैसे सम्भव होगा !
अन्यथा दूसरे के कर्म का दूसरा उपभोग करेगा । शरीरादि को अचेतन मानने पर स्वकृत
कर्म का फलभोग पुरुष (आत्मा) को उपपन्न होगा, क्योंकि वह नित्य है ॥ ३८ ॥
अब इस समग्र प्रकरण का उपसंहार यह है—
परिशेष से तथा यथोक्त हेतुओं द्वारा उपपादन से ॥ ३९ ॥
ज्ञान आत्मा का ही गुण है । 'परिशेष' से तात्पर्य है 'प्रसक्त का निषेध कर दिये
जाने पर, अन्यत्र प्रसङ्ग प्राप्त न होने से अवशिष्ट को मान लेना' । यहाँ साधक हेतुओं
से भूत, इन्द्रिय तथा मन का बुद्धिगुणत्व प्रतिषिद्ध कर दिया गया, तब द्रव्यान्तर में यह
गुण प्रसक्त नहीं हो सकता, अब बाकी बच गया—आत्मा, अतः यह सिद्ध हुआ कि
बुद्धि आत्मा का ही गुण है ।
यथोक्त हेतुओं के उपपादन से भी । 'दर्शन स्पर्शन द्वारा एक ही अर्थ के ग्रहण से'
(३. १. १) इत्यादि आत्मप्रतिपादक हेतुओं के, प्रतिपक्षियों द्वारा खण्डित न किये जाने
से भी बुद्धि आत्मा का गुण सिद्ध होती है ।
अथवा—परिशेष-ज्ञापन कराने के लिए सूत्र में 'यथोक्तहेतु' शब्द का प्रयोग है ।
अर्थात् तृतीयाध्याय-प्रथमाह्निकरोक्त हेतु आत्मा के साधक हैं । अथ च प्रकृत (बुद्धि का
आत्मगुणत्व) स्थापनादिज्ञान के लिये 'उपपत्ति' शब्द का प्रयोग है, अर्थात् बुद्धि को
आत्मगुण मानने में भी वे हेतु खण्डित नहीं होते ।
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