न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
६४. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७१
६४. सू० ] शब्दशक्तिपरीक्षाप्रकरणम् १७१
सहचरणात्–'यष्टिकां भोजय' इति यष्टिकासहचरितो ब्राह्मणोऽभिधीयत
इति । स्थानात्–मञ्चाः क्रोशन्तीति मञ्चस्थाः पुरुषा अभिधीयन्ते । तादर्थ्यात्–
कटार्थेषु वीरणेषु व्यूह्यमानेषु कटं करोतीति भवति । वृत्ताद्–यमो राजा, कुबेरो
राजेति तद्वद् वर्त्तते इति । मानाद्–आढकेन मिताः सक्तवः आढकसक्तव इति ।
धारणात्–तुलायां धृतं चन्दनं तुलाचन्दनमिति । सामीप्याद्–गङ्गायां गावश्च-
रन्तीति देशोऽभिधीयते सन्निकृष्टः । योगात्–कृष्णेन रागेण युक्तः शाटकः कृष्ण
इत्यभिधीयते । साधनात्–'अन्नं प्राणाः' इति । आधिपत्यात्–'अयं पुरुषः कुलम्',
'अयं गोत्रम्' इति ।
तन्नायं सहचरणाद्योगाद् वा जातिशब्दो व्यक्तौ प्रयुज्यत इति ॥ ६४ ॥
आकृतिवादः
यदि गौरित्यस्य पदस्य न व्यक्तिरर्थः, अस्तु तर्हि—
आकृतिः, तदपेक्षत्वात् सत्त्वव्यवस्थानासिद्धेः ? ॥ ६५ ॥
आकृतिः पदार्थः । कस्मात् ? तदपेक्षत्वात् सत्त्वव्यवस्थानासिद्धेः । सत्त्वा-
वयवानां तदवयवानां च नियतो व्यूहः = आकृतिः, तस्यां गृह्यमाणायां सत्त्वव्य-
का प्रयोग' । जैसे—'यष्टिका को खिलाओ' इस वाक्य में 'ब्राह्मण' शब्द के न रहने पर
भी यष्टिका के सहचार से 'यष्टिकाधारी ब्राह्मण को खिलाओ'—यों ब्राह्मण में यष्टि का
उपचार लोक में देखा जाता है । इसी तरह, स्थान हेतु से—'मञ्च चिल्ला रहे हैं' इस
वाक्य में मञ्चस्थ पुरुष का कथन है । तादर्थ्य हेतु से—चटाई के लिये तृणविशेष को
वयन करने वाले पुरुष के लिए भी 'चटाई बना रहा है'—यह प्रयोग होता है । वृत्त
हेतु से—यह राजा यम है' ( क्रूर बर्ताव करने से ), या 'यह राजा कुबेर है' ( दान
करने से )—यह प्रयोग होता है । मान हेतु से भी—आढक परिमाण से तोले हुए सत्तू
को लोक में 'आढक सत्तू' भी कह देते हैं । धारण हेतु से—तुला में रखा हुआ चन्दन
'तुलाचन्दन' कहलाने लगता है । सामीप्य हेतु से—लोक में, गङ्गा के समीपवर्ती देश
को लेकर 'गङ्गा में गायें चर रही हैं—ऐसा बोल देते हैं । योग हेतु से—काले रंग में
रंगी हुई साड़ी 'काली साड़ी' कहलाती है । साधन हेतु से—अन्न प्राण के साधन होने
के कारण 'अन्न प्राण हैं' ऐसा बोल देते हैं । आधिपत्य हेतु से—किसी विशिष्ट प्रभाव
वाले पुरुष को लेकर 'यही कुल हैं' 'यही गोत्र है'—ऐसा लोक में प्रयोग देखा जाता है ।
यहाँ सहचार या अन्य सम्बन्धों से यह जातिशब्द व्यक्ति में प्रयुक्त होता है ॥ ६४ ॥
यदि 'गौ' इस शब्द का व्यक्ति अर्थ नहीं मानते हो तो—
सत्त्वव्यवस्था की सिद्धि को आकृत्यपेक्षता होने से आकृति अर्थ मान लें ? ॥६५॥
आकृति पदार्थ है; क्योंकि सत्त्वव्यवस्थासिद्धि आकृत्यपेक्षित है । प्राणि आदि द्रव्य
के अवयवों या उन के अवयवों का नियत रूपों में जो सन्निवेश होता है वह 'आकृति'
१७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
वस्थानं सिध्यति-अयं गौरयमश्व इति, नागृह्यमाणायाम् । यस्य ग्रहणात् सत्त्व-
व्यवस्थानं सिद्धयति तं शब्दोऽभिधातुमर्हति, सोऽस्यार्थ इति ।
नैतदुपपद्यते; यस्य जात्या योगस्तत्र जातिविशिष्टमभिधीयते-गौरिति ।
न चावयव्यूहस्य जांत्या योगः, कस्य तर्हि ? नियतावयव्यूहस्य द्रव्यस्य ।
तस्मान्नाकृतिः पदार्थः ॥ ६५ ॥
जातिवादः
अस्तु तर्हि जातिः पदार्थः-
व्यक्त्याकृतियुक्तेऽप्यप्रसङ्गात् प्रोक्षणादीनां मृद्गवके जातिः ? ॥ ६६ ॥
जातिः पदार्थः । कस्मात् ? व्यक्त्याकृतियुक्तेऽपि मृद्गवके प्रोक्षणादीनाम-
प्रसङ्गादिति । गां प्रोक्षय, गामानय, गां देहीति नैतानि मृद्गवके प्रयुज्यन्ते ।
कस्मात् ? जातेरभावात् । अस्ति हि तत्र व्यक्तिः, अस्त्याकृतिः, यदभावात्
तत्रासम्प्रत्ययः स पदार्थ इति ? ॥ ६६ ॥
न, आकृतिव्यक्त्यपेक्षत्वाज्जात्यभिव्यक्ते ॥ ६७ ॥
जातेरभिव्यक्तिराकृतिव्यक्ती अपेक्षते, नागृह्यमाणायामाकृतौ व्यक्तौ च
जातिमात्रं शुद्धं गृह्येत, तस्मान्न जातिः पदार्थ इति ? ॥ ६७ ॥
कहलाता है । उस आकृति के गृहीत होने पर 'यह गौ हैं', 'यह अश्व हैं'-ऐसी सत्त्व-
व्यवस्था उपपन्न हो सकती है; आकृति के अगृहीत होते हुए उक्त व्यवस्था उपपन्न नहीं
हो सकती । जिसके ग्रहण से उक्त सत्त्वव्यवस्थान सिद्ध होता हो, उसीको शब्द कहे-
यही उचित है । वही उसका अर्थ है। अतः आकृति को पदार्थ मान लें ?
आपका यह मतस्थापन उचित नहीं; क्योकि जिसका जाति से सम्बन्ध है वही यहां
जातिविशिष्ट होकर अभिहित किया जाता है; जैसे-'गौ' । अवयव्यूहात्मक आकृति
का जाति से योग नहीं होता; अपितु नियतावयव्यूह द्रव्य का योग बनता है । अतः
आकृति पदार्थ नहीं है-यह सिद्ध हो गया ॥ ६५ ॥
तो जाति को ही पदार्थ मान लें-
गौ की मिट्टी की मूर्ति में व्यक्ति तथा आकृति होते हुए भी प्रोक्षण ( बलि ) आदि
की प्रसक्ति न होने से जाति ही पदार्थ है ? ॥ ६६ ॥
जाति पदार्थ हैं; क्योंकि व्यक्त्याकृतियुक्त होने पर भी मृत्तिका-मूर्ति में प्रोक्षण आनय-
नादि की प्रसक्ति नहीं होती । 'गौ का प्रोक्षण करो', 'गौ लाओ', 'गौ दो'-ये व्यवहार
मिट्टी की मूर्ति में नहीं बनते, क्योंकि वहाँ जाति नहीं है; यद्यपि वहाँ व्यक्ति भी है, आकृति
भी है । जिसके अभाव से वहाँ उपर्युक्त ज्ञान नहीं हो पाता, वही पदार्थ हैं ? ॥ ६६ ॥
नहीं; आकृति तथा व्यक्ति की अपेक्षा लेकर जाति के सिद्ध होने से ॥ ६७ ॥
जाति की अभिव्यक्ति भी व्यक्ति तथा आकृति की अपेक्षा रखती है । आकृति तथा
व्यक्ति के गृहीत हुए बिना जाति एकाकी गृहीत नहीं हो पाती; अतः जाति पदार्थ
नहीं है ॥ ६७ ॥-