सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २७१

७२. सू० ] अदृष्टनिष्पाद्यत्वपरीक्षाप्रकरणम् २७१
पुनर्जन्म । भूतमात्रात्तु कर्मनिरपेक्षाच्छरीरोत्पत्तौ कस्य क्षयाच्छरीरपातः प्राय-
णमिति-प्रयाणानुपपत्तेः खलु वै नित्यत्वप्रसङ्गं विद्मः । यादृच्छिके तु प्रायणे
प्रायणभेदानुपपत्तिरिति ॥ ७० ॥
पुनस्तत्प्रसङ्गोऽपवर्ग इत्येतसत् माधित्सुराह—
अणुश्यामतान्नित्यत्ववदेतत् स्यात् ? ॥ ७१ ॥
यथा अणोः श्यामता नित्या अग्निसंयोगेन प्रतिविद्धा न पुनरुत्पद्यते, एवम-
दृष्टकारितं शरीरमपवर्गे पुनर्नोत्पद्यत इति ? ॥ ७१ ॥
न; अकृताभ्यागमप्रसङ्गात् ॥ ७२ ॥
नायमस्ति दृष्टान्तः, कस्मात् ? अकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । अकृतम् = प्रमाणतो-
ऽनुपपन्नम्, तस्याभ्यागमोऽभ्युपपत्तिर्व्यवसायः । एतच्छ्रद्दधानेन प्रमाणतोऽनुपपन्नं
मन्तव्यम् । तस्मान्नायं दृष्टान्तः । न प्रत्यक्षं न चानुमानं किञ्चिदुच्यत इति ।
तदिदं दृष्टान्तस्य साध्यसमत्वमभिधीयत इति ।
अथ वा—नाकृताभ्यागमप्रसङ्गात् । अणुश्यामतादृष्टान्तेनाकर्मनिमित्तां
से शरीरोत्पत्ति मानें तो किसके क्षीण होने पर शरीरनाश होगा ! जब शरीरनाश नहीं
होगा तो उसमें नित्यत्व आ गया—ऐसा हम समझते हैं । निष्कर्ष यह है कि स्वेच्छया
नाश मानें तो कदाचित् तब भी नाश अनुपपन्न ही है ॥ ७० ॥
इस मत में, अपवर्ग के बाद पुनः शरीरोत्पत्ति होने लगेगी—इस शंका का समा-
धान करना चाहते हुए कहते हैं—
अणु की श्यामता के नित्यत्व की तरह यह शरीर अपवर्ग होने पर विनष्ट हो
जायेगा ? ॥ ७१ ॥
जैसे अणु की श्यामता ( कृष्णरूप ) नित्य हैं; क्योंकि वह अग्निसंयोग से एक बार
विनष्ट होकर पुनः उत्पन्न नहीं होती; उसी तरह अपवर्ग होने पर हमारे मत में पुनः
शरीरोत्पत्ति नहीं होगी ? ॥ ७१ ॥
अकृताभ्यागम दोष होने से यह दृष्टान्त उचित नहीं ॥ ७२ ॥
यह दृष्टान्त यहाँ देना उचित नहीं; क्योंकि स्वयं इसमें अकृताभ्यागम दोष है ।
‘अकृत’ अर्थात् प्रमाण से अनुपपन्न, उसका अभ्यागम अर्थात् अभ्युपपत्ति ( स्वीकृति ),
व्यवसाय । श्यामता के दृष्टान्त से शरीरोत्पत्ति न माननेवाले को प्रमाण से अनुपपन्न
( अपने हठ को सिद्ध करने के लिये प्रमाणादि की आवश्यकता न माननेवाला ) ही
समझना चाहिये । अतः यह दृष्टान्त नहीं है; क्योंकि यह प्रत्यक्ष और अनुमान को सहारा
लेकर नहीं कहा जा रहा है । यों यह दृष्टान्त स्वयं साध्य होने से असिद्ध है
अथवा सूत्र का व्याख्यान यों समझना चाहिये—अणु श्यामता के दृष्टान्त से

२७२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
शरीरोत्पत्ति समादधानस्याकृताभ्यागमप्रसङ्गः । अकृते सुखदुःखहेतौ कर्मणि
पुरुषस्य सुखं दुःखमभ्यागच्छतीति प्रसज्येत । ओमिति ब्रुवतः प्रत्यक्षानुमाना-
गमविरोधः ।
प्रत्यक्षविरोधस्तावद्—भिन्नमिदं सुखदुःखं प्रत्यात्मवेदनीयत्वात् प्रत्यक्षं
सर्वशरीरिणाम् । को भेदः ? तीव्रं मन्दं चिरमाशु नानाप्रकारमेकप्रकार-
मिति एवमादिर्विशेषः । न चास्ति प्रत्यात्मनियतः सुखदुःखहेतुविशेषः, न
चासति हेतुविशेषे फलविशेषो दृश्यते । कर्मनिमित्ते तु सुखदुःखयोगे कर्मणां
तीव्रमन्दतोपपत्तेः कर्मसञ्चयानां चोत्कर्षापकर्षभावान्नानाविधैकविधभावाच्च
कर्मणां सुखदुःखभेदोपपत्तिः । सोऽयं हेतुभेदाभावाद् दृष्टः सुखदुःखभेदो न स्या-
दिति प्रत्यक्षविरोधः !
तथाऽनुमानविरोधः—दृष्टं हि पुरुषगुणव्यवस्थानात् सुखदुःखव्यवस्थानम् ।
यः खलु चेतनावान् साधननिर्वर्तनीयं सुखं बुद्ध्वा तदीप्सन् साधनावाप्तये
प्रयतते स सुखेन युज्यते, न विपरीतः । यश्च साधननिर्वर्तनीयं दुःखं बुद्ध्वा
तज्जिहासुः साधनपरिवर्जनाय यतते स च दुःखेन त्यज्यते, न विपरीतः । अस्ति
अकर्मनिमित्तक शरीरोत्पत्ति माननेवाले को अकृताभ्यागम-प्रसङ्ग होगा; क्योंकि तब पुरुष
सुख-दुःख कारणों वाले कर्म को न करने पर भी सुख-दुःख प्राप्त करने लगेगा । यदि यह
अकृताभ्यागम स्वीकार करते हो तो आपके इस मत में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा आगम—
तीनों ही प्रमाणों से विरोध उपस्थित होगा ।
१. प्रत्यक्षप्रमाण-विरोध, जैसे—सभी प्राणियों के ये प्रत्यात्मवेदनीय सुख-दुःख
प्रत्यक्षतः भिन्न-भिन्न देखे जाते है। भेद क्या है ? कोई सुख-दुःख तीव्र तथा कोई मन्द
होता है, कोई चिरकाल तथा कोई अल्पकाल तक ठहरता है । यों, नाना प्रकार तथा एक
प्रकार का देखा जाने से उसमें भेद ज्ञात होता है । परन्तु आपके मत में नियत सुख-
दुःखहेतु विशेष नहीं दिखायी देता, हेतुविशेष के न रहने पर फलभेद भी नहीं होगा ।
कर्मनिमित्तक सुख-दुःखसम्बन्ध मानने पर, कर्मों की तीव्रता या मन्दता के उपपादन से
या कर्म-सञ्चय के उत्कर्ष-अपकर्ष से उससे होने वाले सुख-दुःख में नानाप्रकारता तथा
एकप्रकारता आ ही जायेंगी—अतः कर्मों से सुख-दुःख-भेद बन जायेगा । परन्तु आपके
मत में हेतुभेद न होने से प्रत्यक्षदृष्ट सुख-दुःख-भेद उपपन्न न होगा—यह प्रत्यक्षप्रमाण
से विरोध है !
२. अनुमानप्रमाण-विरोध, जैसे-पुरुषगुणानुरोध से सुख-दुःख की उत्पत्ति लोक
में उपपन्न होती है । जो चेतन प्राणी साधन से उत्पादनीय सुख को प्रमाणों द्वारा जानकर
उसको चाहता हुआ उक्त साधनप्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है तो वह सुखी होता है,
दूसरा नहीं । और जो साधनों से उत्पादनीय दुःख को प्रमाणों द्वारा जानकर उसको छोड़ने
की इच्छा करता हुआ उक्त साधननिवृत्ति के लिये प्रयत्न करता है तो वह दुःखों से