न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
४०. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १५९
४०. सू० ] शब्दपरिणामपरीक्षाप्रकरणम् १५९
भिन्नकरणयोश्च वर्णयोरप्रयोगे प्रयोगोपपत्तिः। विवृतकरण इकारः,
ईषत्स्पृष्टकरणो यकारः, ताविमौ पृथक्करणाख्येन प्रयत्नेनोच्चारणीयौ। तयो-
रेकस्याप्रयोगेऽन्यतरस्य प्रयोग उपपन्न इति ।
अविकारे चाविशेषः। यत्रेमाविकारयकारौ न विकारभूतौ-यतते, यच्छति,
प्रायंस्त इति, इकारः, इदमिति च; यत्र च विकारभूतौ-इष्ट्वा, दध्याहरेति;
उभयत्र प्रयोक्तुरविशेषो यत्नः श्रोतुश्च श्रुतिरित्यादेशोपपत्तिः।
प्रयुज्यमानाग्रहणाच्च। न खलु इकारः प्रयुज्यमानो यकारतामापद्यमानो
गृह्यते, किं तर्हि ? इकारस्य प्रयोगे यकारः प्रयुज्यते, तस्मादविकार इति।
अविकारे च न शब्दान्वाख्यानलोपः। 'न विक्रियन्ते वर्णाः' इति। न
चैतस्मिन् पक्षे शब्दान्वाख्यानस्यासम्भवः, येन वर्णविकारं प्रतिपद्येमहीति।
न खलु वर्णस्य वर्णान्तरं कार्यम्-न हि इकाराद्यकार उत्पद्यते, यकाराद्वा
इकारः। पृथक्स्थानप्रयत्नोत्पाद्या हीमे वर्णाः, तेषामन्योऽन्यस्य स्थाने प्रयुज्यत
इति युक्तम्। एतावच्चैतत्परिणामो विकारः स्यात् कार्यकारणभावो वा; उभयं
च नास्ति। तस्मान्न सन्ति वर्णविकाराः।
भिन्न प्रयत्नजन्य वर्णों में एक के अप्रयोग में दूसरे का प्रयोग उत्पन्न होने लगेगा;
क्योंकि इकार का विवृत प्रयत्न है, तथा यकार का ईषत्स्पृष्ट प्रयत्न। ये दोनों पृथग्व्यापार
वाले प्रयत्न से उच्चारणीय हैं, इनमें एक' के अप्रयोग पर दूसरे का प्रयोग उत्पन्न
होता है।
अविकार मानने पर कोई विशेषता नहीं आयेगी; क्योंकि इनके उच्चारणों में वक्ता
या श्रोता को प्रयत्नान्तर नहीं करना पड़ता। जैसे- 'यतते, यच्छति, आयंस्त'-यहाँ
'य'; तथा 'इकार' 'इदम्' यहाँ 'इ' अविकार हैं; तथा 'इष्ट्वा' 'दध्यत्र' यहाँ ये दोनों
विकार हैं। दोनों ही जगह प्रयोक्ता का समान प्रयत्न है, श्रोता को श्रवण भी वैसा ही
होता है।
प्रयुज्यमान अक्षर में स्थानी अक्षर का ग्रहण न होने से जैसे इकार प्रयुज्यमान होते
हुए वह यकारता के रूप में होता हुआ नहीं होता, बल्कि इस प्रकार के प्रयोग में यकार
का प्रयोग होता है, अतः वह अविकार है।
अविकार मानने से शब्दान्वाख्यानपरम्परा का लोप भी नहीं होगा। 'वर्ण विकृत नहीं
होते' इस पक्ष में शब्दान्वाख्यान असम्भव नहीं है किहमें आपका वर्णविकारपक्ष मानना पड़े।
वर्ण से वर्णान्तर भी नहीं बनता, ऐसा नहीं होता कि इकार से यकार उत्पन्न हो
या यकार से इकार उत्पन्न हो; क्योंकि वर्ण अपने-अपने अलग स्थान तथा प्रयत्न से
उत्पन्न होनेवाले हैं। उनमें दूसरा दूसरे के स्थान में प्रयुक्त होता है-यही मानना
उचित है। इतना इसका यह परिणाम है-ऐसा विकार हो सकता है। अथवा कार्य-
कारण भाव हो सकता है। ये दोनों नहीं हैं, अतः वर्णविकार नहीं है।
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१६० वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ २. अ० २. आ०
वर्णसमुदायविकारानुपपत्तिवच्च वर्णविकारानुपपत्तिः। 'अस्तेर्भूः'
(पा० सू० २. ४. ५२) 'ब्रुवो वचिः' (२. ४. ५३) इति यथा वर्णसमुदायस्य
धातुलक्षणस्य क्वचिद्विषये वर्णान्तरसमुदायो न परिणामो न कार्यम्, शब्दान्तरस्य
स्थाने शब्दान्तरं प्रयुज्यते। तथा वर्णस्य वर्णान्तरमिति ॥ ४० ॥
२. इतश्च न सन्ति विकाराः—
प्रकृतिविवृद्धौ विकारविवृद्धेः ॥ ४१ ॥
प्रकृत्यनुविधानं विकारेषु दृष्टम्, यकारे ह्रस्वदीर्घानुविधानं नास्ति, येन
विकारत्वमनुमीयत इति ॥ ४१ ॥
न्यूनसमाधिकोपलब्धेर्विकाराणामहेतुः ? ॥ ४२ ॥
द्रव्यविकारा न्यूनाः समा अधिकाश्च गृह्यन्ते। तद्द्वयं विकारो न्यूनः
स्यादिति ? ॥ ४२ ॥
द्विविधस्यापि हेतोरभावादसाधनं दृष्टान्तः ॥ ४३ ॥
अत्र नोदाहरणसाधर्म्याद्धेतुरस्ति; न वैधर्म्यात्। अनुपसंहृतश्च हेतुना
दृष्टान्तो न साधक इति।
वर्णसमुदायविकारानुपपत्ति की तरह यह वर्णविकारानुपपत्ति भी मान लेनी चाहिये।
जैसे—'अस्तेर्भूः' (पा० सू० २. ४. ५२), 'ब्रुवो वचिः' (पा० सू० २. ४. ५३)
यह धातुलक्षण वर्णसमुदाय का किसी विषय में होने वाला वर्णसमुदाय (वचि) न
परिणाम है, न विकार; बस, दूसरे शब्द के स्थान में दूसरा शब्द प्रयुक्त हो जाता है—
इतना ही सिद्धान्त है। इस नय से दूसरे वर्ण के स्थान में दूसरा वर्ण प्रयुक्त होता है—
यही सिद्धान्त है ॥ ४० ॥
२. वर्ण इसलिये भी विकार नहीं है—
प्रकृति की विवृद्धि होने से विकार की विवृद्धि होने के कारण ॥ ४१ ॥
विकारों में प्रकृत्यनुविधान देखा जाता है; परन्तु यहाँ यकार में दीर्घादि की अनु-
वृत्ति नहीं देखी जाती, जिससे यकार में विकारत्व का अनुमान न हो सके ॥ ४१ ॥
न्यून, सम तथा अधिक उपलब्धि से यहाँ विकारों का हेतुत्व नहीं बनता ? ॥४२॥
लोक में जैसे द्रव्यविकार में न्यूनता समता या अधिकता देखी जाती हैं वैसे इन
वर्णों में विकार न्यून हो सकता है। अतः विकार का साधक कोई हेतु नहीं हैं ॥ ४२ ॥
दोनों प्रकार के हेतुओं के अभाव से दृष्टान्त असाधक है ॥ ४३ ॥
यहाँ न तो उदाहरणसादृश्य से हेतु है और न उदाहरणवैसादृश्य से। अतः हेतु से
अनुपसंहृत दृष्टान्त साधक नहीं होता।
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