न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
६७. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१७
६७. सू० ] अर्थपरीक्षाप्रकरणम् २१७
संसर्गादिनेकगुणग्रहणं भूतानामिति । भूतान्तररूपकृतं च पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वं
ब्रुवतः प्रत्यक्षो वायुः प्रसज्यते, नियमे वा कारणमुच्यतामिति ।
रसयोर्वा पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् । पार्थिवो रसः षड्विधः, आप्यो मधुर
एव, न चैतत्संसर्गाद्भवितुमर्हति ।
रूपयोर्वा पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् तैजसरूपानुगृहीतयोः । संसर्गे हि
व्यञ्जकमेव रूपं न व्यङ्ग्यमस्तीति । एकानेकविधत्वे च पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्ष-
त्वाद् रूपयोः । पार्थिवं हरितलोहितपीताद्यनेकविधं रूपम्, आप्यं तु शुक्लमप्रका-
शकम् । न चैतदेकगुणानां संसर्गे सत्युपलभ्यते इति । उदाहरणमात्रं चैतत् ।
अतः परं प्रपञ्चः ।
स्पर्शयोर्वा पार्थिवतैजसयोः प्रत्यक्षत्वात् । पार्थिवोऽनुष्णाशीतः स्पर्श उष्ण-
स्तैजसः प्रत्यक्षः, न चैतदेकगुणानामनुष्णाशीतस्पर्शेन वायुना संसर्गेणोपपद्यत
इति ।
अथ वा—पार्थिवाप्ययोर्द्रव्ययोर्व्यवस्थितगुणयोः प्रत्यक्षत्वात् । चतुर्गुणं
सकेगा । तेज के सदृश ही पृथिवी जल का प्रत्यक्ष होने से इतर संसर्गप्रयुक्त उनका प्रत्यक्ष
मानना उचित नहीं है। तब आप का यह सिद्धान्त कहाँ रह जायेगा कि सम्बन्ध से
भूतों में अनेक विषयों का ग्रहण हो जाता है ! यदि उक्त पार्थिव या आप्य द्रव्य के
प्रत्यक्ष को भूतान्तररूपजन्य मानोगे तो इस नय से वायु का भी प्रत्यक्ष होने लगेगा ।
यदि कोई इसके लिये प्रतिबन्धकनियम बनाते हो तो उसमें कोई हेतु बताना चाहिये ।
अथवा—'पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात्' का व्याख्यान 'रस' तथा 'रूप' आदि का अध्या-
हार करके यों करना चाहिये—पार्थिव तथा आप्य रस के प्रत्यक्ष होने से । पार्थिव रस
छह प्रकार का है, जब कि आप्य रस मधुर ही होता है, यह सम्बन्ध से नहीं बन सकता ।
अथवा—तैजस रूप से अनुगृहीत पार्थिव तथा आप्य रूप का प्रत्यक्ष होने से । तैजस
सम्बन्ध मानने पर रूप व्यञ्जक ही होगा, व्यङ्ग्य नहीं । पार्थिव तथा आप्य रूपों का
अनेक तथा एक प्रकार भेद से प्रत्यक्ष होने से भी उसका प्रत्यक्ष संसर्गप्रयुक्त नहीं है ।
पार्थिव रूप हरा, लाल, पीला आदि अनेक प्रकार का है, जब कि आप्य रूप एक अप्र-
काशक शुक्ल ही होता है । यह बात गुणान्तर का सम्बन्ध मानने पर कैसे बनती ! यह
उदाहरणमात्र दिखा दिया है । आगे इसी बात को विस्तार से समझा रहे हैं ।
अथवा—पार्थिव तथा तैजस स्पर्श के प्रत्यक्ष होने से । पार्थिव स्पर्श अनुष्णाशीत
है, जब कि तैजस स्पर्श उष्ण प्रत्यक्ष होता है । यह बात एक गुणवाले अन्य द्रव्यों का
अनुष्णाशीतस्पर्श वाली वायु के साथ सम्बन्ध मानने पर कैसे बनेगी !
अथवा—व्यवस्थित गुणवाले पार्थिव तथा आप्य द्रव्यों के प्रत्यक्ष होने से । पार्थिव
२१८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० १. आ०
पार्थिवं द्रव्यमु, त्रिगुणमाप्यं प्रत्यक्षम्, तेन तत्कारणमनुमीयते तथाभूतमिति ।
तस्य कार्यं लिङ्गं कारणाभावाद्धि कार्याभाव इति । एवं तैजसवायव्ययोर्द्रव्ययोः
प्रत्यक्षत्वाद् गुणव्यवस्थायाः तत्कारणे द्रव्ये व्यवस्थानुमानमिति ।
दृष्टश्च विवेकः—पार्थिवाप्ययोः प्रत्यक्षत्वात् । पार्थिवं द्रव्यमबादिभिर्वियुक्तं
प्रत्यक्षतो गृह्यते, आप्यं च पराभ्याम्, तैजसं च वायुना, न चैकैकगुणं गृह्यत
इति । निरनुमानं तु 'विष्टं ह्यपरं परेण' ( ३.१.६६ ) इत्येतदिति, नात्र लिङ्गम-
नुमापकं गृह्यत इति येनैतदेवं प्रतिपद्येमहि ।
यच्चोक्तम्—'विष्टं ह्यपरं परेणेति भूतसृष्टौ वेदितव्यं न साम्प्रतम्' इति ?
नियमकारणाभावादयुक्तम्¹ । दृष्टं च साम्प्रतमपरं परेण विष्टमिति वायुना च
विष्टं तेज इति । विष्टत्वं संयोगः, स च द्वयोः समानः वायुना च विष्टत्वात्
स्पर्शवत्तेजः, न तु तेजसा विष्टत्वाद् रूपवान् वायुरिति नियमकारणं नास्तीति ।
द्रव्य चतुर्गुण प्रसिद्ध है, जब कि आप्य द्रव्य त्रिगुण ही, इस व्यवस्थित गुणकार्य से
व्यवस्थितगुण वाले कारण का अनुमान करते है । इस अनुमान का हेतु वह कार्य ही है,
क्योंकि कारण न होने से ही कार्य नहीं होता है । इसी प्रकार, तैजस तथा वायव्य
द्रव्यों के प्रत्यक्ष होने के कारण गुणव्यवस्था से कार्यव्यवस्था का अनुमान होता है।
पार्थिव और आप्य पृथक्-पृथक् देखा गया है । पार्थिव द्रव्य का प्रत्यक्ष जलादि से
रहित होने पर भी होता है, इसी तरह जलीय द्रव्य तेज तथा वायु से रहित भी प्रत्यक्ष
से गृहीत होता है, और तैजस द्रव्य वायु से रहित स्वतन्त्रतया प्रत्यक्ष से गृहीत होता
है । उस समय ये एक एक गुण वाले गृहीत नहीं होते हैं। आप का यह कहना तो
निरनुमान ही है कि 'पृथिव्यादि अवादि से व्याप्त हैं' ( ३.१.६६ ) । क्योंकि यहाँ हमें
ऐसा कोई अनुमापक हेतु नहीं मिलता, जिससे आप की बात से हम सहमत हो सकें ।
तथा आप का यह कहना भी अयुक्त ही है कि 'पृथिव्यादि अवादि से व्याप्त हैं,
यह बात भूतसृष्टिप्रतिपादक पुराणों में प्रतिपादित है, भले ही आज कल हम लोगों के
ध्यान में न आवें'; क्योंकि यहाँ भी आपने कोई नियमहेतु नहीं दिखाया । आज भी
हम अपर (तेज) को दूसरे ( वायु ) से विष्ट ( संयुक्त ) देखते हैं, जैसे—तेज वायु से
संयुक्त है । विष्टत्व का अर्थ है 'संयोग' । वह तो दोनों का समान ही है । तथा वायु
से संयुक्त होने से तेज स्पर्शवान् है, परन्तु तेज से संयुक्त होने पर भी वायु रूपवान्
नहीं बनती—इसमें नियमहेतु नहीं है। यह भी हम देखते हैं कि तैजस उष्ण स्पर्श से
१. नियमः 'गन्ध एव पृथिव्याम्' इत्येवमादिः, तस्य कारणं प्रमाणं नास्ति;
तद्बाधकस्यैव प्रमाणस्योक्तत्वात् । तस्माद् भूतसृष्टिः कथञ्चिदुपचारतो व्याख्येयेति
तात्पर्यटीकायां मिश्राः ।
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