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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

४२. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६७

४२. सू० ] षट्पक्षीप्रकरणम् ३६७
सर्वेषु साधर्म्यप्रभृतिषु प्रतिषेधहेतुषु यत्र यत्राविशेषो दृश्यते, तत्रोभयोः
पक्षयोः समः प्रसज्यत इति ॥ ४० ॥
प्रतिषेधविप्रतिषेधे प्रतिषेधदोषवद् दोषः ॥ ४१ ॥
योऽयं प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः-अनैकान्तिकत्वमापद्यते, सोऽयं प्रतिषेधस्य
प्रतिषेधेऽपि समानः । तत्र 'अनित्यः शब्दः प्रयत्नानन्तरीयकत्वात्' इति साधन-
वादिनः स्थापना, प्रथमः पक्षः । 'प्रयत्नकार्यनेकत्वात् कार्यसमः' इति दूषण-
वादिनः प्रतिषेधहेतुना द्वितीयः पक्षः, स च 'प्रतिषेधः' इत्युच्यते । तस्यास्य
'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इति तृतीयः पक्षो 'विप्रतिषेधः' उच्यते । तस्मिन्
प्रतिषेधविप्रतिषेधेऽपि समानो दोषोऽनैकान्तिकत्वं चतुर्थः पक्षः ॥ ४१ ॥
प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधे समानो दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा ॥४२॥
प्रतिषेधं द्वितीय पक्षं सदोषमभ्युपेत्य तदुद्धारमनुक्त्वाऽनुज्ञाय प्रतिषेध-
विप्रतिषेधे तृतीयपक्षे समानमनैकान्तिकत्वमिति समानं दूषणं प्रसजतो
दूषणवादिनो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति पञ्चमः पक्षः ॥ ४२ ॥
सभी 'साधर्म्यसम' प्रभृति प्रतिषेधहेतुओं ( जातियों ) में, जहाँ जहाँ विशेष नहीं
दिखायी देता, वहाँ दोनों ही पक्षों में समान दोष आता है ॥ ४० ॥
[ पुनः प्रकृत में आते हैं-- ]
प्रतिषेध के विप्रतिषेध ( खण्डन ) में प्रतिषेध के समान ही दोष हैं ॥ ४१ ॥
यह जो प्रतिषेध में सर्वत्र समान दोष—व्यभिचार—बतलाया था, वह प्रतिषेध के
खण्डन में भी समान ही है । यह चतुर्थ पक्ष हुआ ।
यहाँ क्रमशः—१. 'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है'—यह प्रथम-
पक्ष है । २. 'प्रयत्न के अनेक कार्य होने से यहाँ कार्यसम दोष है'—यह हेतुपुरस्सर
प्रतिषेधात्मक द्वितीयपक्ष है । ३. 'दोनों पक्षों में व्यभिचारदोष समानरूप से है'—यह
विप्रतिषेधात्मक तृतीयपक्ष है । तथा ४. 'प्रतिषेध का खण्डन करने में भी व्यभिचाररूप
समान दोष है'—यह चतुर्थपक्ष है ॥ ४१ ॥
अब पञ्चमपक्ष कहते हैं—
दोषयुक्त को प्रतिषेध मानकर प्रतिषेध के विप्रतिषेध में समानदोष प्रसङ्ग उठाना
'मतानुज्ञा' ( निग्रहस्थान या स्वीकृति ) है ॥ ४२ ॥
प्रतिषेधपरक द्वितीय पक्ष को दोषयुक्त मानकर उसका खण्डन न कह कर, अपितु
स्वीकार करके प्रतिषेध के खण्डनपरक तृतीय पक्ष में समान अनैकान्तिकत्व है, अतः ऐसा
कहनेवाले को दूषण प्रसक्त होने की दशा में दोषवादी की 'मतानुज्ञा' प्रसक्त हुई । यह
पञ्चम पक्ष है ॥ ४२ ॥

३६८ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ५. अ० १. आ०
स्वपक्षलक्षणापेक्षोपपत्त्युपसंहारे हेतुनिर्देशे परपक्षदोषाभ्युपगमात् समानो
दोष इति ॥ ४३ ॥
स्थापनापक्षे प्रयत्नकार्यानिकत्वादिति दोषः स्थापनाहेतुवादिनः स्वपक्ष-
लक्षणो भवति । कस्मात् ? स्वपक्षसमुत्थत्वात् । सोऽयं स्वपक्षलक्षणं दोष-
मपेक्षमाणोऽनुद्धृत्यानुज्ञाय प्रतिषेधेऽपि समानो दोष इत्युपपद्यमानं दोषं परपक्षे
उपसंहरति । इत्थं चानैकान्तिकः प्रतिषेध इति हेतुं निर्दिशति । तत्र स्वपक्ष-
लक्षणापेक्षयोपपद्यमानदोषोपसंहारे हेतुनिर्देशे च सत्यनेन परपक्षोऽभ्युपगतो
भवति । कथं कृत्वा ? यः परेण प्रयत्नकार्यानेकत्वादित्यादिनाऽनैकान्तिकदोष
उक्तः, तमनुद्धृत्य 'प्रतिषेधेऽपि समानो दोषः' इत्याह । एवं स्थापनां सदोषा-
मभ्युपेत्य प्रतिषेधेऽपि समानं दोषं प्रसजतः परपक्षाभ्युपगमात् समानो दोषो
भवति । यथा परस्य प्रतिषेधं सदोषमभ्युपेत्य प्रतिषेधविप्रतिषेधेऽपि समानो
दोषप्रसङ्गो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति, तथाऽस्यापि स्थापनां सदोषामभ्युपेत्य
प्रतिषेधेऽपि समानं दोषं प्रसजतो मतानुज्ञा प्रसज्यत इति । स खल्वयं षष्ठः पक्षः ।
तत्र खलु स्थापनाहेतुवादिनः प्रथमतृतीयपञ्चमपक्षाः, प्रतिषेधहेतुवादिनः
द्वितीयचतुर्थषष्ठपक्षाः । तेषां साध्वसाधुतायां मीमांस्यमानायां चतुर्थषष्ठयोरर्था-
अपने पक्ष में दोष के लक्षण की अपेक्षा से हेतु के निर्देश में, परपक्ष में दोष
मानने से अथवा उपपादन के उपसंहार से, दोष देखने में समान दोष है ॥ ४३ ॥
'प्रयत्न के पश्चात् उत्पन्न होने से शब्द अनित्य है'—इस स्थापनापक्ष में प्रयत्न-
कार्यनिकत्वहेतु से दोषोद्भावन स्थापनाहेतुवादी (प्रतिपक्षी) का स्वपक्षलक्षण है; क्योंकि
वह इसी हेतु से अपना पक्ष समुपस्थापित कर रहा है। वह स्थापनावादी स्वपक्षलक्षण
दोष को समझता हुआ भी उसे न हटाकर, यों उसे स्वीकार करता हुआ 'प्रतिषेध में भी
समान दोष है' ऐसा कहकर, उपपन्न दोष को परपक्ष में उपसंहृत करता है, और इस
तरह प्रतिषेध अनैकान्तिक हेतुदोष का निर्देश करता है। वहाँ स्वपक्षलक्षण की अपेक्षा
से उपपद्यमान दोष का उपसंहार तथा हेतु का निर्देश होने पर परपक्ष में दोष स्वीकृत
होता है। कैसे ? वह प्रतिपक्षी द्वारा कहा गया 'प्रयत्नकार्यों के अनेक होने से' इत्यादि
हेतु में अनैकान्तिक दोष का खण्डन किये बिना, 'प्रतिषेध में भी समान दोष है'—ऐसा
कहता है । इसी तरह प्रतिपक्षी की सदोष स्थापना को स्वीकार कर प्रतिषेध में भी
समान दोष देते हुए परपक्ष को स्वीकार करता है, अतः उक्त मत में भी समान दोष आता
है। अतः जैसे प्रतिपक्षी के प्रतिषेध को सदोष समझकर प्रतिषेध के विप्रतिषेध में समान
दोष 'मतानुज्ञा' प्रसक्त होता है, उसी तरह इसके स्थापनापक्ष को भी सदोष मानकर
प्रतिषेध में समान दोष प्रसक्त करने वाले को 'मतानुज्ञा' प्रसक्त होगी। यह षष्ठ पक्ष है।
यहाँ—प्रथम, तृतीय तथा पञ्चम पक्ष स्थापनाहेतुवादी के हैं; तथा द्वितीय, चतुर्थ
एवं षष्ठ पक्ष प्रतिषेधहेतुवादी के हैं। इन पक्षों को साधुता, असाधुता का विचार करने