न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)
Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya
महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा
स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)
३७. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४५
३७. सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २४५
अयं तर्ह्यन्योऽर्थः—तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः पार्थिवाद्येष्वप्रतिषेधः। पृथ्वि-
व्यादीनां भूतानामारम्भस्तावत्तदसत्स्थावरशरीरेषु तदवयव्यूहलिङ्गः प्रवृत्ति-
विशेषः. लोष्टादिषु च लिङ्गाभावात् प्रवृत्तिविशेषाभावो निवृत्तिः, आरम्भ-
निवृत्तिलिङ्गाविच्छाद्वेषाविति । पार्थिवाद्येष्वणुषु तद्दर्शनादिच्छाद्वेषयोगः, त-
द्योगाज् ज्ञानयोग इति सिद्धं भूतचैतन्यमिति ?
कुम्भादिष्वनुपलब्धेरहेतुः¹। कुम्भादिमृदवयवानां व्यूहलिङ्गः प्रवृत्तिविशेष
आरम्भः, सिकतादिषु प्रवृत्तिविशेषाभावो निवृत्तिः । न च मृत्सिक्तानामारम्भ-
निवृत्तिदर्शनादिच्छाद्वेषप्रयत्नज्ञानैर्योगः, तस्मात् 'तल्लिङ्गत्वादिच्छाद्वेषयोः'
इत्यहेतुरिति ॥ ३६ ॥
नियमानियमौ तु तद्विशेषकौ ॥ ३७ ॥
तयोरिच्छाद्वेषयोर्नियमानियमौ विशेषकौ = भेदकौ। ज्ञस्येच्छाद्वेषनिमित्ते
प्रवृत्तिनिवृत्ती, न स्वाश्रये। किं तर्हि ? प्रयोज्याश्रये। तत्र प्रयुज्यमानेषु भूतेषु
प्रवृत्तिनिवृत्ती स्तः, न सर्वेष्वित्यनियमोपपत्तिः।
यस्य तु ज्ञत्वाद् भूतानामिच्छाद्वेषनिमित्ते आरम्भनिवृत्ती स्वाश्रये तस्य
शंका—हमारे सिद्धान्तवाक्य का आपने अर्थ ठीक नहीं समझा । उसका अर्थ यह
है—पृथिव्यादि भूतों में उनके अस्थिर स्थावर शरीरों में तदवयव्यूहहेतु से प्रवृत्तिविशेष
ज्ञात होता है। तथा लोष्टादिक में वह हेतु न होने से प्रवृत्तिविशेषाभावरूप निवृत्ति ज्ञात
होती है। इच्छाद्वेषादिक आरम्भ निवृत्ति हेतु से निर्णीत है। पार्थिवादि अणुओं में वह
हेतु देखा जाने से उनसे इच्छाद्वेष का सम्बन्ध तथा उससे ज्ञान का सम्बन्ध है। अतः
भूतचैतन्य सिद्ध हो जाता है ?
कुम्भादि में उक्त साध्य की अनुपलब्धि होने से वह अहेतु है ।
कुम्भादि के मृत्तिकावयवों में उनके आकृतिहेतु प्रवृत्तिविशेष 'आरम्भ', तथा
सिकता ( बालुका ) में उस प्रवृत्तिविशेष का अभाव ही 'निवृत्ति' कहलाती है। उन
मृत्सिक्तादिकों में प्रवृत्ति-निवृत्ति देखी जाने पर भी, इच्छाद्वेषादि या ज्ञान से उनका
सम्बन्ध नहीं देखा जाता। अतः 'इच्छा द्वेष आरम्भप्रवृत्तिमित्तक हैं'—यह आपका
कहना अहेतुक है ॥ ३६ ॥
नियम तथा अनियम तो उनके भेदक हैं ॥ ३७ ॥
इच्छाद्वेषों के नियम, अनियम तो ज्ञ तथा अज्ञ के भेदक हैं। प्रवृत्ति-निवृत्ति ज्ञाता के
इच्छाद्वेषनिमित्तक है। आप उन्हे स्वाश्रय ( ज्ञ के आश्रित ) नहीं कह सकते; वे तो
प्रयोज्याश्रय हैं। जो भूत प्रयुज्यमान होंगे, उनमें ही प्रवृत्ति-निवृत्ति होगी, सब में नहीं;
अतः नियम नहीं बन सकता।
जिस (चार्वाक) के मत में ज्ञाता होने से भूतों की इच्छाद्वेषपत्तिमित्तक प्रवृत्ति-निवृत्ति
१. न्यायसूचीनिबन्धे नैतत् सूत्रत्वेन परिगणितम्, नापि वृत्तिकृता व्याख्यातम्, अतो
नेदं सूत्रम् ।
२४६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
नियमः स्यात्, यथा-भूतानां गुणान्तरनिमित्ता प्रवृत्तिर्गुणप्रतिबन्धाच्चानिवृ-
त्तिर्भूतमात्रे भवति नियमेन; एवं भूतमात्रे ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्ते प्रवृत्तिनिवृत्तौ
स्वाश्रये स्याताम् ! न तु भवतः । तस्मात् प्रयोजकाश्रिता ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नाः,
प्रयोज्याश्रये तु प्रवृत्तिनिवृत्ती इति सिद्धम् ।
एकशरीरे तु ज्ञातृबहुत्वं निरनुमानम् । भूतचैतनिकस्यैकशरीरे बहूनि
भूतानि ज्ञानेच्छाद्वेषप्रयत्नगुणानीति ज्ञातृबहुत्वं प्राप्तम् । ओमिति ब्रुवतः प्रमाणं
नास्ति । यथा नानाशरीरेषु नानाज्ञातारो बुद्ध्यादिगुणव्यवस्थानात्, एवमेक-
शरीरेऽपि बुद्ध्यादिव्यवस्थानुमानं स्याज्ज्ञातृबहुत्वस्येति ।
दृष्टश्चान्यगुणनिमित्तः प्रवृत्तिविशेषो भूतानाम्, सोऽनुमानमन्यत्रापि । दृष्टः
करणलक्षणेषु भूतेषु परश्वादिषु उपादानलक्षणेषु च मृत्प्रभृतिष्वन्यगुणनिमित्तः
प्रवृत्तिविशेषः । सोऽनुमानमन्यत्रापि-त्रसत्स्थावरशरीरेषु तदवयव्यूहलिङ्गः
प्रवृत्तिविशेषो भूतानामन्यगुणनिमित्त इति । स च गुणः प्रयत्नसमानाश्रयः
संस्कारो धर्माधर्मसमाख्यातः सर्वार्थः, पुरुषार्थाराधनाय प्रयोजको भूतानां
- प्रयत्नवदिति ।
है, उसके यहाँ नियम बन सकता है। जैसे भूतसामान्य में गुरुत्वादि गुणान्तरनिमित्तक
प्रवृत्ति तथा इसी गुणप्रतिबन्ध से नियमतः भूतमात्र में निवृत्ति देखी जाती है। इसी
तरह भूतमात्र में ज्ञानेच्छाद्वेषनिमित्तक प्रवृत्ति-निवृत्ति स्वाश्रय होने से होने लगेगी, जब
कि होती नहीं है । अतः यही मानना चाहिये कि ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न प्रयोजक
( ज्ञाता ) के आश्रित हैं, तथा प्रवृत्ति-निवृत्ति प्रयोज्य ( भूतादि ) के आश्रित हैं ।
एक शरीर में अनेक ज्ञाता किसी भी अनुमान से सिद्ध नहीं किये जा सकते । भूत-
चैतन्यवादी के मत में बहुत से भूत ज्ञान, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न गुणवाले हैं, अतः अनेक
ज्ञाता होने लगेंगे । यदि वह उनका अनेकत्व स्वीकार करता है तो उसकी इस स्वीकृति
में कोई प्रमाण नहीं है । जैसे अनेक शरीरों में बुद्ध्यादिगुणव्यवस्था से अनेक ज्ञाता होते
हैं; वैसे ही एक में भी बुद्ध्यादिव्यवस्था से अनेक ज्ञाताओं का अनुमान होने लगेगा ।
भूतों का अन्यगुणनिमित्तक प्रवृत्तिविशेष देखा गया है, वह अन्यत्र भी अनुमान करा
देगा । करणलक्षण परशु-आदि तथा उपादानलक्षण मृदादि भूतों में अन्यगुणनिमित्तक
प्रवृत्तिविशेष देखा जाता है, तन्मूलक ही यह अनुमान होता है कि प्राणियों के अस्थिर
शरीरों में भूतों का तदवयवव्यूहलिङ्गक प्रवृत्तिविशेष अन्यगुणनिमित्तक ही है । वह
गुण प्रयत्नसमानाधिकरण धर्माधर्माख्य संस्कारविशेष ही है । वह पुरुषसम्बद्ध सकलार्थ-
प्रयोजक पुरुषार्थ-सम्पादन के लिये भूतों का प्रयोजक है । जैसे पुरुष का प्रयत्न तत्तदर्थ
सम्पादन के लिये भूतों को प्रेरणा देता है, उसी तरह तद्गत धर्माधर्मरूप संस्कार भी
प्रेरणा देता है ।