सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

सूत्रस्थ 'च' से एक अर्थ यह भी निकलता है कि यदि ज्ञान को मन का गुण मानोगे

२० सू० ] बुद्धेरात्मगुणत्वपरीक्षाप्रकरणम् २३५
नुपलब्ध्या यदनुमीयते अन्तःकरणं न तस्य गुणो ज्ञानम्। कस्य तर्हि ? ज्ञस्य१,
वशित्वात्। वशी ज्ञाता, वश्यं करणम्, ज्ञानगुणत्वे वा करणभावनिवृत्तिः ।
घ्राणादिसाधनस्य च ज्ञातुर्गन्धादिज्ञानभावादनुमीयते-अन्तःकरणसाधनस्य
सुखादिज्ञानं स्मृतिश्चेति । तत्र यज्ज्ञानगुणं मनः स आत्मा, यत्तु सुखाद्युपलब्धि-
साधनमन्तःकरणं मनस्तदिति संज्ञाभेदमात्रं नार्थभेद इति ।
युगपज्ज्ञेयानुपलब्धेश्च योगिन इति वा चार्थः । योगी खलु ऋद्धौ प्रादुर्भूतायां
विकरणधर्मा निर्माय सेन्द्रियाणि शरोरान्तराणि तेषु युगपज्ज्ञेयान्युपलभते ।
तच्चैतद्विभौ ज्ञातर्युपपद्यते, नाणौ मनसीति । विभुत्वे वा मनसो ज्ञानस्य
नात्मगुणत्वप्रतिषेधः । विभु च मनस्तदन्तःकरणभूतमिति तस्य सर्वेन्द्रियै-
र्युगपत्संयोगाद् युगपज्ज्ञानान्युत्पद्येरन्निति ॥ १९ ॥
तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम् ? ॥ २० ॥
से जिस मन का अस्तित्व सिद्ध करते हो; ज्ञान (बुद्धि) उसका गुण नहीं है तो किसका
गुण है ? ज्ञाता का । ज्ञाता (आत्मा) स्वतन्त्र है, ज्ञानसाधन मन उस के अधीन है,
यदि बुद्धि को मन का गुण माने तो मन का साधनत्व नष्ट हो जायेगा । जैसे घ्राणादि-
साधन (इन्द्रिय) वाले पुरूप को गन्धादि का ज्ञान होता है उसी तरह अन्तःकरणसाधन
वाले को सुखादि ज्ञान तथा स्मृति होती है-ऐसा अनुमान होता है । इस प्रकार मन
के दो भेद हो गये ! उन में जो ज्ञानगुणवाला मन है, उसे आत्मा कह देते हैं, और जो
सुखाद्युपलब्धि-साधन मन वह है अन्तःकरण है। यह नाम का ही भेद है, अर्थ का भेद
नहीं। अर्थात् एक ज्ञाता ज्ञानगुणवान् है, तथा दूसरा ज्ञानसाधन है-यों, हम दोनों के
पक्ष में समानता ही है। अन्तर इतना ही है कि जिस ज्ञाता को आप 'मन' कहते हैं,
उसी को हम 'आत्मा' कहते हैं ।
सूत्रस्थ 'च' से एक अर्थ यह भी निकलता है कि यदि ज्ञान को मन का गुण मानोगे
तो अणु मन द्वारा योगी को जो युगपज्ज्ञेयोपलब्धि होती है वह असम्भव हो जायेगी ।
योगी योगज समाधि के प्रादुर्भूत होने पर साधारण जनों से विशिष्ट इन्द्रियों का इन्द्रिय-
सहित शरीरान्तर का निर्माण करके उन से एक साथ अनेक ज्ञेयों का जान लेता है ।
यह बात ज्ञाता के विभु मानने पर बन सकती है, मन के अणु मानने पर नहीं । मन के
विभु होने पर भी ज्ञान के आत्मगुण का प्रतिषेध नहीं बनता । विभु मन उस ज्ञाता का
अन्तःकरण है, उसका सब इन्द्रियों के साथ युगपत् संयोग होने से युगपद् ज्ञान उत्पन्न
होंगे ॥ १९ ॥
ज्ञान को आत्मा का गुण मानने पर भी बात वही रहेगी ? ॥ २० ॥
१. जानतीति ज्ञः, 'इगुपधज्ञाप्रीकिरः कः' ( ३.१.१३५) इति पाणिनिसूत्रेण
सिद्धः, तस्य, ज्ञातुरित्यर्थः ।

सूत्र का भी समुच्चय कर लेना चाहिये । गुणनाश के हेतु दो हो सकते हैं—१. या तो

२३६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ ३. अ० २. आ०
विभुरात्मा सर्वेन्द्रियैः संयुक्त इति युगपज्ज्ञानोत्पत्तिप्रसङ्ग इति ? ॥ २० ॥
इन्द्रियैर्मनसः सन्निकर्षाभावात् तदनुत्पत्तिः ॥ २१ ॥
गन्धाद्युपलब्धेरिन्द्रियार्थसन्निकर्षवदिन्द्रियमनःसन्निकर्षोऽपि कारणम्, तस्य
चायौगपद्यमणुत्वान्मनसः । अयौगपद्यादनुत्पत्तिर्युगपज्ज्ञानानामात्मगुणत्वे-
ऽपीति ॥ २१ ॥
यदि पुनरात्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्राद् गन्धादिज्ञानमुत्पद्यते ?
न; उत्पत्तिकारणानपदेशात् ॥ २२ ॥
'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्राद् गन्धादिज्ञानमुत्पद्यते'—नात्रोत्पत्तिकारणमप-
दिश्यते, येनैतत् प्रतिद्येमहीति ॥ २२ ॥
विनाशकारणानुपलब्धेश्चावस्थाने तन्नित्यत्वप्रसङ्गः ? ॥ २३ ॥
'तदात्मगुणत्वेऽपि तुल्यम्' इत्येतदनेन समुच्चीयते । द्विविधो हि गुणनाश-
विभु आत्मा सब इन्द्रियों के साथ संयुक्त होगा तो युगपज्ज्ञानोत्पाद होने
लगेगा ? ॥ २० ॥
उत्तर—
इन्द्रियों का मन के साथ सन्निकर्ष न होने से युगपज्ज्ञानोत्पाद नहीं होता ॥ २१ ॥
गन्धाद्युपलब्धि का, इन्द्रियार्थसन्निकर्ष के कारण की तरह, इन्द्रियमनःसन्निकर्ष
भी कारण है। वह इन्द्रियमनःसन्निकर्ष एक साथ अनेक जगह नहीं हो सकता; क्योंकि
मन अणु है। अयौगपद्य होने से ही, ज्ञान की युगपद् उत्पत्ति आत्मगुण मानने पर भी
नहीं होगी ॥ २१ ॥
यदि 'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्ष से ही गन्धादि ज्ञान हो जाता है, तो मन की कोई
आवश्यकता नहीं'—ऐसा मान लें ?
उत्पत्तिकारण का प्रसङ्ग न होने से ऐसा नहीं मान सकते ॥ २२ ॥
'आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षमात्र से ही गन्धादि ज्ञान उत्पन्न हो जाता है'—यह आप
कह रहे हैं, परन्तु अभी ज्ञानोत्पत्ति के विचार का प्रसङ्ग नहीं, जिससे हम आपसे सह-
मत हो सकें ॥ २२ ॥
शंका—
ज्ञान के विनाशकारण की अनुपलब्धि से उस के सदा वर्तमान रहने पर उसमें
नित्यता की प्रसक्ति होने लगेगी ? ॥ २३ ॥
यहाँ 'ज्ञान के आत्मगुण मानने पर भी यह बात तो बराबर है' ( ३.२.२०)—इस
सूत्र का भी समुच्चय कर लेना चाहिये । गुणनाश के हेतु दो हो सकते हैं—१. या तो