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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

by महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन

Source: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished410 pages

७. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६५

Page 83Permalink

७. सू० ] हेत्वाभासप्रकरणम् ६५
नित्यत्वप्रतिषेधो नाम विकारस्यात्मलाभात्प्रच्युतेरुपपत्तिः । यदात्मलाभात्प्रच्यवते
तदनित्यं दृष्टम्, यदस्ति न तदात्मलाभात् प्रच्यवते । अस्तित्वं चात्म-
लाभात् प्रच्युतिरिति च-विरुद्धावेतौ धर्मौ न सह सम्भवत इति । सोऽयं हेतुर्यं
सिद्धान्तमाश्रित्य प्रवर्त्तते तमेव व्याहन्तीति ।
(ग) प्रकरणसमलक्षणम्
यस्मात् प्रकरणचिन्ता स निर्णयार्थमपदिष्टः प्रकरणसमः ॥ ७ ॥
विमर्शाधिष्ठानौ पक्षप्रतिपक्षावुभावनवसितौ प्रकरणम् । तस्य चिन्ता =
विमर्शात्प्रभृति प्राङ्निर्णयाद्यत्समीक्षणम् । सा जिज्ञासा यत्कृता स निर्णयार्थं
प्रयुक्त उभयपक्षसाम्यात् प्रकरणमनतिवर्तमानः प्रकरणसमो निर्णयाय न
प्रकल्पते ।
प्रज्ञापनं तु—‘अनित्यः शब्दो नित्यधर्मानुपलब्धेः’ इति । अनुपलभ्यमान-
नित्यधर्मकमनित्यं दृष्टं स्थाल्यादि । ‘नित्यः१ शब्दोऽनित्यधर्मानुपलब्धेः’
अनुपलभ्यमानानित्यधर्मकं नित्यं दृष्टमाकाशादि१ ।
रहे—यही उसका नित्यत्व हैं; क्योंकि नित्यत्वप्रतिषेध का मतलब है—विकार का
आत्मसत्ता से प्रच्युति का उपपादन अर्थात् जो आत्मलाभ से प्रच्युत नहीं होता । अस्तित्व
तथा आत्मलाभ से प्रच्युति—ये दोनों विरुद्ध धर्म एकत्र नहीं रह सकते । इस प्रकार
यह नित्यत्वप्रतिषेध हेतु जिस सिद्धान्त को लेकर प्रवृत्त हुआ था, उसी का व्याघात कर
रहा है ॥ ६ ॥
जिसको लेकर प्रकरण पर विचार किया जा रहा हो और वही निर्णय के लिये प्रयुक्त
हो वह हेतु ‘प्रकरणसम’ हेत्वाभास कहलाता है ॥ ७ ॥
संशयाधिष्ठान अनिर्णीत पक्ष-प्रतिपक्ष ही ‘प्रकरण’ कहलाते हैं । प्रकरण की चिन्ता
अर्थात् विमर्श से लेकर निर्णय तक का समीक्षण । वह जिज्ञासा जिसकी वजह से हो वही
निर्णय के लिये प्रयुक्त कर दिया जाए—ऐसा हेतु प्रकरण की परिधि में रहता हुआ
‘प्रकरणसम’ कहलाता है । ऐसा हेतु साधक या बाधक न रहने से निर्णय करने में
असमर्थ है ।
उदाहरण—‘शब्द अनित्य है, नित्यधर्म की उपलब्धि न होने से’ यह अनुमान ।
यहाँ अनुपलब्ध्यमान नित्यधर्मक अनित्य भी देखा गया है, जैसे—स्थाल्यादि । ‘शब्द
नित्य है, अनित्यधर्म की उपलब्धि न होने से’—यहाँ भी अनुपलब्ध्यमान अनित्यधर्मक
नित्य देखा गया है, जैसे—आकाशादि ।
१-१. अयं पाठो नास्ति क्वचित् पुस्तके ।
न्या० द० : ५

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६६ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने [ १. अ० २. आ०
यत्र समानो धर्मः संशयकारणं हेतुत्वेनोपादीयते स संशयसमः सव्यभिचार
एव। या तु विमर्शस्य विशेषापेक्षिता उभयपक्षविशेषानुपलब्धिश्च सा प्रकरणं
प्रवर्तयति। यथा-- शब्दे नित्यधर्मो नोपलभ्यते, एवमनित्यधर्मोऽपि; सेयमुभय-
पक्षविशेषानुपलब्धिः प्रकरणचिन्तां प्रवर्तयति। कथम् ? विपर्यये हि प्रकरण-
निवृत्तेः। यदि नित्यधर्मः शब्दे गृह्येत, न स्यात्प्रकरणम् । यदि वा अनित्य-
धर्मो गृह्येत, एवमपि निवर्तेत प्रकरणम् । सोऽयं हेतुरुभौ पक्षौ प्रवर्तयन्नन्य-
तरस्य निर्णयाय न प्रकल्पते ॥ ७ ॥
(घ) साध्यसमलक्षणम्
साध्याविशिष्टः साध्यत्वात् साध्यसमः ॥ ८ ॥
द्रव्यं छायेति साध्यम्, गतिमत्त्वादिति हेतुः साध्येनाविशिष्टः साधनीयत्वात्
साध्यसमः । अयमप्यसिद्धत्वात्साध्यवत्प्रज्ञापयितव्यः । साध्यं तावदेतत्—किं
पुरुषवच्छायापि गच्छति, आहोस्विदावरकद्रव्ये संसर्पति, आवरणसन्ताना-
दसन्निधिसन्तानोऽयं तेजसो गृह्यत इति ? सर्पता खलु द्रव्येण यो यस्तेजो-
जहां संशयकारण समानधर्म हेतुरूप से दिया गया हो वह 'संशयसम' हेत्वाभास
कहलाता है, जो कि सव्यभिचार हेत्वाभास में अन्तर्भूत है । विमर्श की विशेषापेक्षित
उभयपक्ष-चिन्ताओं में विशेषानुपलब्धि है वही प्रकरण को प्रवृत्त करती है । जैसे शब्द में
नित्यधर्म नहीं मिलता; वैसे ही अनित्यधर्म भी नहीं मिलता—यह उभयपक्ष की विशेषा-
नुपलब्धि ही प्रकरण पर समीक्षण का प्रारम्भ करती है; क्योंकि विपरीत स्थिति होने पर
प्रकरण की निवृत्ति ही हो जाती है। यदि शब्द में नित्य धर्म मानोगे तो प्रकरण उठेगा
नहीं, यदि केवल अनित्य धर्म मानोगे तो भी प्रकरण की निवृत्ति ही होगी। इस प्रकार,
ऐसा हेतु जो दोनों पक्षों में प्रवृत्त हो सकता हो वह किसी एक तरफ का निर्णय करने में
समर्थ नहीं होता ॥ ७ ॥
साध्य से अविशिष्ट ( साधनीय ) हेतु स्वयं साध्य होने से 'साध्यसम' हेत्वाभास
होता है ॥ ८ ॥
'छाया द्रव्य है, गतिमान् होने से'–इस अनुमान में 'द्रव्य छाया' साध्य है, 'गतिमत्त्व'
यह हेतु साध्य से अविशिष्ट ही है; क्योंकि इसकी भी साध्य की तरह सिद्धि करनी
पड़ेगी, इसलिए यह 'साध्यसम' है। अर्थात् यह हेतु भी असिद्ध है, अतः साध्य की तरह
इसे भी सिद्ध करना पड़ेगा !
इस अनुमान में साध्य है—क्या पुरुष की छाया वस्तुतः चलती है, या आवश्यक द्रव्य में
छिपजाती है, या यह आवरणसन्तान से तेज की असन्निधिसन्तान रूप ही तो नहीं
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri