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न्याय दर्शन (वात्स्यायन भाष्य सहित)

Nyaya Darshan with Vatsyayana Bhashya

महर्षि गौतम / महर्षि वात्स्यायन द्वारा

स्रोत: बौद्ध भारती वाराणसी · बौद्ध भारती वाराणसी · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished410 पृष्ठ

१५. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २३१

१५. सू० ] क्षणभङ्गपरीक्षाप्रकरणम् २३१
यथानुपलभ्यमानं क्षीरविनाशकारणं दध्युत्पत्तिकारणं चाभ्यनुज्ञायते, तथा
स्फटिकेऽपरापरासु व्यक्तिषु विनाशकारणमुत्पादकारणं चाभ्यनुज्ञेयमिति ॥१३॥
लिङ्गतो ग्रहणान्नानुपलब्धिः ॥ १४ ॥
क्षीरविनाशलिङ्गं क्षीरविनाशकारणं दध्युत्पत्तिलिङ्गं दध्युत्पत्तिकारणं
च गृह्यते, अतो नानुपलब्धिः, विपर्ययस्तु स्फटिकादिषु अपरापरोत्पत्तीनां न
लिङ्गमस्तीत्यनुत्पत्तिरेवेति१ ॥ १४ ॥
अत्र कश्चित् परिहारमाह—
न पयसः परिणाम-गुणान्तरप्रादुर्भावात् ॥ १५ ॥
पयसः परिणामो न विनाश इत्येक आह । परिणामश्च—अवस्थितस्य द्रव्य-
स्य पूर्वधर्मनिवृत्तौ धर्मान्तरोत्पत्तिरिति ।
गुणान्तरप्रादुर्भाव इत्यपर आह । गुणान्तरप्रादुर्भावश्च—सतो द्रव्यस्य पूर्व-
गुणनिवृत्तौ गुणान्तरमुत्पद्यत इति । स खल्वेकपक्षीभाव इव ॥ १५ ॥
जैसे लोक में अनुपलभ्यमान क्षीरविनाश तथा दध्युत्पत्ति का कारण अभ्यनुज्ञात
होता है, उसी तरह स्फटिक को अपर-अपर व्यक्तियों में उत्पत्तिविनाशकारण मान
लेना चाहिये ? ॥ १३ ॥
उक्त विनाश तथा उत्पत्ति का लिङ्ग द्वारा ग्रहण होने से वहाँ कारण की अनुपलब्धि
नहीं है ॥ १४ ॥
क्षीरविनाश का लिङ्ग तथा कारण, दध्युत्पत्ति का लिङ्ग तथा कारण प्रमाणों से
गृहीत हैं, अतः वहाँ आप अनुपलब्धि नहीं कह सहते । इसके विपरीत, स्फटिकादि
द्रव्यों में अपर-अपर व्यक्तियों की उत्पत्ति में कोई लिङ्ग नहीं है, अतः उनका अनुपपादन
ही समझिये ॥ १४ ॥
यहाँ कोई ( साङ्ख्यमतानुयायी ) अपने मत से समाधान देते हैं—
दूध का यहाँ विनाश नहीं होता, अपितु परिणामाख्य गुणविशेष प्रादुर्भूत हो जाता
है ॥ १५ ॥
दूध का परिणाम धर्मान्तरोत्पाद विनाश कैसे कहला सकता है—ऐसा एक साङ्ख्य-
मतानुयायी कहता है। 'परिणाम' कहते हैं—अवस्थित द्रव्य के पूर्व-धर्म की निवृत्ति
होने पर धर्मान्तर की उत्पत्ति हो जाना ।
दूसरा साङ्ख्यमतानुयायी कहता है—वहाँ गुणान्तर का प्रादुर्भाव हो जाता है।
द्रव्य के विद्यमान रहते पूर्व-गुण की निवृत्ति हो कर गुणान्तर का उत्पादन होना—
'गुणान्तरप्रादुर्भाव' कहलाता है। इन दोनों ही पक्षों में धर्मी के अविनाशवाली बात
समान है, अवशिष्ट में एक वादी परिणाम मानता है तथा एक गुणान्तर का विनाश-
प्रादुर्भाव ॥ १५ ॥
१. अत्रत्यं वार्त्तिकं जिज्ञासुभिरवश्यं ध्येयम् ।
CC-0. Jangamwadi Math Collection. Digitized by eGangotri

२३२ वात्स्यायनभाष्यसहिते न्यायदर्शने • [ ३ अ० २. आ०
अत्र तु प्रतिषेधः—
व्यूहान्तराद् द्रव्यान्तरोत्पत्तिदर्शनं पूर्वद्रव्यनिवृत्तेरनुमानम् ॥ १६ ॥
सम्मूर्च्छनलक्षणादवयवव्यूहाद् द्रव्यान्तरे दध्युत्पन्ने गृह्यमाणे पूर्वं पयोद्रव्य-
मवयवविभागेभ्यो निवृत्तमित्यनुमीयते, यथा—मृदवयवानां व्यूहान्तराद् द्रव्या-
न्तरे स्थाल्यामुत्पन्नायां पूर्वं मृत्पिण्डद्रव्यं मृदवयवविभागेभ्यो निवर्तत इति ।
मृद्वच्चावयवान्वयः पयोदध्नोर्नशेषनिरोधे निरन्वयो द्रव्यान्तरोत्पादो घटत
इति ॥ १६ ॥
अभ्यनुज्ञाय चं निष्कारणं क्षीरविनाशं दध्युत्पादं च प्रतिषेध उच्यत इति—
क्वचिद्विनाशकारणानुपलब्धेः क्वचिच्चोपलब्धेरनेकान्तः ॥ १७ ॥
क्षीरदधिवन्निष्कारणौ विनाशोत्पादौ स्फटिकव्यक्तीनामिति नायमेकान्त
इति । कस्मात् ? हेतुभावात् । नात्र हेतुरस्ति—अकारणौ विनाशोत्पादौ स्फटि-
कादिव्यक्तीनां क्षीरदधिवत्; न पुनर्यथा विनाशकारणभावात् कुम्भस्य विनाशः,
उक्त साङ्ख्यमत का खण्डन—
व्यूहान्तर से द्रव्यान्तरोत्पत्ति का दिखायी देना पूर्व द्रव्य की निवृत्ति का अनुमान
करा देता है ॥ १६ ॥
सम्मूर्च्छनलक्षणक अवयवव्यूह से दधिरूप द्रव्यान्तर के गृहीत होने पर, पहले का
दुग्धद्रव्य अवयवों का विभाग ( विनाश ) होने से विनष्ट हो गया—ऐसा अनुमान होता
है। जैसे मिट्टी के अवयवों के व्यूहान्तर से स्थालीरूप द्रव्यान्तर के उत्पन्न होने की
दशा में पहले का मृत्पिण्ड द्रव्य, मृदवयवों के विभक्त होने से निवृत्त हुआ रहता है।
मृत्तिका के अन्वय की तरह दूध-दही के अन्वय की स्थिति समझनी चाहिये। सम्पूर्णतया
अन्वय ( अवयव ) के न रहने में द्रव्यान्तरोत्पाद होता है—ऐसा मानना उचित नहीं।
अतः 'अवस्थित का द्रव्यान्तर परिणाम' वाला साङ्ख्यसिद्धान्त अयुक्त है॥ १६॥
अथ च—निष्कारण क्षीरविनाश तथा दध्युत्पाद मान कर भी आप उसका प्रतिषेध
करते हैं, यह भी उचित नहीं; क्योंकि—
विनाश-कारण की कहीं अनुपलब्धि तथा कहीं उपलब्धि होने से, यह नियम नहीं
कहा जा सकता ॥ १७ ॥
स्फटिक व्यक्ति में, क्षीरदधि की तरह निष्कारण विनाश उत्पाद होते हैं—यह नियम
( व्याप्ति ) नहीं बन पाती, क्योंकि इसमें कोई हेतु नहीं है। यहाँ आप कोई हेतु नहीं
बता सकते कि स्फटिक व्यक्ति में क्षीर, दधि की तरह अकारण ही विनाश-उत्पाद हो
जाते हैं। और इस नियम को आप निराकृत भी नहीं कर सकते कि विनाशकारण