महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
१७१-
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः
सात्यकिसे दुर्योधनकी, अर्जुनसे शकुनि और उलूककी तथा धृष्टद्युम्नसे कौरव-सेनाकी पराजय
संजय उवाच
ततस्ते प्राद्रवन् सर्वे त्वरिता युद्धदुर्मदाः ।
अमृष्यमाणाः संरब्धा युयुधानरथं प्रति ॥ १ ॥
**संजय कहते हैं—**राजन्! तत्पश्चात् वे समस्त रणदुर्मद योद्धा बड़ी उतावलीके साथ अमर्ष और क्रोधमें भरकर युयुधानके रथकी ओर दौड़े ॥ १ ॥
ते रथैः कल्पितै राजन् हेमरूप्यविभूषितैः ।
सादिभिश्च गजैश्चैव परिवव्रुः समन्ततः ॥ २ ॥
नरेश्वर! उन्होंने सोने-चाँदीसे विभूषित एवं सुसज्जित रथों, घुड़सवारों और हाथियोंके द्वारा चारों ओरसे सात्यकिको घेर लिया ॥ २ ॥
अथैनं कोष्ठकीकृत्य सर्वतस्ते महारथाः ।
सिंहनादांस्ततश्चक्रुस्तर्जयन्ति स्म सात्यकिम् ॥ ३ ॥
इस प्रकार सब ओरसे सात्यकिको कोष्ठबद्ध-सा करके वे महारथी योद्धा सिंहनाद करने और उन्हें डाँट बताने लगे ॥ ३ ॥
तेऽभ्यवर्षञ्छरैस्तीक्ष्णैः सात्यकिं सत्यविक्रमम् ।
त्वरमाणा महावीरा माधवस्य वधैषिणः ॥ ४ ॥
इतना ही नहीं, मधुवंशी सात्यकिका वध करनेकी इच्छासे उतावले हो वे महावीर सैनिक उन सत्यपराक्रमी सात्यकिपर तीखे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४ ॥
तान् दृष्ट्वा पततस्तूर्णं शैनेयः परवीरहा ।
प्रत्यगृह्णान्महाबाहुः प्रमुञ्चन् विशिखान् बहून् ॥ ५ ॥
तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले महाबाहु शिनिपौत्र सात्यकिने उन लोगोंको अपनेपर धावा करते देख स्वयं भी तुरंत ही बहुत-से बाणोंका प्रहार करते हुए उनका स्वागत किया ॥ ५ ॥
तत्र वीरो महेष्वासः सात्यकिर्युद्धदुर्मदः ।
निचकर्त शिरांस्युग्रैः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ६ ॥
वहाँ महाधनुर्धर रणदुर्मद वीर सात्यकिने झुकी हुई गाँठवाले भयंकर बाणोंद्वारा बहुतेरे शत्रु-योद्धाओंके मस्तक काट डाले ॥ ६ ॥
हस्तिहस्तान् हयग्रीवा बाहूनपि च सायुधान् ।
क्षुरप्रैः शातयामास तावकानां स माधवः ॥ ७ ॥
उन मधुवंशी वीरने आपकी सेनाके हाथियोंके शुण्डदण्डों, घोड़ोंकी गर्दनों तथा योद्धाओंकी आयुधोंसहित भुजाओंको भी क्षुरप्रोंद्वारा काट डाला ॥ ७ ॥
पतितैश्चामरैश्चैव श्वेतच्छत्रैश्च भारत ।
बभूव धरणी पूर्णा नक्षत्रैर्दौरिव प्रभो ॥ ८ ॥
भरतनन्दन! प्रभो! वहाँ गिरे हुए चामरों और श्वेत छत्रोंसे भरी हुई भूमि नक्षत्रोंसे युक्त आकाशके समान जान पड़ती थी ॥ ८ ॥
एतेषां युयुधानेन युध्यतां युधि भारत ।
बभूव तुमुलः शब्दः प्रेतानां क्रन्दतामिव ॥ ९ ॥
भारत! युद्धस्थलमें युयुधानके साथ जूझते हुए इन योद्धाओंका भयंकर आर्तनाद प्रेतोंके करुण-क्रन्दन-सा प्रतीत होता था ॥ ९ ॥
तेन शब्देन महता पूरिताभूद् वसुन्धरा ।
रात्रिः समभवच्चैव तीव्ररूपा भयावहा ॥ १० ॥
उस महान् कोलाहलसे भरी हुई वह रणभूमि और रात्रि अत्यन्त उग्र एवं भयंकर जान पड़ती थी ॥ १० ॥
दीर्यमाणं बलं दृष्ट्वा युयुधानशराहतम् ।
श्रुत्वा च विपुलं नादं निशीथे लोमहर्षणे ॥ ११ ॥
सुतस्तवाब्रवीद् राजन् सारथिं रथिनां वरः ।
यत्रैष शब्दस्तत्राश्वांश्चोदयेति पुनः पुनः ॥ १२ ॥
राजन्! युयुधानके बाणोंसे आहत हुई अपनी सेनामें भगदड़ पड़ी देख और उस रोमांचकारी निशीथकालमें वह महान् कोलाहल सुनकर रथियोंमें श्रेष्ठ आपके पुत्र दुर्योधनने अपने सारथिसे बारंबार कहा—'जहाँ यह कोलाहल हो रहा है, वहाँ मेरे घोड़ोंको हाँक ले चलो' ॥ ११-१२ ॥
तेन संचोद्यमानस्तु ततस्तांस्तुरगोत्तमान् ।
सूतः संचोदयामास युयुधानरथं प्रति ॥ १३ ॥
उसका आदेश पाकर सारथिने उन श्रेष्ठ घोड़ोंको सात्यकिके रथकी ओर हाँक दिया ॥ १३ ॥
ततो दुर्योधनः क्रुद्धो दृढधन्वा जितक्लमः ।
शीघ्रहस्तश्चित्रयोधी युयुधानमुपाद्रवत् ॥ १४ ॥
तदनन्तर दृढ़ धनुर्धर, श्रमविजयी, शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले और विचित्र रीतिसे युद्ध करनेवाले दुर्योधनने क्रोधमें भरकर सात्यकिपर धावा किया ॥ १४ ॥
ततः पूर्णायतोत्सृष्टैः शरैः शोणितभोजनैः ।
दुर्योधनं द्वादशभिर्माधवः प्रत्यविध्यत ॥ १५ ॥
तब मधुवंशी युयुधानने धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बारह रक्तभोजी बाणोंद्वारा दुर्योधनको घायल कर दिया ॥ १५ ॥
दुर्योधनस्तेन तथा पूर्वमेवार्दितः शरैः ।
शैनेयं दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यदमर्षितः ॥ १६ ॥
सात्यकिने जब पहले ही अपने बाणोंसे दुर्योधनको पीड़ित कर दिया, तब उसने भी अमर्षमें भरकर उन्हें दस बाण मारे ॥ १६ ॥
ततः समभवद् युद्धं तुमुलं भरतर्षभ ।
पञ्चालानां च सर्वेषां भरतानां च दारुणम् ॥ १७ ॥
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर समस्त पांचालों और भरतवंशियोंका वहाँ भयंकर युद्ध होने लगा ॥ १७ ॥
शैनेयस्तु रणे क्रुद्धस्तव पुत्रं महारथम् ।
सायकानामशीत्या तु विव्याधोरसि भारत ॥ १८ ॥
भारत! रणभूमिमें कुपित हुए सात्यकिने आपके महारथी पुत्रकी छातीमें अस्सी सायकोंद्वारा प्रहार किया ॥
ततोऽस्य वाहन् समरे शरैर्निन्ये यमक्षयम् ।
सारथिं च रथात् तूर्णं पातयामास पत्रिणा ॥ १९ ॥
फिर समरांगणमें अपने बाणोंद्वारा घायल करके उसके घोड़ोंको यमलोक पहुँचा दिया और एक पंखयुक्त बाणसे मारकर उसके सारथिको भी तुरंत ही रथसे नीचे गिरा दिया ॥ १९ ॥
हताश्वे तु रथे तिष्ठन् पुत्रस्तव विशाम्पते ।
मुमोच निशितान् बाणान् शैनेयस्य रथं प्रति ॥ २० ॥
प्रजानाथ! तब आपका पुत्र उस अश्वहीन रथपर खड़ा हो सात्यकिके रथकी ओर पैने बाण छोड़ने लगा ॥
शरान् पञ्चाशतस्तांस्तु शैनेयः कृतहस्तवत् ।
चिच्छेद समरे राजन् प्रेषितांस्तनयेन ते ॥ २१ ॥
राजन्! परंतु आपके पुत्रद्वारा छोड़े गये पचास बाणोंको समरांगणमें सात्यकिने एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति काट डाला ॥ २१ ॥
अथापरेण भल्लेन मुष्टिदेशे महद् धनुः ।
चिच्छेद तरसा युद्धे तव पुत्रस्य माधवः ॥ २२ ॥
तत्पश्चात् उन मधुवंशी वीरने एक-दूसरे भल्लसे युद्धभूमिमें आपके पुत्रके विशाल धनुषको मुट्ठी पकड़नेकी जगहसे वेगपूर्वक काट दिया ॥ २२ ॥
विरथो विधनुष्कश्च सर्वलोकेश्वरः प्रभुः ।
आरुरोह रथं तूर्णं भास्वरं कृतवर्मणः ॥ २३ ॥
तब सम्पूर्ण जगत्का स्वामी शक्तिशाली वीर दुर्योधन धनुष और रथसे हीन होकर तुरंत ही कृतवर्माके तेजस्वी रथपर आरूढ़ हो गया ॥ २३ ॥
दुर्योधने परावृत्ते शैनेयस्तव वाहिनीम् ।
द्रावयामास विशिखैर्निशामध्ये विशाम्पते ॥ २४ ॥
प्रजानाथ! उस आधीरातके समय दुर्योधनके पराङ्मुख हो जानेपर सात्यकिने आपकी सेनाको अपने बाणोंद्वारा खदेड़ना आरम्भ किया ॥ २४ ॥
शकुनिश्चार्जुनं राजन् परिवार्य समन्ततः ।
रथैरनेकसाहस्रैर्गजैश्चापि सहस्रशः ॥ २५ ॥
तथा हयसहस्रैश्च नानाशास्त्रैर्वाकिरत् ।
राजन्! उधर शकुनिने कई हजार रथों, सहस्रों हाथियों और सहस्रों घोड़ोंद्वारा अर्जुनको चारों ओरसे घेरकर उनपर नाना प्रकारके शस्त्रोंकी वर्षा प्रारम्भ कर दी ॥ २५ १/२ ॥
ते महास्त्राणि सर्वाणि विकिरन्तोऽर्जुनं प्रति ॥ २६ ॥
अर्जुनं योधयन्ति स्म क्षत्रियाः कालचोदिताः ।
वे कालप्रेरित क्षत्रिय अर्जुनपर बड़े-बड़े अस्त्रोंकी वर्षा करते हुए उनके साथ युद्ध करने लगे ॥ २६ १/२ ॥
तान्यर्जुनः सहस्राणि रथवारणवाजिनाम् ॥ २७ ॥
प्रत्यवारयदायस्तः प्रकुर्वन् विपुलं क्षयम् ।
यद्यपि अर्जुन कौरव-सेनाका महान् संहार करते-करते थक गये थे, तो भी उन्होंने उन सहस्रों रथों, हाथियों और घुड़सवारोंकी सेनाको आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ २७ १/२ ॥
ततस्तु समरे शूरः शकुनिः सीबलस्तदा ॥ २८ ॥
विव्याध निशितैर्बाणैरर्जुनं प्रहसन्निव ।
पुनश्चैव शतेनास्य संरुरोध महारथम् ॥ २९ ॥
उस समय समरभूमिमें सुबलकुमार शूरवीर शकुनिने हँसते हुए-से तीखे बाणोंद्वारा अर्जुनको बींध डाला। फिर सौ बाण मारकर उनके विशाल रथको अवरुद्ध कर दिया ॥
तमर्जुनस्तु विंशत्या विव्याध युधि भारत ।
अथेतरान् महेष्वासांस्त्रिभिस्त्रिभिरविध्यत ॥ ३० ॥
भारत! उस युद्धके मैदानमें अर्जुनने शकुनिको बीस बाण मारे और अन्य महाधनुर्धरोंको तीन-तीन बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ३० ॥
निवार्य तान् बाणगणैर्युधि राजन् धनंजयः ।
जघान तावकान् योधान् वज्रपाणिरिवासुरान् ॥ ३१ ॥
राजन्! युद्धस्थलमें अर्जुनने अपने बाण-समूहोंद्वारा आपके उन योद्धाओंको रोककर जैसे वज्रपाणि इन्द्र असुरोंका संहार करते हैं, उसी प्रकार उन सबका वध कर
डाला ।। ३१ ।।
भुजैश्छिन्नैर्महीपाल हस्तिहस्तोपमैर्मृधे ।
समाकीर्णा मही भाति पञ्चास्यैरिव पन्नगैः ।। ३२ ।।
भूपाल! हाथीकी सूँड़के समान मोटी एवं कटी हुई भुजाओंसे आच्छादित हुई वह रणभूमि पाँच मुँहवाले सर्पोंसे ढकी हुई-सी जान पड़ती थी ।। ३२ ।।
शिरोभिः सकीरीटैश्च सुनसैश्चारुकुण्डलैः ।
संदष्टौष्ठपुटैः क्रुद्धैस्तथैवोद्धृतलोचनैः ।। ३३ ।।
निष्कचूडामणिधरैः क्षत्रियाणां प्रियंवदैः ।
पङ्कजैरिव विन्यस्तैः पतितैर्विबभौ मही ।। ३४ ।।
जिनपर किरीट शोभा देता था, जो सुन्दर नासिका और मनोहर कुण्डलोंसे विभूषित थे, जिन्होंने क्रोधपूर्वक अपने ओठोंको दाँतोंसे दबा रखा था, जिनकी आँखें बाहर निकल आयी थीं तथा जो निष्क एवं चूडामणि धारण करते और प्रिय वचन बोलते थे, क्षत्रियोंके वे मस्तक वहाँ कटकर गिरे हुए थे। उनके द्वारा रणभूमिकी वैसी ही शोभा हो रही थी, मानो वहाँ कमल बिछा दिये गये हों ।। ३३-३४ ।।
कृत्वा तत् कर्म बीभत्सुरुग्रमुग्रपराक्रमः ।
विव्याध शकुनिं भूयः पञ्चभिर्नतपर्वभिः ।। ३५ ।।
अताडयदूलूकं च त्रिभिरेव तथा शरैः ।
भयंकर पराक्रमी अर्जुनने वह वीरोचित कर्म करके झुकी हुई गाँठवाले पाँच बाणोंद्वारा पुनः शकुनिको घायल किया। साथ ही तीन बाणोंसे उलूकको भी व्यथित कर दिया ।। ३५ १/२ ।।
उलूकस्तु तथा विद्धो वासुदेवमताडयत् ।। ३६ ।।
ननाद च महानादं पूरयन्निव मेदिनीम् ।
इस प्रकार घायल होनेपर उलूकने भगवान् श्रीकृष्णपर प्रहार किया और पृथ्वीको गुँजाते हुए-से बड़े जोरसे गर्जना की ।। ३६ १/२ ।।
अर्जुनः शकुनेश्चापं सायकैरच्छिनद् रणे ।। ३७ ।।
निन्ये च चतुरो वाहन् यमस्य सदनं प्रति ।
उस समय अर्जुनने रणभूमिमें अपने बाणोंद्वारा शकुनिका धनुष काट दिया और उसके चारों घोड़ोंको भी यमलोक भेज दिया ।। ३७ १/२ ।।
ततो रथादवप्लुत्य सौबलो भरतर्षभ ।। ३८ ।।
उलूकस्य रथं तूर्णमारुरोह विशाम्पते ।
प्रजापालक भरतश्रेष्ठ! तब सुबलपुत्र शकुनि अपने रथसे कूदकर तुरंत ही उलूकके रथपर जा चढ़ा ।। ३८ १/२ ।।
तावेकरथमारूढौ पितापुत्रौ महारथौ ।। ३९ ।।
पार्थं सिषिचतुर्बाणैर्गिरिं मेघाविवाम्बुभिः ।
एक रथपर आरूढ़ हुए पिता और पुत्र दोनों महारथियोंने अर्जुनपर उसी प्रकार बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी, जैसे दो मेघखण्ड अपने जलसे किसी पर्वतको सींच रहे हों ।। ३९ १/२ ।।
तौ तु विद्ध्वा महाराज पाण्डवो निशितैःशरैः ।। ४० ।।
विद्रावयंस्तव चमूं शतशो व्यधमच्छरैः ।
महाराज! परंतु पाण्डुनन्दन अर्जुनने उन दोनोंको तीखे बाणोंसे घायल करके आपकी सेनाको भगाते हुए उसे सैकड़ों बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ४० १/२ ।।
अनिलेन यथाभ्राणि विच्छिन्नानि समन्ततः ।। ४१ ।।
विच्छिन्नानि तथा राजन् बलान्यासन् विशाम्पते ।
प्रजापालक नरेश! जैसे हवा बादलोंको चारों ओर उड़ा देती है, उसी प्रकार अर्जुनने आपकी सेनाओंको छिन्न-भिन्न कर दिया ।। ४१ १/२ ।।
तद् बलं भरतश्रेष्ठ वध्यमानं तदा निशि ।। ४२ ।।
प्रदुद्राव दिशः सर्वा वीक्षमाणं भयार्दितम् ।
भरतश्रेष्ठ! उस समय रात्रिमें अर्जुनद्वारा मारी जाती हुई आपकी सेना भयसे पीड़ित हो सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखती हुई भाग चली ।। ४२ १/२ ।।
उत्सृज्य वाहनान् समरे चोदयन्तस्तथा परे ।। ४३ ।।
सम्भ्रान्ताः पर्यधावन्त तस्मिंस्तमसि दारुणे ।
कुछ लोग अपने वाहनोंको समरांगणमें ही छोड़कर भाग चले। दूसरे लोग उन्हें तेजीसे हाँकते हुए भागे और कितने ही सैनिक भ्रान्त होकर उस दारुण अन्धकारमें चारों ओर चक्कर काटते रहे ।। ४३ १/२ ।।
विजित्य समरे योधांस्तावकान् भरतर्षभ ।। ४४ ।।
दध्मतुर्मुदितौ शङ्खौ वासुदेवधनंजयौ ।
भरतश्रेष्ठ! रणभूमिमें आपके योद्धाओंको जीतकर प्रसन्नतासे भरे हुए भगवान् श्रीकृष्ण और अर्जुन अपना-अपना शंख बजाने लगे ।। ४४ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नो महाराज द्रोणं विद्ध्वा त्रिभिः शरैः ।। ४५ ।।
चिच्छेद धनुषस्तूर्णं ज्यां शरेण शितेन ह ।
महाराज! उधर धृष्टद्युम्नने तीन बाणोंसे द्रोणाचार्यको बींधकर तुरंत ही तीखे बाणसे उनके धनुषकी प्रत्यंचा काट डाली ।। ४५ १/२ ।।
तन्निधाय धनुर्भूमौ द्रोणः क्षत्रियमर्दनः ।। ४६ ।।
आददेऽन्यद् धनुः शूरो वेगवत् सारवत्तरम् ।
तब क्षत्रियमर्दन शूरवीर द्रोणाचार्यने उस धनुषको भूमिपर रखकर दूसरा अत्यन्त प्रबल और वेगशाली धनुष हाथमें लिया ।। ४६ १/२ ।।
धृष्टद्युम्नं ततो द्रोणो विद्ध्वा सप्तभिराशुगैः ।। ४७ ।।
सारथिं पञ्चभिर्बाणै राजन् विव्याध संयुगे ।
राजन्! तत्पश्चात् द्रोणने युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नको सात बाणोंसे बींधकर उनके सारथिको पाँच बाँणोंसे घायल कर दिया ।। ४७ १/२ ।।
तं निवार्य शरैस्तूर्णं धृष्टद्युम्नो महारथः ।। ४८ ।।
व्यधमत् कौरवीं सेनामासुरीं मघवानिव ।
महारथी धृष्टद्युम्नने तुरंत ही अपने बाणोंद्वारा द्रोणाचार्यको रोककर कौरव-सेनाका उसी प्रकार विनाश आरम्भ किया, जैसे इन्द्र आसुरी सेनाका संहार करते हैं ।। ४८ १/२ ।।
वध्यमाने बले तस्मिंस्तव पुत्रस्य मारिष ।। ४९ ।।
प्रावर्तत नदी घोरा शोणितौघतरङ्गिणी ।
माननीय नरेश! इस प्रकार जब आपके पुत्रकी उस सेनाका वध होने लगा, तब वहाँ रक्तराशिके प्रवाहसे तरंगित होनेवाली एक भयंकर नदी बह चली ।। ४९ १/२ ।।
उभयोः सेनयोर्मध्ये नराश्वद्विपवाहिनी ।। ५० ।।
यथा वैतरणी राजन् यमराजपुरं प्रति ।
राजन्! दोनों सेनाओंके बीचमें बहनेवाली वह नदी मनुष्यों, घोड़ों और हाथियोंको भी बहाये लिये जाती थी, मानो वैतरणी नदी यमराजपुरीकी ओर जा रही हो ।। ५० १/२ ।।
द्रावयित्वा तु तत् सैन्यं धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ।। ५१ ।।
अभ्यराजत तेजस्वी शक्रो देवगणेष्विव ।
उस सेनाको भगाकर प्रतापी धृष्टद्युम्न देवताओंके समूहमें तेजस्वी इन्द्रके समान सुशोभित होने लगे ।। ५१ १/२ ।।
अथ दध्मुर्महाशङ्खान् धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।। ५२ ।।
यमौ च युयुधानश्च पाण्डवश्च वृकोदरः ।
तदनन्तर धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, नकुल, सहदेव, सात्यकि तथा पाण्डुपुत्र भीमसेनने भी अपने महान् शंखको बजाया ।। ५२ १/२ ।।
जित्वा रथसहस्राणि तावकानां महारथाः ।
सिंहनादरवांश्चक्रुः पाण्डवा जितकाशिनः ।। ५३ ।।
पश्यतस्तव पुत्रस्य कर्णस्य च रणोत्कटाः ।
तथा द्रोणस्य शूरस्य द्रौणेश्चैव विशाम्पते ।। ५४ ।।
प्रजानाथ! विजयसे उल्लसित होनेवाले रणोन्मत्त पाण्डव महारथी आपके पुत्र दुर्योधन, कर्ण, द्रोणाचार्य तथा शूरवीर अश्वत्थामाके देखते-देखते आपकी सेनाके सहस्रों
रथियोंको परास्त करके सिंहनाद करने लगे ।। ५३-५४ ।।
इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे
एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ।। १७१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। १७१ ।।