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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

१६४-

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चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः

दोनों सेनाओंका घमासान युद्ध और दुर्योधनका द्रोणाचार्यकी रक्षाके लिये सैनिकोंको आदेश

संजय उवाच

प्रकाशिते तदा लोके रजसा तमसाऽऽवृते ।
समाजग्मुरथो वीराः परस्परवधैषिणः ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! उस समय धूल और अन्धकारसे ढकी हुई रणभूमिमें इस प्रकार उजेला होनेपर एक-दूसरेके वधकी इच्छावाले वीर सैनिक आपसमें भिड़ गये ॥ १ ॥

ते समेत्य रणे राजन् शस्त्रप्रासासिधारिणः ।
परस्परमुदैक्षन्त परस्परकृतागसः ॥ २ ॥
महाराज! समरांगणमें परस्पर भिड़कर वे नाना प्रकारके शस्त्र, प्रास और खड्ग आदि धारण करनेवाले योद्धा, जो परस्पर अपराधी थे, एक-दूसरेकी ओर देखने लगे ॥ २ ॥

प्रदीपानां सहस्रैश्च दीप्यमानैः समन्ततः ।
रत्नाचितैः स्वर्णदण्डैर्गन्धतैलावसिञ्चितैः ॥ ३ ॥
चारों ओर हजारों मशालें जल रही थीं। उनके डंडे सोनेके बने हुए थे और उनमें रत्न जड़े हुए थे। उन मशालोंपर सुगन्धित तेल डाला जाता था ॥ ३ ॥

देवगन्धर्वदीपाद्यैः प्रभाभिरधिकोज्ज्वलैः ।
विरराज तदा भूमिर्ग्रहैर्द्यौरिव भारत ॥ ४ ॥
भारत! उन्हींमें देवताओं और गन्धर्वोंके भी दीप आदि जल रहे थे, जो अपनी विशेष प्रभाके कारण अधिक प्रकाशित हो रहे थे। उनके द्वारा उस समय रणभूमि नक्षत्रोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ ४ ॥

उल्काशतैः प्रज्वलितै रणभूमिर्व्यराजत ।
दह्यमानेव लोकानामभावे च वसुंधरा ॥ ५ ॥
सैकड़ों प्रज्वलित उल्काओं (मशालों)-से वह रणभूमि ऐसी शोभा पा रही थी, मानो प्रलयकालमें यह सारी पृथ्वी दग्ध हो रही हो ॥ ५ ॥

व्यदीप्यन्त दिशः सर्वाः प्रदीपैस्तैः समन्ततः ।
वर्षाप्रदोषे खद्योतैर्वृता वृक्षा इवाबभुः ॥ ६ ॥
उन प्रदीपोंसे सब ओर सारी दिशाएँ ऐसी प्रदीप्त हो उठीं, मानो वर्षाके सायंकालमें जुगनुओंसे घिरे हुए वृक्ष जगमगा रहे हों ॥ ६ ॥

असज्जन्त ततो वीरा वीरेष्वेव पृथक् पृथक् ।
नागा नागैः समाजग्मुस्तुरगा ह्यसादिभिः ॥ ७ ॥
उस समय वीरगण विपक्षी वीरोंके साथ पृथक्-पृथक् भिड़ गये। हाथी हाथियोंके और घुड़सवार घुड़सवारोंके साथ जूझने लगे ॥ ७ ॥
रथा रथवरैरेव समाजग्मुर्मुदा युताः ।
तस्मिन् रात्रिमुखे घोरे तव पुत्रस्य शासनात् ॥ ८ ॥
चतुरङ्गस्य सैन्यस्य सम्पातश्च महानभूत् ।
इसी प्रकार रथी श्रेष्ठ रथियोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक युद्ध करने लगे। उस भयंकर प्रदोषकालमें आपके पुत्रकी आज्ञासे वहाँ चतुरङ्गिणी सेनामें भारी मारकाट मच गयी ॥
ततोऽर्जुनो महाराज कौरवाणामनीकिनीम् ॥ ९ ॥
व्यधमत् त्वरया युक्तः क्षपयन् सर्वपार्थिवान् ।
महाराज! तदनन्तर अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ समस्त राजाओंका संहार करते हुए कौरव-सेनाका विनाश करने लगे ॥ ९ १/२ ॥

धृतराष्ट्र उवाच

तस्मिन् प्रविष्टे संरब्धे मम पुत्रस्य वाहिनीम् ॥ १० ॥
अमृष्यमाणे दुर्धर्षे कथमासीन्मनो हि वः ।
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! क्रोध और अमर्षमें भरे हुए दुर्धर्ष वीर अर्जुन जब मेरे पुत्रकी सेनामें प्रविष्ट हुए, उस समय तुमलोगोंके मनकी कैसी अवस्था हुई? ॥
किमकुर्वत सैन्यानि प्रविष्टे परपीड़ने ॥ ११ ॥
दुर्योधनश्च किं कृत्यं प्राप्तकालममन्यत ।
शत्रुओंको पीड़ा देनेवाले अर्जुनके प्रवेश करनेपर मेरी सेनाओंने क्या किया? तथा दुर्योधनने उस समयके अनुरूप कौन-सा कार्य उचित माना? ॥ ११ १/२ ॥
के चैनं समरे वीरं प्रत्युद्ययुररिंदमाः ॥ १२ ॥
द्रोणं च के व्यरक्षन्त प्रविष्टे श्वेतवाहने ।
समरांगणमें शत्रुओंका दमन करनेवाले कौन-कौन-से योद्धा वीर अर्जुनका सामना करनेके लिये आगे बढ़े। श्वेतवाहन अर्जुनके कौरव-सेनाके भीतर घुस आनेपर किन लोगोंने द्रोणाचार्यकी रक्षा की ॥ १२ १/२ ॥
केऽरक्षन् दक्षिणं चक्रं के च द्रोणस्य सव्यतः ॥ १३ ॥
के पृष्ठतश्चाप्यभवन् वीरा वीरान् विनिघ्नतः ।
के पुरस्तादगच्छन्त निघ्नन्तः शात्रवान् रणे ॥ १४ ॥
कौन-कौन-से योद्धा द्रोणाचार्यके रथके दाहिने पहियेकी रक्षा करते थे और कौन-कौन-से बायें पहियेकी? कौन-कौन-से वीर वीरोंका वध करनेवाले द्रोणाचार्यके पृष्ठभागके रक्षक

थे और रणमें शत्रुसैनिकोंका संहार करनेवाले कौन-कौन-से योद्धा आचार्यके आगे-आगे चलते थे? ।। १३-१४ ।।
यत् प्राविशन्महेष्वासः पञ्चालानपराजितः ।
नृत्यन्निव नरव्याघ्रो रथमार्गेषु वीर्यवान् ।। १५ ।।
महाधनुर्धर, पराक्रमी एवं किसीसे पराजित न होनेवाले पुरुषसिंह द्रोणाचार्यने रथके मार्गोंपर नृत्य-सा करते हुए वहाँ पांचालोंकी सेनामें प्रवेश किया था ।। १५ ।।
यो ददाह शरैर्द्रोणः पञ्चालानां रथव्रजान् ।
धूमकेतुरिव क्रुद्धः कथं मृत्युमुपेयिवान् ।। १६ ।।
जिन आचार्य द्रोणने क्रोधमें भरे हुए अग्निदेवके समान अपने बाणोंकी ज्वालासे पांचाल महारथियोंके समुदायोंको जलाकर भस्म कर दिया था, वे कैसे मृत्युको प्राप्त हुए? ।। १६ ।।
अव्यग्रानेव हि परान् कथयस्यपराजितान् ।
हृष्टानुदीर्णान् संग्रामे न तथा सूत मामकान् ।। १७ ।।
सूत! तुम मेरे शत्रुओंको तो व्यग्रतारहित, अपराजित, हर्ष और उत्साहसे युक्त तथा संग्राममें वेगपूर्वक आगे बढ़नेवाले ही बता रहे हो; परंतु मेरे पुत्रोंकी ऐसी अवस्था नहीं बताते ।। १७ ।।
हतांश्चैव विदीर्णांश्च विप्रकीर्णांश्च शंससि ।
रथिनो विरथांश्चैव कृतान् युद्धेषु मामकान् ।। १८ ।।
सभी युद्धोंमें मेरे पक्षके रथियोंको तुम हताहत, छिन्न-भिन्न, तितर-बितर तथा रथहीन हुआ ही बता रहे हो ।। १८ ।।

संजय उवाच

द्रोणस्य मतमाज्ञाय योद्धुकामस्य तां निशाम् ।
दुर्योधनो महाराज वश्यान् भ्रातृनुवाच ह ।। १९ ।।
कर्णं च वृषसेनं च मद्रराजं च कौरव ।
दुर्धर्षं दीर्घबाहुं च ये च तेषां पदानुगाः ।। २० ।।
**संजय कहते हैं—**कुरुनन्दन महाराज! युद्धकी इच्छावाले द्रोणाचार्यका मत जानकर दुर्योधनने उस रातमें अपने वशवर्ती भाइयोंसे तथा कर्ण, वृषसेन, मद्रराज शल्य, दुर्धर्ष, दीर्घबाहु तथा जो-जो उनके पीछे चलनेवाले थे, उन सबसे इस प्रकार कहा— ।।
द्रोणं यत्ताः पराक्रान्ताः सर्वे रक्षन्तु पृष्ठतः ।
हार्दिक्यो दक्षिणं चक्रं शल्यश्चैवोत्तरं तथा ।। २१ ।।
‘तुम सब लोग सावधान रहकर पराक्रमपूर्वक पीछेकी ओरसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो। कृतवर्मा उनके दाहिने पहियेकी और राजा शल्य बायें पहियेकी रक्षा करें’ ।। २१ ।।

त्रिगर्तानां च ये शूरा हतशिष्टा महारथाः ।
तांश्चैव पुरतः सर्वान् पुत्रस्ते समचोदयत् ॥ २२ ॥
राजन्! त्रिगर्तोंके जो शूरवीर महारथी मरनेसे शेष रह गये थे, उन सबको आपके पुत्रने द्रोणाचार्यके आगे-आगे चलनेकी आज्ञा देते हुए कहा— ॥ २२ ॥

आचार्यों हि सुसंयत्तो भृशं यत्ताश्च पाण्डवाः ।
तं रक्षत सुसंयत्ता निघ्नन्तं शात्रवान् रणे ॥ २३ ॥
‘आचार्य पूर्णतः सावधान हैं, पाण्डव भी विजयके लिये विशेष यत्नशील एवं सावधान हैं। तुमलोग रणभूमिमें शत्रु-सैनिकोंका संहार करते हुए आचार्यकी पूरी सावधानीके साथ रक्षा करो ॥ २३ ॥

द्रोणो हि बलवान् युद्धे क्षिप्रहस्तः प्रतापवान् ।
निर्जयेत् त्रिदशान् युद्धे किमु पार्थान् ससोमकान् ॥ २४ ॥
क्योंकि द्रोणाचार्य बलवान्, प्रतापी और युद्धमें शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले हैं। वे संग्राममें देवताओंको भी परास्त कर सकते हैं; फिर कुन्तीके पुत्रों और सोमकोंकी तो बात ही क्या है? ॥ २४ ॥

ते यूयं सहिताः सर्वे भृशं यत्ता महारथाः ।
द्रोणं रक्षत पाञ्चालाद् धृष्टद्युम्नान्महारथात् ॥ २५ ॥
‘इसलिये तुम सब महारथी एक साथ होकर पूर्णतः प्रयत्नशील रहते हुए पांचाल महारथी धृष्टद्युम्नसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करो ॥ २५ ॥

पाण्डवीयेषु सैन्येषु न तं पश्याम कञ्चन ।
यो योधयेद् रणे द्रोणं धृष्टद्युम्नादृते नृपः ॥ २६ ॥
‘हम पाण्डवोंकी सेनाओंमें धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी वीर नरेशको नहीं देखते, जो रणक्षेत्रमें द्रोणाचार्यके साथ युद्ध कर सके ॥ २६ ॥

तस्मात् सर्वात्मना मन्ये भारद्वाजस्य रक्षणम् ।
सुगुप्तः पाण्डवान् हन्यात् सृञ्जयांश्च ससोमकान् ॥ २७ ॥
‘अतः मैं सब प्रकारसे द्रोणाचार्यकी रक्षा करना ही इस समय आवश्यक कर्तव्य मानता हूँ। वे सुरक्षित रहें तो पाण्डवों, सृञ्जयों और सोमकोंका भी संहार कर सकते हैं ॥ २७ ॥

सृञ्जयेष्वथ सर्वेषु निहतेषु चमूमुखे ।
धृष्टद्युम्नं रणे द्रौणिर्हनिष्यति न संशयः ॥ २८ ॥
‘युद्धके मुहानेपर सारे सृञ्जयोंके मारे जानेपर अश्वत्थामा रणभूमिमें धृष्टद्युम्नको भी मार डालेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २८ ॥

तथार्जुनं च राधेयो हनिष्यति महारथः ।
भीमसेनमहं चापि युद्धे जेष्यामि दीक्षितः ॥ २९ ॥
शेषांश्च पाण्डवान् योधाः प्रसभं हीनतेजसः ।

'योद्धाओ! इसी प्रकार महारथी कर्ण अर्जुनका वध कर डालेगा तथा रणयज्ञकी दीक्षा लेकर युद्ध करनेवाला मैं भीमसेनको और तेजोहीन हुए दूसरे पाण्डवोंको भी बलपूर्वक जीत लूँगा॥ २९ १/२॥

सोऽयं मम जयो व्यक्तो दीर्घकालं भविष्यति।
तस्माद् रक्षत संग्रामे द्रोणमेव महारथम्॥ ३०॥
'इस प्रकार अवश्य ही मेरी यह विजय चिरस्थायिनी होगी, अतः तुम सब लोग मिलकर संग्राममें महारथी द्रोणकी ही रक्षा करो'॥ ३०॥

इत्युक्त्वा भरतश्रेष्ठ पुत्रो दुर्योधनस्तव।
व्यादिदेश तथा सैन्यं तस्मिंस्तमसि दारुणे॥ ३१॥
भरतश्रेष्ठ! ऐसा कहकर आपके पुत्र दुर्योधनने उस भयंकर अन्धकारमें अपनी सेनाको युद्धके लिये आज्ञा दे दी॥ ३१॥

ततः प्रवृत्ते युद्धं रात्रौ भरतसत्तम।
उभयोः सेनयोर्घोरं परस्परजिगीषया॥ ३२॥
भरतसत्तम! फिर तो रात्रिके समय दोनों सेनाओंमें एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छासे घोर युद्ध आरम्भ हो गया॥ ३२॥

अर्जुनः कौरवं सैन्यमर्जुनं चापि कौरवाः।
नानाशस्त्रसमावापैरन्योन्यं समपीडयन्॥ ३३॥
अर्जुन कौरव-सेनापर और कौरव-सैनिक अर्जुनपर नाना प्रकारके शस्त्र-समूहोंकी वर्षा करते हुए एक-दूसरेको पीड़ा देने लगे॥ ३३॥

द्रौणिः पाञ्चालराजं च भारद्वाजश्च सृञ्जयान्।
छादयांचक्रतुः संख्ये शरैः संनतपर्वभिः॥ ३४॥
अश्वत्थामाने पांचालराज द्रुपदको और द्रोणाचार्यने सृंजयोंको युद्धस्थलमें झुकी हुई गाँठवाले बाणोंद्वारा आच्छादित कर दिया॥ ३४॥

पाण्डुपाञ्चालसैन्यानां कौरवाणां च भारत।
आसीन्निशानको घोरो निघ्नतामितरेतरम्॥ ३५॥
भारत! एक ओरसे पाण्डव और पांचाल-सैनिकोंका और दूसरी ओरसे कौरव योद्धाओंका, जो एक-दूसरेपर गहरी चोट कर रहे थे, घोर आर्तनाद सुनायी पड़ता था॥ ३५॥

नैवास्माभिस्तथा पूर्वैर्दृष्टपूर्वं तथाविधम्।
श्रुतं वा यादृशं युद्धमासीद् रौद्रं भयानकम्॥ ३६॥
हमने तथा पूर्ववर्ती लोगोंने भी वैसा रौद्र एवं भयानक युद्ध न तो पहले कभी देखा था और न सुना ही था, जैसा कि वह युद्ध हो रहा था॥ ३६॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि घटोत्कचवधपर्वणि रात्रियुद्धे संकुलयुद्धे
चतुःषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत घटोत्कचवधपर्वमें रात्रियुद्धके प्रसंगमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६४ ॥