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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

व्यासजी कहते हैं—राजन्! इन सोलह राजाओंका पवित्र एवं आयुकी वृद्धि करनेवाला उपाख्यान सुनकर राजा सृंजय कुछ भी नहीं बोलते हुए मौन रह गये॥ १॥

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एकसप्ततितमोऽध्यायः

नारदजीका सृंजयके पुत्रको जीवित करना और व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अन्तर्धान होना

व्यास उवाच

पुण्यमाख्यानमायुष्यं श्रुत्वा षोडशराजकम्।
अव्याहरन्नरपतिस्तूष्णीमासीत् स सृञ्जयः॥ १॥
**व्यासजी कहते हैं—**राजन्! इन सोलह राजाओंका पवित्र एवं आयुकी वृद्धि करनेवाला उपाख्यान सुनकर राजा सृंजय कुछ भी नहीं बोलते हुए मौन रह गये॥ १॥

तमब्रवीत् तथाऽऽसीनं नारदो भगवानृषिः।
श्रुतं कीर्तयतो मह्यं गृहीतं ते महाद्युते॥ २॥
उन्हें इस प्रकार चुपचाप बैठे देख भगवान् नारदमुनिने उनसे पूछा—'महातेजस्वी नरेश! मैंने जो कुछ कहा है, उसे तुमने सुना और समझा है न?'॥ २॥

आहोस्विदन्ततो नष्टं श्राद्धं शूद्रीपताविव।
स एवमुक्तः प्रत्याह प्राञ्जलिः सृञ्जयस्तदा॥ ३॥
'अथवा ऐसा तो नहीं हुआ कि जैसे शूद्रजातिकी स्त्रीसे सम्बन्ध रखनेवाले ब्राह्मणको दिया हुआ श्राद्धका दान नष्ट (निष्फल) हो जाता है, उसी प्रकार मेरा यह सारा कहना अन्ततोगत्वा व्यर्थ हो गया हो।' उनके इस प्रकार पूछनेपर उस समय सृंजयने हाथ जोड़कर उत्तर दिया—॥ ३॥

एतच्छ्रुत्वा महाबाहो धन्यमाख्यानमुत्तमम्।
राजर्षीणां पुराणानां यज्वनां दक्षिणावताम्॥ ४॥
विस्मयेन हृते शोके तमसीवार्कतेजसा।
विपाप्मास्म्यव्यथोपेतो ब्रूहि किं करवाण्यहम्॥ ५॥
'महाबाहु महर्षे! यज्ञ करने और दक्षिणा देनेवाले प्राचीन राजर्षियोंका यह परम उत्तम सराहनीय उपाख्यान सुनकर मुझे ऐसा विस्मय हुआ है कि उसने मेरा सारा शोक हर लिया है। ठीक उसी तरह, जैसे सूर्यका तेज सारा अन्धकार हर लेता है। अब मैं पाप (दुःख) और व्यथासे शून्य हो गया हूँ। बताइये, आपकी किस आज्ञाका पालन करूँ'॥ ४-५॥

नारद उवाच

दिष्ट्यापहृतशोकस्त्वं वृणीष्वेह यदिच्छसि।
तत् तत् प्रपत्स्यसे सर्वं न मृषावादिनो वयम्॥ ६॥

नारदजीने कहा— राजन्! बड़े सौभाग्यकी बात है कि तुम्हारा शोक दूर हो गया। अब तुम्हारी जो इच्छा हो, यहाँ मुझसे माँग लो। तुम्हारी वह सारी अभिलषित वस्तु तुम्हें प्राप्त हो जायगी। हमलोग झूठ नहीं बोलते हैं ॥ ६ ॥

सृञ्जय उवाच

एतेनैव प्रतीतोऽहं प्रसन्नो यद्भगवान् मम ।
प्रसन्नो यस्य भगवान् न तस्यास्तीह दुर्लभम् ॥ ७ ॥
संजयने कहा— मुने! आप मुझपर प्रसन्न हैं, इतनेसे ही मैं पूर्ण संतुष्ट हूँ। जिसपर आप प्रसन्न हों, उसे इस जगत्में कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ७ ॥

नारद उवाच

मृतं ददानि ते पुत्रं दस्युभिर्निहतं वृथा ।
उद्धृत्य नरकात् कष्टात् पशुवत् प्रोक्षितं यथा ॥ ८ ॥
नारदजीने कहा— राजन्! लुटेरोंने तुम्हारे पुत्रको प्रोक्षित पशुकी भाँति व्यर्थ ही मार डाला है। तुम्हारे उस मरे हुए पुत्रको मैं कष्टप्रद नरकसे निकालकर तुम्हें पुनः वापस दे रहा हूँ ॥ ८ ॥

व्यास उवाच

प्रादुरासीत् ततः पुत्रः सृञ्जयस्याद्भुतप्रभः ।
प्रसन्नेनर्षिणा दत्तः कुबेरतनयोपमः ॥ ९ ॥
व्यासजी कहते हैं— युधिष्ठिर! नारदजीके इतना कहते ही सृंजयका अद्भुत कान्तिमान् पुत्र वहाँ प्रकट हो गया। उसे ऋषिने प्रसन्न होकर राजाको दिया था। वह देखनेमें कुबेरके पुत्रके समान जान पड़ता था ॥ ९ ॥
ततः संगम्य पुत्रेण प्रीतिमानभवन्नृपः ।
ईजे च ऋतुभिः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ॥ १० ॥
अपने उस पुत्रसे मिलकर राजा सृंजयको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त पुण्यमय यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया ॥ १० ॥
अकृतार्थश्च भीतश्च न च सान्नाहिको हतः ।
अयज्वा त्वनपत्यश्च ततोऽसौ जीवितः पुनः ॥ ११ ॥
सृंजयका पुत्र कवच बाँधकर युद्धमें लड़ता हुआ नहीं मारा गया था। उसे अकृतार्थ और भयभीत अवस्थामें अपने प्राणोंका त्याग करना पड़ा था। वह यज्ञकर्मसे रहित और संतानहीन भी था। इसलिये नारदजीने पुनः उसे जीवित कर दिया था ॥ ११ ॥
शूरो वीरः कृतार्थश्च प्रताप्यारीन् सहस्रशः ।
अभिमन्युर्गतो वीरः पृतनाभिमुखो हतः ॥ १२ ॥

परंतु शूरवीर अभिमन्यु तो कृतार्थ हो चुका है। वह वीर शत्रुसेनाके सम्मुख युद्धतत्पर हो सहस्रों वैरीयोंको संतप्त करके मारा गया और स्वर्गलोकमें जा पहुँचा है ॥

ब्रह्मचर्येण यान् कांश्चित् प्रज्ञया च श्रुतेन च ।
इष्टैश्च क्रतुभिर्यान्ति तांस्ते पुत्रोऽक्षयान् गतः ॥ १३ ॥
पुण्यात्मा पुरुष ब्रह्मचर्यपालन, उत्तम ज्ञान, वेदशास्त्रोंके स्वाध्याय तथा यज्ञोंके अनुष्ठानसे जिन किन्हीं लोकोंमें जाते हैं, उन्हीं अक्षय लोकोंमें तुम्हारा पुत्र अभिमन्यु भी गया है ॥ १३ ॥

विद्वांसः कर्मभिः पुण्यैः स्वर्गमीहन्ति नित्यशः ।
न तु स्वर्गादयं लोकः काम्यते स्वर्गवासिभिः ॥ १४ ॥
विद्वान् पुरुष पुण्यकर्मोंद्वारा सदा स्वर्गलोकमें जानेकी इच्छा करते हैं; परंतु स्वर्गवासी पुरुष स्वर्गसे इस लोकमें आनेकी कामना नहीं करते हैं ॥ १४ ॥

तस्मात् स्वर्गगतं पुत्रमर्जुनस्य हतं रणे ।
न चेहानयितुं शक्यं किंचिदप्राप्यमीहितम् ॥ १५ ॥
अर्जुनका पुत्र युद्धमें मारे जानेके कारण स्वर्गलोकमें गया हुआ है। अतः उसे यहाँ नहीं लाया जा सकता। कोई अप्राप्य वस्तु केवल इच्छा करनेमात्रसे नहीं सुलभ हो सकती ॥ १५ ॥

यां योगिनो ध्यानविविक्तदर्शनाः
प्रयान्ति यां चोत्तमयज्विनो जनाः ।
तपोभिरिद्धैरनुयान्ति यां तथा
तामक्षयां ते तनयो गतो गतिम् ॥ १६ ॥
जिन्होंने ध्यानके द्वारा पवित्र ज्ञानमयी दृष्टि प्राप्त कर ली है, वे योगी निष्कामभावसे उत्तम यज्ञ करनेवाले पुरुष तथा अपनी उज्ज्वल तपस्याओंद्वारा तपस्वी मुनि जिस अक्षय गतिको पाते हैं, तुम्हारे पुत्रने भी वही गति प्राप्त की है ॥ १६ ॥

अन्तात् पुनर्भावगतो विराजते
राजेव वीरो ह्यमृतात्मरश्मिभिः ।
तामैन्दवीमात्मतनुं द्विजोचितां
गतोऽभिमन्युर्न स शोकमर्हति ॥ १७ ॥
वीर अभिमन्यु मृत्युके पश्चात् पुनः पूर्वभावको प्राप्त होकर चन्द्रमासे उत्पन्न अपने द्विजोचित शरीरमें प्रतिष्ठित हो अपनी अमृतमयी किरणोंसे राजा सोमके समान प्रकाशित हो रहा है। अतः उसके लिये तुम्हें शोक नहीं करना चाहिये ॥ १७ ॥

एवं ज्ञात्वा स्थिरो भूत्वा जह्यरीन् धैर्यमाप्नुहि ।
जीवन्त एव नः शोच्या न तु स्वर्गगतोऽनघ ॥ १८ ॥

राजन्! ऐसा जानकर सुस्थिर हो धैर्यका आश्रय लो और उत्साहपूर्वक शत्रुओंका वध करो। अनघ! हमें इस संसारमें जीवित पुरुषोंके लिये ही शोक करना चाहिये। जो स्वर्गमें चला गया है, उसके लिये शोक करना उचित नहीं है॥ १८॥

शोचतो हि महाराज अघमेवाभिवर्धते।
तस्माच्छोकं परित्यज्य श्रेयसे प्रयतेद् बुधः॥ १९॥
प्रहर्षमभिमानं च सुखप्राप्तिं च चिन्तयन्।
महाराज! शोक करनेसे केवल दुःख ही बढ़ता है। अतः विद्वान् पुरुष उत्कृष्ट हर्ष, अतिशय सम्मान और सुख-प्राप्तिका चिन्तन करते हुए शोकका परित्याग करके अपने कल्याणके लिये ही प्रयत्न करे॥ १९ १/२॥

एतद् बुद्ध्वा बुधाः शोकं न शोकः शोक उच्यते॥ २०॥
यही सब सोच-समझकर ज्ञानवान् पुरुष शोक नहीं करते हैं। शोकको शोक नहीं कहते हैं (उसका अनुभव करनेवाला मन ही शोकरूप होता है)॥ २०॥

एवं विद्वान् समुत्तिष्ठ प्रयतो भव मा शुचः।
श्रुतस्ते सम्भवो मृत्योस्तपांस्यनुपमानि च॥ २१॥
राजन्! ऐसा जानकर तुम युद्धके लिये उठो। मन और इन्द्रियोंको संयममें रखो तथा शोक न करो। तुमने मृत्युकी उत्पत्ति और उसकी अनुपम तपस्याका वृत्तान्त सुन लिया है॥ २१॥

सर्वभूतसमत्वं च चञ्चलाश्च विभूतयः।
सृञ्जयस्य तु तं पुत्रं मृतं संजीवितं पुनः॥ २२॥
मृत्यु सम्पूर्ण प्राणियोंको समभावसे प्राप्त होती है और धन-ऐश्वर्य चंचल है—यह बात भी जान ली है। सृंजयका पुत्र मरा और पुनः जीवित हुआ, यह कथा भी तुमने सुन ही ली है॥ २२॥

एवं विद्वान् महाराज मा शुचः साधयाम्यहम्।
एतावदुक्त्वा भगवांस्तत्रैवान्तरधीयत॥ २३॥
महाराज! यह सब तुम जानते हो। अतः शोक न करो। अब मैं अपनी साधनामें लग रहा हूँ। ऐसा कहकर भगवान् व्यास वहीं अन्तर्धान हो गये॥ २३॥

वागीशाने भगवति व्यासे व्यभ्रनभःप्रभे।
गते मतिमतां श्रेष्ठे समाश्वास्य युधिष्ठिरम्॥ २४॥
पूर्वेषां पार्थिवेन्द्राणां महेन्द्रप्रतिमौजसाम्।
न्यायाधिगतवित्तानां तां श्रुत्वा यज्ञसम्पदम्॥ २५॥
सम्पूज्य मनसा विद्वान् विशोकोऽभूद् युधिष्ठिरः।
पुनश्चाचिन्तयद् दीनः किंस्विद् वक्ष्ये धनंजयम्॥ २६॥

बिना बादलके आकाशकी-सी कान्तिवाले, बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ वागीश्वर भगवान् व्यास जब युधिष्ठिरको आश्वासन देकर चले गये, तब देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी और न्यायसे धन प्राप्त करनेवाले प्राचीन राजाओंके उस यज्ञ-वैभवकी कथा सुनकर विद्वान् युधिष्ठिर मन-ही-मन उनके प्रति आदरकी भावना करते हुए शोकसे रहित हो गये। तदनन्तर फिर दीनभावसे यह सोचने लगे कि अर्जुनसे मैं क्या कहूँगा ।। २४—२६ ।।

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
एकसप्ततितमोऽध्यायः ।। ७१ ।।

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयोपाख्यानविषयक इकहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ७१ ।।