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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 458)

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सप्ततितमोऽध्यायः

परशुरामजीका चरित्र

नारद उवाच

रामो महातपाः शूरो वीरलोकनमस्कृतः ।
जामदग्न्योऽप्यतियशा अवितृप्तो मरिष्यति ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं—संजय! महातपस्वी शूरवीर, वीरजनवन्दित महायशस्वी जमदग्निनन्दन परशुरामजी भी अतृप्त अवस्थामें ही मौतके मुखमें चले जायँगे ॥ १ ॥
यः स्माद्यमनुपर्येति भूमिं कुर्वन्निमां सुखाम् ।
न चासीद् विक्रिया यस्य प्राप्य श्रियमनुत्तमाम् ॥ २ ॥
जिन्होंने इस पृथ्वीको सुखमय बनाते हुए आदि युगके धर्मका जहाँ निरन्तर प्रचार किया था तथा परम उत्तम सम्पत्तिको पाकर भी जिनके मनमें किसी प्रकारका विकार नहीं आया ॥ २ ॥
यः क्षत्रियैः परामृष्टे वत्से पितरि चाब्रुवन् ।
ततोऽवधीत् कार्तवीर्यमजितं समरे परैः ॥ ३ ॥
जब क्षत्रियोंने गायके बछड़ेको पकड़ लिया और पिता जमदग्निको मार डाला, तब जिन्होंने मौन रहकर ही समरभूमिमें दूसरोंसे कभी पराजित न होनेवाले कृतवीर्यकुमार अर्जुनका वध किया था ॥ ३ ॥
क्षत्रियाणां चतुःषष्टिमयुतानि सहस्रशः ।
तदा मृत्योः समेतानि एकेन धनुषाजयत् ॥ ४ ॥
उस समय मरने-मारनेका निश्चय करके एकत्र हुए चौसठ करोड़ क्षत्रियोंको उन्होंने एकमात्र धनुषके द्वारा जीत लिया ॥ ४ ॥
ब्रह्मद्विषां चाथ तस्मिन् सहस्राणि चतुर्दश ।
पुनरन्यानि जग्राह दन्तक्रूरं जघान ह ॥ ५ ॥
उसी युद्धके सिलसिलेमें परशुरामजीने चौदह हजार दूसरे ब्रह्मद्रोहियोंका दमन किया और दन्तक्रूर नामक राजाको भी मार डाला ॥ ५ ॥
सहस्रं मुसलेनाहन् सहस्रमसिनावधीत् ।
उद्बन्धनात् सहस्रं च सहस्रमुदके धृतम् ॥ ६ ॥
उन्होंने एक सहस्र क्षत्रियोंको मूसलसे मार गिराया, एक सहस्र राजपूतोंको तलवारसे काट डाला, फिर एक सहस्र क्षत्रियोंको वृक्षोंकी शाखाओंमें फाँसीपर लटकाकर मार डाला और पुनः एक सहस्रको पानीमें डुबो दिया ॥ ६ ॥
दन्तान् भङ्क्त्वा सहस्रस्य कर्णान् नासान्यकृन्तत ।

ततः सप्तसहस्राणां कटुधूपमपाययत् ।। ७ ।।

एक सहस्र राजपूतोंके दाँत तोड़कर नाक और कान काट डाले तथा सात हजार

राजाओंको कड़ुवा धूप पिला दिया ।। ७ ।।

शिष्टान् बद्ध्वा च हत्वा वै तेषां मूर्ध्नि विभिद्य च ।

गुणावतीमुत्तरेण खाण्डवाद् दक्षिणेन च ।

गिर्यन्ते शतसाहस्रा हैहयाः समरे हताः ।। ८ ।।

सरथाश्वगजा वीरा निहतास्तत्र शेरते ।

पितुर्वधामर्षितेन जामदग्न्येन धीमता ।। ९ ।।

शेष क्षत्रियोंको बाँधकर उनका वध कर डाला। उनमेंसे कितनोंके ही मस्तक विदीर्ण

कर डाले। गुणावतीसे उत्तर और खाण्डव वनसे दक्षिण पर्वतके निकटवर्ती प्रदेशमें लाखों

हैहयवंशी क्षत्रिय वीर पिताके वधसे कुपित हुए बुद्धिमान् परशुरामजीके द्वारा समरभूमिमें

मारे गये। वे अपने रथ, घोड़े और हाथियोंसहित मारे जाकर वहाँ धराशायी हो

गये ।। ८-९ ।।

निजघ्ने दशसाहस्रान् रामः परशुना तदा ।

न ह्यमृष्यत ता वाचो यास्तैर्भृशमुदीरिताः ।। १० ।।

भृगो रामाभिधावेति यदाक्रन्दन् द्विजोत्तमाः ।

परशुरामजीने उस समय अपने फरसेसे दस हजार क्षत्रियोंको काट डाला।

आश्रमवासियोंने आर्तभावसे जो बातें कही थीं, वहाँके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने 'भृगुवंशी परशुराम!

दौड़ो, बचाओ' इस प्रकार कहकर जो करुण क्रन्दन किया था, उनकी वह कातर पुकार

परशुरामजीसे नहीं सही गयी ।। १० १/२ ।।

ततः काश्मीरदरदान् कुन्तिक्षुद्रकमालवान् ।। ११ ।।

अङ्गवङ्गकलिङ्गांश्च विदेहांस्ताम्रलिप्तकान् ।

रक्षोवाहान् वीतिहोत्रांस्त्रिगर्तान् मार्तिकावतान् ।। १२ ।।

शिबीनन्यांश्च राजन्यान् देशान् देशान् सहस्रशः ।

निजघान शितैर्बाणैर्जामदग्न्यः प्रतापवान् ।। १३ ।।

तदनन्तर प्रतापी परशुरामने काश्मीर, दरद, कुन्ति, क्षुद्रक, मालव, अंग, वंग, कलिंग,

विदेह, ताम्रलिप्त, रक्षोवाह, वीतिहोत्र, त्रिगर्त, मार्तिकावत, शिबि तथा अन्य सहस्रों देशोंके

क्षत्रियोंका अपने तीखे बाणोंद्वारा संहार किया ।। ११-१३ ।।

कोटीशतसहस्राणि क्षत्रियाणां सहस्रशः ।

इन्द्रगोपकवर्णस्य बन्धुजीवनिभस्य च ।। १४ ।।

रुधिरस्य परीवाहैः पूरयित्वा सरांसि च ।

सर्वानष्टादश द्वीपान् वशमानीय भार्गवः ।। १५ ।।

ईजे क्रतुशतैः पुण्यैः समाप्तवरदक्षिणैः ।

सहस्रों और लाखों कोटि क्षत्रियोंके इन्द्रगोप (वीर-बहूटी) नामक कीट तथा बन्धुजीव (दुपहरिया)-पुष्पके समान रंगवाले रक्तकी धाराओंसे भृगुनन्दन परशुरामने कितने ही तालाब भर दिये और समस्त अठारह द्वीपोंको अपने वशमें करके उत्तम दक्षिणाओंसे युक्त सौ पवित्र यज्ञोंका अनुष्ठान किया ।। १४-१५ १/२ ।।

वेदीमष्टनलोत्सेधां सौवर्णां विधिनिर्मिताम् ।। १६ ।।
सर्वरत्नशतैः पूर्णां पताकाशतमालिनीम् ।
ग्राम्यारण्यैः पशुगणैः सम्पूर्णां च महीमिमाम् ।। १७ ।।
रामस्य जामदग्न्यस्य प्रतिजग्राह कश्यपः ।

उस यज्ञमें विधिपूर्वक बत्तीस हाथ ऊँची सोनेकी वेदी बनायी गयी थी, जो सब प्रकारके सैकड़ों रत्नोंसे परिपूर्ण और सौ पताकाओंसे सुशोभित थी। जमदग्निनन्दन परशुरामकी उस वेदीको तथा ग्रामीण और जंगली पशुओंसे भरी-पूरी इस पृथ्वीको भी महर्षि कश्यपने दक्षिणारूपसे ग्रहण किया ।। १६-१७ १/२ ।।

ततः शतसहस्राणि द्विपेन्द्रान् हेमभूषणान् ।। १८ ।।
निर्दस्यूं पृथिवीं कृत्वा शिष्टेष्टजनसंकुलाम् ।
कश्यपाय ददौ रामो हयमेधे महामखे ।। १९ ।।

उस समय परशुरामजीने लाखों गजराजोंको सोनेके आभूषणोंसे विभूषित करके तथा पृथ्वीको चोर-डाकुओंसे सूनी और साधु पुरुषोंसे भरी-पूरी करके महायज्ञ अश्वमेधमें कश्यपजीको दे दिया ।। १८-१९ ।।

त्रिःसप्तकृत्वः पृथिवीं कृत्वा निःक्षत्रियां प्रभुः ।
इष्ट्वा क्रतुशतैर्वीरो ब्राह्मणेभ्यो ह्यमन्यत ।। २० ।।

वीर एवं शक्तिशाली परशुरामजीने इक्कीस बार इस पृथ्वीको क्षत्रियोंसे शून्य करके सैकड़ों यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया और इस वसुधाको ब्राह्मणोंके अधिकारमें दे दिया ।। २० ।।

सप्तद्वीपां वसुमतीं मारीचोऽगृह्णत द्विजः ।
रामं प्रोवाच निर्गच्छ वसुधातो ममाज्ञया ।। २१ ।।

ब्रह्मर्षि कश्यपने जब सातों द्वीपोंसे युक्त यह पृथ्वी दानमें ले ली, तब उन्होंने परशुरामजीसे कहा—‘अब तू मेरी आज्ञासे इस पृथ्वीसे निकल जाओ’ (और कहीं अन्यत्र जाकर रहो) ।। २१ ।।

स कश्यपस्य वचनात् प्रोत्सार्य सरितां पतिम् ।
इषुपाते युधां श्रेष्ठः कुर्वन् ब्राह्मणशासनम् ।। २२ ।।
अध्यावसद् गिरिश्रेष्ठं महेन्द्रं पर्वतोत्तमम् ।

कश्यपके इस आदेशसे योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामने जितनी दूर बाण फेंका जा सकता है, समुद्रको उतनी ही दूर पीछे हटाकर ब्राह्मणकी आज्ञाका पालन करते हुए उत्तम पर्वत गिरिश्रेष्ठ महेन्द्रपर निवास किया ॥ २२ १/२ ॥

एवं गुणशतैर्युक्तो भृगूणां कीर्तिवर्धनः ॥ २३ ॥
जामदग्न्यो ह्यतियशा मरिष्यति महाद्युतिः ।
इस प्रकार भृगुकुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले महायशस्वी, महातेजस्वी और सैकड़ों गुणोंसे सम्पन्न जमदग्निनन्दन परशुराम भी एक-न-एक दिन मरेंगे ही ॥ २३ १/२ ॥

त्वया चतुर्भद्रतरः पुत्रात् पुण्यतरस्तव ॥ २४ ॥
अयज्वानमदाक्षिण्यं मा पुत्रमनुतप्यथाः ।
सृंजय! चारों कल्याणकारी गुणोंमें वे तुमसे श्रेष्ठ और तुम्हारे पुत्रसे अधिक पुण्यात्मा हैं। अतः तुम यज्ञानुष्ठान और दान-दक्षिणासे रहित अपने पुत्रके लिये शोक न करो ॥ २४ १/२ ॥

एते चतुर्भद्रतरास्त्वया भद्रशताधिकाः ।
मृता नरवरश्रेष्ठ मरिष्यन्ति च सृञ्जय ॥ २५ ॥
नरश्रेष्ठ सृंजय! अबतक जिन लोगोंका वर्णन किया गया है, ये चतुर्विध कल्याणकारी गुणोंमें तो तुमसे बढ़कर थे ही, तुम्हारी अपेक्षा उनमें सैकड़ों मंगलकारी गुण अधिक भी थे; तथापि वे मर गये और जो विद्यमान हैं, वे भी मरेंगे ही ॥ २५ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि अभिमन्युवधपर्वणि षोडशराजकीये
सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत अभिमन्युवधपर्वमें षोडशराजकीयो-
पाख्यानविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥