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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 3072)

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त्रयोदशोऽध्यायः

श्रीकृष्ण, अर्जुन और युधिष्ठिरका भीमसेनके पीछे जाना, भीमका गंगातटपर पहुँचकर अश्वत्थामाको ललकारना और अश्वत्थामाके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोग

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा युधां श्रेष्ठः सर्वयादवनन्दनः ।
सर्वायुधवरोपेतमारुरोह रथोत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! सम्पूर्ण यादवकुलको आनन्दित करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण ऐसा कहकर समस्त श्रेष्ठ आयुधोंसे सम्पन्न उत्तम रथपर आरूढ़ हुए ॥ १ ॥

युक्तं परमकाम्बोजैस्तुरगैर्हेममालिभिः ।
आदित्योदयवर्णस्य धुरं रथवरस्य तु ॥ २ ॥
दक्षिणामवहच्छैब्यः सुग्रीवः सव्यतोऽभवत् ।
पार्ष्णिवाहौ तु तस्यास्तां मेघपुष्पबलाहकौ ॥ ३ ॥
उसमें सोनेकी माला पहने हुए अच्छी जातिके काबुली घोड़े जुते हुए थे। उस श्रेष्ठ रथकी कान्ति उदयकालीन सूर्यके समान अरुण थी। उसकी दाहिनी धुरीका बोझ शैव्य ढो रहा था और बायींका सुग्रीव। उन दोनोंके पार्श्वभागमें क्रमशः मेघपुष्प और बलाहक जुते हुए थे ॥ २-३ ॥

विश्वकर्मकृता दिव्या रत्नधातुविभूषिता ।
उच्छ्रितेव रथे माया ध्वजयष्टिरदृश्यत ॥ ४ ॥
उस रथपर विश्वकर्माद्वारा निर्मित तथा रत्नमय धातुओंसे विभूषित दिव्य ध्वजा दिखायी दे रही थी, जो ऊँचे उठी हुई मायाके समान प्रतीत होती थी ॥ ४ ॥

वैनतेयः स्थितस्तस्यां प्रभामण्डलरश्मिवान् ।
तस्य सत्यवतः केतुर्भुजगारिरदृश्यत ॥ ५ ॥
उस ध्वजापर प्रभापुंज एवं किरणोंसे सुशोभित विनतानन्दन गरुड़ विराज रहे थे। सर्पोंके शत्रु गरुड़ सत्यवान् श्रीकृष्णके रथकी पताकाके रूपमें दृष्टिगोचर हो रहे थे ॥ ५ ॥

अथारोहद्धृषीकेशः केतुः सर्वधनुष्मताम् ।
अर्जुनः सत्यकर्मा च कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ६ ॥
सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण पहले उस रथपर सवार हुए। तत्पश्चात् सत्यपराक्रमी अर्जुन तथा कुरुराज युधिष्ठिर उस रथपर बैठे ॥ ६ ॥

अशोभेतां महात्मानौ दाशार्हमभितः स्थितौ ।
रथस्थं शार्ङ्गधन्वानमश्विनाविव वासवम् ॥ ७ ॥
वे दोनों महात्मा पाण्डव रथपर स्थित हुए शार्ङ्ग धनुषधारी दाशार्हकुलनन्दन श्रीकृष्णके समीप विराजमान हो इन्द्रके पास बैठे हुए दोनों अश्विनीकुमारोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ ७ ॥

तावुपारोप्य दाशार्हः स्यन्दनं लोकपूजितम् ।
प्रतोदेन जवोपेतान् परमाश्वानचोदयत् ॥ ८ ॥
उन दोनों भाइयोंको उस लोकपूजित रथपर चढ़ाकर दशार्हवंशी श्रीकृष्णने वेगशाली उत्तम अश्वोंको चाबुकसे हाँका ॥ ८ ॥

ते हयाः सहसोत्पेतुरृहीत्वा स्यन्दनोत्तमम् ।
आस्थितं पाण्डवेयाभ्यां यदूनामृषभेण च ॥ ९ ॥
वे घोड़े दोनों पाण्डवों तथा यदुकुलतिलक श्रीकृष्णकी सवारीमें आये हुए उस उत्तम रथको लेकर सहसा उड़ चले ॥ ९ ॥

वहतां शार्ङ्गधन्वानमश्वानां शीघ्रगामिनाम् ।
प्रादुरासीन्महान् शब्दः पक्षिणां पततामिव ॥ १० ॥
शार्ङ्गधन्वा श्रीकृष्णकी सवारी ढोते हुए उन शीघ्रगामी अश्वोंका महान् शब्द उड़ते हुए पक्षियोंके समान प्रकट हो रहा था ॥ १० ॥

ते समाच्छन्नरव्याघ्राः क्षणेन भरतर्षभ ।
भीमसेनं महेष्वासं समनुद्रुत्य वेगिताः ॥ ११ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे तीनों नरश्रेष्ठ बड़े वेगसे पीछे-पीछे दौड़कर क्षणभरमें महाधनुर्धर भीमसेनके पास जा पहुँचे ॥ ११ ॥

क्रोधदीप्तं तु कौन्तेयं द्विषदर्थे समुद्यतम् ।
नाशक्नुवन् वारयितुं समेत्यापि महारथाः ॥ १२ ॥
इस समय कुन्तीकुमार भीमसेन क्रोधसे प्रज्वलित हो शत्रुके संहार करनेके लिये तुले हुए थे। इसलिये वे तीनों महारथी उनसे मिलकर भी उन्हें रोक न सके ॥ १२ ॥

स तेषां प्रेक्षतामेव श्रीमतां दृढधन्विनाम् ।
ययौ भागीरथीतीरं हरिभिर्भृशवेगितैः ॥ १३ ॥
यत्र स्म श्रूयते द्रौणिः पुत्रहन्ता महात्मनाम् ।
उन सुदृढ़ धनुर्धर तेजस्वी वीरोंके देखते-देखते वे अत्यन्त वेगशाली घोड़ोंके द्वारा भागीरथीके तटपर जा पहुँचे, जहाँ उन महात्मा पाण्डवोंके पुत्रोंका वध करनेवाला अश्वत्थामा बैठा सुना गया था ॥ १३ ½ ॥

स ददर्श महात्मानमुदकान्ते यशस्विनम् ॥ १४ ॥
कृष्णद्वैपायनं व्यासमासीनमृषिभिः सह ।

तं चैव क्रूरकर्माणं घृताक्तं कुशचीरिनम् ॥ १५ ॥
रजसा ध्वस्तमासीनं ददर्श द्रौणिमन्तिके ।
वहाँ जाकर उन्होंने गङ्गाजीके जलके किनारे परम यशस्वी महात्मा श्रीकृष्ण द्वैपायन व्यासको अनेकों महर्षियोंके साथ बैठे देखा। उनके पास ही वह क्रूरकर्मा द्रोणपुत्र भी बैठा दिखायी दिया। उसने अपने शरीरमें घी लगाकर कुशका चीर पहन रखा था। उसके सारे अंगोंपर धूल छा रही थी ॥ १४-१५ १/२ ॥

तमभ्यधावत् कौन्तेयः प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ १६ ॥
भीमसेनो महाबाहुस्तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
कुन्तीकुमार महाबाहु भीमसेन बाणसहित धनुष लिये उसकी ओर दौड़े और बोले—'अरे! खड़ा रह, खड़ा रह' ॥ १६ १/२ ॥

स दृष्ट्वा भीमधन्वानं प्रगृहीतशरासनम् ॥ १७ ॥
भ्रातरौ पृष्ठतश्चास्य जनार्दनरथे स्थितौ ।
व्यथितात्माभवद् द्रौणिः प्राप्तं चेदममन्यत ॥ १८ ॥
अश्वत्थामाने देखा कि भयंकर धनुर्धर भीमसेन हाथमें धनुष लिये आ रहे हैं। उनके पीछे श्रीकृष्णके रथपर बैठे हुए दो भाई और हैं। यह सब देखकर द्रोणकुमारके हृदयमें बड़ी व्यथा हुई। उस घबराहटमें उसने यही करना उचित समझा ॥ १७-१८ ॥

स तद् दिव्यमदीनात्मा परमास्त्रमचिन्तयत् ।
जग्राह च स चैषीकां द्रौणिः सव्येन पाणिना ॥ १९ ॥
उदारहृदय अश्वत्थामाने उस दिव्य एवं उत्तम अस्त्रका चिन्तन किया। साथ ही बायें हाथसे एक सींक उठा ली ॥ १९ ॥

स तामापदमासाद्य दिव्यमस्त्रमुदैरयत् ।
अमृष्यमाणस्तान् शूरान् दिव्यायुधवरान् स्थितान् ॥ २० ॥
अपाण्डवायेति रुषा व्यसृजद् दारुणं वचः ।
दिव्य आयुध धारण करके खड़े हुए उन शूरवीरोंका आना वह सहन न कर सका। उस आपत्तिमें पड़कर उसने रोषपूर्वक दिव्यास्त्रका प्रयोग किया और मुखसे कठोर वचन निकाला कि 'यह अस्त्र समस्त पाण्डवोंका विनाश कर डाले' ॥ २० १/२ ॥

इत्युक्त्वा राजशार्दूल द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ॥ २१ ॥
सर्वलोकप्रमोहार्थं तदस्त्रं प्रमुमोच ह ।
नृपश्रेष्ठ! ऐसा कहकर प्रतापी द्रोणपुत्रने सम्पूर्ण लोकोंको मोहमें डालनेके लिये वह अस्त्र छोड़ दिया ॥ २१ १/२ ॥

ततस्तस्यामिषीकायां पावकः समजायत ।
प्रधक्ष्यन्निव लोकांस्त्रीन् कालान्तकयमोपमः ॥ २२ ॥

तदनन्तर उस सींकमें काल, अन्तक और यमराजके समान भयंकर आग प्रकट हो गयी। उस समय ऐसा जान पड़ा कि वह अग्नि तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर डालेगी ॥ २२ ॥

इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि ऐषीकपर्वणि ब्रह्मशिरोऽस्त्रत्यागे त्रयोदशोऽध्यायः ॥ १३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सौप्तिकपर्वके अन्तर्गत ऐषीकपर्वमें अश्वत्थामाके द्वारा ब्रह्मास्त्रका प्रयोगविषयक तेरहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३ ॥