महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2949)
त्रिषष्टितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरकी प्रेरणासे श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें जाकर धृतराष्ट्र और गान्धारीको आश्वासन दे पुनः पाण्डवोंके पास लौट आना
जनमेजय उवाच
किमर्थं द्विजशार्दूल धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
गान्धार्याः प्रेषयामास वासुदेवं परंतपम् ।। १ ।।
जनमेजयने पूछा— द्विजश्रेष्ठ! धर्मराज युधिष्ठिरने शत्रुसंतापी भगवान् श्रीकृष्णको गान्धारी देवीके पास किसलिये भेजा? ।। १ ।।
यदा पूर्वं गतः कृष्णः शमार्थं कौरवान् प्रति ।
न च तं लब्धवान् कामं ततो युद्धमभूदिदम् ।। २ ।।
जब पूर्वकालमें श्रीकृष्ण संधि करानेके लिये कौरवोंके पास गये थे, उस समय तो उन्हें उनका अभीष्ट मनोरथ प्राप्त ही नहीं हुआ, जिससे यह युद्ध उपस्थित हुआ ।। २ ।।
निहतेषु तु योधेषु हते दुर्योधने तदा ।
पृथिव्यां पाण्डवेयस्य निःसपत्ने कृते युधि ।। ३ ।।
विद्रुते शिबिरे शून्ये प्राप्ते यशसि चोत्तमे ।
किं नु तत् कारणं ब्रह्मन् येन कृष्णो गतः पुनः ।। ४ ।।
ब्रह्मन्! जब युद्धमें सारे योद्धा मारे गये, दुर्योधनका भी अन्त हो गया, भूमण्डलमें पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके शत्रुओंका सर्वथा अभाव हो गया, कौरवदलके लोग शिविरको सूना करके भाग गये और पाण्डवोंको उत्तम यशकी प्राप्ति हो गयी, तब कौन-सा ऐसा कारण आ गया, जिससे श्रीकृष्ण पुनः हस्तिनापुरमें गये? ।। ३-४ ।।
न चैतत् कारणं ब्रह्मन्नल्पं विप्रतिभाति मे ।
यत्रागमदमेयात्मा स्वयमेव जनार्दनः ।। ५ ।।
विप्रवर! मुझे इसका कोई छोटा-मोटा कारण नहीं जान पड़ता, जिससे अप्रमेयस्वरूप साक्षात् भगवान् जनार्दनको ही जाना पड़ा ।। ५ ।।
तत्त्वतो वै समाचक्ष्व सर्वमध्वर्युसत्तम ।
यच्चात्र कारणं ब्रह्मन् कार्यस्यास्य विनिश्चये ।। ६ ।।
यजुर्वेदीय विद्वानोंमें श्रेष्ठ ब्राह्मणदेव! इस कार्यका निश्चय करनेमें जो भी कारण हो, वह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये ।। ६ ।।
वैशम्पायन उवाच
त्वद्युक्तोऽयमनुप्रश्नो यन्मां पृच्छसि पार्थिव ।
तत्तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि यथावद् भरतर्षभ ॥ ७ ॥
वैशम्पायनजीने कहा— भरतकुलभूषण नरेश! तुमने जो प्रश्न किया है, वह सर्वथा उचित है। तुम मुझसे जो कुछ पूछ रहे हो, वह सब मैं तुझे यथार्थरूपसे बताऊँगा ।।
हतं दुर्योधनं दृष्ट्वा भीमसेनेन संयुगे ।
व्युत्क्रम्य समयं राजन् धार्तराष्ट्रं महाबलम् ॥ ८ ॥
अन्यायेन हतं दृष्ट्वा गदायुद्धेन भारत ।
युधिष्ठिरं महाराज महत् भयमाविशत् ॥ ९ ॥
राजन्! भरतवंशी महाराज! धृतराष्ट्रपुत्र महाबली दुर्योधनको भीमसेनेने युद्धमें उसके नियमका उल्लङ्घन करके मारा है। वह गदायुद्धके द्वारा मारा गया है। इन सब बातोंपर दृष्टिपात करके युधिष्ठिरके मनमें बड़ा भारी भय समा गया ।। ८-९ ।।
चिन्तयानो महाभागां गान्धारीं तपसान्विताम् ।
घोरेण तपसा युक्तां त्रैलोक्यमपि सा दहेत् ॥ १० ॥
वे घोर तपस्यासे युक्त महाभागा तपस्विनी गान्धारी देवीका चिन्तन करने लगे। उन्होंने सोचा 'गान्धारी देवी कुपित होनेपर तीनों लोकोंको जलाकर भस्म कर सकती हैं' ।।
तस्य चिन्तयमानस्य बुद्धिः समभवत् तदा ।
गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः पूर्वं प्रशमनं भवेत् ॥ ११ ॥
इस प्रकार चिन्ता करते हुए राजा युधिष्ठिरके हृदयमें उस समय यह विचार हुआ कि पहले क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त कर देना चाहिये ।।
सा हि पुत्रवधं श्रुत्वा कृतमस्माभीरीदृशम् ।
मानसेनाग्निना क्रुद्धा भस्मसान्नः करिष्यति ॥ १२ ॥
वे हमलोगोंके द्वारा इस तरह पुत्रका वध किया गया सुनकर कुपित हो अपने संकल्पजनित अग्निसे हमें भस्म कर डालेंगी ।। १२ ।।
कथं दुःखमिदं तीव्रं गान्धारी सा सहिष्यति ।
श्रुत्वा विनिहतं पुत्रं छलेनाजिह्मयोधिनम् ॥ १३ ॥
उनका पुत्र सरलतासे युद्ध कर रहा था; परंतु छलसे मारा गया। यह सुनकर गान्धारी देवी इस तीव्र दुःखको कैसे सह सकेंगी? ।। १३ ।।
एवं विचिन्त्य बहुधा भयशोकसमन्वितः ।
वासुदेवमिदं वाक्यं धर्मराजोऽभ्यभाषत ॥ १४ ॥
इस तरह अनेक प्रकारसे विचार करके धर्मराज युधिष्ठिर भय और शोकमें डूब गये और वसुदेवनन्दन भगवान् श्रीकृष्णसे बोले— ।। १४ ।।
तव प्रसादाद् गोविन्द राज्यं निहतकण्टकम् ।
अप्राप्यं मनसापीदं प्राप्तमस्माभिरच्युत ॥ १५ ॥
‘गोविन्द! अच्युत! जिसे मनके द्वारा भी प्राप्त करना असम्भव था, वही यह अकण्टक राज्य हमें आपकी कृपासे प्राप्त हो गया ॥ १५ ॥
प्रत्यक्षं मे महाबाहो संग्रामे लोमहर्षणे ।
विमर्दः सुमहान् प्राप्तस्त्वया यादवनन्दन ॥ १६ ॥
‘यादवनन्दन! महाबाहो! इस रोमांचकारी संग्राममें जो महान् विनाश प्राप्त हुआ था, वह सब आपने प्रत्यक्ष देखा था ॥ १६ ॥
त्वया देवासुरे युद्धे वधार्थममरद्विषाम् ।
यथा साह्यं पुरा दत्तं हताश्च विबुधद्विषः ॥ १७ ॥
साह्यं तथा महाबाहो दत्तमस्माकमच्युत ।
सारथ्येन च वार्ष्णेय भवता हि धृता वयम् ॥ १८ ॥
‘पूर्वकालमें देवासुर-संग्रामके अवसरपर जैसे आपने देवद्रोही दैत्योंके वधके लिये देवताओंकी सहायता की थी, जिससे वे सारे देवशत्रु मारे गये, महाबाहु अच्युत! उसी प्रकार इस युद्धमें आपने हमें सहायता प्रदान की है। वृष्णिनन्दन! आपने सारथिका कार्य करके हमलोगोंको बचा लिया ॥ १७-१८ ॥
यदि न त्वं भवेर्नाथः फाल्गुनस्य महारणे ।
कथं शक्यो रणे जेतुं भवेदेष बलार्णवः ॥ १९ ॥
‘यदि आप इस महासमरमें अर्जुनके स्वामी और सहायक न होते तो युद्धमें इस कौरव-सेनारूपी समुद्रपर विजय पाना कैसे सम्भव हो सकता था? ॥ १९ ॥
गदाप्रहारा विपुलाः परिघैश्चापि ताडनम् ।
शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च तोमरैः सपरश्वधैः ॥ २० ॥
अस्मत्कृते त्वया कृष्ण वाचः सुरुषाः श्रुताः ।
शस्त्राणां च निपाता वै वज्रस्पर्शोपमा रणे ॥ २१ ॥
‘श्रीकृष्ण! आपने हमलोगोंके लिये गदाओंके बहुत-से आघात सहे, परिघोंकी मार खायी; शक्ति, भिन्दिपाल, तोमर और फरसोंकी चोटें सहन कीं तथा बहुत-सी कठोर बातें सुनीं। आपके ऊपर रणभूमिमें ऐसे-ऐसे शस्त्रोंके प्रहार हुए, जिनका स्पर्श वज्रके तुल्य था ॥ २०-२१ ॥
ते च ते सफला जाता हते दुर्योधनेऽच्युत ।
तत् सर्वं न यथा नश्येत् पुनः कृष्ण तथा कुरु ॥ २२ ॥
‘अच्युत! दुर्योधनके मारे जानेपर वे सारे आघात सफल हो गये। श्रीकृष्ण! अब ऐसा कीजिये, जिससे वह सारा किया-कराया कार्य फिर नष्ट न हो जाय ॥
संदेहदोलां प्राप्तं नश्चेतः कृष्ण जये सति ।
गान्धार्या हि महाबाहो क्रोधं बुद्धयस्व माधव ॥ २३ ॥
श्रीकृष्ण! आज विजय हो जानेपर भी हमारा मन संदेहके झूलापर झूल रहा है। महाबाहु माधव! आप गान्धारी देवीके क्रोधपर तो ध्यान दीजिये ।। २३ ।।
सा हि नित्यं महाभागा तपसोग्रेण कर्शिता ।
पुत्रपौत्रवधं श्रुत्वा ध्रुवं नः सम्प्रधक्ष्यति ।। २४ ।।
‘महाभागा गान्धारी प्रतिदिन उग्र तपस्यासे अपने शरीरको दुर्बल करती जा रही हैं। वे पुत्रों और पौत्रोंका वध हुआ सुनकर निश्चय ही हमें जला डालेंगी ।। २४ ।।
तस्याः प्रसादनं वीर प्राप्तकालं मतं मम ।
कश्च तां क्रोधताम्राक्षीं पुत्रव्यसनकर्शिताम् ।। २५ ।।
वीक्षितुं पुरुषः शक्तस्त्वामृते पुरुषोत्तम ।
‘वीर! अब उन्हें प्रसन्न करनेका कार्य ही मुझे समयोचित जान पड़ता है। पुरुषोत्तम! आपके सिवा दूसरा कौन ऐसा पुरुष है, जो पुत्रोंके शोकसे दुर्बल हो क्रोधसे लाल आँखें करके बैठी हुई गान्धारी देवीकी ओर आँख उठाकर देख सके ।। २५ १/२ ।।
तत्र मे गमनं प्राप्तं रोचते तव माधव ।। २६ ।।
गान्धार्याः क्रोधदीप्तायाः प्रशमार्थमरिंदम ।
‘शत्रुओंका दमन करनेवाले माधव! इस समय क्रोधसे जलती हुई गान्धारी देवीको शान्त करनेके लिये आपका वहाँ जाना ही मुझे उचित जान पड़ता है ।।
त्वं हि कर्ता विकर्ता च लोकानां प्रभवाप्ययः ।। २७ ।।
हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैः कालसमीरितैः ।
क्षिप्रमेव महाबाहो गान्धारीं शमयिष्यसि ।। २८ ।।
‘महाबाहो! आप सम्पूर्ण लोकोंके स्रष्टा और संहारक हैं। आप ही सबकी उत्पत्ति और प्रलयके स्थान हैं। आप युक्ति और कारणोंसे संयुक्त समयोचित वचनोंद्वारा गान्धारी देवीको शीघ्र ही शान्त कर देंगे ।। २७-२८ ।।
पितामहश्च भगवान् कृष्णस्तत्र भविष्यति ।
सर्वथा ते महाबाहो गान्धार्याः क्रोधनाशनम् ।। २९ ।।
कर्तव्यं सात्वतां श्रेष्ठ पाण्डवानां हितार्थिना ।
‘हमारे पितामह श्रीकृष्णद्वैपायन भगवान् व्यास भी वहीं होंगे। महाबाहो! सात्वतवंशके श्रेष्ठ पुरुष! आप पाण्डवोंके हितैषी हैं। आपको सब प्रकारसे गान्धारी देवीके क्रोधको शान्त कर देना चाहिये’ ।। २९ १/२ ।।
धर्मराजस्य वचनं श्रुत्वा यदुकुलोद्वहः ।। ३० ।।
आमन्त्र्य दारुकं प्राह रथः सज्जो विधीयताम् ।
धर्मराजकी यह बात सुनकर यदुकुलतिलक श्रीकृष्णने दारुकको बुलाकर कहा—‘रथ तैयार करो’ ।। ३० १/२ ।।
केशवस्य वचः श्रुत्वा त्वरमाणोऽथ दारुकः ।। ३१ ।।
न्यवेदयद् रथं सज्जं केशवाय महात्मने ।
केशवका यह आदेश सुनकर दारुकने बड़ी उतावलीके साथ रथको सुसज्जित किया और उन महात्माको इसकी सूचना दी ॥ ३१ १/२ ॥
तं रथं यादवश्रेष्ठः समारुह्य परंतपः ॥ ३२ ॥
जगाम हास्तिनपुरं त्वरितः केशवो विभुः ।
शत्रुओंको संताप देनेवाले यादवश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही उस रथपर आरूढ़ हो हस्तिनापुरकी ओर चल दिये ॥ ३२ १/२ ॥
ततः प्रायान्महाराज माधवो भगवान् रथी ॥ ३३ ॥
नागसाह्वयमासाद्य प्रविवेश च वीर्यवान् ।
महाराज! पराक्रमी भगवान् माधव उस रथपर बैठकर हस्तिनापुरमें जा पहुँचे। वहाँ पहुँचकर उन्होंने नगरमें प्रवेश किया ॥ ३३ १/२ ॥
प्रविश्य नगरं वीरो रथघोषेण नादयन् ॥ ३४ ॥
विदितो धृतराष्ट्रस्य सोऽवतीर्य रथोत्तमात् ।
अभ्यगच्छददीनात्मा धृतराष्ट्रनिवेशनम् ॥ ३५ ॥
नगरमें प्रविष्ट होकर वीर श्रीकृष्ण अपने रथके गम्भीर घोषसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करने लगे। धृतराष्ट्रको उनके आगमनकी सूचना दी गयी और वे अपने उत्तम रथसे उतरकर मनमें दीनता न लाते हुए धृतराष्ट्रके महलमें गये ॥ ३४-३५ ॥
पूर्वं चाभिगतं तत्र सोऽपश्यदृषिसत्तमम् ।
पादौ प्रपीड्य कृष्णस्य राज्ञश्चापि जनार्दनः ॥ ३६ ॥
अभ्यवादयदव्यग्रो गान्धारीं चापि केशवः ।
वहाँ उन्होंने मुनिश्रेष्ठ व्यासजीको पहलेसे ही उपस्थित देखा। व्यास तथा राजा धृतराष्ट्र दोनोंके चरण दबाकर जनार्दन श्रीकृष्णने बिना किसी व्यग्रताके गान्धारी देवीको प्रणाम किया ॥ ३६ १/२ ॥
ततस्तु यादवश्रेष्ठो धृतराष्ट्रमधोक्षजः ॥ ३७ ॥
पाणिमालम्ब्य राजेन्द्र सुस्वरं प्ररुरोद ह ।
राजेन्द्र! तदनन्तर यादवश्रेष्ठ श्रीकृष्ण धृतराष्ट्रका हाथ अपने हाथमें लेकर उन्मुक्त स्वरसे फूट-फूटकर रोने लगे ॥
स मुहूर्तादिवोत्सृज्य बाष्पं शोकसमुद्भवम् ॥ ३८ ॥
प्रक्षाल्य वारिणा नेत्रे ह्याचम्य च यथाविधि ।
उवाच प्रस्तुतं वाक्यं धृतराष्ट्रमरिंदमः ॥ ३९ ॥
न तेऽस्त्यविदितं किंचिद् वृद्धस्य तव भारत ।
कालस्य च यथावृत्तं तत् ते सुविदितं प्रभो ॥ ४० ॥
उन्होंने दो घड़ीतक शोकके आँसू बहाकर शुद्ध जलसे नेत्र धोये और विधिपूर्वक आचमन किया। तत्पश्चात् शत्रुदमन श्रीकृष्णने राजा धृतराष्ट्रसे प्रस्तुत वचन कहा—‘भारत! आप वृद्ध पुरुष हैं; अतः कालके द्वारा जो कुछ भी संघटित हुआ और हो रहा है, वह कुछ भी आपसे अज्ञात नहीं है। प्रभो! आपको सब कुछ अच्छी तरह विदित है ॥ ३८—४० ॥
यतितं पाण्डवैः सर्वैस्तव चित्तानुरोधिभिः ।
कथं कुलक्षयो न स्यात्तथा क्षत्रस्य भारत ॥ ४१ ॥
‘भारत! समस्त पाण्डव सदासे ही आपकी इच्छाके अनुसार बर्ताव करनेवाले हैं। उन्होंने बहुत प्रयत्न किया कि किसी तरह हमारे कुलका तथा क्षत्रियसमूहका विनाश न हो ॥ ४१ ॥
भ्रातृभिः समयं कृत्वा क्षान्तवान् धर्मवत्सलः ।
द्यूतच्छलजितैः शुद्धैर्वनवासो ह्युपागतः ॥ ४२ ॥
‘धर्मवत्सल युधिष्ठिरने अपने भाइयोंके साथ नियत समयकी प्रतीक्षा करते हुए सारा कष्ट चुपचाप सहन किया था। पाण्डव शुद्धभावसे आपके पास आये थे तो भी उन्हें कपटपूर्वक जूएमें हराकर वनवास दिया गया ॥ ४२ ॥
अज्ञातवासचर्या च नानावेषसमावृतैः ।
अन्ये च बहवः क्लेशात् त्वशक्तैरिव सर्वदा ॥ ४३ ॥
‘उन्होंने नाना प्रकारके वेशोंमें अपनेको छिपाकर अज्ञातवासका कष्ट भोगा। इसके सिवा और भी बहुत-से क्लेश उन्हें असमर्थ पुरुषोंके समान सदा सहन करने पड़े हैं ॥ ४३ ॥
मया च स्वयमागम्य युद्धकाल उपस्थिते ।
सर्वलोकस्य सांनिध्ये ग्रामांस्त्वं पञ्च याचितः ॥ ४४ ॥
‘जब युद्धका अवसर उपस्थित हुआ, उस समय मैंने स्वयं आकर शान्ति स्थापित करनेके लिये सब लोगोंके सामने आपसे केवल पाँच गाँव माँगे थे ॥ ४४ ॥
त्वया कालोपसृष्टेन लोभतो नापवर्जिताः ।
तवापराधान्नृपते सर्वं क्षत्रं क्षयं गतम् ॥ ४५ ॥
‘परंतु कालसे प्रेरित हो आपने लोभवश वे पाँच गाँव भी नहीं दिये। नरेश्वर! आपके अपराधसे समस्त क्षत्रियोंका विनाश हो गया ॥ ४५ ॥
भीष्मेण सोमदत्तेन बाह्लीकेन कृपेण च ।
द्रोणेन च सपुत्रेण विदुरेण च धीमता ॥ ४६ ॥
याचितस्त्वं शमं नित्यं न च तत् कृतवानसि ।
‘भीष्म, सोमदत्त, बाह्लीक, कृपाचार्य, द्रोणाचार्य, अश्वत्थामा और बुद्धिमान् विदुरजीने भी सदा आपसे शान्तिके लिये याचना की थी; परंतु आपने वह कार्य नहीं किया ॥ ४६½ ॥
कालोपहतचित्ता हि सर्वे मुह्यन्ति भारत ।। ४७ ।।
यथा मूढो भवान् पूर्वमस्मिन्नर्थे समुद्यते ।
किमन्यत् कालयोगाद्धि दिष्टमेव परायणम् ।। ४८ ।।
'भारत! जिनका चित्त कालके प्रभावसे दूषित हो जाता है, वे सब लोग मोहमें पड़ जाते हैं। जैसे कि पहले युद्धकी तैयारीके समय आपकी भी बुद्धि मोहित हो गयी थी। इसे कालयोगके सिवा और क्या कहा जा सकता है? भाग्य ही सबसे बड़ा आश्रय है ।। ४७-४८ ।।
मा च दोषान् महाप्राज्ञ पाण्डवेषु निवेशय ।
अल्पोऽप्यतिक्रमो नास्ति पाण्डवानां महात्मनाम् ।। ४९ ।।
धर्मतो न्यायतश्चैव स्नेहतश्च परंतप ।
'महाप्राज्ञ! आप पाण्डवोंपर दोषारोपण न कीजियेगा। परंतप! धर्म, न्याय और स्नेहकी दृष्टिसे महात्मा पाण्डवोंका इसमें थोड़ा-सा भी अपराध नहीं है ।। ४९ १/२ ।।
एतत् सर्वं तु विज्ञाय ह्यात्मदोषकृतं फलम् ।। ५० ।।
असूयां पाण्डुपुत्रेषु न भवान् कर्तुमर्हति ।
'यह सब अपने ही अपराधोंका फल है, ऐसा जानकर आपको पाण्डवोंके प्रति दोषदृष्टि नहीं करनी चाहिये ।। ५० १/२ ।।
कुलं वंशश्च पिण्डाश्च यच्च पुत्रकृतं फलम् ।। ५१ ।।
गान्धार्यास्तव वै नाथ पाण्डवेषु प्रतिष्ठितम् ।
'अब तो आपका कुल और वंश पाण्डवोंसे ही चलनेवाला है। नाथ! आपको और गान्धारी देवीको पिण्डा-पानी तथा पुत्रसे प्राप्त होनेवाला सारा फल पाण्डवोंसे ही मिलनेवाला है। उन्हींपर यह सब कुछ अवलम्बित है ।। ५१ १/२ ।।
त्वं चैव कुरुशार्दूल गान्धारी च यशस्विनी ।। ५२ ।।
मा शुचो नरशार्दूल पाण्डवान् प्रति किल्बिषम् ।
'कुरुप्रवर! पुरुषसिंह! आप और यशस्वी गान्धारी-देवी कभी पाण्डवोंकी बुराई करनेकी बात न सोचें ।।
एतत् सर्वमनुध्याय आत्मनश्च व्यतिक्रमम् ।। ५३ ।।
शिवेन पाण्डवान् पाहि नमस्ते भरतर्षभ ।
'भरतश्रेष्ठ! इन सब बातों तथा अपने अपराधोंका चिन्तन करके आप पाण्डवोंके प्रति कल्याण-भावना रखते हुए उनकी रक्षा करें। आपको नमस्कार है ।। ५३ १/२ ।।
जानासि च महाबाहो धर्मराजस्य या त्वयि ।। ५४ ।।
भक्तिर्भरतशार्दूल स्नेहश्चापि स्वभावतः ।
‘महाबाहो! भरतवंशके सिंह! आप जानते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिरके मनमें आपके प्रति कितनी भक्ति और कितना स्वाभाविक स्नेह है ।। ५४ १/२ ।।
एतच्च कदनं कृत्वा शत्रूणामपकारिणाम् ।। ५५ ।।
दह्यते स दिवा रात्रौ न च शर्माधिगच्छति ।
‘अपने अपराधी शत्रुओंका ही यह संहार करके वे दिन-रात शोककी आगमें जलते हैं, कभी चैन नहीं पाते हैं ।। ५५ १/२ ।।
त्वां चैव नरशार्दूल गान्धारीं च यशस्विनीम् ।। ५६ ।।
स शोचन् नरशार्दूलः शान्तिं नैवाधिगच्छति ।
‘पुरुषसिंह! आप और यशस्विनी गान्धारी देवीके लिये निरन्तर शोक करते हुए नरश्रेष्ठ युधिष्ठिरको शान्ति नहीं मिल रही है ।। ५६ १/२ ।।
ह्रिया च परयाऽऽविष्टो भवन्तं नाधिगच्छति ।। ५७ ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्तं बुद्धिव्याकुलितेन्द्रियम् ।
‘आप पुत्रशोकसे सर्वथा संतप्त हैं। आपकी बुद्धि और इन्द्रियाँ शोकसे व्याकुल हैं। ऐसी दशामें वे अत्यन्त लज्जित होनेके कारण आपके सामने नहीं आ रहे हैं’ ।। ५७ १/२ ।।
एवमुक्त्वा महाराज धृतराष्ट्रं यदूत्तमः ।। ५८ ।।
उवाच परमं वाक्यं गान्धारीं शोककर्शिताम् ।
महाराज! यदुश्रेष्ठ श्रीकृष्ण राजा धृतराष्ट्रसे ऐसा कहकर शोकसे दुर्बल हुई गान्धारी देवीसे यह उत्तम वचन बोले— ।। ५८ १/२ ।।
सौबलेयि निबोध त्वं यत् त्वां वक्ष्यामि तच्छृणु ।। ५९ ।।
त्वत्समा नास्ति लोकेऽस्मिन्नद्य सीमन्तिनी शुभे ।
‘सुबलनन्दिनि! मैं तुमसे जो कुछ कहता हूँ, उसे ध्यान देकर सुनो और समझो। शुभे! इस संसारमें तुम्हारी-जैसी तपोबल-सम्पन्न स्त्री दूसरी कोई नहीं है ।। ५९ १/२ ।।
जानासि च यथा राज्ञि सभायां मम संनिधौ ।। ६० ।।
धर्मार्थसहितं वाक्यमुभयोः पक्षयोर्हितम् ।
उक्तवत्यसि कल्याणि न च ते तनयैः कृतम् ।। ६१ ।।
‘रानी! तुम्हें याद होगा, उस दिन सभामें मेरे सामने ही तुमने दोनों पक्षोंका हित करनेवाला धर्म और अर्थयुक्त वचन कहा था, किन्तु कल्याणि! तुम्हारे पुत्रोंने उसे नहीं माना ।। ६०-६१ ।।
दुर्योधनस्त्वया चोक्तो जयार्थी परुषं वचः ।
शृणु मूढ वचो मह्यं यतो धर्मस्ततो जयः ।। ६२ ।।
‘तुमने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले दुर्योधनको सम्बोधित करके उससे बड़ी रुखाईके साथ कहा था—‘ओ मूढ़! मेरी बात सुन ले, जहाँ धर्म होता है, उसी पक्षकी जीत
होती है' ।। ६२ ।।
तदिदं समनुप्राप्तं तव वाक्यं नृपात्मजे ।
एवं विदित्वा कल्याणि मा स्म शोके मनः कृथाः ।। ६३ ।।
'कल्याणमयी राजकुमारी! तुम्हारी वही बात आज सत्य हुई है, ऐसा समझकर तुम मनमें शोक न करो ।। ६३ ।।
पाण्डवानां विनाशाय मा ते बुद्धिः कदाचन ।
शक्ता चासि महाभागे पृथिवीं सचराचराम् ।। ६४ ।।
चक्षुषा क्रोधदीप्तेन निर्दग्धुं तपसो बलात् ।
'पाण्डवोंके विनाशका विचार तुम्हारे मनमें कभी नहीं आना चाहिये। महाभागे! तुम अपनी तपस्याके बलसे क्रोधभरी दृष्टिद्वारा चराचर प्राणियोंसहित समूची पृथिवीको भस्म कर डालनेकी शक्ति रखती हो' ।। ६४ १/२ ।।
वासुदेववचः श्रुत्वा गान्धारी वाक्यमब्रवीत् ।। ६५ ।।
एवमेतन्महाबाहो यथा वदसि केशव ।
आधिभिर्दह्यमानाया मतिः संचलिता मम ।। ६६ ।।
सा मे व्यवस्थिता श्रुत्वा तव वाक्यं जनार्दन ।
भगवान् श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर गान्धारीने कहा—'महाबाहु केशव! तुम जैसा कहते हो, वह बिलकुल ठीक है। अबतक मेरे मनमें बड़ी व्यथाएँ थीं और उन व्यथाओंकी आगसे दग्ध होनेके कारण मेरी बुद्धि विचलित हो गयी थी (अतः मैं पाण्डवोंके अनिष्टकी बात सोचने लगी थी); परंतु जनार्दन! इस समय तुम्हारी बात सुनकर मेरी बुद्धि स्थिर हो गयी है—क्रोधका आवेश उतर गया है ।। ६५-६६ १/२ ।।
राज्ञस्त्वन्धस्य वृद्धस्य हतपुत्रस्य केशव ।। ६७ ।।
त्वं गतिः सहितैर्वीरैः पाण्डवैर्द्विपदां वर ।
'मनुष्योंमें श्रेष्ठ केशव! ये राजा अन्धे और बूढ़े हैं तथा इनके सभी पुत्र मारे गये हैं। अब समस्त वीर पाण्डवोंके साथ तुम्हीं इनके आश्रयदाता हो' ।। ६७ १/२ ।।
एतावदुक्त्वा वचनं मुखं प्रच्छाद्य वाससा ।। ६८ ।।
पुत्रशोकाभिसंतप्ता गान्धारी प्ररुरोद ह ।
इतनी बात कहकर पुत्रशोकसे संतप्त हुई गान्धारी देवी अपने मुखको आँचलसे ढककर फूट-फूटकर रोने लगीं ।। ६८ १/२ ।।
तत एनां महाबाहुः केशवः शोककर्शिताम् ।। ६९ ।।
हेतुकारणसंयुक्तैर्वाक्यैराश्वासयत् प्रभुः ।
तब महाबाहु भगवान् केशवने शोकसे दुर्बल हुई गान्धारीको कितने ही कारण बताकर युक्तियुक्त वचनोंद्वारा आश्वासन दिया—धीरज बँधाया ।। ६९ १/२ ।।
समाश्वास्य च गान्धारीं धृतराष्ट्रं च माधवः ॥ ७० ॥
द्रौणिसंकल्पितं भावमवबुद्ध्यत केशवः ।
गान्धारी और धृतराष्ट्रको सान्त्वना दे माधव श्रीकृष्णने अश्वत्थामाके मनमें जो भीषण संकल्प हुआ था, उसका स्मरण किया ॥ ७० ½ ॥
ततस्त्वरित उत्थाय पादौ मूर्ध्ना प्रणम्य च ॥ ७१ ॥
द्वैपायनस्य राजेन्द्र ततः कौरवमब्रवीत् ।
आपृच्छे त्वां कुरुश्रेष्ठ मा च शोके मनः कृथाः ॥ ७२ ॥
द्रौणेः पापोऽस्त्यभिप्रायस्तेनास्मि सहसोत्थितः ।
पाण्डवानां वधे रात्रौ बुद्धिस्तेन प्रदर्शिता ॥ ७३ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर वे सहसा उठकर खड़े हो गये और व्यासजीके चरणोंमें मस्तक झुकाकर प्रणाम करके कुरुवंशी धृतराष्ट्रसे बोले—'कुरुश्रेष्ठ! अब मैं आपसे जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। अब आप अपने मनको शोकमग्न न कीजिये। द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके मनमें पापपूर्ण संकल्प उदित हुआ है। इसीलिये मैं सहसा उठ गया हूँ। उसने रातको सोते समय पाण्डवोंके वधका विचार किया है' ॥ ७१—७३ ॥
एतच्छ्रुत्वा तु वचनं गान्धार्या सहितोऽब्रवीत् ।
धृतराष्ट्रो महाबाहुः केशवं केशिसूदनम् ॥ ७४ ॥
शीघ्रं गच्छ महाबाहो पाण्डवान् परिपालय ।
भूयस्त्वया समेष्यामि क्षिप्रमेव जनार्दन ॥ ७५ ॥
यह सुनकर गान्धारीसहित महाबाहु धृतराष्ट्रने केशिनिहन्ता केशवसे कहा—'महाबाहु जनार्दन! आप शीघ्र जाइये और पाण्डवोंकी रक्षा कीजिये। मैं पुनः शीघ्र ही आपसे मिलूँगा' ॥ ७४-७५ ॥
प्रायात् ततस्तु त्वरितो दारुकेण सहाच्युतः ।
वासुदेवे गते राजन् धृतराष्ट्रं जनेश्वरम् ॥ ७६ ॥
आश्वासयदमेयात्मा व्यासो लोकनमस्कृतः ।
तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्ण दारुकके साथ वहाँसे शीघ्र चल दिये। राजन्! श्रीकृष्णके चले जानेपर अप्रमेयस्वरूप विश्ववन्दित भगवान् व्यासने राजा धृतराष्ट्रको सान्त्वना दी ॥ ७६ ½ ॥
वासुदेवोऽपि धर्मात्मा कृतकृत्यो जगाम ह ॥ ७७ ॥
शिविरं हास्तिनपुराद् दिदृक्षुः पाण्डवान् नृप ।
नरेश्वर! इधर धर्मात्मा वसुदेवनन्दन श्रीकृष्ण कृतकृत्य हो हस्तिनापुरसे पाण्डवोंको देखनेके लिये शिविरमें लौट आये ॥ ७७ ½ ॥
आगम्य शिविरं रात्रौ सोऽभ्यगच्छत पाण्डवान् ।
तच्च तेभ्यः समाख्याय सहितस्तैः समाहितः ॥ ७८ ॥
शिविरमें आकर रातमें वे पाण्डवोंसे मिले और उनसे सारा समाचार कहकर उन्हींके
साथ सावधान होकर रहे ।। ७८ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि धृतराष्ट्रगान्धारीसमाश्वासने
त्रिषष्टितमोऽध्यायः ।। ६३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें धृतराष्ट्र और गान्धारीका
श्रीकृष्णको आश्वासन देनाविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६३ ।।