महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2492)
नवमोऽध्यायः
उभय पक्षकी सेनाओंका घमासान युद्ध और कौरव-सेनाका पलायन
संजय उवाच
ततः प्रवृत्ते युद्धं कुरूणां भयवर्धनम् ।
सृञ्जयैः सह राजेन्द्र घोरं देवासुरोपमम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं— राजेन्द्र! तदनन्तर कौरवोंका सृंजयोंके साथ घोर युद्ध आरम्भ हो गया, जो देवासुर-संग्रामके समान भय बढ़ानेवाला था ॥ १ ॥
नरा रथा गजौघाश्च सादिनश्च सहस्रशः ।
वाजिनश्च पराक्रान्ताः समाजग्मुः परस्परम् ॥ २ ॥
पैदल, रथी, हाथीसवार तथा सहस्रों घुड़सवार पराक्रम दिखाते हुए एक-दूसरेसे भिड़ गये ॥ २ ॥
गजानां भीमरूपाणां द्रवतां निःस्वनो महान् ।
अश्रूयत यथा काले जलदानां नभस्तले ॥ ३ ॥
जैसे वर्षाकालके आकाशमें मेघोंकी गम्भीर गर्जना होती रहती है, उसी प्रकार रणभूमिमें दौड़ लगाते हुए भीमकाय गजराजोंका महान् कोलाहल सुनायी देने लगा ॥
नागैरभ्याहताः केचित् सरथा रथिनोऽपतन् ।
व्यद्रवन्त रणे वीरा द्राव्यमाणा मदोत्कटैः ॥ ४ ॥
मदोन्मत्त हाथियोंके आघातसे कितने ही रथी रथसहित धरतीपर लोट गये। बहुत-से वीर उनसे खदेड़े जाकर इधर-उधर भागने लगे ॥ ४ ॥
हयौघान् पादरक्षांश्च रथिनस्तत्र शिक्षिताः ।
शरैः सम्प्रेषयामासुः परलोकाय भारत ॥ ५ ॥
भारत! उस युद्धस्थलमें शिक्षाप्राप्त रथियोंने घुड़सवारों तथा पादरक्षकोंको अपने बाणोंसे मारकर यमलोक भेज दिया ॥ ५ ॥
सादिनः शिक्षिता राजन् परिवार्य महारथान् ।
विचरन्तो रणेऽभ्यघ्नन् प्रासशक्त्यृष्टिभिस्तथा ॥ ६ ॥
राजन्! रणभूमिमें विचरते हुए बहुत-से सुशिक्षित घुड़सवार बड़े-बड़े रथोंको घेरकर उनपर प्रास, शक्ति तथा ऋष्टियोंका प्रहार करने लगे ॥ ६ ॥
धन्विनः पुरुषाः केचित् परिवार्य महारथान् ।
एकं बहव आसाद्य प्रययुर्यमसादनम् ॥ ७ ॥
कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे ॥ ७ ॥
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कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे ॥ ७ ॥
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कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे ॥ ७ ॥
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कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे ॥ ७ ॥
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In the Hindi translation: किसीकी ओटमें युद्ध करनेवाले -> सान्तराय (ओट में) + योधिनं (युद्ध करनेवाले) = सान्तरायोशिनं? No, सान्तरायो strike -> सान्तरायोशिनं -> सान्तरायोधि strike -> सान्तरायोशिनं? It's सान्तरायोशिनं? No, सान्तरायोधिstrike -> धिनं!
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कितने ही धनुर्धर पुरुष महारथियोंको घेर लेते और एक-एकपर बहुत-से योद्धा आक्रमण करके उसे यमलोक पहुँचा देते थे ॥ ७ ॥
नागान् रथवरांश्चान्ये परिवार्य महारथाः ।
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Everything transcribed:
पृथ्वी वज्रपातकी आवाजसे गूँजती हुई-सी प्रतीत होती थी ॥ १४-१५ ॥
धनुषां कूजमानानां शस्त्रौघानां च दीप्यताम् ।
कवचानां प्रभाभिश्च न प्राज्ञायत किञ्चन ॥ १६ ॥
टंकारते हुए धनुष, दमकते हुए अस्त्र-शस्त्रोंके समुदाय तथा कवचोंकी प्रभासे चकाचौंधके कारण कुछ भी सूझ नहीं पड़ता था ॥ १६ ॥
बहवो बाहवश्छिन्ना नागराजकरोपमाः ।
उद्वेष्टन्ते विचेष्टन्ते वेगं कुर्वन्ति दारुणम् ॥ १७ ॥
हाथीकी सूँड़के समान बहुत-सी भुजाएँ कटकर धरती-पर उछलती, लोटती और भयंकर वेग प्रकट करती थीं ॥
शिरसां च महाराज पततां धरणीतले ।
च्युतानामिव तालेभ्यस्तालानां श्रूयते स्वनः ॥ १८ ॥
महाराज! पृथ्वीपर गिरते हुए मस्तकोंका शब्द, ताड़के वृक्षोंसे चूकर गिरे हुए फलोंके धमाकेकी आवाजके समान सुनायी देता था ॥ १८ ॥
शिरोभिः पतितैर्भाति रुधिराद्रैर्वसुन्धरा ।
तपनीयनिभैः काले नलिनैरिव भारत ॥ १९ ॥
भारत! गिरे हुए रक्तरंजित मस्तकोंसे इस पृथ्वीकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो वहाँ सुवर्णमय कमल बिछाये गये हों ॥ १९ ॥
उद्वृत्तनयनैस्तैस्तु गतसत्त्वैः सुविक्षतैः ।
व्यभ्राजत मही राजन् पुण्डरीकैरिवावृता ॥ २० ॥
राजन्! खुले नेत्रोंवाले प्राणशून्य घायल मस्तकोंसे ढकी हुई पृथ्वी लाल कमलोंसे आच्छादित हुई-सी शोभा पाती थी ॥
बाहुभिश्चन्दनादिग्धैः सकेयूरैर्महाधनैः ।
पतितैर्भाति राजेन्द्र महाशक्रध्वजैरिव ॥ २१ ॥
राजेन्द्र! बाजूबंद तथा दूसरे बहुमूल्य आभूषणोंसे विभूषित, चन्दनचर्चित भुजाएँ कटकर पृथ्वीपर गिरी थीं, जो महान् इन्द्रध्वजके समान जान पड़ती थीं। उनके द्वारा रणभूमिकी अपूर्व शोभा हो रही थी ॥ २१ ॥
ऊरुभिश्च नरेन्द्राणां विनिकृत्तैर्महाहवे ।
हस्तिहस्तोपमैरन्यैः संवृतं तद् रणाङ्गणम् ॥ २२ ॥
उस महासमरमें कटी हुई नरेशोंकी जाँघें हाथीकी सूँड़ोंके समान प्रतीत होती थीं। उनके द्वारा वह सारा समरांगण पट गया था ॥ २२ ॥
कबन्धशतसंकीर्णं छत्रचामरसंकुलम् ।
सेनावनं तच्छुशुभे वनं पुष्पाचितं यथा ॥ २३ ॥
वहाँ सैकड़ों कबन्ध सब ओर बिखरे पड़े थे। छत्र और चँवर भरे हुए थे। उन सबसे वह सेनारूपी वन फूलोंसे व्याप्त हुए विशाल विपिनके समान सुशोभित होता था।।
तत्र योधा महाराज विचरन्तो ह्यभीतवत् ।
दृश्यन्ते रुधिराक्ताङ्गाः पुष्पिता इव किंशुकाः ॥ २४ ॥
महाराज! वहाँ खूनसे लथपथ शरीर लेकर निर्भय-से विचरनेवाले योद्धा फूले हुए पलाशवृक्षोंके समान दिखायी देते थे ॥ २४ ॥
मातङ्गाश्चाप्यदृश्यन्त शरतोमरपीडिताः ।
पतन्तस्तत्र तत्रैव छिन्नाभ्रसदृशा रणे ॥ २५ ॥
रणभूमिमें बाणों और तोमरोंकी मारसे पीड़ित हो जहाँ-तहाँ गिरते हुए मतवाले हाथी भी कटे हुए बादलोंके समान दिखायी देते थे ॥ २५ ॥
गजानीकं महाराज वध्यमानं महात्मभिः ।
व्यदीर्यत दिशः सर्वा वातनुन्ना घना इव ॥ २६ ॥
महाराज! वायुके वेगसे छिन्न-भिन्न हुए बादलोंके समान महामनस्वी वीरोंके बाणोंसे घायल हुई गजसेना सम्पूर्ण दिशाओंमें विदीर्ण हो रही थी ॥ २६ ॥
ते गजा घनसंकाशाः पेतुरुर्व्यां समन्ततः ।
वज्रनुन्ना इव बभुः पर्वता युगसंक्षये ॥ २७ ॥
मेघोंकी घटाके समान प्रतीत होनेवाले हाथी चारों ओरसे पृथ्वीपर पड़े थे, जो प्रलयकालमें वज्रके आघातसे विदीर्ण होकर गिरे हुए पर्वतोंके समान प्रतीत होते थे ॥
हयानां सादिभिः सार्धं पतितानां महीतले ।
राशयः स्म प्रदृश्यन्ते गिरिमात्रास्ततस्ततः ॥ २८ ॥
सवारोंसहित धरतीपर गिरे हुए घोड़ोंके पहाड़ों-जैसे ढेर यत्र-तत्र दृष्टिगोचर होते थे ॥ २८ ॥
संजज्ञे रणभूमौ तु परलोकवहा नदी ।
शोणितोदा रथावर्ता ध्वजवृक्षास्थिशर्करा ॥ २९ ॥
भुजनक्रा धनुःस्रोता हस्तिशैला हयोपला ।
मेदोमज्जाकर्दमिनी छत्रहंसा गदोडुपा ॥ ३० ॥
कवचोष्णीषसंछन्ना पताकारुचिरद्रुमा ।
चक्रचक्रावलीजुष्टा त्रिवेणूरगसंवृता ॥ ३१ ॥
उस समय रणभूमिमें एक रक्तकी नदी बह चली, जो परलोककी ओर प्रवाहित होनेवाली थी। रक्त ही उसका जल था, रथ भँवरके समान प्रतीत होते थे, ध्वज तटवर्ती वृक्षके समान जान पड़ते थे, हड्डियाँ कंकड़-पत्थरोंका भ्रम उत्पन्न करती थीं, कटी हुई भुजाएँ नाकोंके समान दिखायी देती थीं, धनुष उसके स्रोत थे, हाथी पार्श्ववर्ती पर्वत और घोड़े प्रस्तर-खण्डके तुल्य थे, मेदा और मज्जा ये ही उसके पंक थे, छत्र हंस थे, गदाएँ
नौका जान पड़ती थीं, कवच और पगड़ी आदि वस्तुएँ सेवारके समान उस नदीके जलको आच्छादित किये हुए थीं, पताकाएँ सुन्दर वृक्ष-सी दिखायी देती थीं, चक्र (पहिये) चक्रवाकोंके समूहकी भाँति उस नदीका सेवन करते थे और त्रिवेणुरूपी सर्प उसमें भरे हुए थे ।। २९–३१ ।।
शूराणां हर्षजननी भीरूणां भयवर्धनी ।
प्रावर्तत नदी रौद्रा कुरुसृञ्जयसंकुला ।। ३२ ।।
वह भयंकर नदी शूरवीरोंके लिये हर्षजनक तथा कायरोंके लिये भय बढ़ानेवाली थी। कौरवों और सृञ्जयोंके समुदायसे वह व्याप्त हो रही थी ।। ३२ ।।
तां नदीं परलोकाय वहन्तीमतिभैरवाम् ।
तेरुर्वाहननौभिस्तैः शूराः परिघबाहवः ।। ३३ ।।
परलोककी ओर ले जानेवाली उस अत्यन्त भयंकर नदीको परिघ-जैसी मोटी भुजाओंवाले शूरवीर योद्धा अपने-अपने वाहनरूपी नौकाओंद्वारा पार करते थे ।। ३३ ।।
वर्तमाने तदा युद्धे निर्मर्यादे विशाम्पते ।
चतुरङ्गक्षये घोरे पूर्वदेवासुरोपमे ।। ३४ ।।
व्याक्रोशन् बान्धवानन्ये तत्र तत्र परंतप ।
क्रोशद्भिर्दयितैरन्ये भयार्ता न निवर्तिरे ।। ३५ ।।
प्रजानाथ! परंतप! प्राचीन देवासुर-संग्रामके समान चतुरंगिणी सेनाका विनाश करनेवाला वह मर्यादाशून्य घोर युद्ध जब चलने लगा; तब भयसे पीड़ित हुए कितने ही सैनिक अपने बन्धु-बान्धवोंको पुकारने लगे और बहुत-से योद्धा प्रियजनोंके पुकारनेपर भी पीछे नहीं लौटते थे ।। ३४-३५ ।।
निर्मर्यादे तथा युद्धे वर्तमाने भयानके ।
अर्जुनो भीमसेनश्च मोहयांचक्रतुः परान् ।। ३६ ।।
इस प्रकार वह भयानक युद्ध सारी मर्यादाको तोड़कर चल रहा था। उस समय अर्जुन और भीमसेनने शत्रुओंको मूर्च्छित कर दिया था ।। ३६ ।।
सा वध्यमाना महती सेना तव नराधिप ।
अमुह्यत् तत्र तत्रैव योषिन्मदवशादिव ।। ३७ ।।
नरेश्वर! उनकी मार पड़नेसे आपकी विशाल सेना मदमत्त युवतीकी भाँति जहाँ-की-तहाँ बेहोश हो गयी ।।
मोहयित्वा च तां सेनां भीमसेनधनंजयौ ।
दध्मतुर्वारिजौ तत्र सिंहनादांश्च चक्रतुः ।। ३८ ।।
उस कौरव-सेनाको मूर्च्छित करके भीमसेन और अर्जुन शंख बजाने तथा सिंहनाद करने लगे ।। ३८ ।।
श्रुत्वैव तु महाशब्दं धृष्टद्युम्नशिखण्डिनौ ।
धर्मराजं पुरस्कृत्य मद्रराजमभिद्रुतौ ॥ ३९ ॥
उस महान् शब्दको सुनते ही धृष्टद्युम्न और शिखण्डीने धर्मराज युधिष्ठिरको आगे करके मद्रराज शल्यपर धावा कर दिया ॥ ३९ ॥
तत्राश्चर्यमपश्याम घोररूपं विशाम्पते ।
शल्येन सङ्गताः शूरा यदयुध्यन्त भागशः ॥ ४० ॥
प्रजानाथ! वहाँ हमने यह भयंकर आश्चर्यकी बात देखी कि पृथक्-पृथक् दल बनाकर आये हुए सभी शूरवीर अकेले शल्यके साथ ही जूझते रहे ॥ ४० ॥
माद्रीपुत्रौ तु रभसौ कृतास्त्रौ युद्धदुर्मदौ ।
अभ्ययातां त्वरायुक्तौ जिगीषन्तौ परंतप ॥ ४१ ॥
शत्रुओंको संताप देनेवाले नरेश! अस्त्रोंके ज्ञाता, रणदुर्मद और वेगशाली वीर माद्रीकुमार नकुल-सहदेव विजयकी अभिलाषा लेकर बड़ी उतावलीके साथ राजा शल्यपर चढ़ आये ॥ ४१ ॥
ततो न्यवर्तत बलं तावकं भरतर्षभ ।
शरैः प्रणुन्नं बहुधा पाण्डवैर्जितकाशिभिः ॥ ४२ ॥
भरतश्रेष्ठ! विजयसे उल्लसित होनेवाले पाण्डवोंने अपने बाणोंकी मारसे आपकी सेनाको बारंबार घायल किया ॥
वध्यमाना चमूः सा तु पुत्राणां प्रेक्षतां तव ।
भेजे दिशो महाराज प्रणुन्ना शरवृष्टिभिः ॥ ४३ ॥
महाराज! इस प्रकार चोट सहती हुई वह सेना बाणोंकी वर्षासे क्षत-विक्षत हो आपके पुत्रोंके देखते-देखते सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग चली ॥ ४३ ॥
हाहाकारो महाञ्जज्ञे योधानां तव भारत ।
तिष्ठ तिष्ठेति चाप्यासीद् द्रावितानां महात्मनाम् ॥ ४४ ॥
भरतनन्दन! वहाँ आपके योद्धाओंमें महान् हाहाकार मच गया। भागे हुए योद्धाओंके पीछे महामनस्वी पाण्डव वीरोंकी 'ठहरो, ठहरो' की आवाज सुनायी देने लगी ॥ ४४ ॥
क्षत्रियाणां तदान्योन्यं संयुगे जयमिच्छताम् ।
प्राद्रवन्नेव सम्भग्नाः पाण्डवैस्तव सैनिकाः ॥ ४५ ॥
त्यक्त्वा युद्धे प्रियान् पुत्रान् भ्रातॄनथ पितामहान् ।
मातुलान् भागिनेयांश्च वयस्यानपि भारत ॥ ४६ ॥
भारत! युद्धमें परस्पर विजयकी अभिलाषा रखनेवाले क्षत्रियोंमेंसे पाण्डवोंद्वारा पराजित होकर आपके सैनिक युद्धमें अपने प्यारे पुत्रों, भाइयों, पितामहों, मामाओं, भानजों और मित्रोंको भी छोड़कर भाग गये ॥ ४५-४६ ॥
हयान् द्विपांस्त्वरयन्तो योधा जग्मुः समन्ततः ।
आत्मत्राणकृतोत्साहास्तावका भरतर्षभ ॥ ४७ ॥
भरतश्रेष्ठ! अपनी रक्षामात्रके लिये उत्साह रखनेवाले आपके सैनिक घोड़ों और हाथियोंको तीव्र गतिसे हाँकते हुए सब ओर भाग चले ।। ४७ ।।
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि संकुलयुद्धे नवमोऽध्यायः ।। ९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ९ ।।