महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 2049)
एकोनषष्टितमोऽध्यायः
धृष्टद्युम्न और कर्णका युद्ध, अश्वत्थामाका धृष्टद्युम्नपर आक्रमण तथा अर्जुनके द्वारा धृष्टद्युम्नकी रक्षा और अश्वत्थामाकी पराजय
संजय उवाच
ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुसृञ्जयाः ।
युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं—राजन्! तदनन्तर पुनः कौरव और सृंजय योद्धा निर्भय होकर एक-दूसरेसे भिड़ गये। एक ओर युधिष्ठिर आदि पाण्डवदलके लोग थे और दूसरी ओर कर्ण आदि हमलोग ॥ १ ॥
ततः प्रवृत्ते भीमः संग्रामो लोमहर्षणः ।
कर्णस्य पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ २ ॥
उस समय कर्ण और पाण्डवोंका बड़ा भयंकर और रोमांचकारी संग्राम आरम्भ हुआ, जो यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाला था ॥ २ ॥
तस्मिन् प्रवृत्ते संग्रामे तुमुले शोणितोदके ।
संशप्तकेषु शूरेषु किंचिच्छिष्टेषु भारत ॥ ३ ॥
धृष्टद्युम्नो महाराज सहितः सर्वराजभिः ।
कर्णमेवाभिदुद्राव पाण्डवाश्च महारथाः ॥ ४ ॥
भारत! जहाँ खून पानीके समान बहाया जाता था, उस भयंकर संग्रामके छिड़ जानेपर तथा थोड़े-से ही संशप्तक वीरोंके शेष रह जानेपर समस्त राजाओं-सहित धृष्टद्युम्नने कर्णपर ही आक्रमण किया। महाराज! अन्य पाण्डव महारथियोंने भी उन्हींका साथ दिया ॥ ३-४ ॥
आगच्छमानांस्तान् संख्ये प्रहृष्टान् विजयैषिणः ।
दधारैको रणे कर्णो जलौघानिव पर्वतः ॥ ५ ॥
युद्धस्थलमें विजयकी अभिलाषा लेकर हर्ष और उल्लासके साथ आते हुए उन वीरोंको रणभूमिमें अकेले कर्णने उसी प्रकार रोक दिया, जैसे जलके प्रवाहोंको पर्वत रोक देता है ॥ ५ ॥
समासाद्य तु ते कर्णं व्यशीर्यन्त महारथाः ।
यथाचलं समासाद्य वार्योघाः सर्वतोदिशम् ॥ ६ ॥
कर्णके पास पहुँचकर वे सब महारथी बिखर गये, ठीक वैसे ही जैसे जलके प्रवाह किसी पर्वतके पास पहुँचकर सम्पूर्ण दिशाओंमें फैल जाते हैं ।। ६ ।।
तयोरासीन्महाराज संग्रामो लोमहर्षणः ।
धृष्टद्युम्नस्तु राधेयं शरेणानतपर्वणा ।। ७ ।।
ताडयामास समरे तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ।
महाराज! उस समय उन दोनोंमें रोमांचकारी युद्ध होने लगा। धृष्टद्युम्नने समरांगणमें झुकी हुई गाँठवाले बाणसे राधापुत्र कर्णको चोट पहुँचायी और कहा—'खड़ा रह, खड़ा रह' ।। ७ १/२ ।।
विजयं च धनुः श्रेष्ठं विधुन्वानो महारथः ।। ८ ।।
पार्षतस्य धनुश्छित्त्वा शरांश्चाशीविषोपमान् ।
ताडयामास संक्रुद्धः पार्षतं नवभिः शरैः ।। ९ ।।
तब महारथी कर्णने अपने विजय नामक श्रेष्ठ धनुषको कम्पित करके धृष्टद्युम्नके धनुष और विषधर सर्पके समान विषैले बाणोंको भी काट डाला। फिर क्रोधमें भरकर नौ बाणोंसे धृष्टद्युम्नको भी घायल कर दिया ।। ८-९ ।।
ते वर्म हेमविकृतं भित्त्वा तस्य महात्मनः ।
शोणिताक्ता व्यराजन्त शक्रगोपा इवानघ ।। १० ।।
निष्पाप नरेश! वे बाण महामना धृष्टद्युम्नके सुवर्णनिर्मित कवचको छेदकर उनके रक्तसे रंजित हो इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीड़ोंके समान सुशोभित होने लगे ।। १० ।।
तदपास्य धनुश्छिन्नं धृष्टद्युम्नो महारथः ।
अथान्यद् धनुरादाय शरांश्चाशीविषोपमान् ।। ११ ।।
कर्णं विव्याध सप्तत्या शरैः संनतपर्वभिः ।
महारथी धृष्टद्युम्नने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष और विषधर सर्पके समान विषैले बाण हाथमें लेकर झुकी हुई गाँठवाले सत्तर बाणोंसे कर्णको बींध डाला ।। ११ १/२ ।।
तथैव राजन् कर्णोऽपि पार्षतं शत्रुतापनम् ।। १२ ।।
छादयामास समरे शरैराशीविषोपमैः ।
द्रोणशत्रुर्महेष्वासो विव्याध निशितैः शरैः ।। १३ ।।
राजन्! इसी प्रकार कर्णने भी समरांगणमें विषधर सर्पोंके समान विषैले बाणोंद्वारा शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नको आच्छादित कर दिया। फिर द्रोणशत्रु महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने भी कर्णको पैने बाणोंसे घायल कर दिया ।। १२-१३ ।।
तस्य कर्णो महाराज शरं कनकभूषणम् ।
प्रेषयामास संक्रुद्धो मृत्युदण्डमिवापरम् ।। १४ ।।
महाराज! तब कर्णने अत्यन्त कुपित हो धृष्टद्युम्नपर द्वितीय मृत्युदण्डके समान एक सुवर्ण-भूषित बाण चलाया ॥ १४ ॥
तमापतन्तं सहसा घोररूपं विशाम्पते ।
चिच्छेद शतधा राजञ्शैनैयः कृतहस्तवत् ॥ १५ ॥
प्रजानाथ! नरेश! सहसा आते हुए उस भयंकर बाणके सात्यकिने सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति सौ टुकड़े कर डाले ॥ १५ ॥
दृष्ट्वा विनिहतं बाणं शरैः कर्णो विशाम्पते ।
सात्यकिं शरवर्षेण समन्तात् पर्यवारयत् ॥ १६ ॥
प्रजापालक नरेश! सात्यकिके बाणोंसे अपने बाणको नष्ट हुआ देख कर्णने चारों ओरसे बाण बरसाकर सात्यकिको ढक दिया ॥ १६ ॥
विव्याध चैनं समरे नाराचैस्तत्र सप्तभिः ।
तं प्रत्यविध्यच्छैनैयः शरैर्हेमपरिष्कृतैः ॥ १७ ॥
साथ ही समरांगणमें सात नाराचोंद्वारा उन्हें घायल कर दिया। तब सात्यकिने भी सुवर्णभूषित बाणोंसे कर्णको घायल करके बदला चुकाया ॥ १७ ॥
ततो युद्धं महाराज चक्षुःश्रोत्रभयानकम् ।
आसीद् घोरं च चित्रं च प्रेक्षणीयं समन्ततः ॥ १८ ॥
महाराज! तब नेत्रोंसे देखने और कानोंसे सुननेपर भी भय उत्पन्न करनेवाला घोर एवं विचित्र युद्ध छिड़ गया, जो सब ओरसे देखने ही योग्य था ॥ १८ ॥
सर्वेषां तत्र भूतानां लोमहर्षोऽभ्यजायत ।
तद् दृष्ट्वा समरे कर्म कर्णशैनैययोर्नृप ॥ १९ ॥
नरेश्वर! समरभूमिमें कर्ण और सात्यकिका वह कर्म देखकर समस्त प्राणियोंके रोंगटे खड़े हो गये ॥ १९ ॥
एतस्मिन्नन्तरे द्रौणिरभ्ययात् सुमहाबलम् ।
पार्षतं शत्रुदमनं शत्रुवीर्यासुनाशनम् ॥ २० ॥
इसी समय शत्रुओंके बल और प्राणोंका नाश करनेवाले शत्रुसूदन महाबली धृष्टद्युम्नके पास द्रोणकुमार अश्वत्थामा आ पहुँचा ॥ २० ॥
अभ्यभाषत संक्रुद्धो द्रौणिः परपुरंजयः ।
तिष्ठ तिष्ठाद्य ब्रह्मघ्न न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ २१ ॥
शत्रुओंकी राजधानीपर विजय पानेवाला द्रोणपुत्र अश्वत्थामा वहाँ पहुँचते ही अत्यन्त कुपित होकर बोला—‘ब्रह्महत्या करनेवाले पापी! खड़ा रह, खड़ा रह, आज तू मेरे हाथसे जीवित नहीं छूट सकेगा’ ॥ २१ ॥
इत्युक्त्वा सुभृशं वीरं शीघ्रकृन्निशितैः शरैः ।
पार्षतं छादयामास घोररूपैः सुतेजनैः ॥ २२ ॥
यतमानं परं शक्त्या यतमानो महारथः ।
ऐसा कहकर शीघ्रता करनेवाले प्रयत्नशील महारथी अश्वत्थामाने अत्यन्त तेज, घोर एवं पैने बाणोंद्वारा यथाशक्ति विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले वीर धृष्टद्युम्नको ढक दिया ।। २२ १/२ ।।
यथा हि समरे द्रोणः पार्षतं वीक्ष्य मारिष ।। २३ ।।
तथा द्रौणिं रणे दृष्ट्वा पार्षतः परवीरहा ।
नातिहृष्टमना भूत्वा मन्यते मृत्युमात्मनः ।। २४ ।।
आर्य! जैसे द्रोणाचार्य समरभूमिमें धृष्टद्युम्नको देखकर मन-ही-मन खिन्न हो उसे अपनी मृत्यु मानते थे, उसी प्रकार शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले धृष्टद्युम्न भी रणक्षेत्रमें अश्वत्थामाको देखकर अप्रसन्न हो उसे अपनी मृत्यु समझते थे ।। २३-२४ ।।
स ज्ञात्वा समरेऽऽत्मानं शस्त्रेणावध्यमेव तु ।
जवेनाभ्याययौ द्रौणिं कालः कालमिव क्षये ।। २५ ।।
वे अपने-आपको समरभूमिमें शस्त्रद्वारा अवध्य मानकर बड़े वेगसे अश्वत्थामाके सामने आये, मानो प्रलयके समय काल ही कालपर टूट पड़ा हो ।। २५ ।।
द्रौणिस्तु दृष्ट्वा राजेन्द्र धृष्टद्युम्नमवस्थितम् ।
क्रोधेन निःश्वसन् वीरः पार्षतं समुपाद्रवत् ।। २६ ।।
राजेन्द्र! वीर अश्वत्थामाने द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्नको सामने खड़ा देख क्रोधसे लंबी साँस खींचते हुए उनपर आक्रमण किया ।। २६ ।।
तावन्योन्यं तु दृष्ट्वैव संरम्भं जग्मतुः परम् ।
अथाब्रवीन्महाराज द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।। २७ ।।
धृष्टद्युम्नं समीपस्थं त्वरमाणो विशाम्पते ।
महाराज! वे दोनों एक-दूसरेको देखते ही अत्यन्त क्रोधमें भर गये। प्रजानाथ! फिर प्रतापी द्रोणपुत्रने बड़ी उतावलीके साथ अपने पास ही खड़े हुए धृष्टद्युम्नसे कहा— ।। २७ १/२ ।।
पाञ्चालापसदाद्य त्वां प्रेषयिष्यामि मृत्यवे ।। २८ ।।
पापं हि यत् त्वया कर्म घ्नता द्रोणं पुरा कृतम् ।
अद्य त्वां तप्स्यते तद् वै यथा न कुशलं तथा ।। २९ ।।
'पांचालकुलकलंक! आज मैं तुझे मौतके मुँहमें भेज दूँगा। तुमने पूर्वकालमें द्रोणाचार्यका वध करके जो पापकर्म किया है, वह एक अमंगलकारी कर्मकी भाँति आज तुझे संताप देगा ।। २८-२९ ।।
अरक्ष्यमाणः पार्थेन यदि तिष्ठसि संयुगे ।
नापक्रामसि वा मूढ सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ।। ३० ।।
‘ओ मूर्ख! यदि तू अर्जुनसे अरक्षित रहकर युद्धभूमिमें खड़ा रहेगा, भाग नहीं जायगा तो अवश्य तुझे मार डालूँगा, यह मैं तुझसे सत्य कहता हूँ’ ॥ ३० ॥
एवमुक्तः प्रत्युवाच धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ।
प्रतिवाक्यं स एवासिर्मामको दास्यते तव ॥ ३१ ॥
येनैव ते पितुर्दत्तं यतमानस्य संयुगे ।
अश्वत्थामाके ऐसा कहनेपर प्रतापी धृष्टद्युम्नने उससे इस प्रकार उत्तर दिया—‘अरे! तेरी इस बातका जवाब तुझे मेरी वही तलवार देगी, जिसने युद्धस्थलमें विजयके लिये प्रयत्न करनेवाले तेरे पिताको दिया था ॥ ३१ १/२ ॥
यदि तावन्मया द्रोणो निहतो ब्राह्मणब्रुवः ॥ ३२ ॥
त्वामिदानीं कथं युद्धे न हनिष्यामि विक्रमात् ।
‘यदि मैंने नाममात्रके ब्राह्मण द्रोणाचार्यको पहले मार डाला था, तो इस समय पराक्रम करके तुझे भी मैं कैसे नहीं मार डालूँगा’ ॥ ३२ १/२ ॥
एवमुक्त्वा महाराज सेनापतिरमर्षणः ॥ ३३ ॥
निशितेनातिबाणेन द्रौणिं विव्याध पार्षतः ।
महाराज! ऐसा कहकर अमर्षशील सेनापति द्रुपदकुमारने अत्यन्त तीखे बाणसे द्रोणपुत्रको बींध डाला ॥ ३३ १/२ ॥
ततो द्रौणिः सुसंक्रुद्धः शरैः संनतपर्वभिः ॥ ३४ ॥
आच्छादयद् दिशो राजन् धृष्टद्युम्नस्य संयुगे ।
इससे अश्वत्थामाका क्रोध बहुत बढ़ गया। राजन्! उसने झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे युद्धस्थलमें धृष्टद्युम्नकी सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित कर दिया ॥ ३४ १/२ ॥
नैवान्तरिक्षं न दिशो नापि योधाः समन्ततः ॥ ३५ ॥
दृश्यन्ते वै महाराज शरैश्छन्नाः सहस्रशः ।
महाराज! उस समय सब ओरसे बाणोंद्वारा आच्छादित होनेके कारण न तो आकाश दिखायी देता था, न दिशाएँ दीखती थीं और न सहस्रों योद्धा ही दृष्टिगोचर होते थे ॥ ३५ १/२ ॥
तथैव पार्षतो राजन् द्रौणिमाहवशोभिनम् ॥ ३६ ॥
शरैः संछादयामास सूतपुत्रस्य पश्यतः ।
राजन्! उसी प्रकार युद्धमें शोभा पानेवाले अश्वत्थामाको धृष्टद्युम्नने भी कर्णके देखते-देखते बाणोंसे ढक दिया ॥ ३६ १/२ ॥
राधेयोऽपि महाराज पञ्चालान् सह पाण्डवैः ॥ ३७ ॥
द्रौपदेयान् युधामन्युं सात्यकिं च महारथम् ।
एकः संवारयामास प्रेक्षणीयः समन्ततः ॥ ३८ ॥
महाराज! सब ओरसे दर्शनीय राधापुत्र कर्णने भी पाण्डवोंसहित पांचालों, द्रौपदीके पाँचों पुत्रों, युधामन्यु और महारथी सात्यकिको अकेले ही आगे बढ़नेसे रोक दिया था ॥ ३७-३८ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु समरे द्रौणेश्चिच्छेद कार्मुकम् ।
तदपास्य धनुर्द्रौणिरन्यदादाय कार्मुकम् ॥ ३९ ॥
वेगवान् समरे घोरे शरांश्चाशीविषोपमान् ।
स पार्षतस्य राजेन्द्र धनुः शक्तिं गदां ध्वजम् ॥ ४० ॥
हयान् सूतं रथं चैव निमेषाद् व्यधमच्छरैः ।
धृष्टद्युम्नने समरांगणमें अश्वत्थामाके धनुषको काट डाला। राजेन्द्र! तब वेगवान् अश्वत्थामाने उस कटे हुए धनुषको फेंककर दूसरा धनुष और विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाण हाथमें लेकर उनके द्वारा पलक मारते-मारते धृष्टद्युम्नके धनुष, शक्ति, गदा, ध्वज, अश्व, सारथि एवं रथको तहस-नहस कर दिया ॥ ३९-४० १/२ ॥
स च्छिन्नधन्वा विरथो हताश्वो हतसारथिः ॥ ४१ ॥
खड्गमादत्त विपुलं शतचन्द्रं च भानुमत् ।
धनुष कट जाने और घोड़ों तथा सारथिके मारे जानेपर रथहीन हुए धृष्टद्युम्नने विशाल खड्ग और सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकती हुई ढाल हाथमें ले ली ॥ ४१ १/२ ॥
द्रौणिस्तदपि राजेन्द्र भल्लैः क्षिप्रं महारथः ॥ ४२ ॥
चिच्छेद समरे वीरः क्षिप्रहस्तो दृढायुधः ।
रथादनवरूढस्य तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४३ ॥
राजेन्द्र! शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले सुदृढ़ आयुधधारी वीर महारथी अश्वत्थामाने समरांगणमें अनेक भल्लोंद्वारा रथसे उतरनेके पहले ही धृष्टद्युम्नकी उस ढाल-तलवारको भी काट दिया। यह एक अद्भुत-सी बात हुई ॥ ४२-४३ ॥
धृष्टद्युम्नं हि विरथं हताश्वं छिन्नकार्मुकम् ।
शरैश्च बहुधा विद्धमस्त्रैश्च शकलीकृतम् ॥ ४४ ॥
नाशकद् भरतश्रेष्ठ यतमानो महारथः ।
भरतश्रेष्ठ! यद्यपि धृष्टद्युम्न रथहीन हो गये थे, उनके घोड़े मारे जा चुके थे, धनुष कट गया था तथा वे बाणोंसे बारंबार घायल और अस्त्र-शस्त्रोंसे जर्जर हो गये थे तो भी महारथी अश्वत्थामा लाख प्रयत्न करनेपर भी उन्हें मार न सका ॥ ४४ १/२ ॥
तस्यान्तमिषुभी राजन् यदा द्रौणिर्न जग्मिवान् ॥ ४५ ॥
अथ त्यक्त्वा धनुर्वीरः पार्षतं त्वरितोऽन्वगात् ।
राजन्! जब वीर द्रोणकुमार बाणोंद्वारा उनका वध न कर सका, तब वह धनुष फेंककर तुरंत ही धृष्टद्युम्नकी ओर दौड़ा ॥ ४५ १/२ ॥
आसीदाप्लवतो वेगस्तस्य राजन् महात्मनः ॥ ४६ ॥
गरुडस्येव पततो जिघृक्षोः पन्नगोत्तमम् ।
नरेश्वर! रथसे उछलकर दौड़ते हुए महामना अश्वत्थामाका वेग बहुत बड़े सर्पको पकड़नेके लिये झपटे हुए गरुड़के समान प्रतीत हुआ ॥ ४६ १/२ ॥
एतस्मिन्नेव काले तु माधवोऽर्जुनमब्रवीत् ॥ ४७ ॥
पश्य पार्थ यथा द्रौणिः पार्षतस्य वधं प्रति ।
यत्नं करोति विपुलं हन्याच्चैनं न संशयः ॥ ४८ ॥
इसी समय श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा—‘पार्थ! वह देखो, द्रोणकुमार अश्वत्थामा धृष्टद्युम्नके वधके लिये कैसा महान् प्रयत्न कर रहा है? वह इन्हें मार सकता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४७-४८ ॥
तं मोचय महाबाहो पार्षतं शत्रुकर्शन ।
द्रौणेरास्यमनुप्राप्तं मृत्योरास्यगतं यथा ॥ ४९ ॥
'महाबाहो! शत्रुसूदन! जैसे कोई मौतके मुखमें पड़ गया हो, उसी प्रकार अश्वत्थामाके मुखमें पहुँचे हुए धृष्टद्युम्नको छुड़ाओ' ॥ ४९ ॥
एवमुक्त्वा महाराज वासुदेवः प्रतापवान् ।
प्रैषयत् तुरगांस्तत्र यत्र द्रौणिर्व्यवस्थितः ॥ ५० ॥
महाराज! ऐसा कहकर प्रतापी वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने अपने घोड़ोंको उसी ओर हाँका जहाँ द्रोणकुमार अश्वत्थामा खड़ा था ॥ ५० ॥
ते हयाश्चन्द्रसंकाशाः केशवेन प्रचोदिताः ।
आपिबन्त इव व्योम जग्मुर्द्रोणिरथं प्रति ॥ ५१ ॥
भगवान् श्रीकृष्णके द्वारा हाँके गये वे चन्द्रमाके समान श्वेत रंगवाले घोड़े अश्वत्थामाके रथकी ओर इस प्रकार दौड़े, मानो आकाशको पीते जा रहे हों ॥ ५१ ॥
दृष्ट्वाऽऽयातौ महावीर्यावुभौ कृष्णधनंजयौ ।
धृष्टद्युम्नवधे यत्नं चक्रे राजन् महाबलः ॥ ५२ ॥
राजन्! महापराक्रमी श्रीकृष्ण और अर्जुन दोनोंको आते देख महाबली अश्वत्थामा धृष्टद्युम्नके वधके लिये विशेष प्रयत्न करने लगा ॥ ५२ ॥
विकृष्यमाणं दृष्ट्वैव धृष्टद्युम्नं नरेश्वर ।
शरांश्चिक्षेप वै पार्थो द्रौणिं प्रति महाबलः ॥ ५३ ॥
नरेश्वर! धृष्टद्युम्नको खींचे जाते देख महाबली अर्जुनने अश्वत्थामापर बहुत-से बाण चलाये ॥ ५३ ॥
ते शरा हेमविकृता गाण्डीवप्रेषिता भृशम् ।
द्रौणिमासाद्य विविशुर्वल्मीकमिव पन्नगाः ॥ ५४ ॥
गाण्डीव धनुषसे वेगपूर्वक छूटे हुए वे सुवर्ण-निर्मित बाण अश्वत्थामाके पास पहुँचकर उसके शरीरमें उसी प्रकार घुस गये, जैसे सर्प बाँबीमें प्रवेश करते हैं ॥ ५४ ॥
स विद्धस्तैः शरैर्घोरैर्द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ।
उत्सृज्य समरे राजन् पाञ्चाल्यममितौजसम् ॥ ५५ ॥
रथमारुरुहे वीरो धनंजयशरार्दितः ।
प्रगृह्य च धनुः श्रेष्ठं पार्थं विव्याध सायकैः ॥ ५६ ॥
राजन्! उन भयंकर बाणोंसे घायल हुआ प्रतापी वीर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा समरांगणमें अमित बलशाली धृष्टद्युम्नको छोड़कर अपने रथपर जा चढ़ा। वह धनंजयके बाणोंसे अत्यन्त पीड़ित हो चुका था; इसलिये उसने भी श्रेष्ठ धनुष हाथमें लेकर बाणोंद्वारा अर्जुनको घायल कर दिया ॥ ५५-५६ ॥
एतस्मिन्नन्तरे वीरः सहदेवो जनाधिप ।
अपोवाह रथेनाजौ पार्षतं शत्रुतापनम् ॥ ५७ ॥
नरेश्वर! इसी बीचमें वीर सहदेव शत्रुओंको संताप देनेवाले धृष्टद्युम्नको अपने रथके द्वारा रणभूमिमें अन्यत्र हटा ले गये ॥ ५७ ॥
अर्जुनोऽपि महाराज द्रौणिं विव्याध पत्रिभिः ।
तं द्रोणपुत्रः संक्रुद्धो बाह्वोरुरसि चार्पयत् ॥ ५८ ॥
महाराज! अर्जुनने भी अपने बाणोंसे अश्वत्थामाको घायल कर दिया। तब द्रोणपुत्रने अत्यन्त कुपित हो अर्जुनकी छाती और दोनों भुजाओंमें प्रहार किया ॥ ५८ ॥
क्रोधितस्तु रणे पार्थो नाराचं कालसम्मितम् ।
द्रोणपुत्राय चिक्षेप कालदण्डमिवापरम् ॥ ५९ ॥
रणमें कुपित हुए कुन्तीकुमारने द्रोणपुत्रपर द्वितीय कालदण्डके समान साक्षात् कालस्वरूप नाराच चलाया ॥ ५९ ॥
ब्राह्मणस्यांसदेशे स निपपात महाद्युतिः ।
स विह्वलो महाराज शरवेगेन संयुगे ॥ ६० ॥
निषसाद रथोपस्थे वैक्लव्यं च परं ययौ ।
महाराज! वह महातेजस्वी नाराच उस ब्राह्मणके कंधेपर जा लगा। अश्वत्थामा युद्धस्थलमें उस बाणके वेगसे व्याकुल हो रथकी बैठकमें धम्मसे बैठ गया और अत्यन्त मूर्च्छित हो गया ॥ ६० १/२ ॥
ततः कर्णो महाराज व्याक्षिपद् विजयं धनुः ॥ ६१ ॥
अर्जुनं समरे क्रुद्धः प्रेक्षमाणो मुहुर्मुहुः ।
द्वैरथं चापि पार्थेन कामयानो महारणे ॥ ६२ ॥
राजराजेश्वर! तत्पश्चात् कर्णने समरांगणमें कुपित हो अर्जुनकी ओर बारंबार देखते हुए विजय नामक धनुषकी टंकार की। वह महासमरमें अर्जुनके साथ द्वैरथ युद्धकी अभिलाषा करता था ॥ ६१-६२ ॥
विह्वलं तं तु वीक्ष्याथ द्रोणपुत्रं च सारथिः ।
अपोवाह रथेनाजौ त्वरमाणो रणाजिरात् ॥ ६३ ॥
द्रोणकुमारको विह्वल देखकर उसका सारथि बड़ी उतावलीके साथ उसे रथके द्वारा समरांगणसे दूर हटा ले गया ॥ ६३ ॥
अथोत्कृष्टं महाराज पञ्चालैर्जितकाशिभिः ।
मोक्षितं पार्षदं दृष्ट्वा द्रोणपुत्रं च पीडितम् ॥ ६४ ॥
महाराज! धृष्टद्युम्नको संकटसे मुक्त और द्रोणपुत्रको पीड़ित देख विजयसे उल्लसित होनेवाले पांचालोंने बड़े जोरसे गर्जना की ॥ ६४ ॥
वादित्राणि च दिव्यानि प्रावाद्यन्त सहस्रशः ।
सिंहनादांश्च चक्रुस्ते दृष्ट्वा संख्ये तदद्भुतम् ॥ ६५ ॥
उस समय सहस्रों दिव्य वाद्य बजने लगे। वे पांचाल-सैनिक युद्धस्थलमें वह अद्भुत कार्य देखकर सिंहनाद करने लगे ।। ६५ ।।
एवं कृत्वाब्रवीत् पार्थो वासुदेवं धनंजयः ।
याहि संशप्तकान् कृष्ण कार्यमेतत् परं मम ।। ६६ ।।
ऐसा पराक्रम करके कुन्तीपुत्र धनंजयने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—'श्रीकृष्ण! अब संशप्तकोंकी ओर चलिये। इस समय यही मेरा सबसे प्रधान कार्य है' ।। ६६ ।।
ततः प्रयातो दाशार्हः श्रुत्वा पाण्डवभाषितम् ।
रथेनातिपताकेन मनोमारुतरंहसा ।। ६७ ।।
श्रीकृष्ण अर्जुनका वह कथन सुनकर मन और वायुके समान वेगशाली तथा अत्यन्त ऊँची पताकावाले रथके द्वारा वहाँसे चल दिये ।। ६७ ।।
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि द्रौण्यपयाने एकोनषष्टितमोऽध्यायः ।। ५९ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें अश्वत्थामाका पलायनविषयक उनसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ५९ ।।