महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1943)
अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः
कर्णके द्वारा बहुत-से योद्धाओंसहित पाण्डव-सेनाका संहार, भीमसेनके द्वारा कर्णपुत्र भानुसेनका वध, नकुल और सात्यकिके साथ वृषसेनका युद्ध तथा कर्णका राजा युधिष्ठिरपर आक्रमण
धृतराष्ट्र उवाच
यत्तत् प्रविश्य पार्थानां सैन्यं कुर्वञ्जनक्षयम् ।
कर्णो राजानमभ्येत्य तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ १ ॥
**धृतराष्ट्रने पूछा—**संजय! कर्ण कुन्तीपुत्रोंकी सेनामें प्रवेश करके राजा युधिष्ठिरके पास पहुँचकर जो जनसंहार कर रहा था, उसका समाचार मुझे सुनाओ ॥ १ ॥
के च प्रवीराः पार्थानां युधि कर्णमवारयन् ।
कांश्च प्रमथ्याधिरथिर्युधिष्ठिरमपीडयत् ॥ २ ॥
उस समय पाण्डवपक्षके किन-किन प्रमुख वीरोंने युद्धस्थलमें कर्णको आगे बढ़नेसे रोका और किन-किनको रौंदकर सूतपुत्र कर्णने युधिष्ठिरको पीड़ित किया ॥ २ ॥
संजय उवाच
धृष्टद्युम्नमुखान् पार्थान् दृष्ट्वा कर्णो व्यवस्थितान् ।
समभ्यधावत्त्वरितः पञ्चालान् शत्रुकर्षणः ॥ ३ ॥
**संजयने कहा—**राजन्! कर्णने धृष्टद्युम्न आदि पाण्डववीरोंको खड़ा देख बड़ी उतावलीके साथ शत्रुसंहारकारी पांचालोंपर धावा किया ॥ ३ ॥
तं तूर्णमभिधावन्तं पञ्चाला जितकाशिनः ।
प्रत्युद्ययुर्महात्मानं हंसा इव महार्णवम् ॥ ४ ॥
विजयसे उल्लसित होनेवाले पांचाल वीर शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करते हुए महामना कर्णकी अगवानीके लिये उसी प्रकार आगे बढ़े, जैसे हंस महासागरकी ओर बढ़ते हैं ॥ ४ ॥
ततः शङ्खसहस्राणां निःस्वनो हृदयङ्गमः ।
प्रादुरासीदुभयतो भेरीशब्दश्च दारुणः ॥ ५ ॥
तदनन्तर दोनों सेनाओंमें सहसा सहस्रों शंखोंकी ध्वनि प्रकट हुई, जो हृदयको कम्पित कर देती थी। साथ ही भयंकर भेरीनाद भी होने लगा ॥ ५ ॥
नानाबाणनिपाताश्च द्विपाश्वरथनिःस्वनः ।
सिंहनादश्च वीराणामभवद् दारुणस्तदा ॥ ६ ॥
उस समय नाना प्रकारके बाणोंके गिरने, हाथियोंके चिग्घाड़ने, घोड़ोंके हींसने, रथके घरघराने तथा वीरोंके सिंहनाद करनेका दारुण शब्द वहाँ गूँज उठा ॥ ६ ॥
साद्रिद्रुमार्णवा भूमिः सवाताम्बुदमम्बरम् ।
सार्केन्दुग्रहनक्षत्रा द्यौश्च व्यक्तं विघूर्णिता ॥ ७ ॥
पर्वत, वृक्ष और समुद्रोंसहित पृथ्वी, वायु तथा मेघोंसहित आकाश एवं सूर्य, चन्द्रमा, ग्रह और नक्षत्रोंसहित स्वर्ग स्पष्ट ही घूमते-से जान पड़े ॥ ७ ॥
इति भूतानि तं शब्दं मेनिरे ते च विव्यथुः ।
यानि चाप्यल्पसत्त्वानि प्रायस्तानि मृतानि च ॥ ८ ॥
इस प्रकार समस्त प्राणियोंने उस तुमुल नादको सुना और सब-के-सब व्यथित हो उठे। उनमें जो दुर्बल प्राणी थे, वे प्रायः मर गये ॥ ८ ॥
अथ कर्णो भृशं क्रुद्धः शीघ्रमस्त्रमुदीरयन् ।
जघान पाण्डवीं सेनामासुरीं मघवानिव ॥ ९ ॥
तत्पश्चात् जैसे इन्द्र असुरोंकी सेनाका विनाश करते हैं, उसी प्रकार अत्यन्त क्रोधमें भरे हुए कर्णने शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलाकर पाण्डव-सेनाका संहार आरम्भ किया ॥ ९ ॥
स पाण्डवबलं कर्णः प्रविश्य विसृजञ्छरान् ।
प्रभद्रकाणां प्रवरानहनत् सप्तसप्ततिम् ॥ १० ॥
पाण्डवोंकी सेनामें प्रवेश करके बाणोंकी वर्षा करते हुए कर्णने प्रभद्रकोंके सतहत्तर प्रमुख वीरोंको मार डाला ॥ १० ॥
ततः सुपुङ्खैर्निशितै रथश्रेष्ठो रथेष्षुभिः ।
अवधीत् पञ्चविंशत्या पञ्चालान् पञ्चविंशतिम् ॥ ११ ॥
तदनन्तर रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णने सुन्दर पंखवाले पचीस पैने बाणोंद्वारा पचीस पांचालोंको कालके गालमें भेज दिया ॥ ११ ॥
सुवर्णपुङ्खैर्नाराचैः परकायविदारणैः ।
चेदिकानवधीद् वीरः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ १२ ॥
वीर कर्णने शत्रुओंके शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले सुवर्णमय पंखयुक्त नाराचोंद्वारा सैकड़ों और हजारों चेदिदेशीय वीरोंका वध कर डाला ॥ १२ ॥
तं तथा समरे कर्म कुर्वाणमतिमानुषम् ।
परिवव्रुर्महाराज पञ्चालानां रथव्रजाः ॥ १३ ॥
महाराज! इस प्रकार समरांगणमें अलौकिक कर्म करनेवाले कर्णको पांचाल रथियोंने चारों ओरसे घेर लिया ॥
ततः संधाय विशिखान् पञ्च भारत दुःसहान् ।
पञ्चालानवधीत् पञ्च कर्णो वैकर्तनो वृषः ॥ १४ ॥
भानुदेवं चित्रसेनं सेनाविन्दुं च भारत ।
तपनं शूरसेनं च पञ्चालानहनद् रणे ॥ १५ ॥
भारत! तब उस रणक्षेत्रमें धर्मात्मा वैकर्तन कर्णने पाँच दुःसह बाणोंका संधान करके भानुदेव, चित्रसेन, सेनाविन्दु, तपन तथा शूरसेन—इन पाँच पांचाल वीरोंका संहार कर दिया ॥ १४-१५ ॥
पञ्चालेषु च शूरेषु वध्यमानेषु सायकैः ।
हाहाकारो महानासीत् पञ्चालानां महाहवे ॥ १६ ॥
उस महासमरमें बाणोंद्वारा उन शूरवीर पांचालोंके मारे जानेपर पांचालोंकी सेनामें महान् हाहाकार मच गया ॥ १६ ॥
परिवव्रुर्महाराज पञ्चालानां रथा दश ।
पुनरेव च तान् कर्णो जघानाशु पतत्रिभिः ॥ १७ ॥
महाराज! फिर दस पांचाल महारथियोंने आकर कर्णको घेर लिया, परंतु कर्णने अपने बाणोंद्वारा पुनः उन सबको तत्काल मार डाला ॥ १७ ॥
चक्ररक्षौ तु कर्णस्य पुत्रौ मारिष दुर्जयौ ।
सुषेणः सत्यसेनश्च त्यक्त्वा प्राणानयुध्यताम् ॥ १८ ॥
माननीय नरेश! कर्णके दो दुर्जय पुत्र सुषेण और चित्रसेन उसके पहियोंकी रक्षामें तत्पर हो प्राणोंका मोह छोड़कर युद्ध करते थे ॥ १८ ॥
पृष्ठगोप्ता तु कर्णस्य ज्येष्ठः ओ महारथः ।
वृषसेनः स्वयं कर्णं पृष्ठतः पर्यपालयत् ॥ १९ ॥
कर्णका ज्येष्ठ पुत्र महारथी वृषसेन पृष्ठरक्षक था। वह स्वयं ही कर्णके पृष्ठभागकी रक्षा कर रहा था ॥
धृष्टद्युम्नः सात्यकिश्च द्रौपदेया वृकोदरः ।
जनमेजयः शिखण्डी च प्रवीराश्च प्रभद्रकाः ॥ २० ॥
चेदिकेकयपाञ्चाला यमौ मत्स्याश्च दंशिताः ।
समभ्यधावन् राधेयं जिघांसन्तः प्रहारिणम् ॥ २१ ॥
उस समय प्रहार करनेवाले राधापुत्र कर्णको मार डालनेकी इच्छासे धृष्टद्युम्न, सात्यकि, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, भीमसेन, जनमेजय, शिखण्डी, प्रमुख प्रभद्रक वीर, चेदि, केकय और पांचाल देशके योद्धा, नकुल-सहदेव तथा मत्स्यदेशीय सैनिकोंने कवचसे सुसज्जित हो उसपर धावा बोल दिया ॥ २०-२१ ॥
त एनं विविधैः शस्त्रैः शरधाराभिरेव च ।
अभ्यवर्षन् विमर्दन्तं प्रावृषीवाम्बुदा गिरिम् ॥ २२ ॥
जैसे वर्षा-ऋतुमें बादल पर्वतपर जलकी धारा गिराते हैं, उसी प्रकार उन पाण्डववीरोंने अपनी सेनाका मर्दन करनेवाले कर्णपर नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रों और बाणधाराओंकी
वृष्टि की ।। २२ ।।
पितरं तु परीप्सन्तः कर्णपुत्राः प्रहारिणः ।
त्वदीयाश्चापरे राजन् वीरा वीरानवारयन् ।। २३ ।।
राजन! उस समय अपने पिताकी रक्षा चाहनेवाले प्रहारकुशल कर्णपुत्र तथा आपकी सेनाके दूसरे-दूसरे वीर पूर्वोक्त पाण्डववीरोंका निवारण करने लगे ।। २३ ।।
सुषेणो भीमसेनस्य छित्त्वा भल्लेन कार्मुकम् ।
नाराचैः सप्तभिर्विद्ध्वा हृदि भीमं ननाद ह ।। २४ ।।
सुषेणने एक भल्लसे भीमसेनके धनुषको काटकर उनकी छातीमें सात नाराचोंका प्रहार करके भयंकर गर्जना की ।। २४ ।।
अथान्यद् धनुरदाय सुदृढं भीमविक्रमः ।
सज्यं वृकोदरः कृत्वा सुषेणस्याच्छिनद् धनुः ।। २५ ।।
तदनन्तर भीषण पराक्रम प्रकट करनेवाले भीमसेनने दूसरा सुदृढ़ धनुष लेकर उसपर प्रत्यंचा चढ़ायी और सुषेणके धनुषको काट डाला ।। २५ ।।
विव्याध चैनं दशभिः क्रुद्धो नृत्यन्निवेषुभिः ।
कर्णं च तूर्णं विव्याध त्रिसप्तत्या शितैः शरैः ।। २६ ।।
साथ ही कुपित हो नृत्य-से करते हुए भीमने दस बाणोंद्वारा उसे घायल कर दिया और तिहत्तर पैने बाणोंसे तुरंत ही कर्णको भी पाट दिया ।। २६ ।।
भानुसेनं च दशभिः साश्वसूतायुधध्वजम् ।
पश्यतां सुहृदां मध्ये कर्णपुत्रमपातयत् ।। २७ ।।
इतना ही नहीं, उन्होंने हितैषी सुहृदोंके बीचमें उनके देखते-देखते कर्णके पुत्र भानुसेनको दस बाणोंसे घोड़े, सारथि, आयुध और ध्वजोंसहित मार गिराया ।। २७ ।।
क्षरप्रणुन्नं तत्तस्य शिरश्चन्द्रनिभाननम् ।
शुभदर्शनमेवासीन्नालभ्रष्टमिवाम्बुजम् ।। २८ ।।
भीमसेनके क्षुरसे कटा हुआ चन्द्रोपम मुखसे युक्त भानुसेनका वह मस्तक नालसे कटकर गिरे हुए कमलपुष्पके समान सुन्दर ही दिखायी दे रहा था ।। २८ ।।
हत्वा कर्णसुतं भीमस्तावकान् पुनरार्दयत् ।
कृपहार्दिक्ययोश्छित्त्वा चापौ तावप्यथार्दयत् ।। २९ ।।
कर्णके पुत्रका वध करके भीमसेनने पुनः आपके सैनिकोंका मर्दन आरम्भ किया। कृपाचार्य और कृतवर्माके धनुषोंको काटकर उन दोनोंको भी गहरी चोट पहुँचायी ।। २९ ।।
दुःशासनं त्रिभिर्विद्ध्वा शकुनिं षड्भिरायसैः ।
उलूकं च पतत्रिं च चकार विरथावुभौ ॥ ३० ॥
तीन बाणोंसे दुःशासनको और छः लोहेके बाणोंसे शकुनिको भी घायल करके उलूक और पतत्रि दोनों वीरोंको रथहीन कर दिया ॥ ३० ॥
सुषेणं च हतोऽसीति ब्रुवन्नादत्त सायकम् ।
तमस्य कर्णश्चिच्छेद त्रिभिश्चैनमताडयत् ॥ ३१ ॥
फिर सुषेणसे यह कहते हुए बाण हाथमें लिया कि 'अब तू मारा गया।' किंतु कर्णने भीमसेनके उस बाणको काट डाला और तीन बाणोंसे उन्हें भी घायल कर दिया ॥ ३१ ॥
अथान्यं परिजग्राह सुपर्वाणं सुतेजनम् ।
सुषेणायासृजद् भीमस्तमप्यस्याच्छिनद् वृषः ॥ ३२ ॥
तब भीमसेनने सुन्दर गाँठ और तेज धारवाले दूसरे बाणको हाथमें लिया और उसे सुषेणपर चला दिया; किंतु कर्णने उसको भी काट डाला ॥ ३२ ॥
पुनः कर्णस्त्रिसप्तत्या भीमसेनमथेषुभिः ।
पुत्रं परीप्सन् विव्याध क्रूरं क्रूरैर्जिघांसया ॥ ३३ ॥
फिर पुत्रके प्राण बचानेकी इच्छासे कर्णने क्रूर भीमसेनको मार डालनेकी अभिलाषा लेकर उनपर तिहत्तर बाणोंका प्रहार किया ।। ३३ ।।
सुषेणस्तु धनुर्गृह्य भारसाधनमुत्तमम् ।
नकुलं पञ्चभिर्बाणैर्बाह्वोरुरसि चार्पयत् ।। ३४ ।।
तब सुषेणने महान् भारको सह लेनेवाले श्रेष्ठ धनुषको हाथमें लेकर नकुलकी दोनों भुजाओं और छातीमें पाँच बाणोंका प्रहार किया ।। ३४ ।।
नकुलस्तं तु विंशत्या विद्ध्वा भारसहैर्दृढैः ।
ननाद बलवन्नादं कर्णस्य भयमादधत् ।। ३५ ।।
नकुलने भी भार सहन करनेमें समर्थ बीस सुदृढ़ बाणोंद्वारा सुषेणको घायल करके कर्णके मनमें भय उत्पन्न करते हुए बड़े जोरसे गर्जना की ।। ३५ ।।
तं सुषेणो महाराज विद्ध्वा दशभिराशुगैः ।
चिच्छेद च धनुः शीघ्रं क्षुरप्रेण महारथः ।। ३६ ।।
महाराज! महारथी सुषेणने दस बाणोंसे नकुलको चोट पहुँचाकर शीघ्र ही एक क्षुरप्रके द्वारा उनका धनुष काट दिया ।। ३६ ।।
अथान्यद् धनुरदाय नकुलः क्रोधमूर्च्छितः ।
सुषेणं नवभिर्बाणैर्वारयामास संयुगे ।। ३७ ।।
तब क्रोधसे अचेत-से होकर नकुलने दूसरा धनुष हाथमें लिया और सुषेणको नौ बाण मारकर उसे युद्धस्थलमें आगे बढ़नेसे रोक दिया ।। ३७ ।।
स तु बाणैर्दिशो राजन्नाच्छाद्य परवीरहा ।
आजघ्ने सारथिं चास्य सुषेणं च ततस्त्रिभिः ।। ३८ ।।
चिच्छेद चास्य सुदृढं धनुर्भल्लैस्त्रिभिस्त्रिधा ।
राजन्! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले नकुलने अपने बाणोंसे सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित करके फिर तीन बाणोंसे सुषेण और उसके सारथिको भी घायल कर दिया। साथ ही तीन भल्ल मारकर उसके सुदृढ़ धनुषके तीन टुकड़े कर डाले ।। ३८ १/२ ।।
अथान्यद् धनुरदाय सुषेणः क्रोधमूर्च्छितः ।। ३९ ।।
आविध्यन्नकुलं षष्ट्या सहदेवं च सप्तभिः ।
तब क्रोधसे मूर्च्छित हुए सुषेणने दूसरा धनुष लेकर नकुलको साठ और सहदेवको सात बाणोंसे घायल कर दिया ।। ३९ १/२ ।।
तद् युद्धं सुमहद् घोरमासीद् देवासुरोपमम् ।। ४० ।।
निघ्नतां सायकैस्तूर्णमन्योन्यस्य वधं प्रति ।
बाणोंद्वारा शीघ्रतापूर्वक एक-दूसरेके वधके लिये चोट करते हुए वीरोंका वह महान् युद्ध देवासुर-संग्रामके समान भयंकर जान पड़ता था ।। ४० १/२ ।।
(सात्यकिर्वृषसेनं तु विद्ध्वा सप्तभिरायसैः ।
पुनर्विव्याध सप्तत्या सारथिं च त्रिभिः शरैः ॥
सात्यकिने लोहेके बने हुए सात बाणोंसे वृषसेनको घायल करके फिर सत्तर बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचायी। साथ ही तीन बाणोंसे उसके सारथिको भी बींध डाला।
वृषसेनस्तु शैनेयं शरेणानतपर्वणा ।
आजघान महाराज शङ्खदेशे महारथम् ॥
महाराज! वृषसेनने झुकी हुई गाँठवाले बाणसे महारथी सात्यकिके कपालमें आघात किया।
शैनेयो वृषसेनेन पत्रिणा परिपीडितः ।
कोपं चक्रे महाराज क्रुद्धो वेगं च दारुणम् ॥
जग्राहेषुवरान् वीरः शीघ्रं वै दश पञ्च च ।)
महाराज! वृषसेनके उस बाणसे अत्यन्त पीड़ित होनेपर वीर सात्यकिको बड़ा क्रोध हुआ। क्रुद्ध होनेपर उन्होंने भयंकर वेग प्रकट किया और शीघ्र ही पंद्रह श्रेष्ठ बाण हाथमें ले लिये।
सात्यकिर्वृषसेनस्य सूतं हत्वा त्रिभिः शरैः ॥ ४१ ॥
धनुश्चिच्छेद भल्लेन जघानाश्वांश्च सप्तभिः ।
ध्वजमेकेषुणोन्मथ्य त्रिभिस्तं हृद्यताडयत् ॥ ४२ ॥
उनमेंसे तीन बाणोंद्वारा सात्यकिने वृषसेनके सारथिको मारकर एकसे उसका धनुष काट दिया और सात बाणोंसे उसके घोड़ोंको मार डाला। फिर एक बाणसे उसके ध्वजाको खण्डित करके तीन बाणोंसे वृषसेनकी छातीमें भी चोट पहुँचायी ॥ ४१-४२ ॥
अथावसन्नः स्वरथे मुहूर्तात् पुनरुत्थितः ।
स रणे युयुधानेन विसूताश्वरथध्वजः ॥ ४३ ॥
कृतो जिघांसुः शैनेयं खड्गचर्मधृगभ्ययात् ।
इस प्रकार रणक्षेत्रमें युयुधानके द्वारा सारथि, अश्व एवं रथकी ध्वजासे रहित किया हुआ वृषसेन दो घड़ीतक अपने रथपर ही शिथिल-सा होकर बैठा रहा। फिर उठकर सात्यकिको मार डालनेकी इच्छासे ढाल और तलवार लेकर उनकी ओर बढ़ा ॥ ४३ १/२ ॥
तस्य चापततः शीघ्रं वृषसेनस्य सात्यकिः ॥ ४४ ॥
वाराहकर्णैर्दशभिर्विध्यदसिचर्मणी ।
इस प्रकार आक्रमण करते हुए वृषसेनकी तलवार और ढालको सात्यकिने वाराहकर्ण नामक दस बाणोंद्वारा शीघ्र ही खण्डित कर दिया ॥ ४४ १/२ ॥
दुःशासनस्तु तं दृष्ट्वा विरथं व्यायुधं कृतम् ॥ ४५ ॥
आरोप्य स्वरथं तूर्णमपोवाह रणातुरम् ।
तब दुःशासनने वृषसेनको रथ और अस्त्र-शस्त्रोंसे हीन हुआ देख उसे रणसे व्याकुल हुआ मानकर तुरंत ही अपने रथपर बिठा लिया और वहाँसे दूर हटा दिया ॥ ४५ १/२ ॥
अथान्यं रथमास्थाय वृषसेनो महारथः ॥ ४६ ॥
द्रौपदेयांस्त्रिसप्तत्या युयुधानं च पञ्चभिः ।
भीमसेनं चतुःषष्ट्या सहदेवं च पञ्चभिः ॥ ४७ ॥
नकुलं त्रिंशता बाणैः शतानीकं च सप्तभिः ।
शिखण्डिनं च दशभिर्धर्मराजं शतेन च ॥ ४८ ॥
एतांश्चान्यांश्च राजेन्द्र प्रवीराञ्जयगृद्धिनः ।
अभ्यर्दयन्महेष्वासः कर्णपुत्रो विशाम्पते ॥ ४९ ॥
कर्णस्य युधि दुर्धर्षस्ततः पृष्ठमपालयत् ।
तदनन्तर महारथी वृषसेनने दूसरे रथपर बैठकर तिहत्तर बाणोंसे द्रौपदीके पुत्रोंको,
पाँचसे युयुधानको, चौंसठसे भीमसेनको, पाँचसे सहदेवको, तीन बाणोंसे नकुलको, सातसे
शतानीकको, दस बाणोंसे शिखण्डीको और सौ बाणोंद्वारा धर्मराज युधिष्ठिरको घायल कर
दिया। राजेन्द्र! प्रजानाथ! महाधनुर्धर कर्णपुत्रने विजयकी अभिलाषा रखनेवाले इन सभी
प्रमुख वीरोंको तथा दूसरोंको भी अपने बाणोंसे पीड़ित कर दिया। तत्पश्चात् वह दुर्धर्ष वीर
युद्धस्थलमें पुनः कर्णके पृष्ठभागकी रक्षा करने लगा ॥ ४६-४९ १/२ ॥
दुःशासनं च शैनेयो नवैर्नवभिरायसैः ॥ ५० ॥
विसूताश्वरथं कृत्वा ललाटे त्रिभिरार्पयत् ।
सात्यकिने लोहेके बने हुए नौ नूतन बाणोंसे दुःशासनको सारथि, घोड़ों और रथसे
वंचित करके उसके ललाटमें तीन बाण मारे ॥ ५० १/२ ॥
स त्वन्यं रथमास्थाय विधिवत् कल्पितं पुनः ॥ ५१ ॥
युयुधे पाण्डुभिः सार्धं कर्णस्याप्याययन् बलम् ।
दुःशासन विधिपूर्वक सजाये हुए दूसरे रथपर बैठकर कर्णके बलको बढ़ाता हुआ पुनः
पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगा ॥ ५१ १/२ ॥
धृष्टद्युम्नस्ततः कर्णमविध्यद् दशभिः शरैः ॥ ५२ ॥
द्रौपदेयांस्त्रिसप्तत्या युयुधानस्तु सप्तभिः ।
भीमसेनश्चतुःषष्ट्या सहदेवश्च सप्तभिः ॥ ५३ ॥
नकुलस्त्रिंशता बाणैः शतानीकस्तु सप्तभिः ।
शिखण्डी दशभिर्वीरो धर्मराजः शतेन तु ॥ ५४ ॥
तदनन्तर धृष्टद्युम्नने कर्णको दस बाणोंसे बींध डाला। फिर द्रौपदीके पुत्रोंने तिहत्तर,
सात्यकिने सात, भीमसेनने चौंसठ, सहदेवने सात, नकुलने तीस, शतानीकने सात,
शिखण्डीने दस और वीर धर्मराज युधिष्ठिरने सौ बाण कर्णको मारे ॥ ५२-५४ ॥
एते चान्ये च राजेन्द्र प्रवीरा जयगृद्धिनः ।
अभ्यर्दयन् महेष्वासं सूतपुत्रं महामृधे ॥ ५५ ॥
राजेन्द्र! विजयकी अभिलाषा रखनेवाले इन प्रमुख वीरों तथा दूसरोंने भी उस महासमरमें महाधनुर्धर सूतपुत्र कर्णको बाणोंद्वारा पीड़ित कर दिया ।। ५५ ।।
तान् सूतपुत्रो विशिखैर्दशभिर्दशभिः शरैः ।
रथेनानुचरन् वीरः प्रत्यविध्यदरिंदमः ।। ५६ ।।
रथसे विचरनेवाले शत्रुदमन वीर सूतपुत्र कर्णने भी उन सबको दस-दस बाणोंसे घायल कर दिया ।। ५६ ।।
तत्रास्त्रवीर्यं कर्णस्य लाघवं च महात्मनः ।
अपश्याम महाभाग तदद्भुतमिवाभवत् ।। ५७ ।।
महाभाग! हमने महामना कर्णके अस्त्र-बल और फुर्तीको वहाँ अपनी आँखों देखा था। वह सब कुछ अद्भुत-सा प्रतीत होता था ।। ५७ ।।
न ह्याददानं ददृशुः संदधानं च सायकान् ।
विमुञ्चन्तं च संरम्भादपश्यन्त हतानरीन् ।। ५८ ।।
वह कब तरकससे बाण निकालता है, कब धनुषपर रखता है और कब क्रोधपूर्वक शत्रुओंपर छोड़ देता है, यह सब किसीने नहीं देखा। सब लोग मारे जाते हुए शत्रुओंको ही देखते थे ।। ५८ ।।
(प्रतीच्यां दिशि तं दृष्ट्वा प्राच्यां पश्याम लाघवात् ।
न तं पश्याम राजेन्द्र क्व नु कर्णोऽधितिष्ठति ।।
राजेन्द्र! हमलोग एक ही क्षणमें कर्णको पश्चिम दिशामें देखकर उसकी फुर्तीके कारण उसे पूर्व दिशामें भी देखते थे। इस समय कर्ण कहाँ खड़ा है, यह हमलोग नहीं देख पाते थे।
इषूनेव स्म पश्यामो विनिकीर्णान् समन्ततः ।
छादयानान् दिशो राजञ्शलभानामिव व्रजान् ।।)
राजन्! सब ओर बिखरे हुए उसके बाण ही हमें दिखायी देते थे, जो टिड्डीदलोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंको आच्छादित किये रहते थे।
द्यौर्वियद्भूदिशश्चैव प्रपूर्णा निशितैः शरैः ।
अरुणाभ्रावृताकारं तस्मिन् देशे बभौ वियत् ।। ५९ ।।
द्युलोक, आकाश, भूमि और सम्पूर्ण दिशाएँ पैने बाणोंसे खचाखच भर गयी थीं। उस प्रदेशमें आकाश अरुण रंगके बादलोंसे ढका हुआ-सा जान पड़ता था ।। ५९ ।।
नृत्यन्निव हि राधेयश्चापहस्तं प्रतापवान् ।
यैर्विद्धः प्रत्यविध्यत् तानेकेकं त्रिगुणैः शरैः ।। ६० ।।
प्रतापी राधापुत्र कर्ण हाथमें धनुष लेकर नृत्य-सा कर रहा था। जिन-जिन योद्धाओंने उसे एक बाणसे घायल किया, उनमेंसे प्रत्येकको उसने तीन गुने बाणोंसे बींध डाला ।। ६० ।।
दशभिर्दशभिश्चैतान् पुनर्विद्ध्वा ननाद च ।
साश्वसूतरथच्छत्रांस्ततस्ते विवरं ददुः ॥ ६१ ॥
फिर दस-दस बाणोंसे घोड़ों, सारथि, रथ और छत्रोंसहित इन सबको घायल करके कर्णने सिंहके समान दहाड़ना आरम्भ किया। फिर तो उन शत्रुओंने उसे आगे बढ़नेके लिये जगह दे दी ॥ ६१ ॥
तान् प्रमथ्य महेष्वासान् राधेयः शरवृष्टिभिः ।
राजानीकमसम्बाधं प्राविशच्छत्रुकर्शनः ॥ ६२ ॥
शत्रुओंका संहार करनेवाले राधापुत्र कर्णने अपने बाणोंकी वर्षाद्वारा उन महाधनुर्धरोंको रौंदकर राजा युधिष्ठिरकी सेनामें बेरोक-टोक प्रवेश किया ॥ ६२ ॥
स रथांस्त्रिशतं हत्वा चेदीनामनिवर्तिनाम् ।
राधेयो निशितैर्बाणैस्ततोऽभ्यार्च्छद् युधिष्ठिरम् ॥ ६३ ॥
उसने युद्धसे पीछे न हटनेवाले तीन सौ चेदिदेशीय रथियोंको अपने पैने बाणोंद्वारा मारकर युधिष्ठिरपर आक्रमण किया ॥ ६३ ॥
ततस्ते पाण्डवा राजन् शिखण्डी च ससात्यकिः ।
राधेयात् परिरक्षन्तो राजानं पर्यवारयन् ॥ ६४ ॥
राजन्! तब पाण्डवों, शिखण्डी और सात्यकिने राधापुत्र कर्णसे राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करनेके लिये उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ ६४ ॥
तथैव तावकाः सर्वे कर्णं दुर्वारणं रणे ।
यत्ताः शूरा महेष्वासाः पर्यरक्षन्त सर्वशः ॥ ६५ ॥
इसी प्रकार आपके सभी महाधनुर्धर शूरवीर योद्धा रणमें अनिवार्य गतिसे विचरनेवाले कर्णकी सब ओरसे प्रयत्नपूर्वक रक्षा करने लगे ॥ ६५ ॥
नानावादित्रघोषाश्च प्रादुरासन् विशाम्पते ।
सिंहनादश्च संजज्ञे शूराणामभिगर्जताम् ॥ ६६ ॥
प्रजानाथ! उस समय नाना प्रकारके रणवाद्योंकी ध्वनि होने लगी और सब ओरसे गर्जना करनेवाले शूरवीरोंका सिंहनाद सुनायी देने लगा ॥ ६६ ॥
ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः ।
युधिष्ठिरमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ ६७ ॥
तदनन्तर पुनः कौरव और पाण्डव योद्धा निर्भय होकर एक-दूसरेसे भिड़ गये। एक ओर युधिष्ठिर आदि कुन्तीपुत्र थे और दूसरी ओर कर्ण आदि हमलोग ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक अड़तालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४८ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ७२ १/२ श्लोक हैं)