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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1909)

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चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः

कर्णके द्वारा मद्र आदि बाहीक देशवासियोंकी निन्दा

शल्य उवाच

ननु प्रलापाः कर्णैते यान् ब्रवीषि परान् प्रति ।
ऋते कर्णसहस्रेण शक्या जेतुं परे युधि ॥ १ ॥
शल्य बोले— कर्ण! तुम दूसरोंके प्रति जो आक्षेप करते हो, ये तुम्हारे प्रलापमात्र हैं। तुम-जैसे हजारों कर्ण न रहें तो भी युद्धस्थलमें शत्रुओंपर विजय पायी जा सकती है ॥ १ ॥

संजय उवाच

तथा ब्रुवन्तं परुषं कर्णो मद्राधिपं तदा ।
परुषं द्विगुणं भूयः प्रोवाचाप्रियदर्शनम् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! ऐसी कठोर बात बोलते हुए मद्रराज शल्यसे कर्णने पुनः दूनी कठोरता लिये अप्रिय वचन कहना आरम्भ किया ॥ २ ॥

कर्ण उवाच

इदं तु ते त्वमेकाग्रः शृणु मद्रजनाधिप ।
संनिधौ धृतराष्ट्रस्य प्रोच्यमानं मया श्रुतम् ॥ ३ ॥
कर्ण बोला— मद्रनरेश! तुम एकाग्रचित्त होकर मेरी ये बातें सुनो। राजा धृतराष्ट्रके समीप कही जाती हुई इन सब बातोंको मैंने सुना था ॥ ३ ॥
देशांश्च विविधांश्चित्रान् पूर्ववृत्तांश्च पार्थिवान् ।
ब्राह्मणाः कथयन्ति स्म धृतराष्ट्रनिवेशने ॥ ४ ॥
एक दिन महाराज धृतराष्ट्रके घरमें बहुत-से ब्राह्मण आ-आकर नाना प्रकारके विचित्र देशों तथा पूर्ववर्ती भूपालोंके वृत्तान्त सुना रहे थे ॥ ४ ॥
तत्र वृद्धः पुरावृत्ताः कथाः कश्चिद् द्विजोत्तमः ।
वाहीकदेशं मद्रांश्च कुत्सयन् वाक्यमब्रवीत् ॥ ५ ॥
वहीं किसी वृद्ध एवं श्रेष्ठ ब्राह्मणने बाहीक और मद्रदेशकी निन्दा करते हुए वहाँकी पूर्वघटित बातें कही थीं— ॥ ५ ॥
बहिष्कृता हिमवता गङ्गया च बहिष्कृताः ।
सरस्वत्या यमुनया कुरुक्षेत्रेण चापि ये ॥ ६ ॥
पञ्चानां सिन्धुषष्ठानां नदीनां येऽन्तराश्रिताः ।
तान् धर्मबाह्यानशुचीन् वाहीकानपि वर्जयेत् ॥ ७ ॥

‘जो प्रदेश हिमालय, गंगा, सरस्वती, यमुना और कुरुक्षेत्रकी सीमासे बाहर हैं तथा जो सतलज, व्यास, रावी, चिनाव और झेलम—इन पाँचों एवं छठी सिंधु नदीके बीचमें स्थित हैं, उन्हें बाहीक कहते हैं। वे धर्मबाह्य और अपवित्र हैं। उन्हें त्याग देना चाहिये।।
गोवर्धनो नाम वटः सुभद्रं नाम चत्वरम् ।
एतद् राजकुलद्वारमाकुमारात् स्मराम्यहम् ॥ ८ ॥
‘गोवर्धन नामक वटवृक्ष और सुभद्र नामक चबूतरा—ये दोनों वहाँके राजभवनके द्वारपर स्थित हैं, जिन्हें मैं बचपनसे ही भूल नहीं पाता हूँ।। ८ ।।
कार्येणात्यर्थगूढेन वाहीकेषूषितं मया ।
तत एषां समाचारः संवासाद् विदितो मम ॥ ९ ॥
‘मैं अत्यन्त गुप्त कार्यवश कुछ दिनोंतक बाहीक देशमें रहा था। इससे वहाँके निवासियोंके सम्पर्कमें आकर मैंने उनके आचार-व्यवहारकी बहुत-सी बातें जान ली थीं।। ९ ।।
शाकलं नाम नगरमापगा नाम निम्नगा ।
जर्तिका नाम वाहीकास्तेषां वृत्तं सुनिन्दितम् ॥ १० ॥
‘वहाँ शाकल नामक एक नगर और आपगा नामकी एक नदी है, जहाँ जर्तिक नामवाले बाहीक निवास करते हैं। उनका चरित्र अत्यन्त निन्दित है।। १० ।।
धाना गौड़्यासवं पीत्वा गोमांसं लशुनैः सह ।
अपूपमांसवाट्यानामाशिनः शीलवर्जिताः ॥ ११ ॥
‘वे भुने हुए जौ और लहसुनके साथ गोमांस खाते और गुड़से बनी हुई मदिरा पीकर मतवाले बने रहते हैं। पुआ, मांस और वाटी खानेवाले बाहीकदेशके लोग शील और आचारसे शून्य हैं।। ११ ।।
गायन्त्यथ च नृत्यन्ति स्त्रियो मत्ता विवाससः ।
नगरागारवप्रेषु बहिर्माल्यानुलेपनाः ॥ १२ ॥
‘वहाँकी स्त्रियाँ बाहर दिखायी देनेवाली माला और अंगराग धारण करके मतवाली तथा नंगी होकर नगर एवं घरोंकी चहारदिवारियोंके पास गाती और नाचती हैं।। १२ ।।
मत्तावगीतैर्विविधैः खरोष्ट्रनिनदोपमैः ।
अनावृता मैथुने ताः कामचाराश्च सर्वशः ॥ १३ ॥
‘वे गदहोंके रेंकने और ऊँटोंके बलबलानेकी-सी आवाजसे मतवालेपनमें ही भाँति-भाँतिके गीत गाती हैं और मैथुनकालमें भी परदेके भीतर नहीं रहती हैं। वे सब-की-सब सर्वथा स्वेच्छाचारिणी होती हैं।। १३ ।।
आहुरन्योन्यसूक्तानि प्रब्रुवाणा मदोत्कटाः ।
हे हते हे हतेत्येवं स्वामिभर्तृहतेति च ॥ १४ ॥
आक्रोशन्त्यः प्रनृत्यन्ति व्रात्या पर्वस्वसंयताः ।

‘मदसे उन्मत्त होकर परस्पर सरस विनोदयुक्त बातें करती हुई वे एक-दूसरीको ‘ओ घायल की हुई! ओ किसीकी मारी हुई! हे पतिमर्दिते!’ इत्यादि कहकर पुकारती और नृत्य करती हैं। पर्वों और त्योहारोंके अवसरपर तो उन संस्कारहीन रमणियोंके संयमका बाँध और भी टूट जाता है ।। १४ १/२ ।।

तासां किलावलिप्तानां निवसन् कुरुजाङ्गले ।। १५ ।।
कश्चिद् वाहीकदुष्टानां नातिहृष्टमना जगौ ।
‘उन्हीं बाहीकदेशी मदमत्त एवं दुष्ट स्त्रियोंका कोई सम्बन्धी वहाँसे आकर कुरुजांगल प्रदेशमें निवास करता था। वह अत्यन्त खिन्नचित्त होकर इस प्रकार गुनगुनाया करता था — ।। १५ १/२ ।।

सा नूनं बृहती गौरी सूक्ष्मकम्बलवासिनी ।। १६ ।।
मामनुस्मरती शेते वाहीकं कुरुजाङ्गले ।
‘निश्चय ही वह लंबी, गोरी और महीन कम्बलकी साड़ी पहननेवाली मेरी प्रेयसी कुरुजांगल प्रदेशमें निवास करनेवाले मुझ बाहीकको निरन्तर याद करती हुई सोती होगी ।। १६ १/२ ।।

शतद्रुकामहं तीर्त्वा तां च रम्यामिरावतीम् ।। १७ ।।
गत्वा स्वदेशं द्रक्ष्यामि स्थूलशङ्खाः शुभाः स्त्रियः ।
‘मैं कब सतलज और उस रमणीय रावी नदीको पार करके अपने देशमें पहुँचकर शंखकी बनी हुई मोटी-मोटी चूड़ियोंको धारण करनेवाली वहाँकी सुन्दरी स्त्रियोंको देखूँगा ।। १७ १/२ ।।

मनःशिलोज्ज्वलापाङ्ग्यो गौर्यस्त्रिककुदाञ्जनाः ।। १८ ।।
कम्बलाजिनसंवीताः कूर्दन्त्यः प्रियदर्शनाः ।
मृदङ्गानकशङ्खानां मर्दलानां च निःस्वनैः ।। १९ ।।
‘जिनके नेत्रोंके प्रान्तभाग मैनसिलके आलेपसे उज्ज्वल हैं, दोनों नेत्र और ललाट अंजनसे सुशोभित हैं तथा जिनके सारे अंग कम्बल और मृगचर्मसे आवृत हैं, वे गोरे रंगवाली प्रियदर्शना (परम सुन्दरी) रमणियाँ मृदंग, ढोल, शंख और मर्दल आदि वाद्योंकी ध्वनिके साथ-साथ कब नृत्य करती दिखायी देंगी ।। १८-१९ ।।

खरोष्ट्राश्वतरैश्चैव मत्ता यास्यामहे सुखम् ।
शमीपीलुकरीराणां वनेषु सुखवर्त्मसु ।। २० ।।
‘कब हमलोग मदोन्मत्त हो गदहे, ऊँट और खच्चरोंकी सवारीद्वारा सुखद मार्गोंवाले शमी, पीलु और करीलोंके जंगलोंमें सुखसे यात्रा करेंगे ।। २० ।।

अपूपान् सक्तुपिण्डांश्च प्राश्नन्तो मथितान्वितान् ।
पथि सुप्रबला भूत्वा कदा सम्पततोऽध्वगान् ।। २१ ।।
चेलापहारं कुर्वाणास्ताडयिष्याम भूयसः ।

‘मार्गमें तक्रके साथ पूए और सत्तूके पिण्ड खाकर अत्यन्त प्रबल हो कब चलते हुए बहुत-से राहगीरोंको उनके कपड़े छीनकर हम अच्छी तरह पीटेंगे’ ॥ २१½ ॥

एवंशीलेषु व्रात्येषु वाहीकेषु दुरात्मसु ॥ २२ ॥
कश्चेतयानो निवसेन्मुहूर्तमपि मानवः ।
संस्कारशून्य दुरात्मा बाहीक ऐसे ही स्वभावके होते हैं। उनके पास कौन सचेत मनुष्य दो घड़ी भी निवास करेगा?’ ॥ २२½ ॥

ईदृशा ब्राह्मणेनोक्ता वाहीका मोघचारिणः ॥ २३ ॥
येषां षड्भागहर्ता त्वमुभयोः शुभपापयोः ।
ब्राह्मणने निरर्थक आचार-विचारवाले बाहीकोंको ऐसा ही बताया है, जिनके पुण्य और पाप दोनोंका छठा भाग तुम लिया करते हो ॥ २३½ ॥

इत्युक्त्वा ब्राह्मणः साधुरुत्तरं पुनरुक्तवान् ॥ २४ ॥
वाहीकेष्वविनीतेषु प्रोच्यमानं निबोध तत् ।
शल्य! उस श्रेष्ठ ब्राह्मणने ये सब बातें बताकर उद्दण्ड बाहीकोंके विषयमें पुनः जो कुछ कहा था, वह भी बताता हूँ, सुनो— ॥ २४½ ॥

तत्र स्म राक्षसी गाति सदा कृष्णचतुर्दशीम् ॥ २५ ॥
नगरे शाकले स्फीते आहत्य निशि दुन्दुभिम् ।
‘उस देशमें एक राक्षसी रहती है, जो सदा कृष्णपक्षकी चतुर्दशी तिथिको समृद्धिशाली शाकल नगरमें रातके समय दुन्दुभि बजाकर इस प्रकार गाती है— ॥ २५½ ॥

कदा वाहेयिका गाथाः पुनर्गास्यामि शाकले ॥ २६ ॥
गव्यस्य तृप्ता मांसस्य पीत्वा गौडं सुरासवम् ।
गौरीभिः सह नसिभिर्बृहतीभिः स्वलंकृताः ॥ २७ ॥
पलाण्डुगंडूषयुतान् खादन्ती चैडकान् बहून् ।
‘मैं वस्त्राभूषणोंसे विभूषित हो गोमांस खाकर और गुड़़की बनी हुई मदिरा पीकर तृप्त हो अंजलि भर प्याजके साथ बहुत-सी भेड़ोंको खाती हुई गोरे रंगकी लंबी युवती स्त्रियोंके साथ मिलकर इस शाकल नगरमें पुनः कब इस तरहकी बाहीकसम्बन्धी गाथाओंका गान करूँगी ॥ २६-२७½ ॥

वाराहं कौक्कुटं मांसं गव्यं गार्दभमौष्ट्रिकम् ॥ २८ ॥
ऐडं च ये न खादन्ति तेषां जन्म निरर्थकम् ।
‘जो सूअर, मुर्गा, गाय, गदहा, ऊँट और भेड़के मांस नहीं खाते, उनका जन्म व्यर्थ है’ ॥ २८½ ॥

इति गायन्ति ये मत्ताः सीधुना शाकलाश्च ये ॥ २९ ॥
सबालवृद्धाः क्रन्दन्तस्तेषु धर्मः कथं भवेत् ।

'जो शाकलनिवासी आबालवृद्ध नर-नारी मदिरासे उन्मत्त हो चिल्ला-चिल्लाकर ऐसी गाथाएँ गाया करते हैं, उनमें धर्म कैसे रह सकता है?' ।। २९½ ।।

इति शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ।। ३० ।।
यदन्योऽप्युक्तवानस्मान् ब्राह्मणः कुरुसंसदि ।
शल्य! इस बातको अच्छी तरह समझ लो। हर्षका विषय है कि इसके सम्बन्धमें मैं तुम्हें कुछ और बातें बता रहा हूँ, जिन्हें दूसरे ब्राह्मणने कौरव-सभामें हमलोगोंसे कहा था — ।। ३०½ ।।

पञ्च नद्यो वहन्त्येता यत्र पीलुवनान्युत ।। ३१ ।।
शतद्रुश्च विपाशा च तृतीयैरावती तथा ।
चन्द्रभागा वितस्ता च सिन्धुषष्ठा बहिर्गिरेः ।। ३२ ।।
आरट्टा नाम ते देशा नष्टधर्मा न तान् व्रजेत् ।
'जहाँ शतद्रु (सतलज), विपाशा (व्यास), तीसरी इरावती (रावी), चन्द्रभागा (चिनाव) और वितस्ता (झेलम)—ये पाँच नदियाँ छठी सिंधु नदीके साथ बहती हैं, जहाँ पीलु नामक वृक्षोंके कई जंगल हैं, वे हिमालयकी सीमासे बाहरके प्रदेश 'आरट्ट' नामसे विख्यात हैं। वहाँका धर्म-कर्म नष्ट हो गया है। उन देशोंमें कभी न जाय ।।

व्रात्यानां दासमीयानां वाहीकानामयज्वनाम् ।। ३३ ।।
न देवाः प्रतिगृह्णन्ति पितरो ब्राह्मणास्तथा ।
तेषां प्रनष्टधर्माणां वाहीकानामिति श्रुतिः ।। ३४ ।।
'जिनके धर्म-कर्म नष्ट हो गये हैं, वे संस्कारहीन, जारज बाहीक यज्ञ-कर्मसे रहित होते हैं। उनके दिये हुए द्रव्यको देवता, पितर और ब्राह्मण भी नहीं ग्रहण करते हैं, यह बात सुननेमें आयी है' ।। ३३-३४ ।।

ब्राह्मणेन तथा प्रोक्तं विदुषा साधुसंसदि ।
काष्ठकुण्डेषु वाहीका मृन्मयेषु च भुञ्जते ।। ३५ ।।
सक्तुमद्यावलिप्तेषु श्वावलीढेषु निर्घृणाः ।
आविकं चौष्ट्रिकं चैव क्षीरं गार्दभमेव च ।। ३६ ।।
तद्विकारांश्च वाहीकाः खादन्ति च पिबन्ति च ।
किसी विद्वान् ब्राह्मणने साधु पुरुषोंकी सभामें यह भी कहा था कि 'बाहीक देशके लोग काठके कुण्डों तथा मिट्टीके बर्तनोंमें जहाँ सत्तू और मदिरा लिपटे होते हैं और जिन्हें कुत्ते चाटते रहते हैं, घृणाशून्य होकर भोजन करते हैं। बाहीक देशके निवासी भेड़, ऊँटनी और गदहीके दूध पीते और उसी दूधके बने हुए दही-घी आदि भी खाते हैं ।। ३५-३६½ ।।

पुत्रसंकरिणो जाल्माः सर्वान्नक्षीरभोजनाः ।। ३७ ।।
आरट्टा नाम वाहीका वर्जनीया विपश्चिता ।

‘वे जारज पुत्र उत्पन्न करनेवाले नीच आरट्ट नामक बाहीक सबका अन्न खाते और सभी पशुओंके दूध पीते हैं। अतः विद्वान् पुरुषको उन्हें दूरसे ही त्याग देना चाहिये’॥ ३७१/२॥

हन्त शल्य विजानीहि हन्त भूयो ब्रवीमि ते ॥ ३८ ॥
यदन्योऽप्युक्तवान् मह्यं ब्राह्मणः कुरुसंसदि ।
शल्य! इस बातको याद कर लो। अभी तुमसे और भी बातें बताऊँगा, जिन्हें किसी दूसरे ब्राह्मणने कौरवसभामें स्वयं मुझसे कहा था— ॥ ३८१/२ ॥

युगन्धरे पयः पीत्वा प्रोष्य चाप्यच्युतस्थले ॥ ३९ ॥
तद्वद् भूतिलये स्नात्वा कथं स्वर्गं गमिष्यति ।
‘युगन्धर नगरमें दूध पीकर अच्युतस्थल नामक नगरमें एक रात रहकर तथा भूतिलयमें स्नान करके मनुष्य कैसे स्वर्गमें जायगा?’॥ ३९१/२ ॥

पञ्च नद्यो वहन्त्येता यत्र निःसृत्य पर्वतात् ॥ ४० ॥
आरट्टा नाम वाहीका न तेष्वार्योद्व्यहं वसेत् ।
जहाँ पर्वतसे निकलकर ये पूर्वोक्त पाँचों नदियाँ बहती हैं, वे आरट्ट नामसे प्रसिद्ध बाहीक प्रदेश हैं। उनमें श्रेष्ठ पुरुष दो दिन भी निवास न करे॥ ४०१/२॥

बहिश्च नाम हीकश्च विपाशायां पिशाचकौ ॥ ४१ ॥
तयोरपत्यं वाहीका नैषा सृष्टिः प्रजापतेः ।
ते कथं विविधान् धर्मान् ज्ञास्यन्ते हीनयोनयः ॥ ४२ ॥
विपाशा (व्यास) नदीमें दो पिशाच रहते हैं। एकका नाम है बहि और दूसरेका नाम है हीक। इन्हीं दोनोंकी संतानें बाहीक कहलाती हैं। ब्रह्माजीने इनकी सृष्टि नहीं की है। वे नीच योनिमें उत्पन्न हुए मनुष्य नाना प्रकारके धर्मोंको कैसे जानेंगे? ॥ ४१-४२ ॥

कारस्करान्माहिषकान् कुरण्डान् केरलांस्तथा ।
कर्कोटकान् वीरकांश्च दुर्धर्मांश्च विवर्जयेत् ॥ ४३ ॥
कारस्कर, माहिषक, कुरंड, केरल, कर्कोटक और वीरक—इन देशोंके धर्म (आचार-व्यवहार) दूषित हैं; अतः इनका त्याग कर देना चाहिये ॥ ४३ ॥

इति तीर्थानुसर्तारं राक्षसी काचिदब्रवीत् ।
एकरात्रशयी गेहे महोलूखलमेखला ॥ ४४ ॥
विशाल ओखलियोंकी मेखला (करधनी) धारण करनेवाली किसी राक्षसीने किसी तीर्थयात्रीके घरमें एक रात रहकर उससे इस प्रकार कहा था— ॥ ४४ ॥

आरट्टा नाम ते देशा वाहीकं नाम तज्जलम् ।
ब्राह्मणापसदा यत्र तुल्यकालाः प्रजापतेः ॥ ४५ ॥
जहाँ ब्रह्माजीके समकालीन (अत्यन्त प्राचीन) वेदविरुद्ध आचरणवाले नीच ब्राह्मण निवास करते हैं, वे आरट्ट नामक देश हैं और वहाँके जलका नाम बाहीक है ॥ ४५ ॥

वेदा न तेषां वेद्यश्च यज्ञा यजनमेव च ।
व्रात्यानां दासमीयानामन्नं देवा न भुञ्जते ॥ ४६ ॥

उन अधम ब्राह्मणोंको न तो वेदोंका ज्ञान है, न वहाँ यज्ञकी वेदियाँ हैं और न उनके यहाँ यज्ञ-याग ही होते हैं। वे संस्कारहीन एवं दासोंसे समागम करनेवाली कुलटा स्त्रियोंकी संतानें हैं; अतः देवता उनका अन्न नहीं ग्रहण करते हैं ॥ ४६ ॥
प्रस्थला मद्रगान्धारा आरट्टा नामतः खशाः ।
वसातिसिन्धुसौवीरा इति प्रायोऽतिकुत्सिताः ॥ ४७ ॥

प्रस्थल, मद्र, गान्धार, आरट्ट, खस, वसाति, सिंधु तथा सौवीर—ये देश प्रायः अत्यन्त निन्दित हैं ॥ ४७ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णशल्यसंवादे चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें कर्ण और शल्यका संवादविषयक चौवालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४४ ॥