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महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व

Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished3,237 पृष्ठ

अध्याय (पृष्ठ 1799)

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दुर्योधनकी शल्यसे कर्णका सारथि बननेके लिये प्रार्थना

सूर्यारुणौ यथा दृष्ट्वा तमो नश्यति मारिष ।
तथा नश्यन्तु कौन्तेयाः सपञ्चालाः ससंजयाः ॥ २६ ॥
'मान्यवर! जैसे सूर्य और अरुणको देखते ही अन्धकार नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार आप दोनोंको देखकर कुन्तीके पुत्र, पांचाल और सृंजय नष्ट हो जायें ॥

रथिनां प्रवरः कर्णो यन्तॄणां प्रवरो भवान् ।
संयोगो युवयोर्लोके नाभून्न च भविष्यति ॥ २७ ॥
'कर्ण रथियोंमें श्रेष्ठ है और आप सारथियोंके शिरोमणि हैं। संसारमें आप दोनोंका संयोग जो आज बन गया है, न तो कभी हुआ था और न आगे कभी होगा ॥ २७ ॥

यथा सर्वास्ववस्थासु वार्ष्णेयः पाति पाण्डवम् ।
तथा भवान् परित्रातुं कर्णं वैकर्तनं रणे ॥ २८ ॥
'जैसे श्रीकृष्ण सभी अवस्थाओंमें पाण्डुपुत्र अर्जुनकी रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आप रणभूमिमें वैकर्तन कर्णकी रक्षा करें ॥ २८ ॥

(सारथ्यं क्रियतां तस्य युध्यमानस्य संयुगे ।)
त्वया सारथिना ह्येष अप्रधृष्यो भविष्यति ।
देवतानामपि रणे सशक्राणां महीपते ।
किं पुनः पाण्डवेयानां मा विशंकीर्वचो मम ॥ २९ ॥
'युद्धस्थलमें युद्ध करते समय कर्णके सारथिका कार्य सँभालिये। राजन्! आपके सारथि होनेसे यह कर्ण रणभूमिमें इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हो जायगा, फिर पाण्डवोंकी तो बात ही क्या है। आप मेरे इस कथनमें संदेह न कीजिये' ॥ २९ ॥

संजय उवाच

दुर्योधनवचः श्रुत्वा शल्यः क्रोधसमन्वितः ।
विशिखां भुकुटिं कृत्वा धुन्वन् हस्तौ पुनः पुनः ॥ ३० ॥
संजय कहते हैं—राजन्! दुर्योधनकी बात सुनकर शल्यको बड़ा क्रोध हुआ। वे अपनी भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके बारंबार हाथ हिलाने लगे ॥ ३० ॥

क्रोधरक्ते महानेत्रे परिवृत्य महाभुजः ।
कुलैश्वर्यश्रुतबलैर्दृप्तः शल्योऽब्रवीदिदम् ॥ ३१ ॥
महाबाहु शल्यको अपने कुल, ऐश्वर्य, शास्त्रज्ञान और बलका बड़ा अभिमान था। वे क्रोधसे लाल हुए विशाल नेत्रोंको घुमाकर इस प्रकार बोले ॥ ३१ ॥

शल्य उवाच

अवमन्यसि गान्धारे ध्रुवं च परिशङ्कसे ।
यन्मां ब्रवीषि विश्रब्धं सारथ्यं क्रियतामिति ॥ ३२ ॥

शल्यने कहा— गान्धारीपुत्र! तुम मेरा अपमान कर रहे हो, निश्चय ही तुम्हारे मनमें मेरे प्रति संदेह है, तभी तुम निर्भय होकर कह रहे हो कि आप ‘सारथिका कार्य कीजिये’ ।। ३२ ।।

अस्मत्तोऽभ्यधिकं कर्णं मन्यमानः प्रशंससि ।
न चाहं युधि राधेयं गणये तुल्यमात्मनः ॥ ३३ ॥
तुम कर्णको मुझसे श्रेष्ठ मानकर उसकी भूरि-भूरि प्रशंसा करते हो; परंतु युद्धस्थलमें राधापुत्र कर्णको मैं अपने समान नहीं गिनता हूँ ।। ३३ ।।

आदिश्यतामभ्यधिको ममांशः पृथिवीपते ।
तमहं समरे जित्वा गमिष्यामि यथागतम् ॥ ३४ ॥
राजन्! तुम शत्रुसेनाके अधिक-से-अधिक भागको मेरे हिस्सेमें दे दो, मैं उसे जीतकर जैसे आया हूँ, वैसे लौट जाऊँगा ।। ३४ ।।

अथवाप्येक एवाहं योत्स्यामि कुरुनन्दन ।
पश्य वीर्यं ममाद्य त्वं संग्रामे दहतो रिपून् ॥ ३५ ॥
अथवा कुरुनन्दन! आज मैं अकेला ही युद्ध करूँगा। तुम संग्राममें शत्रुओंको दग्ध करते हुए मेरे पराक्रमको देख लेना ।। ३५ ।।

न चापि कामान् कौरव्य निधाय हृदये पुमान् ।
अस्मद्विधः प्रवर्तेत मा मां त्वमभिशङ्किथाः ॥ ३६ ॥
कौरव्य! मेरे-जैसा पुरुष अपने मनमें कुछ कामनाएँ रखकर युद्धमें प्रवृत्त नहीं होता। अतः तुम मुझपर संदेह न करो ।। ३६ ।।

युधि वाप्यवमानो मे न कर्तव्यः कथञ्चन ।
पश्य पीनौ मम भुजौ वज्रसंहननौ दृढौ ॥ ३७ ॥
धनुः पश्य च मे चित्रं शरांश्चाशीविषोपमान् ।
रथं पश्य च मे क्लृप्तं सदश्वैर्वातवेगितैः ॥ ३८ ॥
गदां च पश्य गान्धारे हेमपट्टविभूषिताम् ।
तुम्हें युद्धमें किसी प्रकार मेरा अपमान नहीं करना चाहिये। तुम मेरी मोटी और वज्रके समान गँठीली इन सुदृढ़ भुजाओंको तो देखो। मेरे इस विचित्र धनुष और विषधर सर्पके समान इन विषैले बाणोंकी ओर तो दृष्टिपात करो। गन्धारीकुमार! वायुके समान वेगशाली उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए मेरे इस सजे-सजाये रथ और सुवर्णपत्रसे मढ़ी हुई गदापर भी तो दृष्टि डालो ।। ३७-३८ १/२ ।।

दारयेयं महीं कृत्स्नां विकिरेयं च पर्वतान् ॥ ३९ ॥
शोषयेयं समुद्रांश्च तेजसा स्वेन पार्थिव ।
राजन्! मैं सारी पृथिवीको विदीर्ण कर सकता हूँ, पर्वतोंको तोड़-फोड़कर बिखेर सकता हूँ और अपने तेजसे समुद्रोंको भी सुखा सकता हूँ ।। ३९ १/२ ।।

तं मामेवंविधं राजन् समर्थमरिनिग्रहे ॥ ४० ॥
कस्माद् युनक्षि सारथ्ये नीचस्याधिरथे रणे ।
नरेश्वर! इस प्रकार शत्रुओंका दमन करनेमें पूर्णतया समर्थ होनेपर भी तुम मुझे इस नीच सूतपुत्र कर्णके सारथिके कामपर कैसे नियुक्त कर रहे हो? ॥ ४० १/२ ॥

न मामधुरि राजेन्द्र नियोक्तुं त्वमिहार्हसि ॥ ४१ ॥
न हि पापीयसः श्रेयान् भूत्वा प्रेष्यत्वमुत्सहे ।
राजेन्द्र! तुम्हें मुझे नीच कर्ममें नहीं लगाना चाहिये। मैं श्रेष्ठ होकर अत्यन्त नीच पापी पुरुषकी दासता नहीं कर सकता ॥ ४१ १/२ ॥

यो ह्यभ्युपगतं प्रीत्या गरीयांसं वशे स्थितम् ॥ ४२ ॥
वशे पापीयसो धत्ते तत् पापमधरोत्तरम् ।
जो पुरुष प्रेमवश अपने पास आकर अपनी आज्ञाके अधीन रहनेवाले किसी श्रेष्ठतम पुरुषको नीचतम मनुष्यके अधीन कर देता है, उसे उच्चको नीच और नीचको उच्च करनेका महान् पाप लगता है ॥ ४२ १/२ ॥

ब्रह्मणा ब्राह्मणाः सृष्टा मुखात् क्षत्रं च बाहुतः ॥ ४३ ॥
ऊरुभ्यामसृजद् वैश्याञ्शूद्रान् पद्भ्यामिति श्रुतिः ।
ब्रह्माजीने ब्राह्मणोंको अपने मुखसे, क्षत्रियोंको भुजाओंसे, वैश्योंको जाँघोंसे और शूद्रोंको पैरोंसे उत्पन्न किया है, ऐसा श्रुतिका मत है ॥ ४३ १/२ ॥

तेभ्यो वर्णविशेषाश्च प्रतिलोमानुलोमजाः ॥ ४४ ॥
अथान्योन्यस्य संयोगाच्चातुर्वर्ण्यस्य भारत ।
भारत! इन्हींसे अनुलोम और विलोम क्रमसे विभिन्न वर्णोंकी उत्पत्ति होती है। चारों वर्णोंके पारस्परिक संयोगसे अन्य जातियाँ उत्पन्न हुई हैं ॥ ४४ १/२ ॥

गोप्तारः संगृहीतारो दातारः क्षत्रियाः स्मृताः ॥ ४५ ॥
याजनाध्यापनैर्विप्रा विशुद्धैश्च प्रतिग्रहैः ।
लोकस्यानुग्रहार्थाय स्थापिता ब्राह्मणा भुवि ॥ ४६ ॥
इनमें क्षत्रिय-जातिके लोग सबकी रक्षा करनेवाले, सबसे कर लेनेवाले और दान देनेवाले बताये गये हैं। ब्राह्मण यज्ञ कराने, वेद पढ़ाने और विशुद्ध दान ग्रहण करनेके द्वारा जीवन-निर्वाह करते हुए सम्पूर्ण जगत्‌पर अनुग्रह करनेके लिये इस भूतलपर ब्रह्माजीके द्वारा स्थापित किये गये हैं ॥ ४५-४६ ॥

कृषिश्च पशुपाल्यं च विशां दानं च धर्मतः ।
ब्रह्मक्षत्रविशां शूद्रा विहिताः परिचारकाः ॥ ४७ ॥
कृषि, पशुपालन और धर्मानुसार दान देना वैश्योंका कर्म है तथा शूद्रलोग ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्योंकी सेवाके काममें नियुक्त किये गये हैं ॥ ४७ ॥

ब्रह्मक्षत्रस्य विहिताः सूता वै परिचारकाः ।
न क्षत्रियो वै सूतानां शृणुयाच्च कथञ्चन ॥ ४८ ॥
सूतजातिके लोग ब्राह्मणों और क्षत्रियोंके सेवक नियुक्त किये गये हैं, क्षत्रिय सूतोंका सेवक हो, यह कोई किसी प्रकार कहीं नहीं सुन सकता ॥ ४८ ॥

अहं मूर्धाभिषिक्तो हि राजर्षिकुलजो नृपः ।
महारथः समाख्यातः सेव्यः स्तुत्यश्च वन्दिनाम् ॥ ४९ ॥
मैं राजर्षियोंके कुलमें उत्पन्न हुआ मूर्द्धाभिषिक्त नरेश हूँ, विश्वविख्यात महारथी हूँ, सूतोंद्वारा सेव्य और वन्दीजनोंद्वारा स्तुतिके योग्य हूँ ॥ ४९ ॥

सोऽहमेतादृशो भूत्वा नेहारिबलसूदनः ।
सूतपुत्रस्य संग्रामे सारथ्यं कर्तुमुत्सहे ॥ ५० ॥
ऐसा प्रतिष्ठित एवं शत्रुसेनाका संहार करनेमें समर्थ होकर मैं यहाँ युद्धस्थलमें एक सूतपुत्रके सारथिका कार्य कदापि नहीं कर सकता ॥ ५० ॥

अवमानमहं प्राप्य न योत्स्यामि कथञ्चन ।
आपृच्छे त्वाद्य गान्धारे गमिष्यामि गृहाय वै ॥ ५१ ॥
गान्धारीनन्दन! आज इस अपमानको पाकर अब मैं किसी प्रकार युद्ध नहीं करूँगा। अतः तुमसे आज्ञा चाहता हूँ। आज ही अपने घरको लौट जाऊँगा ॥ ५१ ॥

संजय उवाच

एवमुक्त्वा महाराज शल्यः समितिशोभनः ।
उत्थाय प्रययौ तूर्णं राजमध्यादमर्षितः ॥ ५२ ॥
**संजय कहते हैं—**महाराज! ऐसा कहकर युद्धमें शोभा पानेवाले शल्य अमर्षमें भर गये और राजाओंके बीचसे उठकर तुरंत चल दिये ॥ ५२ ॥

प्रणयाद् बहुमानाच्च तं निगृह्य सुतस्तव ।
अब्रवीन्मधुरं वाक्यं साम्ना सर्वार्थसाधकम् ॥ ५३ ॥
तब आपके पुत्रने बड़े प्रेम और आदरसे उन्हें रोका तथा सान्त्वनापूर्ण मधुर स्वरमें उनसे यह सर्वार्थसाधक वचन कहा— ॥ ५३ ॥

यथा शल्य विजानीषे एवमेतदसंशयम् ।
अभिप्रायस्तु मे कश्चित् तं निबोध जनेश्वर ॥ ५४ ॥
‘महाराज शल्य! आप अपने विषयमें जैसा समझते हैं ऐसी ही बात है, इसमें तनिक भी संशय नहीं है। मेरा कोई और ही अभिप्राय है, उसे ध्यान देकर सुनिये ॥ ५४ ॥
न कर्णोऽभ्यधिकस्त्वत्तो न शङ्के त्वां च पार्थिव ।
न हि मद्रेश्वरो राजा कुर्याद् यदनृतं भवेत् ॥ ५५ ॥
‘भूपाल! न तो कर्ण आपसे श्रेष्ठ है और न आपके प्रति मैं संदेह ही करता हूँ। मद्रदेशके स्वामी राजा शल्य कोई ऐसा कार्य नहीं कर सकते, जो उनकी सत्य प्रतिज्ञाके विपरीत हो ॥ ५५ ॥
ऋतमेव हि पूर्वास्ते वदन्ति पुरुषोत्तमाः ।
तस्मादार्तायनिः प्रोक्तो भवानिति मतिर्मम ॥ ५६ ॥
‘आपके पूर्वज श्रेष्ठ पुरुष थे और सदा सत्य ही बोला करते थे, इसीलिये आप ‘आर्तायनि’ कहलाते हैं; मेरी ऐसी ही धारणा है ॥ ५६ ॥
शल्यभूतस्तु शत्रूणां यस्मात्त्वं युधि मानद ।
तस्माच्छल्यो हि ते नाम कथ्यते पृथिवीतले ॥ ५७ ॥

‘मानद! आप युद्धस्थलमें शत्रुओंके लिये शल्य (काँटे)-के समान हैं, इसीलिये इस भूतपर आपका शल्य नाम विख्यात है॥ ५७॥
यदेतद् व्याहृतं पूर्वं भवता भूरिदक्षिण।
तदेव कुरु धर्मज्ञ मदर्थं यद् यदुच्यते॥ ५८॥
‘यज्ञोंमें प्रचुर दक्षिणा देनेवाले धर्मज्ञ नरेश्वर! आपने पहले यह जो कुछ कहा है और इस समय जो कुछ कह रहे हैं, उसीको मेरे लिये पूर्ण करें॥ ५८॥
न च त्वत्तो हि राधेयो न चाहमपि वीर्यवान्।
वृणेऽहं त्वां हयाग्र्याणां यन्तारमिह संयुगे॥ ५९॥
‘आपकी अपेक्षा न तो राधापुत्र कर्ण बलवान् है और न मैं ही। आप उत्तम अश्वोंके सर्वश्रेष्ठ संचालक (अश्वविद्याके सर्वोत्तम ज्ञाता) हैं, इसलिये इस युद्धस्थलमें आपका वरण कर रहा हूँ॥ ५९॥
मन्ये चाभ्यधिकं शल्य गुणैः कर्णं धनंजयात्।
भवन्तं वासुदेवाच्च लोकोऽयमिति मन्यते॥ ६०॥
‘शल्य! मैं कर्णको अर्जुनसे अधिक गुणवान् मानता हूँ और यह सारा जगत् आपको वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णसे श्रेष्ठ मानता है॥ ६०॥
कर्णो ह्यभ्यधिकः पार्थादस्त्रैरेव नरर्षभ।
भवानभ्यधिकः कृष्णादश्वज्ञाने बले तथा॥ ६१॥
‘नरश्रेष्ठ! कर्ण तो अर्जुनसे केवल अस्त्र-ज्ञानमें ही बढ़ा-चढ़ा है, परंतु आप श्रीकृष्णसे अश्वविद्या और बल दोनोंमें बड़े हैं॥ ६१॥
यथाश्वहृदयं वेद वासुदेवो महामनाः।
द्विगुणं त्वं तथा वेत्सि मद्रराजेश्वरत्मज॥ ६२॥
‘मद्रराजकुमार! महामनस्वी श्रीकृष्ण जिस प्रकार अश्वविद्याका रहस्य जानते हैं, वैसा ही, बल्कि उससे भी दूना आप जानते हैं’॥ ६२॥

शल्य उवाच
यन्मां ब्रवीषि गान्धारे मध्ये सैन्यस्य कौरव।
विशिष्टं देवकीपुत्रात् प्रीतिमानस्म्यहं त्वयि॥ ६३॥
**शल्यने कहा—**कौरव! गान्धारीपुत्र! तुम सारी सेनाके बीचमें जो मुझे देवकीनन्दन श्रीकृष्णसे भी बढ़कर बता रहे हो, इससे मैं तुमपर बहुत प्रसन्न हूँ॥ ६३॥
एष सारथ्यमातिष्ठे राधेयस्य यशस्विनः।
युध्यतः पाण्डवाग्र्येण यथा त्वं वीर मन्यसे॥ ६४॥
वीर! जैसा तुम चाहते हो उसके अनुसार मैं पाण्डव-शिरोमणि अर्जुनके साथ युद्ध करते हुए यशस्वी कर्णका सारथिकर्म अब स्वीकार किये लेता हूँ॥ ६४॥

समयश्च हि मे वीर कश्चिद् वैकर्तनं प्रति ।
उत्सृजेयं यथाश्रद्धमहं वाचोऽस्य संनिधौ ॥ ६५ ॥
परंतु वीरवर! कर्णके साथ मेरी एक शर्त रहेगी। 'मैं इसके समीप, जैसी मेरी इच्छा हो, वैसी बातें कर सकता हूँ' ॥ ६५ ॥

संजय उवाच
तथेति राजन् पुत्रस्ते सह कर्णेन भारत ।
अब्रवीन्मद्रराजस्य मतं भरतसत्तम ॥ ६६ ॥
संजयने कहा— भारत! भरतभूषण नरेश! इसपर कर्णसहित आपके पुत्रने 'बहुत अच्छा' कहकर शल्यकी शर्त स्वीकार कर ली ॥ ६६ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि शल्यसारथ्ये द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें शल्यका सारथिकर्मविषयक बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १/३ श्लोक मिलाकर कुल ६६ १/३ श्लोक हैं)