महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1719)
एकविंशोऽध्यायः
कौरव-पाण्डव-दलोंका भयंकर घमासान युद्ध
धृतराष्ट्र उवाच
पाण्ड्ये हते किमकरोदर्जुनो युधि संजय ।
एकवीरेण कर्णेन द्रावितेषु परेषु च ॥ १ ॥
धृतराष्ट्रने पूछा—संजय! जब युद्धस्थलमें अश्वत्थामाद्वारा पाण्ड्यनरेश मार डाले गये और मेरे पक्षके अद्वितीय वीर कर्णने जब शत्रुसैनिकोंको मार भगाया, उस समय अर्जुनने क्या किया? ॥ १ ॥
समाप्तविद्यो बलवान् युक्तो वीरः स पाण्डवः ।
सर्वभूतेष्वनुज्ञातः शङ्करेण महात्मना ॥ २ ॥
पाण्डुकुमार अर्जुन युद्धविद्याकी शिक्षा समाप्त कर चुके हैं। वे विजयके प्रयत्नमें लगे हुए बलवान् वीर हैं। भगवान् शंकरने उन्हें कृपापूर्वक अनुगृहीत करते हुए यह कह दिया है कि 'तुम समस्त प्राणियोंमें प्रधान एवं अजेय होओगे' ॥ २ ॥
तस्मान्महद् भयं तीव्रममित्रघ्नाद् धनंजयात् ।
स यत् तत्राकरोत् पार्थस्तन्ममाचक्ष्व संजय ॥ ३ ॥
इसलिये उन शत्रुनाशक धनंजयसे मुझे अत्यन्त तीव्र एवं महान् भय बना रहता है। अतः संजय! वहाँ कुन्तीकुमार अर्जुनने जो कुछ किया हो, वह मुझे बताओ ॥ ३ ॥
संजय उवाच
हते पाण्ड्येऽर्जुनं कृष्णस्त्वरन्नाह वचो हितम् ।
पश्यामि नाहं राजानमपयातांश्च पाण्डवान् ॥ ४ ॥
संजयने कहा—राजन्! पाण्ड्यनरेशके मारे जानेपर श्रीकृष्णने बड़ी उतावलीके साथ अर्जुनसे यह हितकर वचन कहा—'पार्थ! मैं राजा युधिष्ठिरको नहीं देख रहा हूँ। युद्धस्थलसे हटे हुए अन्य पाण्डव भी मुझे नहीं दिखायी दे रहे हैं ॥ ४ ॥
निवृत्तैश्च पुनः पार्थैर्भग्नं शत्रुबलं महत् ।
अश्वत्थाम्नश्च सङ्कल्पाद्धताः कर्णेन सृञ्जयाः ॥ ५ ॥
तथाश्वरथनागानां कृतं च कदनं महत् ।
'पुनः लौटे हुए पाण्डव-योद्धाओंने विशाल शत्रुसेनामें भगदड़ मचा दी थी; परंतु अश्वत्थामाके संकल्पके अनुसार कर्णने सृंजयौंका संहार कर डाला तथा अपनी सेनाके हाथी, घोड़े एवं रथोंका भारी विनाश कर दिया' ॥ ५ १/२ ॥
सर्वमाख्यातवान् वीरो वासुदेवः किरीटिने ॥ ६ ॥
एतच्छ्रुत्वा च दृष्ट्वा च भ्रातुर्घोरं महद्भयम् ।
वाहयाश्वान् हृषीकेश क्षिप्रमित्याह पाण्डवः ॥ ७ ॥
वीर वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णने किरीटधारी अर्जुनको ये सारी बातें बतायीं। यह सुनकर तथा अपने भाईके ऊपर आये हुए इस घोर एवं महान् भयको देखकर पाण्डुकुमार अर्जुनने कहा—'हृषीकेश! आप शीघ्र ही इन घोड़ोंको बढ़ाइये' ॥ ६-७ ॥
ततः प्रायाद्धृषीकेशो रथेनाप्रतियोधिना ।
दारुणश्च पुनस्तत्र प्रादुरासीत् समागमः ॥ ८ ॥
तब भगवान् हृषीकेश जिसका सामना करनेवाला दूसरा कोई योद्धा नहीं था उस रथके द्वारा आगे बढ़े। उस समय वहाँ पुनः बड़ा भयंकर संग्राम छिड़ा हुआ था ॥ ८ ॥
ततः पुनः समाजग्मुरभीताः कुरुपाण्डवाः ।
भीमसेनमुखाः पार्थाः सूतपुत्रमुखा वयम् ॥ ९ ॥
कौरव तथा पाण्डव-योद्धा पुनः निर्भय होकर एक-दूसरेसे भिड़ गये थे। पाण्डव-सैनिकोंके प्रधान थे भीमसेन और हमलोगोंका प्रधान था सूतपुत्र कर्ण ॥ ९ ॥
ततः प्रवृत्ते भूयः संग्रामो राजसत्तम ।
कर्णस्य पाण्डवानां च यमराष्ट्रविवर्धनः ॥ १० ॥
नृपश्रेष्ठ! उस समय कर्णका पाण्डव-सैनिकोंके साथ जो पुनः संग्राम आरम्भ हुआ था, वह यमराजके राज्यकी श्रीवृद्धि करनेवाला था ॥ १० ॥
धनूंषि बाणान् परिघानसिपट्टिशतोमरान् ।
मुसलानि भुशुण्डीश्च सशक्त्यृष्टिपरश्वधान् ॥ ११ ॥
गदाः प्रासाञ्छितान् कुन्तान् भिन्दिपालान् महाङ्कुशान् ।
प्रगृह्य क्षिप्रमापेतुः परस्परजिघांसया ॥ १२ ॥
दोनों दलोंके सैनिक एक-दूसरेको मार डालनेकी इच्छासे धनुष, बाण, परिघ, खड्ग, पट्टिश, तोमर, मूसल, भुशुण्डी, शक्ति, ऋष्टि, फरसे, गदा, प्रास, तीखे कुन्त, भिन्दिपाल और बड़े-बड़े अंकुश लेकर शीघ्रतापूर्वक युद्धके मैदानमें कूद पड़े थे ॥ ११-१२ ॥
बाणज्यातालशब्देन द्यां दिशः प्रदिशो वियत् ।
पृथिवीं नेमिघोषेण नादयन्तोऽभ्ययुः परान् ॥ १३ ॥
रथी वीर अपने बाणसहित धनुषकी प्रत्यंचाकी टंकारध्वनि एवं रथके पहियोंकी घर्घरराहटसे आकाश, अन्तरिक्ष, दिशा, विदिशा तथा भूतलको शब्दायमान करते हुए शत्रुओंपर चढ़ आये ॥ १३ ॥
तेन शब्देन महता संहृष्टाश्चक्रुराहवम् ।
वीरा वीरैर्महाघोरं कलहान्तं तितीर्षवः ॥ १४ ॥
कलहके पार जानेकी इच्छा रखनेवाले वे सभी वीर उस महान् शब्दसे हर्ष एवं उत्साहमें भरकर विपक्षी वीरोंके साथ अत्यन्त घोर संग्राम करने लगे ॥ १४ ॥
ज्यातालत्रधनुःशब्दः कुञ्जराणां च बृंहताम् ।
पादातानां च पततां नृणां नादो महानभूत् ॥ १५ ॥
प्रत्यंचा, हस्तत्राण और धनुषका शब्द, चिग्घाड़ते हुए हाथियोंकी आवाज तथा रणभूमिमें गिरते हुए पैदल मनुष्योंके महान् आर्तनादकी तुमुल ध्वनि वहाँ गूँजने लगी ॥ १५ ॥
तालशब्दांश्च विविधाञ्शूराणां चाभिगर्जताम् ।
श्रुत्वा तत्र भृशं त्रेसुः पेतुर्मम्लुश्च सैनिकाः ॥ १६ ॥
सामने गर्जना करनेवाले शूरवीरोंके ताल ठोंकनेके विविध शब्द सुनकर कितने ही सैनिक वहाँ भयसे थर्रा उठते थे, कितने ही गिर पड़ते थे और कितने ही ग्लानिसे भर जाते थे ॥ १६ ॥
तेषां निनदतां चैव शस्त्रवर्षं च मुञ्चताम् ।
बहूनाधिरथिर्वीरः प्रममाथेषुभिः परान् ॥ १७ ॥
जोर-जोरसे गर्जते तथा अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए उन शत्रुसैनिकोंमेंसे बहुतोंको वीर कर्णने अपने बाणोंसे मथ डाला ॥ १७ ॥
पञ्च पाञ्चालवीराणां रथान् दश च पञ्च च ।
साश्वसूतध्वजान् कर्णः शरैर्निन्ये यमक्षयम् ॥ १८ ॥
उसने अपने बाणोंद्वारा पांचाल वीरोंमेंसे पहले पाँच, फिर दस और फिर पाँच रथियोंको घोड़े, सारथि एवं ध्वजोंसहित मारकर यमलोक पहुँचा दिया ॥ १८ ॥
योधमुख्या महावीर्याः पाण्डूनां कर्णमाहवे ।
शीघ्रास्त्रास्तूर्णमावृत्य परिवव्रुः समन्ततः ॥ १९ ॥
तब समरांगणमें पाण्डवदलके शीघ्रतापूर्वक अस्त्र चलानेवाले महापराक्रमी प्रधान-प्रधान योद्धाओंने तुरंत आकर कर्णको चारों ओरसे घेर लिया ॥ १९ ॥
ततः कर्णो द्विषत्सेनां शरवर्षैर्विलोड़यन् ।
विजगाहाण्डजाकीर्णां पद्मिनीमिव यूथपः ॥ २० ॥
तदनन्तर कर्णने अपने बाणोंकी वर्षासे शत्रुसेनाका मन्थन करते हुए उसके भीतर उसी प्रकार प्रवेश किया, जैसे यूथपति गजराज पक्षियोंसे भरे हुए कमलपूर्ण सरोवरमें घुसकर उसे मथने लगता है ॥ २० ॥
द्विषन्मध्यमवस्कन्द्य राधेयो धनुरुत्तमम् ।
विधुन्वानः शितैर्बाणैः शिरांस्युन्मथ्य पातयत् ॥ २१ ॥
राधापुत्र कर्ण क्रमशः शत्रुसेनाके मध्यभागमें पहुँचकर अपने उत्तम धनुषको कम्पित करता हुआ पैने बाणोंसे शत्रुओंके सिर काट-काटकर गिराने लगा ॥ २१ ॥
चर्मवर्माणि संछिन्नान्यपतन् भुवि देहिनाम् ।
विषेहुर्नास्य संस्पर्शं द्वितीयस्य पतत्रिणः ॥ २२ ॥
उस समय देहधारियोंके चमड़े और कवच कट-कटकर भूतलपर गिर रहे थे। शत्रुसैनिक कर्णके द्वितीय बाणका स्पर्श नहीं सहन कर पाते थे ।। २२ ।।
वर्मदेहासुमथनैर्धनुषः प्रच्युतैः शरैः ।
मौर्व्या तलत्रे न्यहनत् कशया वाजिनो यथा ॥ २३ ॥
जैसे घुड़सवार घोड़ोंको कोड़ेसे पीटता है, उसी प्रकार कर्ण धनुषसे छूटकर कवच, शरीर और प्राणोंको मथ डालनेवाले बाणोंद्वारा शत्रुओंके हस्तत्राणपर भी प्रहार करने लगा ।। २३ ।।
पाण्डुसृञ्जयपञ्चालान् शरगोचरमागतान् ।
ममर्द तरसा कर्णः सिंहो मृगगणानिव ॥ २४ ॥
जैसे सिंह अपनी दृष्टिमें पड़े हुए मृगोंको वेगपूर्वक मसल डालता है, उसी प्रकार कर्णने अपने बाणोंकी पहुँचके भीतर आये हुए पाण्डव, सृंजय तथा पांचाल योद्धाओंको बड़े वेगसे रौंद डाला ।। २४ ।।
ततः पाञ्चालराजश्च द्रौपदेयाश्च मारिष ।
यमौ च युयुधानश्च सहिताः कर्णमभ्ययुः ॥ २५ ॥
मान्यवर! तब पांचालराज धृष्टद्युम्न, द्रौपदीके पुत्र तथा नकुल, सहदेव और सात्यकि— इन सबने एक साथ आकर कर्णपर आक्रमण किया ।। २५ ।।
तेषु व्यायच्छमानेषु कुरुपाञ्चालपाण्डुषु ।
प्रियानसून रणे त्यक्त्वा योधा जघ्नुः परस्परम् ॥ २६ ॥
उस समय जब कौरव, पांचाल तथा पाण्डव योद्धा परिश्रमपूर्वक युद्धमें लगे हुए थे, सभी सैनिक रणभूमिमें अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर एक-दूसरेको मारने लगे ।।
सुसंनद्धाः कवचिनः सशिरस्त्राणभूषणाः ।
गदाभिर्मुसलैश्चान्ये परिघैश्च महाबलाः ॥ २७ ॥
समभ्यधावन्त भृशं कालदण्डैरिवोद्यतैः ।
नर्दन्तश्चाह्वयन्तश्च प्रवल्गन्तश्च मारिष ॥ २८ ॥
माननीय नरेश! कमर कसे, कवच बाँधे तथा शिरस्त्राण एवं आभूषण धारण किये हुए महाबली योद्धा गरजते, उछलते-कूदते और एक-दूसरेको ललकारते हुए कालदण्डके समान गदा, मूसल और परिघ उठाये परस्पर धावा बोल रहे थे ।। २७-२८ ।।
ततो निजघ्नुरन्योन्यं पेतुश्चान्योन्यताडिताः ।
वमन्तो रुधिरं गात्रैर्विमस्तिष्केक्षणायुधाः ॥ २९ ॥
तदनन्तर वे एक-दूसरेका वध करने, परस्पर चोट खाकर धराशायी होने तथा शरीरसे रक्त बहाने लगे। उनके मस्तिष्क, नेत्र और आयुध नष्ट हो गये थे ।।
दन्तपूर्णैः सरुधिरैर्वक्त्रैर्दाडिमसंनिभैः ।
जीवन्त इव चाप्येके तस्थुः शस्त्रोपबृंहिताः ॥ ३० ॥
कितने ही वीरोंके शरीर अस्त्र-शस्त्रोंसे व्याप्त एवं प्राणशून्य होकर पड़े थे; परंतु उनके खुले हुए मुखमें जो रक्तरंजित दाँत थे, उनके द्वारा वे फटे हुए अनारके फलों-जैसे जान पड़ते थे और उस तरहके मुखोंद्वारा वे जीवित-से प्रतीत होते थे ।। ३० ।।
परश्वधैश्चाप्यवरे पट्टिशैरसिभिस्तथा ।
शक्तिभिर्भिन्दिपालैश्च नखरप्रासतोमरैः ।। ३१ ।।
ततक्षुश्चिच्छिदुश्चान्ये बिभिदुश्चिक्षिपूस्तथा ।
संचकर्तुश्च जघ्नुश्च क्रुद्धा रणमहार्णवे ।। ३२ ।।
महासागरके समान उस विशाल युद्धस्थलमें परस्पर कुपित हुए अन्यान्य योद्धा परशु, पट्टिश, खड्ग, शक्ति, भिन्दिपाल, नखर, प्रास तथा तोमरोंद्वारा यथासम्भव एक-दूसरेका छेदन-भेदन, विदारण, क्षेपण, कर्तन और हनन करने लगे ।। ३१-३२ ।।
पेतुरन्योन्यनिहता व्यसवो रुधिरोक्षिताः ।
क्षरन्तः सुरसं रक्तं प्रकृत्ताश्चन्दना इव ।। ३३ ।।
जैसे लाल चन्दनके वृक्ष कट जानेपर रक्त वर्णका रस बहाने लगते हैं, उसी प्रकार परस्परके आघातसे मारे गये योद्धा खूनसे लथपथ एवं प्राणशून्य होकर युद्धभूमिमें पड़े थे और अपने अंगोंसे रक्त बहा रहे थे ।। ३३ ।।
रथै रथा विनिहता हस्तिभिश्चापि हस्तिनः ।
नरैर्नरा हताः पेतुरश्वाश्चाश्वैः सहस्रशः ।। ३४ ।।
रथियोंसे रथी, हाथियोंसे हाथी, पैदल मनुष्योंसे मनुष्य और घोड़ोंसे घोड़े मारे जाकर रणभूमिमें सहस्रोंकी संख्यामें पड़े थे ।। ३४ ।।
ध्वजाः शिरांसि च्छत्राणि द्विपहस्ता नृणां भुजाः ।
क्षुरैर्भल्लार्धचन्द्रैश्च च्छिन्नाः पेतुर्महीतले ।। ३५ ।।
ध्वज, मस्तक, छत्र, हाथीकी सूँड़ तथा मनुष्योंकी भुजाएँ—ये सब-के-सब क्षुरों, भल्लों तथा अर्धचन्द्रोंद्वारा कटकर भूतलपर पड़े थे ।। ३५ ।।
नरांश्च नागान् सरथान् हयान् ममृदुराहवे ।
अश्वारोहैर्हताः शूराश्छिन्नहस्ताश्च दन्तिनः ।। ३६ ।।
सपताकाध्वजाः पेतुर्विशीर्णा इव पर्वताः ।
घुड़सवारोंने कितने ही शूरवीरोंको मार डाला और बड़े-बड़े दन्तार हाथियोंकी सूँड़ें काट लीं। सूँड़ कट जानेपर उन हाथियोंने युद्धस्थलमें बहुत-से मनुष्यों, हाथियों, रथों और घोड़ोंको कुचल डाला। फिर वे पताका और ध्वजोंसहित टूटे-फूटे पर्वतोंके समान पृथ्वीपर गिर पड़े ।। ३६ ½ ।।
पत्तिभिश्च समाप्लुत्य द्विरदाः स्यन्दनास्तथा ।। ३७ ।।
हताश्च हन्यमानाश्च पतिताश्चैव सर्वशः ।
पैदल वीरोंद्वारा उछल-उछलकर मारे गये और मारे जाते हुए कितने ही हाथी और रथ सवारोंसहित सब ओर पड़े थे ॥ ३७१/२ ॥
अश्वारोहाः समासाद्य त्वरिताः पत्तिभिर्हताः ॥ ३८ ॥
सादिभिः पत्तिसंघाश्च निहता युधि शेरते ।
कितने ही घुड़सवार बड़ी उतावलीके साथ पैदल वीरोंके पास जाकर उनके द्वारा मारे गये तथा झुंड-के-झुंड पैदल सैनिक भी घुड़सवारोंकी चोटसे मारे जाकर युद्धस्थलमें सदाके लिये सो गये थे ॥ ३८१/२ ॥
मृदितानीव पद्मानि प्रम्लाना इव च स्रजः ॥ ३९ ॥
हतानां वदनान्यासन् गात्राणि च महाहवे ।
उस महासमरमें मारे गये योद्धाओंके मुख और शरीर कुचले हुए कमलों और कुम्हलायी हुई मालाओंके समान श्रीहीन हो गये थे ॥ ३९१/२ ॥
रूपाण्यत्यर्थकान्तानि द्विरदाश्वनृणां नृप ।
समुन्नानीव वस्त्राणि ययुर्दुर्दर्शतां पराम् ॥ ४० ॥
नरेश्वर! हाथी, घोड़े और मनुष्योंके अत्यन्त सुन्दर रूप भी वहाँ कीचड़में सने हुए वस्त्रोंके समान घिनौने हो गये थे। उनकी ओर देखना कठिन हो रहा था ॥ ४० ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकविंशोऽध्यायः ॥ २१ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २१ ॥