महाभारत (खंड ४) - द्रोण, कर्ण, शल्य, सौप्तिक व स्त्री पर्व
Mahabharata (Vol 4) - Drona, Karna, Shalya, Sauptika and Stri Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
अध्याय (पृष्ठ 1594)
तृतीयोऽध्यायः
दुर्योधनके द्वारा सेनाको आश्वासन देना तथा सेनापति कर्णके युद्ध और वधका संक्षिप्त वृत्तान्त
संजय उवाच
हते द्रोणे महेष्वासे तव पुत्रा महारथाः ।
बभूवुरस्वस्थमुखा विषण्णा गतचेतसः ॥ १ ॥
संजयने कहा— महाराज! महाधनुर्धर द्रोणाचार्यके मारे जानेपर आपके महारथी पुत्र विषादग्रस्त और अचेत-से हो गये। उनके मुखपर अस्वस्थताका चिह्न स्पष्ट दिखायी देने लगा ॥ १ ॥
अवाङ्मुखाः शस्त्रभृतः सर्व एव विशाम्पते ।
अप्रेक्षमाणाः शोकार्ता नाभ्यभाषन् परस्परम् ॥ २ ॥
प्रजानाथ! सभी शस्त्रधारी सैनिक मुँह नीचे किये शोकसे व्याकुल हो गये। वे एक-दूसरेकी ओर न तो देखते थे और न बात ही करते थे ॥ २ ॥
तान् दृष्ट्वा व्यथिताकारान् सैन्यानि तव भारत ।
ऊर्ध्वमेव निरैक्षन्त दुःखत्रस्तान्यनेककः ॥ ३ ॥
भरतनन्दन! उन सबको विषादमें डूबा हुआ देख आपकी अनेक सेनाएँ भी दुःखसे संत्रस्त हो ऊपरकी ओर ही दृष्टिपात करने लगीं ॥ ३ ॥
शस्त्राण्येषां तु राजेन्द्र शोणिताक्तानि सर्वशः ।
प्राभ्रश्यन्त कराग्रेभ्यो दृष्ट्वा द्रोणं हतं युधि ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! युद्धमें द्रोणाचार्यको मारा गया देख खूनसे रँगे हुए इन सैनिकोंके शस्त्र हाथोंसे छूटकर गिर पड़े ॥ ४ ॥
तानि बद्धान्यरिशानि लम्बमानानि भारत ।
अदृश्यन्त महाराज नक्षत्राणि यथा दिवि ॥ ५ ॥
भरतवंशी महाराज! कमर आदिमें बँधकर लटकते हुए वे अस्त्र-शस्त्र आकाशसे टूटते हुए नक्षत्रोंके समान दिखायी दे रहे थे ॥ ५ ॥
तथा तु स्तिमितं दृष्ट्वा गतसत्त्वमवस्थितम् ।
बलं तव महाराज राजा दुर्योधनोऽब्रवीत् ॥ ६ ॥
नरेश्वर! इस प्रकार आपकी सेनाको प्राणहीन-सी निश्चल खड़ी देख राजा दुर्योधनने कहा— ॥ ६ ॥
भवतां बाहुवीर्यं हि समाश्रित्य मया युधि ।
पाण्डवेयाः समाहूता युद्धं चेदं प्रवर्तितम् ॥ ७ ॥
‘वीरो! आपलोगोंके बाहुबलका भरोसा करके मैंने युद्धके लिये पाण्डवोंको ललकारा है और यह युद्ध आरम्भ किया है ॥ ७ ॥
तदिदं निहते द्रोणे विषण्णमिव लक्ष्यते ।
युध्यमानाश्च समरे योधा वध्यन्ति सर्वशः ॥ ८ ॥
जयो वापि वधो वापि युध्यमानस्य संयुगे ।
भवेत् किमत्र चित्रं वै युध्यध्वं सर्वतोमुखाः ॥ ९ ॥
‘परंतु द्रोणाचार्यके मारे जानेपर यह सारी सेना विषादमें डूबी हुई-सी दिखायी देती है। समर-भूमिमें युद्ध करनेवाले प्रायः सभी योद्धा शत्रुओंके हाथसे मारे जाते हैं। रणभूमिमें जूझनेवाले वीरको कभी विजय भी प्राप्त होती है और कभी उसका वध भी हो जाता है। इसमें आश्चर्यकी कौन-सी बात है? अतः आपलोग सब ओर मुँह करके उत्साहपूर्वक युद्ध करें ॥ ८-९ ॥
पश्यध्वं च महात्मानं कर्णं वैकर्तनं युधि ।
प्रचरन्तं महेष्वासं दिव्यैरस्त्रैर्महाबलम् ॥ १० ॥
‘देखिये, महामना, महाधनुर्धर और महाबली वैकर्तन कर्ण अपने दिव्यास्त्रोंके साथ किस प्रकार युद्धमें विचर रहा है? ॥ १० ॥
यस्य वै युधि संत्रासात् कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
निवर्तते सदा मन्दः सिंहात् क्षुद्रमृगो यथा ॥ ११ ॥
‘जिसके भयसे वह कुन्तीका मूर्ख पुत्र अर्जुन सदा उसी प्रकार मुँह मोड़ लेता है, जैसे सिंहके सामनेसे क्षुद्र मृग भाग जाता है ॥ ११ ॥
येन नागायुतप्राणो भीमसेनो महाबलः ।
मानुषेणैव युद्धेन तामवस्थां प्रवेशितः ॥ १२ ॥
‘जिसने दस हजार हाथियोंके समान बलवाले महाबली भीमसेनको मानव-युद्धके द्वारा ही वैसी दुरवस्थामें डाल दिया था ॥ १२ ॥
येन दिव्यास्त्रविच्छूरो मायावी स घटोत्कचः ।
अमोघया रणे शक्त्या निहतो भैरवं नदन् ॥ १३ ॥
‘जिसने रणभूमिमें भयंकर गर्जना करनेवाले दिव्यास्त्रवेत्ता, शूरवीर मायावी घटोत्कचको अपनी अमोघ शक्तिसे मार डाला था ॥ १३ ॥
तस्य दुर्वारवीर्यस्य सत्यसंधस्य धीमतः ।
बाह्वोर्द्रविणमक्षय्यमद्य द्रक्ष्यथ संयुगे ॥ १४ ॥
‘जिसके पराक्रमको रोकना अत्यन्त कठिन है, उस सत्यप्रतिज्ञ बुद्धिमान् कर्णके अक्षय बाहुबलको आज आपलोग समरांगणमें देखेंगे ॥ १४ ॥
द्रोणपुत्रस्य विक्रान्तं राधेयस्यैव चोभयोः ।
पश्यन्तु पाण्डुपुत्रास्ते विष्णुवासवयोरिव ॥ १५ ॥
'आज पाण्डव भगवान् विष्णु और इन्द्रके समान शक्तिशाली द्रोणपुत्र तथा राधापुत्र दोनोंके पराक्रमको देखें' ॥ १५ ॥
सर्व एव भवन्तश्च शक्ताः प्रत्येकशोऽपि वा ।
पाण्डुपुत्रान् रणे हन्तुं ससैन्यान् किमु संहताः ॥ १६ ॥
वीर्यवन्तः कृतास्त्राश्च द्रक्ष्यथाद्य परस्परम् ।
'आप सभी योद्धाओंमेंसे प्रत्येक वीर रणभूमिमें सेनासहित पाण्डवोंको मार डालनेकी शक्ति रखता है। फिर जब आपलोग संगठित होकर युद्ध करें तो क्या नहीं कर सकते हैं? आप पराक्रमी और अस्त्रविद्याके विद्वान् हैं; अतः आज एक-दूसरेको अपना-अपना पुरुषार्थ दिखावें' ॥ १६ १/२ ॥
संजय उवाच
एवमुक्त्वा ततः कर्णं चक्रे सेनापतिं तदा ।
तव पुत्रो महावीर्यो भ्रातृभिः सहितोऽनघ ॥ १७ ॥
संजय कहते हैं—निष्पाप नरेश! ऐसा कहकर आपके महापराक्रमी पुत्र दुर्योधनने अपने भाइयोंके साथ मिलकर कर्णको सेनापति बनाया ॥ १७ ॥
सैनापत्यमथावाप्य कर्णो राजन् महारथः ।
सिंहनादं विनद्योच्चैः प्रायुध्यत रणोत्कटः ॥ १८ ॥
राजन्! सेनापतिका पद पाकर महारथी कर्ण उच्चस्वरसे सिंहनाद करके रणोन्मत्त होकर युद्ध करने लगा ॥
स सृंजयानां सर्वेषां पञ्चालानां च मारिष ।
केकयानां विदेहानां चकार कदनं महत् ॥ १९ ॥
मान्यवर! उसने समस्त सृंजयों, पांचालों, केकयों और विदेहोंका महान् संहार किया ॥ १९ ॥
तस्येषुधाराः शतशः प्रादुरासञ्छरासनात् ।
अग्रे पुङ्खे च संसक्ता यथा भ्रमरपङ्क्तयः ॥ २० ॥
उसके धनुषसे सैकड़ों बाणधाराएँ, जो अग्रभाग और पुच्छभागमें परस्पर सटी हुई थीं, भ्रमरपंक्तियोंके समान प्रकट होने लगीं ॥ २० ॥
स पीडयित्वा पञ्चालान् पाण्डवांश्च तरस्विनः ।
हत्वा सहस्रशो योधानर्जुनेन निपातितः ॥ २१ ॥
वह पांचालों और वेगशाली पाण्डवोंको पीड़ित करके सहस्रों योद्धाओंको मारकर अन्तमें अर्जुनके हाथसे मारा गया ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संजयवाक्यं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संजयवाक्य नामक तीसरा अध्याय पूरा हुआ ।। ३ ।।