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कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

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DevanagariSanskritpublished918 pages

About this granth

The Kautiliya Arthashastra (कौटिलीय अर्थशास्त्रम्) is the most detailed ancient Indian treatise on government, administration, economy, law and war. Tradition ascribes it to Kautilya (Chanakya, Vishnugupta), minister of Chandragupta Maurya. It is divided into fifteen books, covering the training of the king, the duties of departmental superintendents, civil and criminal justice, secret operations, the circle of neighbouring states, the six measures of foreign policy, calamities of the state, campaigns, battle, dealings with confederacies, the weaker king, the capture of forts, occult practices and the methods of the treatise itself.

This is No. 75 of the Vidyabhawan Sanskrit Granthamala, Chowkhamba Vidyabhawan, Varanasi, third edition 1984. It was edited with introduction, Hindi translation and glossary by Vachaspati Gairola of the Hindi Sahitya Sammelan, Allahabad, and also includes the Chanakya Sutras. The book is dedicated to the memory of Mahamahopadhyaya T. Ganapati Shastri. Gairola's long introduction surveys early Indian assemblies such as the sabha and samiti and the growth of the state.

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प्रकरण१६०-१६१
अध्याय१

भेदोपादानानि, उपांशुदण्डश्च


(१) सङ्घलाभो दण्डमित्रलाभानामुत्तमः । सङ्घा हि संहतत्वादधृष्याः परेषाम् । ताननुगुणान् भुञ्जीत सामदानाभ्याम् । विगुणान् भेददण्डाभ्याम् ।

(२) काम्बोजसुराष्ट्रक्षत्रियश्रेण्यादयो वार्ताशस्त्रोपजीविनः । लिच्छिविकवृजिकमल्लकद्रककुकुरपाञ्चालादयो राजशब्दोपजीविनः ।

(३) सर्वेषामासन्नाः सत्रिणः सङ्घानां परस्परन्यङ्गद्वेषवैरकलहस्थानान्युपलभ्य क्रमाभिनीतं भेदमुपचारयेयुः—‘असौ त्वा विजलपति’ इति । एवमुभयतः । बद्धरोषाणां विद्याशिल्पद्यूतवैहारिकेष्वाचार्यव्यञ्जना बालककलहानुत्पादयेयुः । वेशशौण्डिकेषु वा प्रतिलोमप्रशंसाभिः सङ्घमुख्यमनुष्याणां तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । कृत्यपक्षोपग्रहेण वा ।


भेदक प्रयोग और उपांशुदण्ड

(१) भेदक प्रयोग : संघलाभ, सेनालाभ और मित्रलाभ, इन तीनों में संघ-लाभ उत्तम है; क्योंकि संगठित होने से संघों को शत्रु दबा नहीं पाता है । इन संघों के अनुकूल होने पर विजिगीषु को साम और दान के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए और प्रतिकूलावस्था में भेद तथा दण्ड के द्वारा उनका उपभोग करना चाहिए ।

(२) कम्बोज और सौराष्ट्र देशों के क्षत्रिय, वैश्य आदि वर्गों के संघ कृषि, व्यापार और शस्त्र के द्वारा जीविकोपार्जन करते हैं । लिच्छविक, व्रजिक, मल्लक, मद्रक, कुकुर, कुरु और पांचाल देशों के राजाओं के केवल नाममात्र के संघ होते हैं ।

(३) विजिगीषु को चाहिए कि उक्त सभी प्रकार के संघों में अपने सत्री नामक गुप्तचरों को नियुक्त करे और वे सत्री उन संघों के पारस्परिक दोष, द्वेष, वैर और कलह के कारणों को पकड़ कर धीरे-धीरे उन्हें प्रकाश में लाकर उन संघों में इस तरीके से कि 'अमुक संघ आप की ऐसी निंदा करता है' भेद डाल दे । इसी प्रकार दूसरे को भी पहिले के विरुद्ध भड़काने का यत्न करे । परस्पर द्वेष रखने वाले संघों के राजकुमारों के कपटी आचार्य बनकर गुप्तचर विद्या, शिल्प, द्यूत और प्रश्नोत्तर आदि के विषय में कलह उत्पन्न करा दे । अथवा वेश्या तथा सुरापान आदि में आसक्त संघ के मुख्य व्यक्तियों की उल्टी प्रशंसा कराकर तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें कलह उत्पन्न करा दें । अथवा संघमुख्यों के प्रति जो कुछ, लुब्ध या भीत आदि भृत्य व्यक्ति हों उनको अपने वश में करके फिर संघों के साथ उनका कलह करा दे ।

६७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

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६७० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

(१) कुमारकान् विशिष्टच्छन्दिकया हीनच्छन्दिकानुत्साहयेयुः ।
(२) विशिष्टानां चैकपात्रं विवाहं हीनेभ्यो वारयेयुः । हीनान् वा विशिष्टैरेकपात्रे विवाहे वा योजयेयुः । अवहीनान् वा तुल्यभावोपगमने कुलतः पौरुषतः स्थानविपर्यास्तो वा । व्यवहारमवस्थितं वा प्रतिलोम-स्थापनेन निशामयेयुः । विवादपदेषु वा द्रव्यपशुमनुष्याभिघातेन रात्रौ तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । सर्वेषु च कलहस्थानेषु हीनपक्षं राजा कोश-दण्डाभ्यामुपगृह्य प्रतिपक्षवधे योजयेत्, भिन्नानपवाहयेद्वा । एकदेशे सम-स्तान् वा निवेश्य भूमौ चेषां पञ्चकुलीं दशकुलीं वा कृष्यां निवेशयेत् । एकस्था हि शस्त्रग्रहणसमर्थाः स्युः । समवाये चैषामत्ययं स्थापयेत् ।
(३) राजशब्दिभिरवरुद्धमवक्षिप्तं वा कुल्यमभिजातं राजपुत्रत्वे स्था-


( १ ) संघ के राजकुमारों में जो अधिक साधनसंपन्न होकर सुखपूर्वक रहते हों उनके मुकाबले में असंपन्न राजकुमारों को भड़का दे ।

( २ ) गुप्तचरों को चाहिए कि वे संघ के विशिष्ट व्यक्तियों को उनकी अपेक्षा हीन व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में बैठ कर भोजन करने तथा विवाहादि संबंध करने, से वर्जित करें । अथवा हीन व्यक्तियों को विशिष्ट व्यक्तियों के साथ एक पंक्ति में भोजन करने तथा विवाहादि संबंध के लिए प्रेरित करें । अथवा छोटी हैसियत के व्यक्तियों को बड़ी हैसियत के व्यक्तियों के बराबर खानदानी या बहादुरी या स्थानां-तर के लिए उत्साहित करें । अथवा संघ द्वारा किसी विवादास्पद विषय का निर्णय किये जाने पर जो निर्णय हुआ हो उसके विपरीत ही वादी को जाकर सुनायें । अथवा रात में तीक्ष्ण गुप्तचर स्वयं ही किसी संघ के द्रव्य, पशु तथा मनुष्यों को नष्ट कर उसको दूसरे संघ वालों का कार्य बताकर प्रचार करे और इस प्रकार के विवादास्पद विषयों को उठाकर उनको आपस में लड़ा दे । जब इस प्रकार के कलह संघों में उत्पन्न हों, तो विजिगीषु को चाहिए कि वह किसी पक्षपात रहित संघ के व्यक्ति को कोष तथा दण्ड के द्वारा अपने वश में कर उससे अपने शत्रु का वध करा डाले । अथवा संघ के विरुद्ध हुए उन व्यक्तियों को संघ से अलग करा दे । अथवा उनको किसी एक प्रदेश में इकट्ठा कर पाँच-पाँच, दस-दस समूहों के छोटे-छोटे गाँवों में बसा दे । क्योंकि यदि उन्हें एक साथ ही बसा दिया जायगा तो संभव है वे लोग फिर कभी अवसर आने पर विजिगीषु के विरुद्ध हथियार उठाने में समर्थ हो सकें, इसलिए उनकी आबादी के बीच में थोड़ी-थोड़ी सेना नियुक्त कर दे ।

( ३ ) विजिगीषु को चाहिए कि वह नाममात्र को राजा कहलाने वाले लिच्छिवी आदि क्षत्रिय-संघों से अवरुद्ध या तिरस्कृत, उच्चकुलोत्पन्न गुणी व्यक्ति को राजपुत्र

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प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७१

पयेत् । कार्तान्तिकादिश्चास्य वर्गो राजलक्षण्यतां सङ्घेषु प्रकाशयेत् । सङ्घ-मुख्यांश्च धर्मिष्ठानुपजपेत्—'स्वधर्मममुष्य राज्ञः पुत्रे भ्रातरि वा प्रतिपद्य-ध्वम्' इति । प्रतिपन्नेषु कृत्यपक्षोपग्रहार्थमर्थं दण्डं च प्रेषयेत् ।
(१) विक्रमकाले शौण्डिकव्यञ्जनाः । पुत्रदारप्रेतापदेशेन 'नैषेच-निकम्' इति मदनरसयुक्तान् मद्यकुम्भान् शतशः प्रयच्छेयुः ।
(२) चैत्यदैवतद्वाररक्षास्थानेषु च सत्रिणः समयकर्मनिक्षेपं सहिरण्या-भिज्ञानमुद्राणि हिरण्यभाजनानि च प्ररूपयेयुः, दृश्यमानेषु च सङ्घेषु 'राज-कीयाः' इत्यावेदयेयुः । अथावस्कन्दं दद्यात् ।
(३) सङ्घानां वा वाहनहिरण्ये कालिके गृहीत्वा संघमुख्याय प्रख्यातं द्रव्यं प्रयच्छेत् । तदेषां याचिते 'दत्तममुष्मै मुख्याय' इति ब्रूयात् ।


के रूप में नियुक्त करे और संबंधित ज्योतिषी तथा सामुद्रिक लिच्छवी-संघों में जाकर उस राजपुत्र को राज-लक्षणों से युक्त प्रकाशित करें । उन संघों के जो मुख्य धार्मिक व्यक्ति हैं उनको इस प्रकार बहकाया जाय कि 'अमुक राजपुत्र या राजमाता को संघ के लोग कैद में डाल कर बहुत कष्ट दे रहे हैं; आप ही इस बीच धर्मात्मा व्यक्ति हैं, इसलिए आप ही उस निर्दोष राजपुत्र की रक्षा करें ।' जब संघ के मुख्य लोग इस बात को स्वीकार कर लें तब क्रुद्ध, लुब्ध एवं भीत कृत्य व्यक्तियों को अपने अनुकूल बनाने के लिए संघ के मुख्य व्यक्तियों के पास सहायतार्थ धन तथा सेना भेजी जाय ।

( १ ) जब युद्ध की तैयारी हो जाय; तब शराब बेचने वाले छद्मवेष गुप्तचर अपने स्त्री-पुत्रों के मर जाने का बहाना बनाकर 'यह नैषेचनिक मद्य है, अपने दिवंगत स्त्री-पुत्रों के निमित्त इसको हम आप लोगों के लिए भेंट करते हैं' ऐसा कह कर विष-रस से भरे हुए सैकड़ों घड़े लाकर उन्हें थमा दें ।

( २ ) देवालय तथा अन्य पवित्र स्थानों के दरवाजों पर और रक्षास्थानों के सभी गुप्तचर संघ के मुखिया के साथ शर्त के तौर पर अमानत के रूप में दिया जाने वाला धन, अभिज्ञात सुवर्ण मुद्रा सहित तथा अन्य सुवर्ण के पात्र आदि वस्तुओं को संघ के अन्य व्यक्तियों के समक्ष इस प्रकार प्रकट करें कि वे इस बात को जान लें । बात के खुल जाने पर जब संघ के लोग यह पूछें कि 'यह सुवर्ण का सामान किसका है ?' तब उनको उत्तर दिया जाय कि 'यह राजा का है ।' इस प्रकार संघों में पारस्परिक फूट पड़ जाने के बाद विजिगीषु फौरन उन पर धावा बोल दे ।

( ३ ) अथवा सभी गुप्तचर किसी बहाने से संघ के लोगों से घोड़े, सवारी तथा हिरण्य आदि को नियत समय पर वापिस कर देने के वायदे पर ले ले, और समय आने पर सब लोगों के सामने उस सामान को संघ के मुखिया को वापिस कर दे ।

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६७२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

(१) एतेन स्कन्धावाराटवीभेदो व्याख्यातः ।
(२) सङ्घमुख्यपुत्रमात्मसंभावितं वा सत्त्री ग्राहयेत्—'अमुष्य राज्ञः पुत्रस्त्वं शत्रुभयादिह न्यस्तोऽसि' इति । प्रतिपन्नं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य सङ्घेषु विक्रमयेत्; अवाप्तार्थस्तमपि प्रवासयेत् ।
(३) बन्धकीपोषकाः प्लवकनटनर्तकसौभिका वा प्रणिहिताः स्त्रीभिः परमरूपयौवनाभिः सङ्घमुख्यानुन्मादयेयुः । जातकामानामन्यतमस्य प्रत्ययं कृत्वाऽन्यत्र गमनेन प्रसभहरणेन वा कलहानुत्पादयेयुः । कलहे तीक्ष्णाः कर्म कुर्युः–हतोऽयमित्थं कामुकः' इति ।
(४) विसंवादितं वा मर्षयमाणमभिसृत्य स्त्री ब्रूयात्—असौ मां मुख्यस्त्वयि जातकामां बाधते, तस्मिन् जीवति नेह स्थास्यामि' इति घातमस्य प्रयोजयेत् ।


जब वे लोग उससे अपना सामान माँगे तो कह दे कि 'वह सामान मुखिया को वापिस कर दिया गया है।' इस रीति से सभी गुप्तचर, संघ के लोगों और मुखिया के बीच भेद डाल दें ।

( १ ) अपनी छावनी में प्रविष्ट आटविक लोगों को परस्पर फोड़ने के लिए भी उक्त उपायों को ही उपयोग में लाना चाहिए ।

( २ ) उपांशुवध : संघमुख्य के अभिमानी पुत्र को सभी गुप्तचर यह कह कर बहकायें कि 'तू अमुक राजा का पुत्र है, शत्रु भय से यहाँ रख दिया गया है'। यदि संघ मुख्य का पुत्र इस बात को मान जाय तो उसको कोष और सेना की सहायता देकर संघों के ऊपर आक्रमण के लिए भेज दिया जाय । उसके द्वारा जब अपने कार्य की सिद्धि हो जाय तो बाद में उसको भी प्रवासित कर दिया जाय या मार दिया जाय ।

( ३ ) कुलटा स्त्रियों का पालन-पोषण करने वाले या प्लवक, नट, नर्तक और सौभिक वेष में रहने वाले गुप्तचर अत्यंत सुन्दरी यौवन-संपन्न स्त्रियों के द्वारा संघमुख्यों को प्रमादी बनायें । जब स्त्रियों में बहुत से संघमुख्यों की आसक्ति हो जाय तो उनमें से किसी एक को किसी सांकेतिक स्थान पर स्त्री से मिलने का वायदा कर, ठीक समय पर उस स्त्री को वहाँ से किसी दूसरे संघमुख्य के द्वारा अन्यत्र भिजवा दें या उसके द्वारा अपहरण करा दें और बाद में इसी निमित्त उन संघमुख्यों का परस्पर झगड़ा करा दें । झगड़ा होने पर तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें से किसी एक संघ मुख्य को मार डालें और बाद में यह अफवाह उड़ा दें कि एक कामी पुरुष ने दूसरे कामी पुरुष का वध कर डाला है ।

( ४ ) यदि उन संघमुख्यों में एक व्यक्ति स्त्री के लिए झगड़ा न करना चाहे तो

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प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७३

(१) प्रसह्यापहृता वा वनान्ते क्रीडागृहे वापहर्तारं रात्रौ तीक्ष्णेन घातयेत् । स्वयं वा रसेन । ततः प्रकाशयेद्—'अमुना मे प्रियो हतः' इति ।
(२) जातकामं वा सिद्धव्यञ्जनः सांवननिकीभिरोषधीभिः संवास्य रसेनातिसन्धायोपगच्छेत् । तस्मिन्नपक्रान्ते सत्रिणः परप्रयोगमभिशंसेयुः ।
(३) आढ्यविधवा गूढाजीवा योगस्त्रियो वा दायनिक्षेपार्थं विवदमानाः संघमुख्यानुन्मादयेयुः इति । अदितिकौशिकस्त्रियो नर्तकीगायना वा प्रतिपन्नान् गूढवेश्मसु रात्रिसमागमप्रविष्टांस्तीक्ष्णा हन्युर्बद्ध्वा हरेयुर्वा ।
(४) सत्री वा स्त्रीलोलुपं सङ्घमुख्यं प्ररूपयेत्—'अमुष्मिन् ग्रामे दरिद्रकुलमपसृतं, तस्य स्त्री राजार्हा, गृहाणैनाम्' इति । गृहीतायामर्धमासान्तरं


उसके पास जाकर वह स्त्री कहे 'आपके प्रति मेरी दिली ख्वाहिश होने पर भी अमुक संघमुख्य मुझे आपके पास आने से रोकता है। उसके जीवित रहते मैं आपके पास न आ सकूँगी', इस प्रकार दूसरे संघमुख्य के वध का आयोजन किया जाय।

(१) अथवा बलात् अपहृत स्त्री तीक्ष्ण गुप्तचर द्वारा अपने अपहरण करने वाले व्यक्ति को मरवा डाले, अथवा स्वयं ही उसे विष देकर मार डाले। तदनन्तर यह अफवाह फैलाये कि 'अमुक संघमुख्य कामुक व्यक्ति ने मेरे प्रियतम को मार डाला है।'

(२) अथवा संघमुख्य जब उस स्त्री पर आसक्त हो जाय तो सिद्ध के वेष में रहने वाला गुप्तचर उस स्त्री पर वशीकरण मन्त्र प्रयोग करने के बहाने संघमुख्य व्यक्ति को विषमिश्रित औषधियाँ देकर मार डाले और स्वयं वहाँ से भाग जाय। उसके भाग जाने पर सभी गुप्तचर इस अफवाह को उड़ायें कि 'प्रतिद्वंद्वी किसी कामी पुरुष की प्रेरणा से ही सिद्ध-पुरुष के द्वारा इसको विष देकर मारा है।'

(३) कोई धनी विधवा, गूढाजीवा (गरीबी के कारण व्यभिचार करने वाली सधवा), या स्त्री का कपटवेष धारण करने वाले पुरुष दायभाग या अमानत आदि का विवाद लेकर निर्णय के बहाने संघमुख्यों के पास जाकर उन्हें अपने वश में कर ले। अथवा अदिति (तरह-तरह के देवताओं के चित्र दिखाकर जीविका कमाने वाली) स्त्रियाँ, या कौशिक स्त्रियाँ (सँपेरों की स्त्रियाँ) या नाचने-गाने वाली स्त्रियाँ ही संघमुख्यों को अपने वश में करें। जब संघमुख्य उन स्त्रियों के जाल में फँस जायें और उनसे सम्भोग करने के लिए किसी निश्चित स्थान का संकेत कर दें, तब एकान्त में उन स्थानों पर रात में संभोग करते हुए संघमुख्यों को तीक्ष्ण गुप्तचर मार डाले या बांध कर उनका अपहरण कर लें।

(४) अथवा स्त्रीलोलुप संघमुख्य को सभी गुप्तचर यह कह कर बहकायें कि 'अमुक गाँव का एक गरीब व्यक्ति जीविकोपार्जन के लिए विदेश चला गया है।

४३ कौ०

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६७४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ ग्यारहवां अधिकरण

सिद्धव्यञ्जनो दूष्यः सङ्घमुख्यमध्ये प्रक्रोशेत—‘असौ मे मुख्यां भार्यां स्नुषां भगिनीं दुहितरं वाधिचरति’ इति । तं चेत्सङ्घो निगृह्णीयात्, राजैनमुपगृह्य विगुणेषु विक्रमयेत् । अनिगृहीते सिद्धव्यञ्जनं हि रात्रौ तीक्ष्णाः प्रवासयेयुः । ततस्तद्व्यञ्जनाः प्रक्रोशेयुः—असौ ब्रह्महा ब्राह्मणीजारश्च’ इति ।
(१) कार्तान्तिकव्यञ्जनो वा कन्यामन्येन वृतामन्यस्य प्ररूपयेत्—‘अमुष्य कन्या राजपत्नी राजप्रसविनी च भविष्यति, सर्वस्वेन प्रसह्य वैनां लभस्व’ इति । अलभ्यमानायां परपक्षमुद्धर्षयेत् । लब्धायां सिद्धः कलहः ।
(२) भिक्षुकी वा प्रियभार्यं मुख्यं ब्रूयात्—‘असौ ते मुख्यो यौवनोत्सिक्तो भार्यायां मां प्राहिणोत्; तस्याहं भयाल्लेख्यमाभरणं गृहीत्वाऽऽगतास्मि,


उसकी रूपवती स्त्री राजा के योग्य है। आप उसको ले लें।' यदि वह संघमुख्य उस स्त्री को ग्रहण कर ले तो पन्द्रह दिन के बाद सिद्ध-वेषधारी दूष्य पुरुष संघमुख्यों के पास आकर शोर मचाता हुआ इस प्रकार कहे 'यह संघमुख्य मेरी पत्नी या पुत्रवधू या बहिन या लड़की को बलात् उपभोग करता है।' इस बात को सुनकर संघ के लोग यदि उस संघमुख्य को गिरफ्तार कर लें तो विजिगीषु राजा उस गिरफ्तार व्यक्ति को अपनी ओर मिलाकर, विरोधी संघों के साथ उसको युद्ध करने के लिए खड़ा कर दे। यदि उसको गिरफ्तार न किया जाय तो सिद्ध के वेष में आये हुए उस दूष्य पुरुष को तीक्ष्ण गुप्तचर रात में मार डालें। उसके बाद वही तीक्ष्ण गुप्तचर सिद्ध का वेष धारण कर यह शोर मचाये कि 'अमुक संघमुख्य ब्रह्म-हत्यारा है। यह ब्राह्मणी का बलात् उपभोग करता है और इसी ने ब्राह्मण को भी मार डाला है।'

(१) ज्योतिषी के वेष में रहने वाले सभी गुप्तचर किसी दूसरे संघमुख्य द्वारा वरण की हुई कन्या को किसी दूसरे ही संघमुख्य के लिए बतलाकर उससे कहे कि 'अमुक व्यक्ति की कन्या से जो व्याह करेगा वह राजा होगा और उससे जो पुत्र होगा वह भी राजा बनेगा। इसलिए अपना सर्वस्व लगाकर अथवा बलात्कार द्वारा ही उसको अवश्य प्राप्त करो।' इसके बाद यत्न करने पर भी यदि वह संघमुख्य उस कन्या को प्राप्त न कर सके तो जिस घर में उस कन्या का विवाह हुआ है उन लोगों को इसके विरुद्ध उभारे। यदि वह कन्या को प्राप्त कर ले तब दोनों संघमुख्यों में झगड़ा होना निश्चित है।

(२) अथवा भिक्षुकी के वेष में रहने वाली गुप्तचर पर किसी ऐसे संघमुख्य के पास, जो कि अपनी स्त्री पर बुरी तरह आसक्त है, जाकर यह कहे 'अपने यौवन के अभिमान में अमुक संघमुख्य ने आपकी स्त्री के साथ समागम करने की इच्छा से दूती बनाकर मुझे भेजा है, भय से विवश होकर वह प्रेमपत्र और यह आभूषण

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प्र० १६०-१६१ : अ० १ ] भेदक-प्रयोग और उपांशुदण्ड ६७५

निर्दोषो ते भार्या; गूढमस्मिन् प्रतिकर्तव्यम् । अहमपि तावत्प्रतिपत्स्यामि' इति । एवमादिषु कलहस्थानेषु स्वयमुत्पन्ने वा कलहे तीक्ष्णैरुत्पादिते वा हीनपक्षं राजा कोशदण्डाभ्यामुपगृह्य विगुणेषु विक्रमयेदपवाहयेद् वा ।

(१) सङ्घेष्वेवमेकराजो वर्तेत । सङ्घाश्चाप्येवमेकराजादेतेभ्योऽतिसन्धानेभ्यो रक्षेयुः ।

(२) सङ्घमुख्यश्च सङ्घेषु न्यायवृत्तिर्हितः प्रियः ।
दान्तो युक्तजनस्तिष्ठेत्सर्वचित्तानुवर्तकः ॥

इति संघवृत्ते एकादशेऽधिकरणे भेदोपादानानि उपांशुदण्डश्चेति प्रथमोऽध्यायः;
आदितश्चतुस्त्रिंशदधिकशततमः ।

समाप्तमिदं संघवृत्तं नाम एकादशमधिकरणम् ।

— : ० : —


आदि उपहार लेकर मुझे यहाँ आना पड़ा है । आपकी पत्नी सर्वथा निर्दोष है । इसलिए आप चुपचाप ही उस संघमुख्य का वध कर डालें । जब तक उसकी हत्या नहीं की जायगी तब तक डर के मारे मैं भी यहाँ से नहीं जा सकती हूँ ।' इस प्रकार कलह के कारणों के उत्पन्न होने पर अथवा तीक्ष्ण आदि गुप्तचरों द्वारा उत्पन्न किये जाने पर कमजोर संघमुख्य को विजिगीषु कोष तथा सेना की यथोचित सहायता देकर अपने वश में कर ले और अवसर आने पर उसे विरोधी संघमुख्यों के मुकाबले में युद्ध के लिए तैयार कर दे । यदि वह युद्ध करने में असमर्थ हो तो उसे अपने देश से बाहर कर दे ।

( १ ) इस प्रकार विजिगीषु उन संघमुख्यों पर अपना आधिपत्य जमाये रखे और संघों को भी उचित है कि वे इस प्रकार की चेष्टा करने वालों तथा उनके द्वारा फैलाये गये षड्यन्त्रों से अपनी रक्षा करते रहें ।

( २ ) अतः संघमुख्य को चाहिए कि वह संघों के बीच में न्यायपूर्ण हितकारी और प्रिय व्यवहार करे । कभी भी उद्धत होकर बर्ताव न करे और अपने अनुकूल व्यक्तियों को सदा अपने समीप रखे तथा सब संघों के व्यक्तियों की राय से राज-व्यवहार चलाये ।

संघवृत्त नामक ग्यारहवें अधिकरण में भेदोपादान-उपांशुदण्ड नामक पहला अध्याय समाप्त ।

— : ० : —

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(प्रस्तुत पृष्ठ अत्यधिक धुंधला/प्रकाश के आधिक्य (faded/overexposed) के कारण लगभग पूर्णतः अपाठ्य है।)


कठोपनिषद् [...]

(उपर्युक्त पृष्ठ का मूल पाठ अत्यधिक क्षीण होने के कारण स्पष्ट रूप से पठनीय नहीं है।)

बारहवाँ अधिकरण

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बारहवाँ अधिकरण

आबलीयस

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प्रकरण १६२दूतकर्माणि
अध्याय १

(१) बलीयसाऽभियुक्तो दुर्बलः सर्वत्रानुप्रणतो वेतसधर्मा तिष्ठेत् । 'इन्द्रस्य हि स प्रणमति यो बलीयसो नमति' इति भारद्वाजः ।

(२) 'सर्वसन्दोहेन बलानां युध्येत, पराक्रमो हि व्यसनमपहन्ति । स्वधर्मश्चैष क्षत्रियस्य, युद्धे जयः पराजयो वा' इति विशालाक्षः ।

(३) नेति कौटिल्यः । सर्वत्रानुप्रणतः कुलैडक इव निराशो जीविते वसति । युध्यमानश्चाल्पसैन्यः समुद्रमिवाप्लवोऽवगाहमानः सीदति । तद्विशिष्टं तु राजानमाश्रितो दुर्गमविषह्यं वा चेष्टेत ।


दूतकर्म

(१) 'जब किसी दुर्बल राजा पर कोई बलवान् राजा आक्रमण करे तो उसे चाहिए कि वह हर प्रकार का अपमान सहन करता हुआ उसके सामने बेत की तरह झुक जाय। जो अपने से बलवान् राजा के सामने झुकता है, वह दंड के सामने झुकता है'—यह आचार्य भारद्वाज का मत है।

(२) किन्तु इसके विरुद्ध आचार्य विशालाक्ष की राय है कि 'दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपनी सारी सैन्य-शक्ति को लगाकर बलवान् राजा के साथ युद्ध करे; क्योंकि पराक्रम ही आपत्तियों को नष्ट करता है और पराक्रम तो क्षत्रिय का धर्म है। युद्ध में विजय हो या पराजय, क्षत्रिय को अपने क्षात्रधर्म का पालन करना चाहिए; शत्रु के आगे कदापि न झुकना चाहिए।'

(३) किन्तु आचार्य कौटिल्य उक्त दोनों मतों से सहमत नहीं है। उसका कहना है कि 'जो दुर्बल राजा हर तरह का अपमान होने पर भी नम्र ही बना रहता है उसका जीवन वैसा ही दूभर हो जाता है, जैसा कि अपने समूह से अलग हुए मेंढे का। इसी प्रकार थोड़ी सेना को लेकर जो युद्ध में जाता है उसकी वही स्थिति है; जो तैरने के साधनों को साथ लिये बिना ही समुद्र में कूद पड़ता है। इसलिए दुर्बल राजा को चाहिए कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी राजा के सामने या उससे भी अधिक शक्तिशाली किसी दूसरे राजा का आश्रय प्राप्त करे। अथवा ऐसे दुर्ग में जाकर शत्रु का मुकाबला करे, जो कि अभेद्य हो।

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६८० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण

(१) त्रयोऽभियोक्तारो धर्मलोभासुरविजयिन इति । तेषामभ्यवपत्त्या धर्मविजयी तुष्यति; तमभ्यवपद्येत परेषामपि भयात् । भूमिद्रव्यहरणेन लोभविजयी तुष्यति; तमर्थेनाभ्यवपद्येत । भूमिद्रव्यपुत्रदारप्राणहरणेन असुरविजयी, तं भूमिद्रव्याभ्यामुपगृह्याग्राह्यः प्रतिकुर्वीत ।
(२) तेषामुत्तिष्ठमानं सन्धिना मंत्रयुद्धेन कूटयुद्धेन वा प्रतिव्यूहेत । शत्रुपक्षमस्य सामदानाभ्यां, स्वपक्षं भेददण्डाभ्याम् । दुर्गं राष्ट्रं स्कन्धावारं वास्य गूढाः शस्त्ररसाग्निभिः साधयेयुः ।
(३) सर्वतः पार्ष्णिमस्य ग्राहयेत्, अटवीभिर्वा राज्यं घातयेत्, तत्कुलीनावरुद्धाभ्यां वा हारयेत् ।
(४) अपकारान्तेषु चास्य दूतं प्रेषयेत् । अनपकृत्य वा सन्धानम् । तथाप्यभिप्रयान्तं कोशदण्डयोः पादोत्तरमहोरात्रोत्तरं वा सन्धि याचेत ।

(१) दुर्बल राजा पर आक्रमण करने वाला बलवान् राजा तीन प्रकार का होता है : १. धर्मविजयी २. लोभविजयी और ३. असुरविजयी । उनमें धर्मविजयी तो आत्मसमर्पण करने से संतुष्ट हो जाता है । उस धर्मविजयी राजा की शाखा में जाने से दुर्बल राजा अपने वर्तमान संकट को तो दूर कर ही लेता है, वरन् दूसरे बलवान् राजाओं से भी वह अपनी रक्षा कर लेता है लोभविजयी राजा भूमि और धन देने से संतुष्ट हो जाता है । इसलिए दुर्बल राजा धनादि देकर उसको संतुष्ट करे । किन्तु असुरविजयी राजा तो भूमि, द्रव्य, स्त्री, पुत्र और प्राणों तक ले लेने के बाद ही सूझता है । इसलिए उससे दूर रहकर ही उसको भूमि आदि देकर अपने अनुकूल बनाना चाहिए या संधि आदि के द्वारा उसका प्रतीकार करना चाहिए ।

(२) यदि उक्त राजाओं में से कोई राजा दुर्बल राजा पर आक्रमण करे तो संधि, मंत्र-युद्ध अथवा कूट-युद्ध के द्वारा उसका मुकाबला करना चाहिए । उस बलवान् अभियोक्ता के शत्रुपक्ष को साम तथा दाम द्वारा अपने अनुकूल बनाना चाहिए और अपने प्रकृतिवर्ग को भेद तथा दण्ड द्वारा अपने वश में रखना चाहिए । उस प्रबल राजा के दुर्ग, राष्ट्र तथा छावनियों को अपने गुप्तपुरुषों द्वारा शस्त्र, विष तथा अग्नि आदि से नष्ट कर देना चाहिए ।

(३) यथावसर उसके आगे-पीछे, अगल-बगल से छापा मारना चाहिये; अथवा आटविक पुरुषों द्वारा उसके दुर्ग, जनपद को नष्ट करवा देना चाहिए; अथवा उसके द्वारा अवरुद्ध उसके किसी बंधु-बांधव द्वारा ही उसके राज्य का अपहरण करवा देना चाहिए ।

(४) इस प्रकार उसका अनिष्ट कर देने के बाद संधि के लिए उसके पास अपना दूत भेजना चाहिए । अथवा यदि उसका अनिष्ट न किया जा सके तो उससे

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प्र० १६२ : अ० १ ] दूतकर्म ६८१

(१) स चेद्दण्डसन्धि याचेत, कुण्ठमस्मै हस्त्यश्वं दद्यात् । उत्साहितं वा गरयुक्तम् ।
(२) पुरुषसन्धि याचेत, दूष्यामित्राटवीबलमस्मै दद्याद्योगपुरुषाधिष्ठितम् । तथा कुर्याद्यथोभयविनाशः स्यात् । तीक्ष्णबलं वाऽस्मै दद्यात्, यदवमानितं विकुर्वीत । मौलमनुरक्तं वा, यदस्य व्यसनेऽपकुर्यात् ।
(३) कोशसन्धि याचेत, सारमस्मै दद्यात् । यस्य क्रेतारं नाधिगच्छेत्; कुप्यमयुद्धयोग्यं वा ।
(४) भूमिसन्धि याचेत, प्रत्यादेयां नित्यामित्रामनपाश्रयां महाक्षयव्ययनिवेशां वास्मै भूमिं दद्यात् ।
(५) सर्वस्वेन वा राजधानीवर्जेन सन्धि याचेत बलीयसः ।


संधि की याचना करनी चाहिए। यदि वह इतने पर भी रजामंद न हो और चढ़ाई करने पर ही आमादा हो तो पूर्वप्रतिज्ञात धन में अपने कोष तथा सेना का चौथाई भाग अधिक बढ़ाकर उससे संधि के लिए याचना करनी चाहिए।

( १ ) यदि वह बलवान् अभियुक्ता संधि की शर्तों में केवल सेना को ही लेना चाहे तो सर्वथा अशक्त हाथी, घोड़े अथवा विष खिलाकर सशक्त हाथी, घोड़े देकर संधि कर लेनी चाहिए ।

( २ ) यदि वह संधि की शर्तों में पैदल सेना की माँग करे तो अपने गुप्तचरों को साथ मिलाकर दूष्यबल, शत्रुबल तथा आटविकबल शर्तनामा में देने चाहिए और इस प्रकार का प्रबंध करे कि अपनी वे दूष्य आदि सेनायें तथा शत्रु की सेनायें नष्ट हो जायें । अथवा ऐसे तीक्ष्ण बल को देना चाहिए जो थोड़ी सी बात पर बिगड़ उठे और शत्रु का अपकार करने के लिए तैयार हो जाय । अथवा वंशपरंपरा से चली आती अनुरक्त तथा विश्वासी सेना को संधि में देना चाहिए, जो आपत्ति के समय शत्रु का अपकार कर सके ।

( ३ ) यदि अभियुक्ता संधि के बदले में धन लेना पसंद करे तो ऐसे बहुमूल्य रत्न आदि दिये जायें, जिन्हें कोई न खरीद सके अथवा ऐसा सामान दिया जाय जो युद्ध में काम न आ सके ।

( ४ ) यदि अभियुक्ता भूमिसंधि की माँग करे तो उसको ऐसी भूमि दी जाय, जिसको आसानी से वापस लिया जा सके अथवा जिसके स्थायी शत्रु हों या जिसमें कोई दुर्ग न हो और जिसमें अधिक क्षय-व्यय की आशंका हो ।

( ५ ) अथवा जो अत्यंत बलवान् अभियुक्ता हो उसको राजधानी के अलावा अपना सर्वस्व देकर, उससे संधि कर लेनी चाहिए ।

आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में दूतकर्म नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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६४२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ बारहवां अधिकरण

(१) यत्प्रसह्य हरेदन्यस्तत्प्रयच्छेदुपायतः ।
रक्षेत्स्वदेहं न धनं का ह्यनित्ये धने दया ॥

इति आबलीयसनाम्नि द्वादशेऽधिकरणे दूतककर्मणि सन्धियाचनं नाम प्रथमोऽध्यायः; आदितः पञ्चत्रिंशदधिकशततमः ।

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( १ ) यदि कोई बलवान् अभियोक्ता किसी दुर्बल राजा से बलात् धन आदि का अपहरण करे तो वह धन संधि आदि के बहाने उसी को दे देना चाहिए । धन की की अपेक्षा अपने प्राणों की अधिक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि अनित्य धन पर अधिक मोह करना ठीक नहीं है । यदि जीवन रहेगा तो नष्ट हुआ धन फिर से पैदा किया जा सकता है ।

आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में दूतकर्म नामक पहला अध्याय समाप्त ।

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प्रकरण १६३मन्त्रयुद्धम्
अध्याय २

(१) स चेत्सन्धौ नावतिष्ठेत, ब्रूयादेनम्—‘इमे षड्वर्गवशगा राजानो विनष्टाः, तेषामनात्मवतां नार्हसि मार्गमनुगन्तुम्, धर्ममर्थं चावेक्षस्व, मित्रमुखा ह्यमित्रास्ते ये त्वां साहसधर्ममर्थातिक्रमं व ग्राहयन्ति, शूरैस्त्यक्तात्मभिः सह योद्धुं साहसं जनक्षयमुभयतः कर्तुमधर्मः; दृष्टमर्थं मित्रमदुष्टं च त्यक्तुमर्थातिक्रमः। मित्रावांश्च स राजा भूयश्चैतेन अर्थेन मित्राण्युद्योजयिष्यति, यानि त्वा सर्वतोऽभियास्यन्ति। न च मध्यमउदासीनयोर्मण्डलस्य वा परित्यक्तः, भवांस्तु परित्यक्तो ये त्वां समुद्युक्तमुपप्रेक्षन्ते—‘भूयः क्षयव्ययाभ्यां युज्यतां, मित्राच्च भिद्यताम्, अथैनं परित्यक्तमूलं सुखेनोध्छेत्स्याम’ इति। स भवान् नार्हति मित्रमुखानाममित्राणां श्रोतुं मित्राण्युद्वेज-


मंत्रयुद्ध

( १ ) यदि प्रबल अभियोक्ता संधि के लिए राजी न हो तो उससे कहा जाय कि 'देखिए; काम, क्रोधादि अरि षड्वर्ग के चंगुल में फँस कर इन विनष्ट हुए राजाओं का उदाहरण आपके सामने प्रत्यक्ष है, आपको ऐसे नीच-राजाओं का अनुसरण करना शोभा नहीं देता है, अपने धर्म और अर्थ की ओर तो देखिए। आपके ये ऊपरी मित्र वस्तुतः आपके भीतरी शत्रु हैं, जो आपको युद्ध, अधर्म और अपव्यय की ओर प्रेरित कर रहे हैं, अपने प्राणों को हथेली पर रखकर दूसरे बलवान् राजा के साथ युद्ध करना ही तो साहस है, उसमें दोनों ओर के आदमियों का नाश होता है, यही तो अधर्म है; विद्यमान धन और अत्यन्त सज्जन मित्र को छोड़ने के लिए आपको जो प्रोत्साहित किया जा रहा है, वही तो धन का अपव्यय है; उस राजा के और भी मित्र हैं, इसी धन से वह अपने उन मित्रों को साथ लेकर आप पर ही आक्रमण कर देगा; मध्यम और उदासीन राजा भी उसकी मदद के लिए तैयार बैठे हैं; लेकिन आपको तो उन्होंने त्याग दिया है, युद्ध के लिए तैयार आपको वे लोग चुपचाप देख रहे हैं कि आपके प्रभूत जन-धन का नाश हो जाय और आपका अपने मित्र के साथ मतभेद हो जाय, इस प्रकार जब आपकी सारी शक्ति क्षीण हो जायेगी और जब आप अपनी राजधानी को छोड़कर युद्ध में चले जायेंगे तो वे बड़ी सरलता से आपका उच्छेद कर देंगे, इसलिए आपके लिए यही उचित है कि ऊपर से मित्र बने

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६८४ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ बारहवाँ अधिकरण


यितुम्, अमिश्रांश्च श्रेयसा योक्तुम्, प्राणसंशयमनर्थं चोपगन्तुम्' इति । यच्छेत् ।

(१) तथापि प्रतिष्ठमानस्य प्रकृतिकोपमस्य कारयेद् यथा संघवृत्ते व्याख्यातं, योगवामने च । तीक्ष्णरसदप्रयोगं च । यदुक्तमात्मरक्षितके रक्ष्यं, तत्र तीक्ष्णान् रसदांश्च प्रयुञ्जीत ।

(२) बन्धकीपोषकाः परमरूपयौवनाभिः स्त्रीभिः सेनामुख्यानुन्मादयेयुः । बहूनामेकस्यां द्वयोर्वा मुख्ययोः कामे जाते तीक्ष्णाः कलहानुत्पादयेयुः । कलहे पराजितपक्षं परत्रापगमने यात्रासाहाय्यदाने वा भर्तुर्योजयेयुः ।

(३) कामवशान् वा सिद्धव्यञ्जनाः सांवननिकीभिरोषधिभिरतिसन्धानाय मुख्येषु रसं दापयेयुः ।

(४) वैदेहकव्यञ्जनो वा राजमहिष्याः सुभगायाः प्रेष्यामासन्नां काम-


उन भीतरी शत्रुओं का आप विश्वास न करें, अपने मित्रों को खिन्न कर शत्रुओं के कल्याण-साधन मत बनायें, अपने प्राणों को विपत्ति में डालकर अपने धन का इस प्रकार अपव्यय न कीजिए।' इस प्रकार समझाये गये राजा को जिस शर्त पर संधि के लिए तैयार किया जाय, उस शर्त को पूरा करके संधि को पक्की बनाने के लिए यत्न किया जाना चाहिए ।

(१) यदि इस प्रकार समझाने-बुझाने पर भी वह राजी न हो और युद्ध के लिए तैयार हो तो संघवृत्त तथा योगवृत्त अधिकरणों में निर्दिष्ट उपायों के द्वारा उसके प्रकृतिमंडल को कुपित कर देना चाहिए । उस आक्रमणकारी को मारने के लिए तीक्ष्ण तथा रसद गुप्तचर नियुक्त किये जाँय । आत्मरक्षित प्रकरण में जिन रक्षायोग्य स्थानों का निरूपण किया गया है वहाँ पर तीक्ष्ण तथा रसद आदि गुप्त-चरों को नियुक्त कर उस राजा का काम तमाम कर देना चाहिए ।

(२) कुलटा स्त्रियों का पालन-पोषण करने वाले गुप्तचरों को चाहिए कि वे सुन्दर रूपवती युवती स्त्रियों के द्वारा सेना के प्रमुख व्यक्तियों को प्रमादी बनवा दें, जब बहुत सारे अथवा दो सेनामुख्यों को एक ही स्त्री में कामासक्ति हो जाय तब तीक्ष्ण गुप्तचर उनमें परस्पर कलह पैदा कर दें । आपसी झगड़े में जो हार जाय उसको विजिगीषु के पक्ष में भेज दिया जाय और जब विजिगीषु आक्रमण करने लगे तब सहायतार्थ उसको नियुक्त किया जाय ।

(३) अथवा जो सेना मुख्य कामासक्त हों, उन्हें सिद्ध के वेश में रहने वाले गुप्तचर वशीकरण द्वारा उस सुन्दरी युवती को वश में करने के उपायों का बहाना करके विषमिश्रित औषधि खिलाकर मार डालें ।

(४) व्यापारी के वेश में रहने वाला गुप्तचर अति सुन्दरी पटरानी की अंतरंग

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प्र० १६३ : अ० २ ] मन्त्रयुद्ध ६८५

निमित्तमर्थेनाभिवृष्य परित्यजेत् । तस्यैव परिचारकव्यञ्जनोपदिष्टः सिद्धव्यञ्जनः सांवननिकीमोषधिं दद्याद्, वैदेहकशरीरेऽवघातव्येति । सिद्धे सुभगया अप्येनं योगमुपदिशेद्—राजशरीरेऽवघातव्या इति । ततो रसेनातिसन्दध्यात् ।
(१) कार्तान्तिकव्यञ्जनो वा महामात्रं राजलक्षणसम्पन्नं क्रमाभिनीतं ब्रूयात् । भार्यामस्य भिक्षुकी—'राजपत्नी राजप्रसविनी वा भविष्यसि' इति ।
(२) भार्याव्यञ्जना वा महामात्रं ब्रूयात्—'राजा किल मामवरोधयिष्यति, तवान्तिकाय पत्रलेख्यमाभरणं चेदं परिव्राजिकयाऽऽहृतम्' इति ।
(३) सूदारालिकव्यञ्जनो वा रसप्रयोगार्थं राजवचनामर्थं चास्य


सेविका को प्रचुर धन दे कर अपने उपभोग के लिए उसे फुसलाये और एक बार उसका भोग कर दुबारा उसके पास न जाये । फिर उसी गुप्तचर से प्रेरित होकर दूसरा सिद्ध वेषधारी उस पटरानी की सेविका को वशीकरण औषधि देकर उससे कहे कि 'इस औषधी को अपने व्यापारी प्रेमी के शरीर पर छिड़क देना, वह तुम्हारे वश में हो जायेगा ।' जब दिखावा मात्र के लिए वह व्यापारी वेषधारी गुप्तचर उस सेविका के वश में हो जाय तब उस सुन्दरी पटरानी को भी वशीकरण के प्रयोग का उपदेश दिया जाय । उससे कहा जाय कि 'इस औषधि को राजा के शरीर पर छिड़क देने से वह तुम्हारे काबू में हो जायेगा ।' उस वशीकरण योग में विष मिलाकर इस प्रकार राजा का वध कर दिया जाय ।

(१) अथवा ज्योतिषी ( कार्तान्तिक ) के वेश में रहने वाला गुप्तचर, विश्वासी राजलक्षण-संपन्न महामात्र को यह कहकर फुसलाये कि 'तुम अवश्य ही राजा बनोगे ।' और भिक्षुकी गुप्तचर स्त्री द्वारा उस महामात्र की पत्नी को कहला दिया जाय कि 'तुम पटरानी बनोगी और तुम राजा होने योग्य पुत्र को पैदा करोगी ।' इस प्रकार राजा बनने की इच्छा रखने वाले महामात्र का राजा से विरोध हो जायेगा ।

(२) अथवा महामात्र की स्त्री बनकर रहने वाली छद्मवेश स्त्री उससे कहे कि 'राजा मुझे अवश्य ही अपने अंतःपुर में रोक लेगा । दूती द्वारा लाये गये तुम्हारे नाम के इस पत्र और इन आभरणों से यह साफ जाहिर होता है ।' ऐसा करने से भी महामात्र का राजा के साथ विरोध हो जायेगा ।

(३) अथवा रसोइया ( सूद ) और मांस बनाने वालों ( आरालिक ) के वेष में रहने वाले गुप्तचर विष का प्रयोग करने के लिए राजा के गुप्त कथन को तथा इस लोभ में डालने के लिए दिये हुए राजा के धन को कि, महामात्र को मारना है,

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६८६कौटिल्य का अर्थशास्त्र[ बारहवां अधिकरण

लोभनीयमभिनयेत् । तदस्य वैदेहकव्यञ्जनः प्रतिसन्दध्यात्, कार्यसिद्धिं च ब्रूयात् । एवमेकेन द्वाभ्यां त्रिभिरित्युपायैरेकैकस्य महामात्रं विक्रमायाप-गमनाय वा योजयेदिति ।

(१) दुर्गेषु चास्य शून्यपालालाञ्छाः सत्रिणः पौरजानपदेषु मैत्रोनिमित्त-मावेदयेयुः—‘शून्यपालेनोक्ता योधाश्च अधिकरणस्थाश्च—‘कृच्छ्रगतो राजा जीवन्नागमिष्यति न वा; प्रसह्य वित्तमार्जमध्वममित्रांश्च हत’ इति । बहुली-भूते तीक्ष्णाः पौरान् निशास्वाहारयेयुः, मुख्यांश्चाभिहन्युः—‘एवं क्रियन्ते, ये शून्यपालस्य न शुश्रूषन्ते’ इति । शून्यपालस्थानेषु च सशोणितानि ‘शस्त्र-वित्तबन्धनान्युत्सृजेयुः । ततः सत्रिणः—‘शून्यपालो घातयति विलोपयति च’ इत्यावेदयेयुः ।

(२) एवं जानपदान्समाहर्तुर्भेदयेयुः ।


महामात्र के सामने प्रकट कर दें । ठीक उसी समय व्यापारी के वेष में रहने वाला गुप्तचर महामात्र के पास आकर साक्षी रूप में कहे कि ‘राजा के कहने से मैंने तुम्हारे सूद और आरालिक को विष दिया था; मैं नहीं जानता कि वे किस उद्देश्य के लिए ले गये थे ।’ और यह भी बता दे कि ‘इस विष से तत्काल ही मृत्यु हो सकती है ।’ इस प्रकार विजिगीषु के गुप्तचर एक, दो या तीनों प्रयोगों से महामात्र को राजा के विरुद्ध बनाकर दोनों को युद्ध के लिए उभाड़ दें ।

( १ ) शत्रु के स्थानीय दुर्गों में रहने वाले शून्यपाल की ओर सभी गुप्तचर नगरवासियों तथा जनपदवासियों से कहे ‘शून्यपाल ने सेनाओं और राजकर्मचारियों से कहा है कि राजा महान् विपत्ति में फँस गया है । कहा नहीं जा सकता कि वह जीवित लौट भी सकेगा या नहीं ! इसलिए बलपूर्वक आप यथेच्छया जनता से धन लूटें और जो बाधा डाले उसको मार डालें ।’ जब शून्यपाल की यह आज्ञा सर्वत्र फैल जाय तब तीक्ष्ण गुप्तचर अपने आदमियों को रात में नगर की लूट-पाट करने के लिए प्रेरित करें और नगर के प्रमुख व्यक्तियों को मरवा डालें । सब जगह इस बात को फैला दें कि ‘जो शून्यपाल का कहना न मानेंगे उनकी यही हालत की जायेगी ।’ इसी बीच वे रक्त से भीगे अस्त्र-शस्त्र तथा रस्सी आदि को शून्यपाल के स्थान में रखवा दें । तदनन्तर सभी गुप्तचर इस बात का प्रचार करें कि ‘यह शून्यपाल ही सब लोगों को मरवाता तथा लुटवाता है’ इस तरीके से शून्यपाल तथा प्रजा में लड़ाई करा दी जाय ।

( २ ) इसी प्रकार समाहर्त्ता ( टैक्स कलैक्टर ) और जनपदवासियों के बीच फूट डाली जाय ।

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प्र० १६३ : अ० २ ] मन्त्रयुद्ध ६८७

(१) समाहर्तृपुरुषांस्तु ग्राममध्येषु रात्रौ तीक्ष्णा हत्वा ब्रूयुः—'एवं क्रियन्ते, ये जनपदमधर्मेण बाधन्ते' इति ।
(२) समुत्पन्ने दोषे शून्यपालं समाहर्त्तारं वा प्रकृतिकोपेन घातयेयुः । तत्कुलीनमवरुद्धं वा प्रतिपादयेयुः ।
(३) अन्तःपुरपुरद्वारद्रव्यधान्यपरिग्रहान् ।
दहेयुस्तांश्च हन्युर्वा ब्रूयुरस्यार्तवादिनः ॥

इति आबलीयसे द्वादशेऽधिकरणे मन्त्रयुद्धं नाम द्वितीयोऽध्यायः;
आदितः षट्त्रिंशदधिकशततमः ।

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( १ ) समाहर्त्ता के आदमियों को रात के समय गाँव के मध्य में मारकर तीक्ष्ण गुप्तचर यह प्रचार करें कि 'जो लोग अधर्मपूर्वक प्रजावर्ग को पीड़ित करते हैं उनकी यही दशा होती है ।'

( २ ) जब शून्यपाल और समाहर्ता, दोनों के ऐसे कुकर्म सर्वत्र फैल जायें और उनसे प्रजाजन पूरी तरह कुपित हो जायें, तब सभी गुप्तचर उनका भी वध कर डालें और उस शत्रु राजा के किसी बन्धु-बांधव को या नजरबन्द राजकुमार को सिंहासन पर बैठा दें ।

( ३ ) उसके बाद तीक्ष्ण गुप्तचर अंतःपुर, पुरद्वार ( नगर का प्रधान द्वार ), द्रव्य परिग्रह ( लकड़ी-वस्त्र के गोदाम ) और धान्य परिग्रह ( अन्नभंडार ) आदि को जला दें तथा उन स्थानों के रक्षकों को मार डालें। तदनन्तर स्वयं इस दुर्घटना के लिए हार्दिक दुःख प्रकट करते हुए, इस कार्य को नगर या गाँव के लोगों का किया हुआ बतायें ।

आबलीयस नामक बारहवें अधिकरण में मन्त्रयुद्ध नामक दूसरा अध्याय समाप्त ।

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