सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला द्वारा

DevanagariSanskritpublished918 पृष्ठ

८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

८६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण

दण्डान् विस्तीर्णाः विस्तारादवगाधाः पादोनमर्धं वा त्रिभागमूला मूले चतुरश्राः पाषाणोपहिताः पाषाणेष्टकावद्धपार्श्वा वा तोयान्तिकीरागन्तु-तोयपूर्णा वा सपरवाहाः पद्मग्राहवतीः ।

(१) चतुर्दण्डावकृष्ट परिखायाः षड्दण्डोच्छ्रितमवरुद्धं तद्विगुण-विष्कम्भं खाताद्वप्रं कारयेत्; ऊर्ध्वचयं मञ्चपृष्ठं कुम्भकुक्षिकं वा हस्ति-भिर्गोभिश्च क्षुण्णं कण्टकिगुल्मविषवल्लीप्रतानवन्तम् । पांसुशेषेण वास्तु-च्छिद्रं वा पूरयेत् ।

(२) वप्रस्योपरि प्राकारं विष्कम्भद्विगुणोत्सेधमैष्टकं द्वादशहस्ता-दूर्ध्वमोजं युग्मं वा आचतुर्विंशतिहस्तादिति कारयेत् । रथचर्यासञ्चारं


का प्रबन्ध भी वहाँ होना चाहिए। नगर में आने-जाने के लिए जलमार्ग और स्थल-मार्ग दोनों की सुविधा होनी चाहिए। नगर के चारों ओर एक-एक दंड (चार हाथ) की दूरी पर तीन खाइयाँ खुदवानी चाहिए। वे खाइयाँ क्रमशः चौदह, बारह और दस दंड चौड़ी होनी चाहिए। जितनी वे चौड़ी हो उससे चौथाई अथवा आधी गहरी होनी चाहिए। अथवा चौड़ाई का तीसरा हिस्सा गहरी भी हो सकती है। उन खाइयों की तलहटी बराबर चौरस एवं मजबूत पत्थरों से बँधी हो। उनकी दीवारें पत्थर अथवा ईंटों से मजबूत बनी हुई हों। कहीं-कहीं खाइयाँ इतनी कम गहरी हों कि जहाँ से जल बाहर की ओर छलकने लगे अथवा किसी नदी के जल से इन्हें भरा जा सके। उनमें जल के निकलने का मार्ग अवश्य रहना चाहिए। कमल के फूल तथा घड़ियाल आदि जलचर भी उनमें रहें।

(१) खाई से चार दंड की दूरी पर छह दण्ड ऊँचा, सब ओर से मजबूत और ऊपर की चौड़ाई से दुगुनी नींव वाला एक बड़ा वप्र (प्राकार या फसील) बनवाया जाय। इसके बनवाने में वही मिट्टी काम में लाई जाय, जो खाई से खोदकर बाहर फेंकी गई है। प्राकार (वप्र) तीन प्रकार का होना चाहिए—१. ऊर्ध्वचय, २. मञ्चपृष्ठ और ३. कुम्भकुक्षिक, अर्थात् क्रमशः ऊपर पतला, नीचे चपटा और बीच में कुम्भाकार। इन प्राकारों को बनवाते समय, इनकी मिट्टी को हाथी और बैलों से अच्छी तरह रौंदवाना चाहिए, जिससे कि मिट्टी बैठकर मजबूत हो जाय। इनके चारों ओर कांटेदार विषैली झाड़ियाँ लगी होनी चाहिए। प्राकार बन जाने पर यदि मिट्टी बची रह जाय तो उसे उन्हीं गड्ढों में भर देना चाहिए, जहाँ से उसको खोदा गया है, अथवा उस अवशिष्ट मिट्टी से, प्राकार के जो छिद्र रह गए हों, उन्हें भरवा देना चाहिए।

(२) वप्र बन जाने पर उसके ऊपर दीवार बनवानी चाहिए। वह दीवार चौड़ाई से दुगुनी ऊँची हो, कम-से-कम बारह हाथ से लेकर चौदह, सोलह, अठारह

प्र० १९ : अ० ३ ] दुर्गों का निर्माण ८७

तालमूलमुरजकैः कपिशीर्षकैश्चाचिताग्रं पृथुशिलासंहितं वा शैलं कारयेत्; न त्वेव काष्ठमयम् । अग्निरवहितो हि तस्मिन्वसति ।
(१) विष्कम्भचतुरश्रमट्टालकमुत्सेधसमावक्षेपसोपानं कारयेत्, त्रिंशद्दण्डान्तरं च ।
(२) द्वयोरट्टालकयोर्मध्ये सहर्म्यद्वितलामध्यर्धायामां प्रतोलीं कारयेत् ।
(३) अट्टालकप्रतोलीमध्ये त्रिधानुष्काधिष्ठानं सापिधानच्छिद्रफलक-संहितमतीन्द्रकोशं कारयेत् ।
(४) अन्तरेषु द्विहस्तविष्कम्भं पार्श्वे चतुर्गुणायाममनुप्राकारम् अष्टहस्तायतं देवपथं कारयेत् ।
(५) दण्डान्तरा द्विदण्डान्तरा वाचार्याः कारयेद्; अग्राह्ये देशे प्रधावितिकां निष्कुहद्वारं च ।


सम संख्याओं में, अथवा पन्द्रह, सत्रह आदि विषम संख्याओं में, अधिक-से अधिक चौबीस हाथ तक ऊँची होनी चाहिए । प्राकार का ऊपरी भाग इतना चौड़ा होना चाहिए जिस पर एक रथ आसानी से चलाया जा सके । ताड़ वृक्ष की जड़ के समान, मृदंग बाजे के समान, बंदर की खोपड़ी के समान आकार वाले ईंट-पत्थरों की कंकरीटों से अथवा बड़े-बड़े शिलाखंडों से प्राकार का निर्माण करवाना चाहिए । लकड़ी का प्राकार कभी भी न बनवाना चाहिए, क्योंकि उसमें सदा आग लगने का भय बना रहता है ।

( १ ) प्राकार के आगे एक ऐसी अट्टालिका बनवाये जिसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई प्राकार के बराबर हो । ऊँचाई के अनुपात से उस पर सीढ़ियाँ भी बनवानी चाहिए । ये अट्टालिकाएँ एक-दूसरी से तीस दंड की दूरी पर हों ।

( २ ) दो अट्टालिकाओं के बीच, चौड़ाई से डेढ़गुना लम्बा प्रतोली नाम का एक घर बनवाना चाहिए, जिसकी दूसरी मंजिल में जनानखाना रहे ।

( ३ ) अट्टालिका और प्रतोली के बीच में इन्द्रकोष नामक एक विशिष्ट स्थान बनवाया जाय । वह इतना ही बड़ा हो जिसमें तीन धनुर्धारी संतरी आसानी से बैठ सकें । उसके आगे छिद्रयुक्त एक ऐसा तख्ता लगा रहना चाहिए, जिससे धनुर्धारी बाहर की वस्तु देख सकें और भीतर से ही निशाना बाँध सकें, किन्तु बाहर के लोग उन्हें न देख सकें ।

( ४ ) प्राकार के साथ ही एक ऐसा देवपथ ( गुप्तमार्ग या सुरंग ) बनवाना चाहिए जो अट्टालक, प्रतोली तथा इन्द्रकोष के बीच में दो हाथ चौड़ा और प्राकार के पास आठ हाथ चौड़ा हो ।

( ५ ) इसी प्रकार एक दंड या दो दंड की दूरी पर चार्या अर्थात् प्राकार आदि पर चढ़ने उतरने का स्थान बनवाना चाहिए । प्राकार के ऊपर ही जिस स्थान को