कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)
Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola
by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में शासनाधिकार नामक दसवां अध्याय समाप्त ।
१२४ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
(१) वधः परिक्लेशोऽर्थहरणं दण्ड इति ।
(२) अकान्तिर्व्याघातः पुनरुक्तमपशब्दः संप्लव इति लेखदोषाः ।
(३) तत्र कालपत्रकमचारुविषमविरागाक्षरत्वमकान्तिः ।
(४) पूर्वेण पश्चिमस्यानुपपत्तिर्व्याघातः ।
(५) उक्तस्याविशेषेण द्वितीयमुच्चारणं पुनरुक्तम् ।
(६) लिङ्गवचनकालकारकाणामन्यथाप्रयोगोऽपशब्दः ।
(७) अवर्गे वर्गकरणं वर्गे चावर्गक्रिया गुणविपर्यासः संप्लव इति ।
(८) सर्वशास्त्राण्यनुक्रम्य प्रयोगमुपलभ्य च ।
कौटिल्येन नरेन्द्रार्थे शासनस्य विधिः कृतः ॥इत्यध्यक्षप्रचारे द्वितीयेऽधिकरणे शासनाधिकारं नाम दशमोऽध्यायः,
आदितः त्रिंशः ।
—: ० :—
(१) उसे मार देना, उसको पीड़ा पहुँचाना या उसके धन का अपहरण करना दण्ड कहलाता है ।
(२) पत्रलेख के पाँच दोष हैं—१. अकान्ति, २. व्याघात, ३. पुनरुक्त ४. अपशब्द और ५. संप्लव ।
(३) स्याही पड़े कागज पर लिखना, मलिन कागज पर लिखना, भद्दे अक्षर लिखना, छोटे-बड़े अक्षर लिखना और फीकी स्याही से लिखना अकान्ति नामक दोष है ।
(४) पहले लेख से पिछले लेख का विरोध हो जाना अथवा पहिले लेख से पिछले लेख की बाधा हो जाना व्याघात दोष है ।
(५) जो बात पहिले कही गई है उसे ही दोहरा देना पुनरुक्त दोष है ।
(६) लिङ्ग, वचन, काल और कारक का विपरीत प्रयोग करना अपशब्द दोष है ।
(७) लेख में विराम आदि चिह्नों की, अर्थक्रम के अनुसार योजना न करना, संप्लव दोष है ।
(८) आचार्य कौटिल्य ने सम्पूर्ण शास्त्रों का विधिवत् अध्ययन करके और उनके प्रयोगों को अच्छी तरह परीक्षा करके ही राजा के लिए इस शासनविधि की रचना की है ।
अध्यक्षप्रचार नामक द्वितीय अधिकरण में शासनाधिकार नामक दसवां अध्याय समाप्त ।
—: ० :—
| प्रकरण २७ | # कोषप्रवेश्यरत्नपरीक्षा |
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| अध्याय ११ |
(१) कोषाध्यक्षः कोषप्रवेश्यं रत्नं सारं फल्गु कुप्यं वा तज्जातकरणाधिष्ठितः प्रतिगृह्णीयात् ।
(२) ताम्रपर्णिकं, पाण्ड्यकवाटकं, पाशिक्यं, कौलेयं, चौर्णेयं, माहेन्द्रं कार्दमिकं स्रोतसीयं, ह्रादीयं, हैमवतं, च मौक्तिकम् ।
(३) शङ्खः शुक्तिः प्रकीर्णकं च योनयः ।
(४) मसूरकं त्रिपुटकं कूर्मकमर्धचन्द्रं कञ्चुकितं यमकं कर्तकं खरकं सिक्थकं कामण्डुलुकं श्यावं नीलं दुर्विद्धं चाप्रशस्तम् ।
कोष में रखने योग्य रत्नों की परीक्षा
( १ ) कोषाध्यक्ष को चाहिए कि वह विशेषज्ञों की सहमति से ही रत्न, सार, फल्गु और कुप्य आदि मूल्यवान् द्रव्यों को राजकोष के लिए लेना स्वीकार करे ।
( २ ) मोतियों के दस उत्पत्ति स्थान हैं : १. ताम्रपर्णिक ( पाण्ड्यदेश की ताम्रपर्णी नदी के संगम पर उत्पन्न ), २. पाण्ड्यकवाटक ( मलयकोटि नामक पर्वत पर उत्पन्न ), ३. पाशिक्य ( पाटलिपुत्र के समीप पाशिका नामक नदी में उत्पन्न ), ४. कौलेय ( सिंहलद्वीप की कुला नामक नदी में उत्पन्न ), ५. चौर्णेय ( केरल की चूर्णी नामक नदी में उत्पन्न ), ६. माहेन्द्र ( महेंद्रगिरि के निकटवर्ती समुद्रतल में उत्पन्न ); ७. कार्दमिक ( फारस की कर्दमा नामक नदी में उत्पन्न ), ८. स्रोतसीय ( बर्बर के समीप स्रोतसी नामक नदी में उत्पन्न ); ९. ह्रादीय ( बर्बर के समीप समुद्रतटवर्ती श्रीषण्ड नामक झील में उत्पन्न ) और १०. हैमवत ( हिमालय पर्वत पर उत्पन्न )।
( ३ ) मोतियों की उत्पत्ति के तीन कारण हैं : शुक्ति, शंख और प्रकीर्णक ( गजमुक्ता तथा सर्पमणि )।
( ४ ) दूषित मोतियों के तेरह प्रकार होते हैं । १. मसूरक ( मसूर की तरह का ), २. त्रिपुटक ( तीन खूंट वाला ), ३. कूर्मक ( कछुये के समान ), ४. अर्धचन्द्रक ( अर्धचन्द्र की भाँति ), ५. कंचुकित ( मोटे छिलके वाला ), ६. यमक ( जुडा हुआ ), ७. कर्तक ( कटा हुआ ), ८. खरक ( खुरदुरा ), ९. सिक्थक ( दागवाला ), १०. कामण्डलुक ( कमण्डलु के समान ), ११. श्याव ( भूरे रङ्ग का ), १२. नील ( नीले रङ्ग का ) और १३. दुर्विद्ध ( अस्थान विंधा मोती )।
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(१) स्थूलं वृत्तं निस्तलं भ्राजिष्णु श्वेतं गुरु स्निग्धं देशविद्धं च प्रशस्तम् ।
(२) शीर्षकमुपशीर्षकं प्रकाण्डकमवघाटकं तरलप्रतिबन्धं चेति यष्टिप्रभेदाः ।
(३) यष्टीनामष्टसहस्रमिन्द्रच्छन्दः । ततोऽर्धं विजयच्छन्दः । शतं देवच्छन्दः । चतुष्षष्टिरर्धहारः । चतुष्पञ्चाशद्रश्मिकलापः । द्वात्रिंशद्-गुच्छः । सप्तविंशतिर्नक्षत्रमाला । चतुर्विंशतिरर्धगुच्छः । विंशतिर्माण-वकः । ततोऽर्धमर्धमाणवकः । एत एव मणिमध्यास्तन्माणवका भवन्ति । एकशीर्षकः शुद्धो हारः । तद्वच्छेषाः । मणिमध्योऽर्धमाणवकस्त्रिफलकः फलकहारः पञ्चफलको वा । सूत्रमेकावली शुद्धा । सैव मणिमध्या यष्टिः ।
(१) मोटा, गोल, तलरहित, दीप्तिमान, श्वेत, वजनी, चिकना और स्थान पर विधा मोती उत्तम कोटि का है ।
(२) यष्टि अर्थात् मोतियों की माला के कई नाम हैं, शीर्षक (जिसमें दो छोटे मोतियों के बीच में एक बड़ा मोती पिरोया गया हो), उपशीर्षक (जिसमें दो छोटे मोतियों के बाद एक बड़ा मोती हो), प्रकाण्डक (जिसमें चार छोटे मोतियों के बाद एक बड़ा मोती हो), अवघाटक (जिस माला के बीच में एक बड़ा मोती और उसके दोनों ओर उत्तरोत्तर छोटे-छोटे मोती हों) और तरलप्रतिबन्ध (जिसमें सभी मोती एक समान लगे हों) ।
(३) एक हजार आठ लड़ों की माला को इन्द्रच्छन्द, उससे आधी पांच सौ चार लड़ों की माला को विजयच्छन्द, सौ लड़ों की माला को देवच्छन्द, चौंसठ लड़ों की माला को अर्धहार, चौवन लड़ों की माला को रश्मिकलाप, बत्तीस लड़ों की माला को गुच्छ, सत्ताईस लड़ों की माला को नक्षत्रमाला, चौबीस लड़ों की माला को अर्धगुच्छ, बीस लड़ों की माला को माणवक, और उससे आधा दस लड़ों की माला को अर्धमाणवक कहा जाता है । इन्हीं मालाओं के बीच में यदि मणि पिरो दी जाय तो उनके नाम के आगे माणवक शब्द जुड़ जाता है । यदि इन्द्रच्छन्द आदि मालाओं में सभी मोती शीर्षक के समान पिरोये जाते हैं तो उनका नाम इन्द्रच्छन्दशीर्षक शुद्धहार, विजयच्छन्दशीर्षक शुद्धहार कहा जाता है । इसी प्रकार यदि इन्द्रच्छन्द आदि में सभी मोती उपशीर्षक के समान पिरोये गए हों तो उसे इन्द्रच्छन्दोपशीर्षकशुद्धहार कहा जाता है । यदि इन शुद्धहारों के बीच में मणि पिरो दी जाय तो, बजाय शुद्धहार के वे अर्धमाणवक कहलाते हैं और तब उनका पूरा नामकरण होता है इन्द्रच्छन्दशीर्षकार्धमाणवक । इसी प्रकार उपशीर्षक आदि के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए । दस लड़ियों की माला में यदि सोने के तीन या पाँच दाने पिरो दिए गए हों तो उसे फलकहार कहा जाता है । एक ही लड़ी की मोती की माला का नाम सूत्र है । यदि उसके बीच में मणि पिरो दी जाय तो उसे ही
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १२७
हेममणिचित्रा रत्नावली । हेममणिमुक्तान्तरोऽपवर्तकः । सुवर्णसूत्रान्तरं सोपानकम् । मणिमध्यं वा मणिसोपानकम् ।
(१) तेन शिरोहस्तपादकटीकलापजालकविकल्पा व्याख्याताः ।
(२) मणिः कौटो मालेयकः पारसमुद्रकश्च ।
(३) सौगन्धिकः पद्मरागः अनवद्यरागः पारिजातपुष्पकः बालसूर्य्यकः ।
(४) वैदूर्य्यः—उत्पलवर्णः शिरीषपुष्पक उदकवर्णो वंशरागः, शुकपत्रवर्णः पुष्यरागो गोमूत्रको गोमेदकः ।
(५) नीलावल्रीय इन्द्रनीलः कलायपुष्पको महानीलो जाम्बवाभो जीमूतप्रभो नन्दकः स्रवन्मध्यः ।
यष्टि कहा जाता है। सोने के दाने और मणियों से पिरोई गई मोती की माला रत्नावली कहलाती है। यदि किसी माला में सोने के दाने, मणि और मोती क्रमशः पिरो दिये गये हैं तो उस माला को अपवर्तक कहते हैं। यदि अपवर्तक माला में मणि न लगी हो तो उसका नाम सोपानक है। यदि बीच में मणि लगा दी जाय तो उसे मणिसोपानक कहते हैं।
(१) इसी प्रकार शिर, हाथ, पैर और कमर की भिन्न-भिन्न मालाओं के सम्बन्ध में भी समझ लेना चाहिए।
(२) मणियों के तीन उत्पत्ति-स्थान हैं : १. कौट (मलयसागर के समीप कोटि नामक स्थान में उत्पन्न) २. मालेयक (मलय देश के कर्णीवन नामक पर्वत में उत्पन्न) और ३. पारसमुद्रक (समुद्र पार सिंहल आदि स्थानों में उत्पन्न)।
(३) मणियों में पाँच प्रकार के मणिक्य होते हैं : १. सौगन्धिक (सायंकाल खिलने वाले सौगन्धिक नामक नीलवर्णयुक्त कमल के समान), २. पद्मराग (पद्म नामक कमल के समान), ३. अनवद्यराग (केशर के समान); ४. पारिजात पुष्पक (हरसिंगार पुष्प के समान) और ५. बालसूर्य्यक (उदय होते सूर्य के समान)।
(४) वैदूर्य मणि आठ प्रकार की होती है : १. उत्पलवर्ण (लाल कमल के समान) २. शिरीषपुष्पक (शिरीष पुष्प की भाँति), ३. उदकवर्ण (जल के समान), ४. वंशराग (बाँस के पत्ते के समान), ५. शुकपत्रवर्ण (तोते के पंख की तरह), ६. पुष्यराग (हल्दी के समान), ७. गोमूत्रक (गोमूत्र के समान) और ८. गोमेदक (गोरोचन के समान)।
(५) इन्द्रनीलमणि भी आठ प्रकार की होती है : १. नीलाबलीय (नीली धारियों वाली), २. इन्द्रनील (मोरपंख के समान), ३. कलायपुष्पक (मटर पुष्प के समान), ४. महानील (गहरे काले रंग की), ५. जाम्बवाभ (जामुन के समान), ६. जीमूतप्रभ (मेघ के समान), ७. नन्दक (भीतर से श्वेत तथा बाहर से नीली) और ८. स्रवन्मध्य (जलप्रवाह के समान तरलित किरणों वाली)।
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(१) शुद्धस्फटिकः मूलाटवर्णः शीतवृष्टिः सूर्यकान्तश्चेति मणयः ।
(२) षडश्रश्चतुरश्रो वृत्तो वा, तीव्ररागः संस्थानवानच्छः स्निग्धो गुरुरर्चिष्मानन्तर्गतप्रभः प्रभानुलेपी चेति मणिगुणाः ।
(३) मन्दरागप्रभः सशर्करः पुष्पच्छिद्रः खण्डो दुर्विद्धो लेखाकीर्ण इति दोषाः ।
(४) विमलकः सस्यकोऽञ्जनमूलकः पित्तकः सुलभको लोहिताक्षो मृगाश्मको ज्योतीरसको मैलेयक आहिच्छत्रकः कूर्पः प्रतिकूर्पः सुगन्धि-कूर्पः क्षीरपकः शुक्तिचूर्णकः शिलाप्रवालकः पुलकः शुक्रपुलक इत्यन्तर-जातयः ।
(५) शेषाः काचमणयः ।
( १ ) स्फटिक मणि चार प्रकार की होती है : १. शुद्धस्फटिक (स्वच्छ, श्वेत) २. मूलाटवर्ण ( मक्खन निकाले हुए मट्ठे की भाँति ), ३. शीतवृष्टि ( चन्द्रमा के किरणों से पिघलने वाली ) और ४. सूर्यकान्त ( सूर्य किरणों का स्पर्श पाकर आग उगलने वाली ) ।
( २ ) मणियों में ग्यारह प्रकार के गुण होते हैं : १. षड्ज ( छह कोनों वाली ) २. चतुरस्र ( चार कोनों वाली ), ३. वृत्त ( गोलाकार ); ४. गहरे रंगवाली चमकदार, ५. आभूषण में लगाने योग्य, ६. निर्मल, ७. चिकनी, ८. भारी, ९. दीप्तियुक्त, १०. चञ्चलकान्तियुक्त और ११. अपनी कांति से पास की वस्तु को प्रकाशित कर देने वाली ( प्रभानुलेपी ) ।
( ३ ) मणियों में सात प्रकार के दोष पाये जाते हैं : १. हलके रंग वाली, २. हलकी प्रभावानी, ३. खुरदरी, ४. छोटे छिद्र वाली, ५. कटी हुई, ९. उपयुक्त स्थान पर न वेधी हुई और ७. विभिन्न रेखाओं वाली ।
( ४ ) मणियों की अठारह प्रकार की उपजातियाँ हैं—१. विमलक ( श्वेत-हरित वर्णों से मिश्रित ), २. सस्यक ( नीली ), ३. अंजनमूलक ( नील-श्याम वर्ण-मिश्रित ), ४. पित्तक ( गाय के पित्त के समान ), ५. सुलभक ( श्वेत ), ६. लोहिताक्ष ( किनारों पर लाल और केन्द्र में श्याम ), ७ मृगाश्मक ( श्वेत-अरुण-मिश्रित ), ८. ज्योतीरसक ( श्वेत-अरुण-मिश्रित ), ६. मैलेयक ( शिंगरफ की भाँति) १० आहिच्छत्रक ( फीके रंग वाली ), ११. कूर्प ( खुरदरी ), १२. प्रतिकूर्प ( दागी ) १३. सुगन्धिकूर्प ( मूंग-वर्णी ), १४. क्षीरपक ( दुग्ध धवल ), १५. शुक्ति चूर्णक ( अनेक रंगों वाली ), १६. शिलाप्रवालक ( मूंगे के समान ), १७. पुलक ( केंद्र में काली ) और १८. शुक्रपुलक ( केन्द्र में श्वेत ) ।
( ५ ) इनके अतिरिक्त जो मणियाँ हों वे काँच के समान निम्न कोटि की होती है ।
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १२९
(१) सभाराष्ट्रकं मध्यमराष्ट्रकं कास्तीरराष्ट्रकं श्रीकटनकं मणिमन्त-
कमिन्द्रवानकं च वज्रम् ।
(२) खनिः स्रोतः प्रकीर्णकं च योनयः ।
(३) मार्जाराक्षकं च शिरीषपुष्पकं गोमूत्रकं गामेदकं शुद्धस्फटिकं मूलाटीपुष्पकवर्णं मणिवर्णानामन्यतमवर्णमिति वज्रवर्णाः ।
(४) स्थूलं स्निग्धं गुरु प्रहारसहं समकोटिकं भाजनलेखि तर्कुभ्रामि भ्राजिष्णु च प्रशस्तम् ।
(५) नष्टकोणं निरश्रिपाश्र्वापवृत्तं च अप्रशस्तम् ।
(६) प्रबालकं आलकन्दकं वैवर्णिकं च रक्तं पद्मरागं च करटगर्भिणि-
कावर्जमिति ।
(७) चन्दनम्—सातनं रक्तं भूमिगन्धि । गोशीर्षकं कालताम्रं मत्स्य-
(१) हीरा के छह उत्पत्ति स्थान है : १. सभाराष्ट्रक (बरार, बम्बई प्रदेश में उत्पन्न), २. मध्यमराष्ट्रक (कोशल देश में उत्पन्न), ३. कास्तीरराष्ट्रक (कास्तीर देश में उत्पन्न), ४. श्रीकटनक (श्रीकटन पर्वत पर उत्पन्न) : ५. मणिमंतक (उत्तरस्थ मणिमंत पर्वत में उत्पन्न) और ६. इन्द्रवानक (कलिंग देश में उत्पन्न)।
(२) इनके अतिरिक्त खदान, विशेष जलप्रवाह और हाथी दाँत की जड़ आदि भी हीरा के उत्पत्तिस्थान हैं। खान और जलप्रवाह आदि के अन्य स्थानों में उत्पन्न हीरा को प्रकीर्णक रहते हैं।
(३) हीरा के अनेक आकार-प्रकार हैं : बिलाव की आँख के समान, शिरीष पुष्प की आकृति का, गोमूत्र के समान, गोरोचन की भाँति, सर्वथा स्वच्छ, श्वेत, मुलहटी के फूल जैसा, और मणियों की आकृति का।
(४) मोटा; वजनी, घन की चोट सहने वाला, समकोण पानी से भरे पीतल के बर्तन में उसको हिलाने से लकीरें डाल देने वाला, चर्खे में लगे तकुवे के तरह घूमने वाला और चमकदार हीरा उत्तम कोटि का है।
(५) नष्टकोण, नुकीले कोनों से रहित और छोटे-बड़े कोनों वाला हीरा दूषित समझा जाता है।
(६) प्रवाल (मूंगा) के दो उत्पत्ति स्थान हैं—१. आलकन्दक (अलकन्द नामक स्थान से उत्पन्न) और २. वैवर्णिक (यूनान के समीपवर्ती विवर्ण नामक समुद्रतल में उत्पन्न)। प्रवाह के दो रंग होते हैं : १. रक्त और २. कमल। वह कीड़े का खाया हुआ तथा बीच में मोटा या उठा हुआ नहीं होना चाहिए।
(७) चन्दन के सोलह उत्पत्ति स्थान, नौ रंग, छह गन्ध और ग्यारह गुण होते हैं। उत्पत्तिस्थान—१. सातन देश में उत्पन्न चन्दन लाल रंग का होता है और
९ कौ०
१३० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ दूसरा अधिकरण
गन्धि । हरिचन्दनं शुकपत्रवर्णमाम्रगन्धि । तार्णसं च । ग्रामेरुकं रक्तं रक्त-
कालं वा वस्तमूत्रगन्धि । दैवसभेयं रक्तं पद्मगन्धि । जावकं च । जोङ्गकं
रक्तं रक्तकालं वा स्निग्धम् । तौरूपं च । मालेयकं पाण्डुरक्तम् । कुचन्दनं
कालवर्णकं गोमूत्रगन्धि । कालपर्वतकं रूक्षमगुरुकालं रक्तं रक्तकालं वा ।
कोशकारपर्वतकं कालं कालचित्रं वा । शीतोदकीयं पद्माभं कालस्निग्धं
वा । नागपर्वतकं रूक्षं शैलवर्णं वा । शाकलं कपिलमिति ।
(१) लघु स्निग्धमश्यानं सर्पिः स्नेहलेपि गन्धसुखं त्वगनुसार्यनुल्बण-
मविराग्युष्णसहं दाहग्राहि सुखस्पर्शनमिति चन्दनगुणाः ।
उसमें धरती की सोंध होती है, २. गोशीर्ष देश में उत्पन्न चन्दन कालिमा एवं लाली लिए होता है और उसमें मछली की जैसी गन्ध होती है, ३. हरि नामक देश में उत्पन्न चन्दन तोते के पंख के समान हरे रंग का और उसमें आम की जैसी महक होती है, ४. तृणसा नामक नदी के किनारे उत्पन्न होने वाला चन्दन भी हरिचन्दन के ही समान होता है, ५. ग्रामेरु प्रदेश में उत्पन्न चन्दन या तो लाल रंग का अथवा लाल-काले मिले हुए रंग का होता है और उसमें बकरे की पेशाब जैसी गन्ध होती है, ६. देवसभा नामक स्थान में उत्पन्न चन्दन लाल रंग का और पद्म के समान सुगन्धि वाला होता है, ७. जाबक देश का चन्दन भी देवसभा चन्दन की भाँति होता है, ८. जोंग देश में उत्पन्न चन्दन या तो लाल रंग का अथवा लाल-काला रंग का चिकना होता है और वह भी पद्म के समान सुगन्धित होता है, ६. तुरूप देश का चन्दन भी जोंगरु की भाँति होता है, १०. माल देश में उत्पन्न चन्दन का रंग लाल-पीला होता है, उसमें पद्म के समान सुगन्ध होती है, ११. कुचन्दन काले रंग का तथा गोमूत्र के समान गन्ध वाला होता है, १२. काल पर्वत पर उत्पन्न चन्दन खुर-दुरा, अगर के समान काला या लाल या लाल-काला होता है और उसमें भी गोमूत्र जैसी गन्ध होती है, १३. कोशकार पर्वत पर उत्पन्न चन्दन काला अथवा चितकबरा होता है, १४. शीतोदक देश में उत्पन्न चन्दन पत्र के रंग का या काला अथवा स्निग्ध होता है, १५. नाग पर्वत पर उत्पन्न चन्दन रूखा और सेवार के रंग जैसा होता है, १६. शाकल देश में उत्पन्न चन्दन पीला-लाल ( कपिल ) वर्ण का होता है ।
( १ ) चन्दन में ग्यारह गुण होते हैं—१. लघु २. स्निग्ध ३. बहुत दिनों में सूखने वाला, ४. शरीर में घी के समान लगने वाला, ५. सुगन्धित, ६. त्वचा के भीतर ठंडक पहुँचाने वाला, ७. बिना फटा, ८. स्थायी वर्ण एवं गन्ध वाला, ९. गर्मी शांत करने वाला, १०. सन्ताप को दूर करने वाला और ११. सुखकर स्पर्श वाला ।
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १३१
(१) अगुरु—जोङ्गकं कालं कालचित्रं मण्डलचित्रं वा । श्यामं दोङ्ग-
कम् । पारसमुद्रकं चित्ररूपम् । उशीरगन्धि नवमालिकागन्धि वेति ।
(२) गुरु स्निग्धं पेशलगन्धि निर्हारि अग्निसहमसंप्लुतधूमं समगन्धं
विमर्दसहम् इत्यगुरुगुणाः ।
(३) तैलपर्णिकम्—अशोकग्रामिकं मांसवर्णं पद्मगन्धि । जोङ्गकं
रक्तपीतकमुत्पलगन्धि गोमूत्रगन्धि वा ग्रामेरुकं स्निग्धं गोमूत्रगन्धि ।
सौवर्णकुड्यकं रक्तपीतं मातुलुङ्गगन्धि । पूर्णकद्वीपकं पद्मगन्धि नवनीत-
गन्धि वेति ।
(४) भद्रश्रीयम्—पारलौहित्यकं जातीवर्णम् । आन्तरवत्यमुशीर-
वर्णम् । उभयं कुष्ठगन्धि चेति ।
(५) कालेयकः—स्वर्णभूमिजः स्निग्धपीतकः । औत्तरपर्वतको रक्त-
पीतकः इति साराः ।
( १ ) अगर का निरूपण इस प्रकार है—जौंगल नामक अगर तीन तरह का होता है : काला, चितकबरा और काले-सफेद दागों वाला । दोंगक नामक अगर काला होता है, जोंगक और दोंगक दोनों आसाम में पैदा होते हैं । समुद्र पार पैदा होने वाला अगर, चित्र रूप का होता है, जिसकी गन्ध खश और चमेली जैसी होती है ।
( २ ) भारी, स्निग्ध, सुगन्धित, दूर तक सुगन्ध फेंकने वाला, अग्नि को सहन करने वाला, जिसका धुआँ व्याकुल न कर दे, जलते समय एक जैसी गन्ध देने वाला और वस्त्र आदि पर पोंछ देने से गन्ध बनी रहना; ये अगर के गुण हैं ।
( ३ ) असम में पैदा होने वाला तैलपर्णिक चन्दन मांस के रङ्ग का और पद्म के समान गन्ध वाला होता है । असम में ही पैदा होने वाला दूसरा तैलपर्णिक चन्दन लाल-पीले रङ्ग का और कमल अथवा गोमूत्र की गन्ध का होता है । ग्रामेरू प्रदेश में पैदा होने वाला चन्दन चिकना और गोमूत्र की गन्ध का होता है । असम के सुवर्णकुड्य नामक स्थान में पैदा होने वाला चन्दन लाल-पीला और नीबू की गन्ध का होता है । पूर्णक द्वीप में उत्पन्न चन्दन पद्म अथवा मक्खन की गन्ध का होता है ।
( ४ ) भद्रश्रीय नामक चन्दन दो प्रकार का होता है : १. पारलौहित्य और २. आन्तरवत्य । पारलौहित्य असम में पैदा होता है और उसका रङ्ग चमेलीपुष्प जैसा होता है, आन्तरवत्य चन्दन भी असम में ही पैदा होता है, उसका रङ्ग खस की भांति होता है । इन दोनों की गन्ध कूट औषधि की तरह होती है ।
( ५ ) कालेयक नामक चन्दन स्वर्णभूमि में पैदा होता है और वह स्निग्ध एवं पीले रङ्ग का होता है । हिमालय पर पैदा होने वाला कालेयक लाल-पीले रङ्ग का होता है । यहाँ तक सार वस्तुओं का विवरण प्रस्तुत किया गया है ।
| १३२ | कौटिल्य का अर्थशास्त्र | [ दूसरा अधिकरण |
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(१) पिण्डक्वाथधूमसहमविरागि योगानुविधायि च। चन्दनागरुवच्च तेषां गुणाः।
(२) कान्तनावकं प्रैयकं चोत्तरपर्वतकं चर्म। कान्तनावकं मयूर-ग्रीवाभम्। प्रैयकं नीलं पीतं श्वेतं लेखाविन्दुचित्रम्। तदुभयमष्टाङ्गुला-यामम्।
(३) बिसी महाबिसी च द्वादशग्रामीये। अव्यक्तरूपा दुहिलिका चित्र वा बिसी। परुषा श्वेतप्राया महाबिसी। द्वादशाङ्गुलायाममुभयम्।
(४) श्यामिका कालिका कदली चन्द्रोत्तरा शाकुला चारोहजाः। कपिला बिन्दुचित्रा वा श्यामिका। कालिका कपिला कपोतवर्णा वा। तदुभयमष्टाङ्गुलायाम। परुषा कदली हस्तायता। सैव चन्द्रचित्रा चन्द्रो-त्तरा। कदलीत्रिभागा शाकुला कोठमण्डलचित्रा कृतकर्णिकाजिनचित्रा चेति।
(१) तैलपर्णिक, भद्रश्रीय और कालेयक, इन तीनों में पीसने पर, पकाने पर, आग में जलाने पर किसी प्रकार का विकार पैदा न होना, दूसरी वस्तु के साथ मिलाने पर तथा देर तक रखे रहने पर उनकी गन्ध में किसी प्रकार का फर्क न आना, ये गुण पाये जाते हैं। पूर्वोक्त चन्दनों में जो गुण बताये गए हैं, वे भी इन तीनों में पाये जाते हैं।
(२) फल्गु पदार्थों में पहिला स्थान चमड़े का है, जिसकी लगभग पन्द्रह जातियाँ होती है, १. कान्तनावक और २. प्रैयक दोनों का चमड़ा हिमालय में पैदा होता है। उनमें कान्तनावक मयूरग्रीवा का कान्ति वाला और प्रैयक नीले-पीले तथा सफेद रेखाओं अथवा दागों से युक्त होता है। इन दोनों का विस्तार आठ अंगुल होता है।
(३) हिमालय में स्थित म्लेच्छों के बारह गावों में ३. बिसी और ४. महा-बिसी नामक चमड़ा पैदा होता है। बिसी बहुरङ्ग, बालों वाला एवं चितकबरा, और महाबिसी कठोर तथा श्वेत होता है। इन दोनों का विस्तार बारह-बारह अंगुल होता है।
(४) हिमालय के आरोह नामक स्थान में पैदा होने वाला चमड़ा पाँच प्रकार का होता है : ५. श्यामिका, ६. कालिका ७, कदली ८ चन्दोत्तरा और ९. शाकुला। कपिल और चितकबरे रङ्ग का चमड़ा श्यामिका है। कपिल अथवा कबूतरी रङ्ग का चमड़ा कालिका कहलाता है। इन दोनों का विस्तार आठ-आठ अंगुल होता है। कदली नामक चमड़ा कठोर तथा खुरदुरा होता है, जिसकी लम्बाई एक हाथ मानी गई है। कदली नामक चमड़े पर यदि चन्द्रबिन्दु अंकित हों तो वह चन्द्रोत्तरा कह-लाता है। रङ्ग में ये दोनों कालिका के समान होते हैं। कदली से तीन गुणा बढ़ा
प्र० २७ : अ० ११ ] रत्नों की परीक्षा १३३
(१) सामूरं चीनसी सामूली च बाह्लवेयाः । षट्त्रिंशदङ्गुलमञ्जन-वर्णं सामूरम् । चीनसी रक्तकाली पाण्डुकाली वा । सामूली गोधूमवर्णेति ।
(२) सातिना नलतूला वृत्तपुच्छा औद्राः । सातिना कृष्णा । नलतूला नलतूलवर्णा । कपिला वृत्तपुच्छा च । इति चर्मजातयः ।
(३) चर्मणां मृदु स्निग्धं बहुलरोग च श्रेष्ठम् ।
(४) शुद्धं शुद्धरक्तं पक्षरक्तं च आविकम् । खचितं वानचित्रं खण्ड-सङ्घात्यं तन्तुविच्छिन्नं च ।
(५) कम्बलः केचलकः कलमितिका सौमितिका तुरगास्तरणं वर्णकं तच्छिल्लकं वारवाणः परिस्तोमः समन्तभद्रकं च आविकम् ।
(६) पिच्छलमार्द्रमिव च सूक्ष्म मृदु च श्रेष्ठम् ।
( तीन हाथ का ) या कदली का तीसरा हिस्सा ( आठ अंगुल ) शाकुला नामक चमड़ा होता है, जिसमें लाल धब्बे और कुछ गांठें पड़ी होती हैं ।
( १ ) हिमालय के बाह्लव नामक प्रदेश में तीन प्रकार का चमड़ा होता है : १०. सामूर, ११. चीनसी और १२. सामूली । सामूर चमड़ा अञ्जन के समान काले रङ्ग का और छत्तीस अंगुल का होता है । चीनसी चमड़ा लाल-काला अथवा पीला-काला रङ्ग का होता है । सामूली गेहुँए रङ्ग का होता है । ये दोनों छबीस-छबीस अंगुल के होते हैं ।
( २ ) उद्र नामक जलचर प्राणी की खाल तीन प्रकार होती है १३. सातिना १४. नलतूला और १५. वृत्तपुच्छा । सातिना काले रङ्ग की होती है । नलतूला, नरसल के समान सफेद होती है । वृतपुच्छा लाल-पीले रङ्ग की होती है । चमड़े की ये पन्द्रह प्रकार की भिन्न-भिन्न जातियाँ हैं ।
( ३ ) मुलायम, चिकना और अधिक बालों वाला चमड़ा उत्तम समझा जाता है ।
( ४ ) भेड़ की ऊन के चमड़े प्रायः सफेद और सफेद-लाल अथवा दूसरे रंग के भी होते हैं । इनके चार भेद हैं : १. खचित ( बेल-बूटेदार ), २. वानचित्र ( बुनाई के समय जिनमें तरह-तरह के फूल चित्रित हों ) ३. खण्डसंघात्य ( तरह-तरह की बुनावट के छोटे-छोटे टुकड़ों के जोड़ ) और ४. तन्तु-विच्छिन्न ( जालीदार कपड़ा ) ।
( ५ ) इनके अतिरिक्त १. कम्बल, २. केचलक, ३. कलमितिका, ४. सौमितिका, ५. तुरगास्तरण, ६. वर्णक, ७. तच्छिल्लक, ८. वारवाण, ९. परिस्तोम और १०. समन्तभद्रक, ये दस भेद बने हुए ऊनी वस्त्रों के और होते हैं ।
( ६ ) चिकना, चमकदार बारीक डोरे का और मुलायम कम्बल उत्तम समझा जाता है ।