Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

कौटिलीय अर्थशास्त्रम् (सटीक - डॉ. वाचस्पति गैरोला)

Kautiliya Arthashastra with Hindi Commentary by Gairola

by आचार्य कौटिल्य (चाणक्य) / डॉ. वाचस्पति गैरोला

DevanagariSanskritpublished918 pages

५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

Page 590Permalink

५०६ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) खनिधान्यभोगयोः खनिभोगः कोशकरः, धान्यभोगः कोशकोष्ठा-गारकरः धान्यमूला हि दुर्गादीनां कर्मणामारम्भाः । महाविषयविक्रयो वा खनिभोगः श्रेयान् ।

(२) 'द्रव्यहस्तिवनभोगयोर्द्रव्यवनभोगः सर्वकर्मणां योनिः प्रभूतनिधान-क्षमश्च । विपरीतो हस्तिवनभोगः' इत्याचार्याः ।

(३) नेति कौटिल्यः । शक्यं द्रव्यवनमनेकमनेकस्यां भूमौ वापयितुं न हस्तिवनं, हस्तिप्रधानो हि परानीकवध इति ।

(४) वारिस्थलपथभोगयोरनित्यो वारिपथभोगः, नित्यः स्थलपथभोग इति ।

(५) भिन्नमनुष्या श्रेणीमनुष्या वा भूमिरिति । भिन्नमनुष्या श्रेयसी ।


भूमि को अधिक उपजाऊ बनाना अपने हाथ में निर्भर है; इसलिए अधिक भूमि को लेना ही श्रेष्ठ है ।

( १ ) खानयुक्त तथा धान्ययुक्त भूमियों में खानयुक्त भूमि केवल कोष की वृद्धि करती है; किन्तु धान्ययुक्त भूमि कोष और कोष्ठागार दोनों को संपन्न करती है । क्योंकि दुर्ग आदि कर्मों की उन्नति भी धान्यमूलक ही है; अतः धान्ययुक्त भूमि ही श्रेयस्कर होती है । अथवा खानयुक्त भूमि भी उत्तम है, क्योंकि वहाँ से उत्पन्न वस्तुओं का बड़ा भारी व्यापार किया जा सकता है ।

( २ ) 'लकड़ी के जंगल और हाथी के जंगल, दोनों में से कौन श्रेष्ठ है ?' इस संबंध में पूर्वाचार्यों का कहना है कि लकड़ियों का जंगल ही श्रेष्ठ है; क्योंकि एक तो दुर्ग आदि कर्मों में लकड़ी की बड़ी आवश्यकता होती है और दूसरे उसका अधिक-से अधिक संचय सरलता से किया जा सकता है । किन्तु हाथी के जंगलों में यह उपयो-गिता नहीं होती है ।

( ३ ) आचार्य कौटिल्य इस बात को नहीं मानता है । उसका कथन है कि 'लकड़ी के जंगल अपनी इच्छानुसार बनाये जा सकते हैं; हाथियों के जंगल स्वयं नहीं बनाये जा सकते हैं । शत्रु की सेना को नाश करने वाले साधनों में हाथी प्रमुख साधन है । इसलिए हाथियों के जंगल ही श्रेष्ठ हैं ।'

( ४ ) जलमार्ग और स्थलमार्ग में दोनों ही अनित्य ( अस्थायी ) हों तो उनमें जलमार्ग ही उत्तम है । यदि दोनों ही नित्य ( स्थायी ) हों तो स्थलमार्ग ही उत्तम समझना चाहिए ।

( ५ ) 'भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि अच्छी है या समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि श्रेष्ठ है ?' इन दोनों में भिन्न प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ समझनी

Page 591Permalink

प्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०७

भिन्नमनुष्याभोग्या भवत्यनुपजाप्या चान्येषाम् । अनापत्सहा तु । विपरीता श्रेणीमनुष्या कोपे महादोषा ।
(१) तस्यां चातुर्वर्ण्याभिनिवेशे सर्वभोगसहत्वादवरवर्णप्राया श्रेयसी । बाहुल्याद्ध्रुवत्वाच्च कृष्याः कर्षणवती । कृष्याश्चान्येषां चारम्भाणां प्रयोजकत्वाद् गोरक्षकवती । पण्यनिचयार्णनुग्रहादाढ्यवणिक्वती ।
(२) भूमिगुणानामपाश्रयः श्रेयान् ।
(३) दुर्गापाश्रया पुरुषापाश्रया वा भूमिरिति । पुरुषापाश्रया श्रेयसी । पुरुषवद्धि राज्यम् । अपुरुषा गौर्वन्ध्येव किं दुहीत ।
(४) महाक्षयव्ययनिवेशां तु भूमिमवाप्तुकामः पूर्वमेव क्रेतारं पणेत । दुर्बलमराजबीजिनं निरुत्साहमपक्षमन्‍यायवर्त्तिं व्यसनिनं दैवप्रमाणं यत्किञ्चनकारिणं वा ।


चाहिए; क्योंकि ऐसी भूमि को विजिगीषु शीघ्र ही अपने कब्जे में कर लेता है, और क्योंकि भिन्न प्रकृति के कारण दूसरे शत्रु भी उन्हें बहका नहीं सकते हैं । ऐसे लोग आपत्तिसह भी नहीं होते हैं । किन्तु समान प्रकृति मनुष्यों वाली भूमि को शत्रु बहका सकते हैं । एकता के कारण वहाँ की प्रजा हर तरह की आपत्तियों को सहन करने के लिए तैयार रहती हैं और कुपित होने पर राजा का भी उच्छेद कर देती है ।

( १ ) उस भूमि में चारों वर्णों के लोगों की स्थिति के संबंध में यह विचार कर लेना चाहिए कि सब तरह के दुःख-सुख सहन करने वाले शूद्र, ग्वाले आदि नीची जाति के मनुष्यों वाली भूमि ही श्रेष्ठ होती है । क्योंकि खेती की अधिकता और निश्चित फलवती होने के कारण ऐसी भूमि श्रेयस्कर होती है । कृषि संबंधी व्यापार तथा अन्य अनेक कार्य गाय एवं गोपालकों पर ही निर्भर हैं । इसलिए गाय और ग्वालों से युक्त भूमि ही श्रेष्ठ है । व्यापार के लिए धान्य आदि का संचय तथा ब्याज पर ऋण आदि देकर उपकार करने के कारण व्यापारी और धनवान् व्यक्तियों से युक्त भूमि भी श्रेष्ठ होती है ।

( २ ) भूमि के उक्त सभी गुणों में से आश्रय या रक्षा, उसके सर्वोच्च गुण हैं ।

( ३ ) 'दुर्गों का आश्रय देने वाली भूमि अच्छी होती है या मनुष्यों का ?' इन दोनों में मनुष्यों का सहारा देने वाली भूमि श्रेष्ठ है, क्योंकि राज्य कहते ही उसको है, जहाँ बहुत से पुरुष निवास करते हों; 'पुरुषवद्धि राज्यम्' । पुरुषहीन भूमि तो वन्ध्या गो के समान है ।

( ४ ) जन-धन का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने वाली भूमि को यदि विजिगीषु प्राप्त करना चाहे तो पहिले वह उस भूमि का ऐसा खरीदार राजा तैयार कर ले, जो दुर्बल, अराजजीवी ( जो किसी राजवंश का न हो ), उत्साहहीन, अपक्ष

Page 592Permalink

५०८ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) महाक्षयव्ययनिवेशायां हि भूमौ दुर्बलो राजबीजी निविष्टः सगन्धाभिः प्रकृतिभिः सह क्षयव्ययेनावसीदति ।
(२) बलवानराजबीजी क्षयव्ययभयादसगन्धाभिः प्रकृतिभिस्त्यज्यते ।
(३) निरुत्साहस्तु दण्डवानपि दण्डस्याप्रणेता सदण्डः क्षयव्ययेनावभज्यते ।
(४) कोशवानप्यपक्षः क्षयव्ययानुग्रहहीनत्वान्न कुतश्चित्प्राप्नोति ।
(५) अन्यायवृत्तिर्निविष्टमप्युत्थापयेत्, स कथमिनिविष्टं निवेशयेत् ।
(६) तेन व्यसनी व्याख्यातः ।
(७) दैवप्रमाणो मानुषहीनो निरारम्भो विपन्नकर्मारम्भो वावसीदति ।
(८) यत्किञ्चनकारी न किंचिदासादयति । स चैषां पापिष्ठतमो भवति ।

( बेसहारा ), अन्यायवृत्ति, व्यसनी, भाग्यवादी और यत्किंचनकारी ( जो मन में आया, कर दिया ) हो ।

( १ ) जन-धन आदि का अत्यधिक व्यय करके बसाई जाने योग्य भूमि में जब शक्तिहीन राजवंश में पैदा हुआ राजा उपनिवेश बसाता है तो अत्यधिक पुरुषों का 'क्षय और धन का व्यय होने के कारण अपने सहायकों, सजातियों और अमात्य आदि प्रकृतियों के साथ वह क्षीण हो जाता है ।

( २ ) राजवंश में पैदा न हुए बलवान् राजा को क्षय-व्यय के भय से उसके विजातीय अमात्य आदि सहायक उसको छोड़ देते हैं ।

( ३ ) सेना के होते हुए भी उत्साहहीन राजा उसका यथोचित उपयोग नहीं कर पाता है । इसलिए धन-जन का व्यय-क्षय हो जाने के कारण सेना के सहित ही वह नष्ट हो जाता है ।

( ४ ) कोषसंपन्न मित्रहीन राजा क्षय-व्यय में उचित सहायता न मिलने के कारण नष्ट हो जाता है ।

( ५ ) प्रजा पर अन्याय करने वाले स्थायी रूप से बसे हुए राजा को जब प्रजा उखाड़ फेंकती है तब नये उपनिवेशों को बसाना उसके लिए कैसे संभव हो सकता है ?

( ६ ) यही हाल व्यसनी राजा का भी होता है ।

( ७ ) भाग्य पर भरोसा करने वाला पौरुषहीन राजा किसी नये कार्य को आरंभ नहीं करता है; यदि आरंभ करता भी है तो विघ्न के भय से उसे अधूरा ही छोड़ देता है; और इस प्रकार जन-धन की व्यर्थ हानि करने के बाद वह स्वयं भी नष्ट हो जाता है ।

( ८ ) बिना विचारे कार्य करने वाला राजा कभी फूलता-फलता नहीं है; किन्तु

Page 593Permalink

प्र० ११६ : अ० ११ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५०९

(१) 'यत्किंचिदारभमाणो हि विजिगीषोः कदाचिच्छिद्रमासादयेत्' इत्याचार्याः।
(२) 'यथा छिद्रं तथा विनाशमप्यासादयेत्' इति कौटिल्यः ।
(३) तेषामलाभे यथा पाष्णिग्राहोपग्रहे वक्ष्यामस्तथा भूमिमवस्थाप-
येत् । इत्यभिहितसन्धिः ।
(४) गुणवतीमादेयां वा भूमिं बलवता क्रयेण याचितः सन्धिमवस्थाप्य
दद्यात् । इत्यनिभृतसन्धिः ।
(५) समेन वा याचितः कारणमवेक्ष्य दद्यात् । 'प्रत्यादेया मे भूमि-
र्वश्या वा, अनया प्रतिबद्धः परो मे वश्यो भविष्यति, भूमिविक्रयाद्वा मित्र-
हिरण्यलाभः कार्यसामर्थ्यकरो मे भविष्यति' इति ।

ऊपर कहे गए सभी राजाओं की अपेक्षा विजिगीषु के लिए वह बहुत खतरनाक सिद्ध होता है ।

( १ ) पूर्वाचार्यों का कहना है कि किसी कार्य को प्रारंभ करता हुआ शत्रु यदि विजिगीषु के किसी दोष का पता लगा ले तो वह यत्किंचनकारी राजा के द्वारा विजिगीषु को हानि पहुँचा सकता है; क्योंकि विजिगीषु उसे मूर्ख समझ कर उससे पीठ फेरे रहता है ।

( २ ) परन्तु आचार्य कौटिल्य का मत है कि वह यत्किंचनकारी विजिगीषु के दोषों को जानने की तरह स्वयं को भी नष्ट कर सकता है; क्योंकि विजिगीषु तो उसके अनेक दोषों से परिचित रहता है ।

( ३ ) यदि इन उपर्युक्त राजाओं में से कोई उस व्यय-क्षयी भूमि को खरीदने के लिए तैयार न हो तो जो तरीका आगे पाष्णिग्राह के साथ सन्धि के लिए बताया जायेगा उसी के अनुसार उस भूमि को बसाने की व्यवस्था करे । इसीका नाम अभिहितसंधि है । अभिहितसन्धि, अर्थात् लेन-देन से विचलित न होकर बराबर बनी रहना ।

( ४ ) गुणवती और अदेय भूमि को यदि बलवान् सामंत खरीदना चाहे तो उससे 'अवसर आने पर आप मेरी सहायता करेंगे' ऐसी सामान्य संधि करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए, क्योंकि प्रबल सामंत दुर्बल से अविश्वास करके अपनी प्रतिज्ञा को तोड़ भी सकता है । इसको अनिभृतसन्धि कहते हैं ।

( ५ ) यदि समानशक्ति राजा उस भूमि को खरीदना चाहे तो नीचे लिखे कारणों पर अच्छी तरह विचार करके वह भूमि उसके हाथ बेच देनी चाहिए । वे कारण हैं : बेच देने पर यह भूमि कालान्तर में मेरे पास आ सकेगी, अथवा बेच देने पर भी मैं इससे लाभ उठाता रहूँगा, अथवा इस भूमि के साथ संबंध बना रहने के कारण दूसरा

Page 594Permalink

५१० कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवाँ अधिकरण

(१) तेन हीनः क्रेता व्याख्यातः ।
(२) एवं मित्रं हिरण्यं च सजनामजनां च गाम् ।
लभमानोऽतिसन्धत्ते शास्त्रवित्सामवायिकान् ॥

इति षाड्गुण्ये सप्तमेऽधिकरणेऽनवसितसन्धिनार्म एकादशोऽध्यायः,
आदितोऽष्टशततमः ।

—: ० :—


शत्रु मेरे वश में हो जायेगा, अथवा इसको बेच देने पर मैं मित्र तथा धन-संपति से संपन्न हो जाऊँगा ।'

( १ ) इसी प्रकार हीनशक्ति खरीददार के संबंध में भी समझना चाहिए ।

( २ ) अर्थशास्त्रज्ञ राजा इस प्रकार मित्र, धन, संपत्ति, आवाद और वंजर भूमि को प्राप्त करता हुआ दूसरे राजाओं की अपेक्षा सदा ही विशेष लाभ प्राप्त करता है ।

षाड्गुण्य नामक सप्तम अधिकरण में अनवसितसन्धि नामक
ग्यारहवाँ अध्याय समाप्त ।

—: ० :—

Page 595Permalink
प्रकरण ११६
अध्याय १२# कर्मसन्धि

(१) ‘त्वं चाहं च दुर्गं कारयावहे’ इति कर्मसन्धिः ।
(२) तयोर्यो दैवकृतमविषह्यमल्पव्ययारम्भं दुर्गं कारयति, सोऽतिसन्धत्ते ।
(३) तत्रापि स्थलनदीपर्वतदुर्गाणामुत्तरोत्तरं श्रेयः ।
(४) सेतुबन्धयोरप्याहार्योदकात्सहोदकः श्रेयान् । सहोदकयोरपि प्रभूतवापस्थानः श्रेयान् ।
(५) द्रव्यवनयोरपि यो महत् सारवद्द्रव्याटवीकं विषयान्ते नदीमातृकं द्रव्यवनं छेदयति, सोऽतिसन्धत्ते । नदीमातृकं हि स्वाजीवमपाश्रयश्चापदि भवति ।
(६) हस्तिवनयोरपि यो बहुशूरमृगं दुर्बलप्रतिवेशमन्तावक्लेशं विषयान्ते हस्तिवनं बध्नाति, सोऽतिसन्धत्ते ।


कर्मसन्धि

( सन्धि-विचार ४ )

( १ ) ‘आप और मैं मिलकर दुर्ग बनवायें’ इस प्रकार किसी कार्य सम्बन्धी वस्तु का नाम लेकर जो सन्धि की जाती है उसको कर्मसन्धि कहते हैं।

( २ ) इस प्रकार की सन्धि करने वाले विजिगीषु और उसका साथी राजा, दोनों में से वही विशेष लाभ में रहता है जो शत्रुओं से दुर्भेद्य दुर्गम स्थान में अल्प व्यय करके दुर्ग बनवाता है।

( ३ ) ऐसे दुर्गों में भी स्थल में बने दुर्ग की अपेक्षा जल में बना दुर्ग श्रेष्ठ है और उससे भी पर्वतीय प्रदेश में बना हुआ दुर्ग श्रेष्ठ होता है।

( ४ ) सेतुबंधों में वर्षा जल से भरने वाले की अपेक्षा स्वाभाविक अर्थात् नहर आदि के जल से भरने वाला सेतुबंध उत्तम है। उनमें भी वह सेतुबन्ध श्रेष्ठ है जो खेती योग्य पर्याप्त भूमि के निकट हो।

( ५ ) जो राजा अनेक पदार्थों को पैदा करने वाले जंगलों में नदियों से सींचे जाने योग्य फल-फूलों को पैदा करने वाले अपने सीमाप्रान्त के जंगलों को ठीक करता है। वही विशेष लाभ में रहता है। क्योंकि नदियों से सींचे जाने वाले स्थान आजीविका के साधन होने के साथ-साथ विपत्ति काल में आश्रय देने वाले भी होते हैं।

( ६ ) हाथी और मृग के जंगलों में भी जो राजा शक्तिशाली जंगली जानवरों

Page 596Permalink

५१२ कौटिल्य का अर्थशास्त्र [ सातवां अधिकरण

(१) तत्रापि 'बहुकुण्ठालपशूरयोरल्पशूरं श्रेयः। शूरेषु हि युद्धम्। अल्पाः शूरा बहूनशूरान् भञ्जन्ति, ते भग्नाः स्वसैन्यावघातिनो भवन्ति' इत्याचार्याः।

(२) नेति कौटिल्यः। कुण्ठा बहवः श्रेयांसः, स्कन्धविनियोगादनेकं कर्म कुर्वाणाः स्वेषामपाश्रया युद्धे, परेषां दुर्धर्षा विभीषणाश्च।

(३) बहुषु हि कुण्ठेषु विनयकर्मणा शक्यं शौर्यमाधातुं, न त्वेवाल्पेषु शूरेषु बहुत्वमिति।

(४) खन्योरपि यः प्रभूतसारामदुर्गमार्गामल्पव्ययारम्भां खनिं खानयति, सोऽतिसन्धत्ते।

(५) तत्रापि 'महासारमल्पसारं वा प्रभूतमिति। महासारमल्पं श्रेयः। वज्रमणिमुक्ताप्रवालहेमरूप्यधातुर्हि प्रभूतमल्पसारमत्यर्थेण ग्रसते' इत्याचार्याः।


से युक्त, दुर्बलों के लिए भी सुखकर और अनेक जाने-आने के मार्गों से युक्त हस्तिवनों को अपने प्रदेश में स्थापित करता है वह विशेष लाभ में रहता है।

(१) उन हाथी के जंगलों में भी अशक्त अधिक संख्यावाले हस्तिवन की अपेक्षा शक्तिशाली थोड़े हाथियों वाले जंगल ही श्रेष्ठ हैं; क्योंकि बलवान् हाथियों के भरोसे ही युद्ध होता है। इसके विपरीत पुरातन आचार्यों का कहना है कि अल्पसंख्यक शूर हाथी बहुसंख्यक कायर हाथियों को भगा देते हैं और वे तितर-वितर हो कर अपनी ही सेना को कुचल डालते हैं।

(२) किन्तु कौटिल्य इस तर्क से सहमत नहीं हैं। उनका कथन है कि शक्तिहीन बहुत हाथियों का होना ही श्रेयस्कर है; क्योंकि सेना के अनेक विभागों में उनसे अनेक कार्य लिए जा सकते हैं। इसलिए युद्ध में वे अच्छे सहायक, शत्रुओं को घबड़ा देने वाले (अधिक होने के कारण) और शत्रु के वश में न आने वाले होते हैं।

(३) संख्या में अधिक हाथी यदि सामर्थ्यहीन भी हों तो कोई हानि नहीं है; क्योंकि युद्ध सम्बन्धी शिक्षाओं के द्वारा उन्हें समर्थ बनाया जा सकता है; किन्तु शक्तिशाली थोड़े हाथियों की संख्या सहसा बढ़ाई नहीं जा सकती है।

(४) खानों में भी, जो राजा उत्तम वस्तुएँ देने वाली, दुर्गम मार्गों से युक्त और अल्प व्ययकर खानों को खुदवाता है वह विशेष लाभ प्राप्त करता है।

(५) उन खानों में भी मणि-माणिक्य आदि बहुमूल्य वस्तुओं को थोड़े परिमाण में उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? अथवा अधिक परिमाण वाली अल्पमूल्य की वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान श्रेष्ठ है? इस सम्बन्ध में पूर्वाचार्यों का कथन है कि 'बहुमूल्य थोड़ी वस्तुओं को उत्पन्न करने वाली खान अच्छी है; क्योंकि हीरा,

Page 597Permalink

प्र० ११६ : अ० १२ ] सन्धि-विचार ( ३ ) ५१३

(१) नेति कौटिल्यः। चिरादल्पो महासारस्य क्रेता विद्यते। प्रभूतः सातत्यादल्पसारस्य।
(२) एतेन वणिकपथो व्याख्यातः।
(३) तत्रापि 'वारिस्थलपथयोर्वारिपथः श्रेयान्, अल्पव्ययव्यायामः प्रभूतपण्योदयश्च' इत्याचार्याः।
(४) नेति कौटिल्यः। संरुद्धगतिरसार्वकालिकः प्रकृष्टभययोनिर्निष्प्रतिकारश्च वारिपथः। विपरीत: स्थलपथः।
(५) वारिपथे तु कूलसंयानपथयोः कूलपथः पण्यपट्टणबाहुल्याच्छ्रेयान्। नदीपथो वा सातत्याद्विषह्याबाधत्वाच्च।
(६) स्थलपथेऽपि। 'हैमवतो दक्षिणापथाच्छ्रेयान् हस्त्यश्वगन्धदन्ताजिनरूप्यसुवर्णपण्याः सारवत्तराः' इत्याचार्याः।

मणि, मोती, मूंगा, सोना, चाँदी आदि बहुमूल्य थोड़ी वस्तुएँ, अल्प मूल्य की अधिक वस्तुओं को भी दबा लेती हैं।'

( १ ) किन्तु कौटिल्य इस मन्तव्य से सहमत नहीं है। वह कहता है कि 'मूल्यवान् वस्तु का खरीददार बहुत समय बाद कोई विरला ही मिलता है; किन्तु अल्पमूल्य वस्तुओं के खरीदारों की कमी नहीं रहती है।'

( २ ) इसी प्रकार व्यापारिक मार्गों के सम्बन्ध में भी समझना चाहिए।

( ३ ) स्थलमार्ग और जलमार्ग में से जलमार्ग द्वारा व्यापार करना श्रेयस्कर है; क्योंकि उसमें श्रम तथा व्यय अधिक नहीं करना पड़ता और उसके द्वारा माल आसानी से लाया-ले-जाया जा सकता है—ऐसा प्राचीन आचार्यों का मत है।

( ४ ) इसके विपरीत आचार्य कौटिल्य का कथन है कि 'विपत्तिकाल में जलमार्ग सब ओर से रोका जा सकता है। सभी ऋतुओं में उससे जाना-आना भी नहीं हो सकता है। स्थल मार्ग की अपेक्षा वह भयजनक और अप्रतीकारक भी है। किन्तु स्थल मार्ग में ये सभी दिक्कतें नहीं होती हैं। इसलिए स्थलमार्ग ही श्रेष्ठ है।'

( ५ ) जलमार्ग दो प्रकार का होता है : एक तो किनारे-किनारे का मार्ग ( कूलपथ ) और दूसरा जल के बीच का मार्ग ( संयानपथ )। इन दोनों में कूलपथ ही श्रेष्ठ होता है, क्योंकि उस पर अनेक व्यापारिक नगर बसे होते हैं, जिससे बड़ा लाभ उठाया जा सकता है। अथवा संयानपथ भी उत्तम समझना चाहिए; क्योंकि नदी में निरन्तर पानी भरा रहता है, जिससे मार्ग में कोई उत्कट बाधा उपस्थित नहीं हो पाती है।

( ६ ) 'स्थलमार्ग में भी दक्षिणापथ की अपेक्षा उत्तरापथ श्रेष्ठ है, क्योंकि उस

३३ कौ०